मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

चन्द फ़र्द अश’आर

चन्द फ़र्द अश’आर


सुकून-ओ-चैन ज़ेर-ए-हुक्म  उनके आने जाने पे
वो आतें हैं तो आता है ,  नहीं आते ,  नहीं  आता
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वो चिराग़ लेके चला तो है ,मगर आँधियों का ख़ौफ़ भी
मैं सलामती की दुआ करूँ ,उसे हासिल-ए-महताब हो
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ज़माने की हज़ारों बन्दिशें क्यों फ़र्ज़ हो मुझ पर
अकेला मैं ही क्या ’आनन’ जो राह-ए-इश्क़ चलता हूँ ?
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तेरी उल्फ़त ज़ियादा तो मेरी उलफ़त है क्या कमतर
ज़ियादा-कम का मसला तो नहीं  होता है उलफ़त में
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अगर हो रूह में ख़ुशबू तो ख़ुद ही फैल जायेगी
ज़माने को दिखाना क्या , ज़माने को बताना क्या !
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हुस्न-ओ-जमाल यूँ तो इनायत ख़ुदा की है
उस हुस्न में दिखे  है  ख़ुदा का ज़ुहूर  भी
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अजब क्या चीज़ है ये नीद जो आंखों में बसती है
जब आना है तो आती है , नहीं आना ,नही आती
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जहाँ जहाँ पे पड़े थे तेरे क़दम ,जानम
वहीं वहीं पे झुकाते गए थे  सर अपने     
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खुद का चेहरा ख़ुद नज़र आता नहीं
जब तलक ना आइना  हो सामने
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बचाता दिल को तो कैसे  बचाता  मैं ,’आनन’
बला की धार थी उसकी निगाह-ए-क़ातिल  में
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यूँ  जितना भी चाहो  दबे पाँव आओ
हवाओं की ख़ुशबू से पहचान लूँगा

अगर मेरे दिल से निकल कर दिखा दो
तो फिर हार अपनी चलो मान लूँगा
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राह-ए-उलफ़त तो नही  आसान है
दिल को तू पहले अभी शैदा तो कर

सिर्फ़  सजदे  में पड़ा  है  बेसबब
इश्तियाक़-ए-इश्क़ भी पैदा  तो कर
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    तुझसे  ख़फ़ा  हूँ  ज़िन्दगी , तू  जानती भी  है
अब आ भी जा कि मुझ को मनाने की बात कर
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तुम्हारा रास्ता तुमको मुबारक हज़रत-ए-नासेह
अरे ! मैं रिन्द हूँ , पीर-ए-मुगां है ढूँढता  मुझको

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एक क़ता-----

भला होते मुकम्मल कब यहाँ पे इश्क़ के किस्से
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

पढ़ो ’फ़रहाद’ का किस्सा ,यकीं आ जायेगा तुम को
मुहब्बत में कभी ’तेशा’ भी बन कर मौत आती है

जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का ’आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको नीद आती है
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कुछ करो या मत करो ,इतना करो
है बची ग़ैरत अगर ,ज़िन्दा   करो

कौन देता है  किसी  को रास्ता
ख़ुद नया इक रास्ता  पैदा  करो

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जो मिले मुझ से चेहरे चढ़ाए थे ,वो
कोई मिलता नहीं  मुझ से मेरी तरह
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चाह अपनी कभी छुपा न सके
दाग़-ए-दिल भी उसे दिखा न सके
यार की आँख नम न हो-’आनन’
बात दिल की ज़ुबाँ पे ला न सके
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एक क़ता

खिड़कियाँ अब न खुलती किसी बात पर
आज इन्सानियत को ये क्या हो गया

लोग अपने ही थी जिनके हाथों लुटे
उनकी आँखों में पानी था ,क्या हो गया

सब को हासिल हुई है इनायत तेरी
एक मुझको न हासिल तो क्या हो गया

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ढूँढने मैं चला वो कि शायद  मिले
आदमी ही कहीं बीच में खो  गया

जब कि मंजिल क़रीब आने वाली ही थी
दरमियान-ए-सफ़र ,रहनुमा  सो गया


ज़िन्दगी तुम से कोई शिकायत नहीं
प्यार से भी छुआ तो ये दिल रो गया


ये उजाला तेरे दर पे पहुँचा न हो
पर खुशी है कि तेरी गली तो गया
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मिला कर खाक में मुझ को ,भला अब पूछते हो क्या
हुनर  कैसा  तुम्हारा और क्या   तक़दीर  थी मेरी

भरे थे रंग  कितने  ज़िन्दगी  में उम्र  भर  ’आनन’
जो वक़्त-ए-जाँ-ब लब  देखा ,फटी  तस्वीर थी मेरी
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महफ़िल में लोग आए थे अपनी अना के साथ
देखा नहीं किसी को भी ज़ौक़-ए-फ़ना  के साथ

नासेह ! तुम्हारी बात में नुक्ते की बात  है
दिल लग गया है  मेरा किसी  आश्ना  के साथ
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 एक क़ता ----

खिड़कियाँ  अब न खुलती किसी बात पर
आज इन्सानियत को ये क्या  हो  गया

ढूँढने मैं चला  वो कि शायद मिले
आदमी ही कहीं बीच में   खो  गया

जब कि मंजिल क़रीब आने वाली ही थी
दरमियान-ए-सफ़र  रहनुमा  सो गया

तेरे दर पे उजाला न पहुँचा भले
पर खुशी है कि तेरी गली तो गया

ज़िन्दगी तुम से कोई शिकायत नहीं
प्यार से भी  छुई ,मेरा दिल रो गया
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भला होते मुकम्मल कब ज़हाँ में इश्क़ के किस्से
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

जो अफ़साना अधूरा था ’विसाल-ए-यार’ का -आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको  नीद आती है
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ये माना तुम्हारे मुक़ाबिल न कोई
मगर इस का  मतलब ,ख़ुदा तो नहीं हो

बहुत लोग आए तुम्हारे ही जैसे
फ़ना हो गए,तुम जुदा तो नहीं हो
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ये शराफ़त थी हमारी ,आप की सुन गालियां
चुप रहे, हम भी सुनाते ,बेज़ुबां हम भी न थे
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गर हवाएँ सरकशी हों, क़ैद कर सकता है ’आनन’
इन्क़लाबी मुठ्ठियाँ तू , भींच कर ऐलान कर दे
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मैं जैसा भी हूँ और जो भी बना हूँ
तुम्हारी ही तख़्लीक़ का आइना हूँ
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न आलिम,न मुल्ला,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्बत ,अदब आश्ना हूँ
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मैं दरख़्त हूँ ,वो लगा गया ,मैं बड़ा हुआ ,वो चला गया
वो बसीर था जो भी ख़्वाब थे मेरी शाख़ शाख़ में जज़्ब है
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मेरा अहसास है ज़िन्दा तो राह-ए-रास्त है ’आनन’
वगरना इन अँधेरों में कहाँ से रोशनी मिलती
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तेरा होना ,नहीं होना ,भरम है तो भी अच्छा है
न तू होता तसव्वुर में , कहाँ फिर ज़िन्दगी मिलती


-anand.pathak-



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