शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 57 [ बह्र-ए-ख़फ़ीफ़]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 57 [ बह्र-ए-ख़फ़ीफ़]

[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

पिछली क़िस्त 56 में ,बह्र-ए-क़रीब पर चर्चा की है ,अब इस क़िस्त में ’बह्र-ए-ख़फ़ीफ़’ पर चर्चा करेंगे।
उर्दू के अमूमन हर शायर ने इस बह्र  में शायरी की है
 बह्र-ए-ख़फ़ीफ़  एक मुरक़्कब बह्र है जो 3-अर्कान से मिल कर बना है
फ़ाइलातुन---मुसतफ़अ’लुन--फ़ाइलातुन
2122--------2212--------2122
a------------b-------------a
यूँ तो इसकी ’मुसम्मन’ शकल या मुरब्ब: शकल में शायरी करने की मनाही तो नहीं है ,परन्तुउर्दू शायरी में ’मुसद्दस’ शकल में ही और ख़ास तौर से ’मख़्बून’ मुज़ाहिफ़ में  ही ज़्यादातर --ग़ज़लें कही गई हैं।
इस बह्र की मुसम्मन शकल के अर्कान होंगे
फ़ाइलातुन---मुसतफ़अ’लुन--फ़ाइलातुन-----मुसतफ़अ’लुन
2122--------2212--------2122------------2212
  a-------------b-------------a--------------b
 और मुरब्ब: शकल के अर्कान होंगे
फ़ाइलातुन--मुस तफ़अ’लुन
2122---------2212
a-----------------b
मगर कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब ने इसकी ’मुसम्मन शकल’ में एक कोशिश की है --आप भी ऐसी कोशिश कर सकते है। हम यहाँ सिर्फ़ कुछ ’मुसद्दस’ बह्र की ही चर्चा करेंगे -जो काफी प्रचलन में है
एक बात ध्यान देने की है
मुस तफ़अ’ लुन -[2212]--में वतद  ’ तफ़अ’ [21] -’ अपनी ’मफ़रूक़’ शकल में है [यानी सबब+ वतद मफ़रूक़+ सबब] जब कि
मुसतफ़इलुन      [2212 ] में  वतद   ’इलुन’    [12]  अपनी    ’मज्मुआ’   शकल में है [ यानी सबब+सबब+वतद-ए- मज्मुआ}
तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ेगा ? वज़न में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा --मगर ज़िहाफ़ लगाते वक़्त फ़र्क़ पड़ेगा । इस बह्र में ’मुस तफ़अ’- पर वही ज़िहाफ़ लगेंगे जो  ’.वतद-ए-मफ़रूक़’ पर लगते है ---न कि वतद-ए-मज्मुआ वाले ज़िहाफ़ात।
इन अर्कान पर लगने वाले कुछ ज़िहाफ़ की चर्चा कर लेते है

फ़ाइलातुन[2122] + ख़ब्न   = मख़्बून फ़इलातुन 1122

मुस तफ़अ’लुन [2212] +ख़ब्न     = मख़्बून  मफ़ाइ’लुन 1212

अब कुछ मानूस आहंग की चर्चा कर लेते हैं
[1] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्द्स
  फ़ाइलातुन---मुसतफ़अ’लुन--फ़ाइलातुन
   2122--------2212--------2122
कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के ही हवाले से

चाह्ते हैं वो बात उन से करूँ मैं
इस लिए शायद मुझ से बरहम नहीं है 

तक़्तीअ’ देख लेते हैं
2122     /  2  2  1   2/ 2122
चाह्ते हैं / वो बात उन /से करूँ मैं  = 2122---2212---2122
2  1  2   2     / 2 2     1  2 / 2 1 2 2
इस लिए शा /यद मुझ से बर/हम नहीं है   = 2122----2212----2122

[2] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून
फ़ाइलातुन-----मफ़ाइ’लुन--फ़इ’लातुन     [ -इ’ का मतलब -ऐन- मय हरकत है यानी मुतहर्रिक है ]
2122*---------1212--------1122
 आख़िरी रुक्न ’ फ़ इ’लातुन ’ देखें ---इसमे [ फ़े--ऐन--लाम तीनों मुतहर्रिक है और तीनों एक साथ भी है और फ़ इ’लातुन  मुज़ाहिफ़ रुक्न भी है ] तो तस्कीन-ए-औसत  का अमल हो सकता है । तब यह रुक्न ’मफ़ऊलुन’ [2 2 2] मे बदल जायेगी।  आप ’फ़ाइलातुन [2122] की जगह ’ फ़ इ’लातुन [1122] का इस्तेमाल कर सकते हैं तो तस्कीन-ए-औसत का अमल यहाँ भी हो सकता है । मगर ख़याल रहे--एक ही मिसरा में दोनो रुक्न पर तस्कीन-ए-औसत का अमल एक साथ ही न कर दें- [यानी मफ़ऊलुम 222 एक ही मिसरा में न कर दें ] -उचित नहीं होगा
तो एक शकल  यह भी हो सकती है

[2-क] फ़ाइलातुन-----मफ़ाइ’लुन--मफ़ऊलुन   
         2122*---------1212--------222
[3] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख्बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन---मफ़ा इ’लुन---फ़ इ’लुन
2122*---------1212------112‍**
ग़ालिब के शे’र से उदाहरण देते है

दर्द मिन्नत-कशे-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ ,बुरा न हुआ

तक़्तीअ’ कर के देख लेते है
2    1  2     2   / 1 2   1 2  / 112
दर् द मिन् नत/ -कशे-दवा /न हुआ
2  1  2     2   / 1 2  1 2  / 1 1 2
मैं न अच् छा/ हुआ ,बुरा /न हुआ

[3-क] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख्बून महज़ूफ़ मुसक्किन
फ़ाइलातुन---मफ़ा इ’लुन---फ़ेलुन
2122*---------1212------22
एक उदाहरण देख लेते है
ग़ालिब  की एक मशहूर ग़ज़ल है--आप ने भी सुना होगा

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

तक्तीअ’ कर के देख लेते हैं
1 1     2   2   / 1 2 1 2  / 22
दिल-ए-नादाँ / तुझे हुआ /क्या है
2  1      2    2    /  1 2 1 2   / 2 2
आ ख़ि रिस दर् / द की दवा /क्या है
[नोट-दिल को यहाँ 1 1 के वज़न पर लिया गया है कारण कि -दि- तो मुतहर्रिक है ही [1] ---और -ल- भी मुतहर्रिक हो गया[1]   कारण कि आगे -इत्फ़- जो है ।
’आखिर इस ’ -में वस्ल है अलिफ़ का---आ खि रिस [212--]
इसी ग़ज़ल का मक़्ता है

मैने माना कि कुछ नहीं ’ग़ालिब’
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

तक़्तीअ तो आप कर ही लेंगे---बस यह बताना था कि  दोनो मिसरे-
- 2122--1212---22
-2122  --1212---22 के वज़न मैं है

[4] बह्र-ए-खफ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून मक़्सूर
फ़ाइलातुन---मफ़ा इ’लुन---फ़ इ’लान
2122*---------1212------1121**
मीर का एक शे’र है
अब तो दिल को न ताब है न क़रार
याद-ए-अय्याम जब तहम्मुल  था

अब तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
   2   1  2     2  / 1  2 1 2 / 1 1 2 1   = 2122--1212---1121
अब तो दिल को/ न ताब है / न क़रार
2    1    2   2    / 1 2  1   2    / 2 2  =   2122---1212----22
याद-ए-अय या /म जब त हम् /मुल  था

[4-क] बह्र-ए-खफ़ीफ़ मुसद्दस मख़्बून मक़्सूर मुसक्किन
फ़ाइलातुन---मफ़ा इ’लुन---फ़ेलान
2122*---------1212------221
मीर का एक शे’र है

अब तो जाते हैं बुतकदे से मीर
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा  लाया

तक्तीअ’ आप कर के देख लें --इशारा मैं कर देता हूँ

अब तो जाते /हैं बुतकदे /से ’मीर’  = 2122---1212----221= [----मक़्सूर-मुसक्किन ]
फिर मिलेंगे /अगर ख़ुदा  /लाया     = 2122---1212----22   =[ ---महज़ूफ़ मुसक्किन ]

[नोट  ’मख़्बून’ ज़िहाफ़ के केस में -
* फ़ाइलातुन [2122] की जगह -फ़इ’लातुन [1122] भी लाया जा सकता है । क्यों ? कारण कि ज़िहाफ़ ’ख़ब्न’ दोनो ही रुक्न पर लगता है और एक आम ज़िहाफ़ भी है आप चाहें तो पहले रुक्न पर लगाएँ या न लगाए। दूसरे रुक्न पर तो लगाना ही लगाना है
कारण कि फ़ाइलातुन [2122] का मख्बून फ़ इ’लातुन [1122] ही होता है

**  इन पर तस्कीन-ए-औसत का अमल हो सकता है और अगली बह्र बरामद हो सकती है
और अरूज़/ज़र्ब के मुकाम पर -22/221/112/1121--आपस में सब मुतबादिल भी है --यानी शे’र में एक दूसरे के मुक़ाम पर लाया जा सकता है
चलते चलते इसकी मुरब्ब: आहंग की भी चर्चा कर लेते है

[5] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुरब्ब:
    फ़ाइलातुन -----मुस तफ़अ’लुन
   2122-----------2212
कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब के ही हवाले से

हाल मेरा ? मेरा जुनू
इसको देखा अहल-ए-नज़र

बात दिल की जाने भी दो
दिल कहाँ है किसको ख़बर

दूसरे शे’र की तक़्तीअ कर के देख लेते है---आसान है
2  1    2   2   /   2 2 1 2
बात दिल की / जाने भी दो = 2122--2212
2     1   2  2  / 2     2   1  2
दिल कहाँ है / किस को ख़बर =2122--2212
[6] बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ मुरब्ब: सालिम मख़्बून /मुसब्बीग़
फ़ाइलातुन------मफ़ाइ’लुन/मफ़ाइ’लान
2122-----------1212/12121

हम तरसते रहें निगार
हो तो औरों से हमकिनार
              -नामालूम

इशारा हम कर देते हैं --तक़्तीअ’ आप कर लें
2     1 2   2 / 1 2 1 2 1
हम त रस ते / रहें निगार = 2122---12121
2   1   2 2   / 1 2  1   2 1
हो तो औरों / से हम किनार =          2122---12121
यह मुस्बीग़ का उदाहरण था। अरूज़ और ज़र्ब के मुक़ाम पर मफ़ाइ’लान -12121] की जगह मफ़ाइ’लुन [1212]लाया जा सकता है
एक उदाहरण वो भी देख लें [कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से]

ज़िन्दगी इक सवाल है
साँस लेना मुहाल  है
तक़्तीअ’ आसान है--आप कर के देख सकते है
 इनके अलावा और भी बहूर बरामद हो सकती है जिसकी यहाँ चर्चा करना कोई ख़ास ज़रूरी  भी नहीं है
जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि शायरों ने अपने कलाम ज़्यादातर ’मुसद्दस ’ आहंग में ही कहे हैं -और उनकी ग़ज़लों के अश’आरों में  अरूज़/ज़र्ब के मुकाम पर -22/221/112/1121-का ख़ल्त दिखाई देता है कारण कि ये सब -आपस में सब मुतबादिल भी है
यहाँ कुछ ऐसे ही मशहूर शे’र पेश कर रहा हूँ आप भी लुत्फ़ अन्दोज़ हों--बह्र/आहंग आप पहचाने

तुम हमारे किसी तरह न हुए
वरना दुनिया में क्या नहीं होता
-मोमिन
आँख उस पुरज़फ़ा से लड़ती है
जान कुश्ती कज़ा  से लड़ती  है
-ज़ौक़

जाओ अब सो रहो सितारों
दर्द की रात ढल चुकी है
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
फिर हुईं दिल में हसरतें आबाद
नाले देने लगे मुबारकबाद 
-दाग़ देहलवी
दूर होकर भी पास है कोई 
एह्तमाम-ए-नज़र को क्या कहिए
-शकील बदायूनी
मौत इक गीत रात गाती थी
ज़िन्दगी झूम झूम जाती  थी
-फ़िराक़ गोरखपुरी
मैं जहाँ हूँ तेरे ख़याल में हूं
तू जहाँ है मेरी निगाह में है
-जिगर मुरादाबादी
बेख़ुदी बेसबब नहीं ’ग़ालिब’
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है
-ग़ालिब-
शाम से कुछ बुझा सा रहता है
दिल हुआ है चिराग़ मुफ़लिस का
-मीर-
बेवफ़ा रास्ते  बदलते हैं
हमसफ़र साथ साथ चलते हैं
-बशीर बद्र
अगर आप इजाज़त दे और आप को नागवार न गुज़रे -तो इस हक़ीर के भी कुछ शे’र इसी आहंग में बर्दास्त कर लें

इक धुआँ सा उठा दिया तुम ने
झूट को सच बता  दिया तुम ने
-----
आदमी है,गुनाह  लाज़िम है
आदमी तो ख़ुदा  नहीं  होता
---
लोग क्या क्या नहीं कहा करते
जब कभी तुम से हम मिला करते
---
बज़ाहिर ऐसे हज़ारों अश’आर मिसाल के तौर पर दिए जा सकते है ।इसी बात से पता चलता है कि यह आहंग कितना दिलकश मानूस और आहंगखेज़ है

अब बहर-ए-ख़फ़ीफ़ का बयान ख़त्म हुआ । अगली क़िस्त में किसी और बह्र की चर्चा करेंगे

अस्तु
 {क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

-आनन्द.पाठक-

कोई टिप्पणी नहीं: