शनिवार, 3 नवंबर 2018

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 51 [बह्र-ए-मुज़ारे’: भाग-2 और अन्तिम]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 51 [बह्र-ए-मुज़ारे’:  भाग-2  और अन्तिम]

[Disclaimer cause : वही जो क़िस्त -1 में है]

पिछली क़िस्त 50 में   ’बह्र-ए-मुज़ारे’ के बारे में कुछ चर्चा की थी । इस क़िस्त में मुज़ारे’ की कुछ मक़्बूल बह्रों  की चर्चा करेंगे।
यह बह्र इतनी मक़्बूल और दिलकश है कि ’मीर’ ने इस का कसरत से [प्रचुरता से]  प्रयोग किया है
अब बह्र-ए-मुज़ारे’ के  कुछ प्रचलित और लोकप्रिय आहंग ---

[क] मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ सालिम अल आखिर
मफ़ऊलु---फ़ाअ’लातु---मफ़ाईलु---फ़ाअ’लातुन           [ यहां -अ’- को आप समझ लें कि ’मुतहर्रिक है और -1- से दर्शाया गया है]
221--------2121-------1221----2122
डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से

मैं वक़्त के ग़ुबार में खो जाउँगा किसी दिन
ज़िन्दा रहोगे तुम तो मेरी शायरी में लेकिन

यहाँ तक़्तीअ’ करने की ज़रूरत तो नहीं है ,आप अब खुद भी कर सकते हैं ।  आप कहें तो कर देता हूं
2  2    1  / 2 1  2  1  / 1 2   2 1 /  2  1 2  1
मैं वक़् त / के ग़ु बार / में खो जाउँ/ गा किसी दिन
2     2   1 /  2 1   2   1  / 1  2  2 1  / 2 1 2 2
ज़िन् दा र/ हो गे तुम  तो /मि री शाय /री में ले किन

अब यह मत पूछियेगा कि यहाँ -में--ऊँ---तो--आदि को -1- के वज़न पर क्यों लिया
कारण साफ़ है---एक तो बह्र में वज़न की माँग है । दूसरा यह  कि ये सब अर्कान के  मुतहर्रिक [1] के मुकाम पर आ भी रहे है  और यह सब मुतहर्रिक हैं भी जो अरूज़ के ऐन मुताबिक भी है

[ख] मज़ारि’अ मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़--मकफ़ूफ़ मुख़्न्निक़ सालिम अल आखिर \मुस्बीग़
मफ़ऊलु---फ़ा’अलातुन-//--मफ़ऊलु---फ़ा’अलातुन\ फ़ा’अल्लियान
221--------2122------//--221-----2122
यह बह्र --बह्र-ए-शिकस्ता है यानी दूसरे रुक्न के बाद ’अरूज़ी वक़्फ़ा’ है यानी लाजिमी है
ग़ालिब की ग़ज़ल  का एक शे’र है

उस शमअ’ की तरह से ,जिसको कोई बुझा दे
मैं भी जले हुओं में  , हूँ   दाग़-ए-ना तमामी 

इसकी तक़्तीअ’ भी कर के देख लेते हैं
2     2     1   / 2  1  2 2  //  2      2   1  / 2 1 2 2
उस शम अ’ /की त रा से // ,जिस को कु / ई बुझा दे
2    2  1  /  2 1 2  1  //  2   2   1 /  2  1 2 2
मैं भी ज / ले हुओं में  // , हूँ   दाग़-/ ना तमामी
 मैने पहले भी कहा है कि ये बह्र इतनी मक़्बूल और दिलकश बह्र है कि अमूमन हर शायर ने इसमे शायरी की है
कुछ चन्द अश’आर दीगर शायरों के आप की ज़ेर-ए-नज़र पेश कर रहा हूँ --आप भी लुत्फ़ अन्दोज़ होइए । अगर फ़ुर्सत मिले तो लगे हाथ तक़्तीअ भी कर लें -तो आप मुतमय्यिन हो सकते हैं

देखा करूँ तुझी को ,मंज़ूर है तो ये है
आँखें न खोलूँ तुझ बिन .मक़दूर है तो ये है      --मीर तक़ी ’मीर’

रहने की कोई जागह ,शायद न थी उन्होंके
जो याँ से उठ गए हैं फिर वो कभू न आए मीर तक़ी ’मीर’ 
[ नोट-- जागह---उन्होंके----कभू--- ये सब मीर के ज़माने की भाषा है]

हाँ किसको है मयस्सर ,यह काम कर गुज़रना
एक बांकपन से जीना . इक बांकपन से मरना जिगर मुरादाबादी

उस से भी शोख़तर हैं उस शोख़ की अदाएँ
कर जाएँ काम अपना ,लेकिन नज़र न आएँ जिगर मुरादाबादी

अगर आप को नागवार न गुज़रे --तो 1-2 अश’आर इस हक़ीर का भी बर्दाश्त कर लें

पर्दा तो तेरे रुख़ पर ,देखा सभी ने लेकिन
देखा तुझे नुमायां ख़ुर्शीद  में ,क़मर  में

आए गए हज़ारों .इस रास्ते पे  ’आनन’
तुम ही नहीं हो तनहा, इस इश्क़ के सफ़र में

ऐसे बहुत से अशाआ’र/ग़ज़ल दीगर शोअ’रा के मिल जायेंगे
एक बात और
आख़िर के रुक्न 2122 [फ़ा’अलातुन] की जगह ’फ़ा’अलय्यान’ [ 21221]  भी लाया जा सकता है }

[ग] मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ऊलु---फ़ा’अलातु--मफ़ाईलु--फ़ा’इलुन\फ़ा’इलान
221--------2121-----1221------212   \2121
ग़ालिब का एक मशहूर शे’र है

अर्ज़-ए-नियाज़-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

अब तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
  2   2  1  /  2  1  2   1  / 1 2    2    1  / 2  1 2 
अर् जे-नि /याज़-इश् क़/  के क़ा बिल न /हीं रहा
2       2    1  / 2 1  2  1/  1  2  2   1    / 2 1 2
जिस दिल पे /नाज़ था मु /झे वो दिल न   /हीं रहा
यह महज़ूफ़ की मिसाल है
अच्छा एक बात ---अगर मिसरा सानी में -’ जिस दिल पर नाज़ था मुझे---’ होता तो क्या होता?
मानी में तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता -पर शे’र में इब्तिदा’ के मुक़ाम पर जो रुक्न आयद है -मफ़ऊलु- [जिस दिल पर] वज़न से ख़ारिज़ हो जाता क्योंकि -पर - सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है और -2-का वज़न देता जब कि -पे- 1 का वज़न दे रहा है और मुतहर्रिक भी है -लु- के मुक़ाबिल है या फिर शायर -पर- को  -प- ही पढ़ेगा और वज़न दे कर पढ़ेगा।
मैने पहले भी कहा है कि ये बह्र इतनी मक़्बूल और दिलकश बह्र है कि अमूमन हर शायर ने इसमे शायरी की है
ग़ालिब के ही कुछ चन्द मज़ीद [अतिरिक्त] अश’आर इसी बह्र में पेश करते है

रोने से और इश्क़  में बेबाक हो गए
धोए गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए - ग़ालिब

’ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहे जिसे -ग़ालिब

अपने हुदूद से न बढ़े कोई इश्क़ में
जो ज़र्रा जिस जगह है वहीं आफ़ताब है             -जिगर मुरादाबादी

दिल की ख़बर न होश किसी को जिगर का है
अल्लाह , अब ये हाल तुम्हारी  नज़र का  है -जिगर मुरादाबादी

था मुस्तआर हुस्न से उसके जो नूर था
ख़ुर्शीद में भी उसका ही ज़र्रा ज़हूर  था मीर तक़ी ’मीर’

जब रफ़्तनी को इश्क़ का आज़ार हो गया
दो चार दिन में बरसों का बीमार  हो गया मीर तक़ी ’मीर’

अगर आप को नागवार न गुज़रे --तो 1-2 अश’आर इस हक़ीर का भी बर्दाश्त कर लें

अच्छा हुआ कि आप ने देखा न आइना
इल्जाम ऊगलियों पे लगाने का शुक्रिया


आने लगा है दिल को यकीं तेरी बात का 
फिर से उसी पुराने बहाने  की बात  कर 

[घ] मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुख्ननीक़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ऊलु---फ़ाअ’लातुन---मफ़ऊलु--फ़ा’अ लुन\फ़ा’अ लान
    221---2122---221---212-\ 2121
इसे मुज़ारे’ मुसम्मन अख़रब.सालिम.अख़रब,महज़ूफ़\मक़्सूर भी कह सकते हैं
कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब के हवाले से एक मिसाल

ज़ख़्मी नहीं हुआ है कोई भी और शख़्स
लिखे है पत्थरों पे अहल-ए-नज़र के नाम 

एक बार तक़्तीअ’ कर के देख लेते हैं
2      2    1 / 2 1 2 2   /  2 2 1  / 2  1 2
ज़ख़ मी न / हीं हुआ है /कोई भी/  और शख़् स्
2       2    1 /   2 1 2 2  /   2   2   1 / 2   1  2  1
लिख खे  है /पत् थरो पर / अह ले -न/ ज़र के नाम
एक स्पष्टीकरण [वज़ाहत]
मिसरा ऊला मे ’शख़्स" को 2 1 2 के वज़न पर क्यों लिया ?, 2 1 2 1  के वज़न पर क्यों नहीं लिया ?
ले सकते है -यहाँ ले सकते है --कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा
मगर तक़्तीअ’ के क़ायदा के मुताबिक --अगर किसी  लफ़्ज़ के अन्त में दो साकिन [ दोस्त--गोस्त--दुरुस्त शख़्स ---जैसे शब्द आ जाए तो तक़्तीअ’ में एक ही साकिन शुमार करते  है]
मिसरा सानी में ’लिख्खे हैं ’ क्यों लिया ?--’लिखे हैं ’ क्यों नहीं लिया ?
जी बिल्कुल सही ,दुरुस्त हैं आप
कारण साफ़ है --लिखे हैं---मक़्तूबी [ किताबत /लिखा हुआ] है जब कि -’लिख्खे हैं -- [ मलफ़ूज़ी /उच्चारित किया हुआ] है । तक़्तीअ’ में ’मल्फ़ूज़ी हर्फ़ ही शुमार करते है
एक बात और -- यहां बह्र में वज़न की माँग भी है और शायर लय और प्रवाह क़ायम रखने के लिए ’लिख्खे’ है ही पढ़ेगा
फिर आप कहेंगे " पत्थरों पर " को  ’पत्थरों पे’  क्यों नहीं लिया । आप ले सकते है --यहाँ दोनो चलेगा --कारण कि दोनो ही [-पे- और पर-] सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है और दोनो ही  ”फ़ाअ’लातुन’ के -तुन- [सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ] के मुक़ाम पर आयेगा
मगर जब आप के पास  better option है तो -पर- ही क्यों न लें सही लफ़्ज़ भी है । हाँ अर्कान के लिहाज़ से कोई मज़बूरी होती तो -पे- ही लेते
[च] मुज़ारे मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ाईलु---फ़ा’अलातु---मफ़ाईलु---फ़ा’अ लुन\ फ़ा’अ लान
1221-------2121-----1221------212----\2121
[ध्यान दीजियेगा -- इस वज़न को ऊपर [ग] की वज़न से confuse न कीजियेगा। कारण कि [ग] के सदर/इब्तिदा के मुक़ाम पर मुज़ाहिफ़ ’अख़रब’ --मफ़ऊलु--[221] है जब कि इस बह्र में सदर/इब्तिदा के मुक़ाम पर मुज़ाहिफ़ मक्फ़ूफ़ [मफ़ाईलु--1221] है
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से एक मिसाल देखते हैं

 जिसे जान से ज़ियादा कभी था अज़ीज़ मैं
वो कल राह में मिला तो मुझे अजनबी लगा

मुझे नहीं लगता कि अब आप को इसकी तक़्तीअ’ की ज़रूरत पडेगी। कारण कि यह साहब का ख़ुद साख्ता शे’र बतौर -ए-मिसाल है तो वज़न में होगा ही
चलिए आप का हुकुम है तो एक बार कर के देख लेते है 

जिसे जान / से ज़ियाद: /कभी था अ/ ज़ीज़ मैं
वो कल राह /में मिला तो /मुझे अज न /बी लगा

{छ]  मज़ारि’अ मुसम्मन अख़रम मक्फ़ूफ़  मुख़न्नीक़ मुसब्बीग़
मफ़ऊलुन----फ़ा’अला तुन---मफ़ऊलुन----फ़ा’अ लिय्यान
222----------2122----------222---------21221
आप जानते हैं कि ’मुफ़ाईलुन’ [1222] का ’अख़रम’ ’मफ़ऊलुन [2 2 2] होता है --यानी ’मुफ़ा’[1 2] वतद-ए-मज्मुआ का सर -मु- [1] ख़रम [ ख़त्म या सर कलम--हा हा हा] कर दीजिए--तो बचा -फ़ाईलुन [222] --जिसे मफ़ऊलुन [2 2 2] से बदल लीजिए। आप के मन में एक सवाल उठ रहा होगा --कि सालिम रुक्न पर ज़िहाफ़ लगाने से जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होती है --उसे अरूज़ी किसी ’हम वज़न’  दीगर रुक्न से बदल क्यों लेते है? ऐसा सवाल मेरे मन मैं भी उठा था।
जवाब सीधा है--- आप न बदलना चाहे न बदलें --जब तक वज़न बराबर है तब तक कोई कबाहट नहीं है । मगर अरूज़ में इतने ज़िहाफ़ हैं कि उनकी बदली हुई शकले [मुज़ाहिफ़] बरामद होंगी कि  हमको/आप को याद रखना मुशकिल हो जायेगा 
अत: अरूज़ियों ने इसका रास्ता निकाला कि ऐसे बरामद मुज़ाहिफ़ को ’कुछ standard अर्कान ’ जो हम वज़न हो --से बदल कर लें। और ऐसे ’standard अर्कान" }"
20-22 के आसपास बैठते हैं।
अब मूल विषय पर आते है---मज़ारि’अ मुसम्मन अख़रम मक्फ़ूफ़  मुख़न्नीक़ मुसब्बीग़ पर--एक उदाहरण देखते है । डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

ये दुनिया का तमाशा दो दिन का खेला है यार
जब आँखें बन्द होंगी फिर कुछ भी तो नहीं यार

इसकी तक्तीअ’ आप कर लें--- टुकड़े मै कर देता हूँ

ये दुनिया / का तमाशा / दो दिन का /खेल  है यार
जब आँखें / बन् द होंगी/  फिर कुछ भी / तो नहीं यार


-----------
इस बह्र के मुसद्दस वज़न के बहूर भी मुमकिन है
यहाँ सब का ज़िक्र करना ज़रूरी तो नहीं ,मात्र  उनके वज़न की चर्चा कर दे रहा हूँ । आप चाहें तो इन बहूर में तबअ’ आजमाई [शायरी की कोशिश] कर सकते है या कहीं से आप को उदाहरण भी मिल जाए----वैसे अमूमन सभी शायरों ने ज़्यादातर ’ मुसम्मन’ में ही शायरी की है और वो भी ’अख़रब,---मक्फ़ूफ़---महज़ूफ़--मक्सूर के मुज़ाहिफ़ शकल में और कुछ तख़्नीक़ के अमल से प्राप्त वज़न में भी ।

कुछ मुसद्दस शकलें---
[प] मुज़ारे’ मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन---फ़ाअ’लातुन
1222---------1222------2122

[ज]  मुज़ारे’ मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़
मफ़ऊलु----फ़ा’अ लातु---मफ़ाईलुन
221-------2121---------1222

[झ] मुज़ारे’ मुसद्दस अख्रब मक्फ़ूफ़ मुख़्न्नीक़
मफ़ऊलु----फ़ा’अलातुन----मफ़ऊलुन
221----------2122---------222
[त]  मुज़ारे’ मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़\मक़्सूर
मफ़ऊलु-----फ़ा’अ लातु----फ़ऊलुन\ फ़ऊलान
221-----------2121--------122  \1221
[थ] मुज़ारे’ मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ मुख़्न्नीक़\मक़्सूर
मफ़ऊलु------फ़ा’अ लातुन--फ़े लुन \फ़े लान
221----------2121----------22  \ 221
[द] मुज़ारे’ मुसद्द्स अख़रब मक्फ़ूफ़ मज्बूब \अहतम
मफ़ऊलु----फ़ा’अ लातु---फ़े’अल\ फ़ऊलु
221---------2121--------12   \ 121
[ध] मुज़ारे’ मुसद्दस मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ \मक़्सूर 
मफ़ाईलु----फ़ा’अलातु---फ़ऊलुन-\ फ़ऊलान
1221-------2121-------122-\1221
[ट] मुज़ारे’ मुसद्द्स मक़्बूज़ 
मफ़ा इलुन----फ़ाइलातुन---मफ़ाइलुन
1212---------2122-------1212
इसके अलावा  तख़नीक़ के अमल से और भी वज़न बरामद हो सकते है
मैं यह तो दावा नहीं कर सकता कि बह्र-ए-मुज़ारे’ के सारे वज़न पर बातचीत कर ली -मगर हाँ काफ़ी कुछ कर ली।

अब अगली क़िस्त में एक नए बह्र पर बातचीत करेंगे
अस्तु
{क्षमा याचना -वही जो पिछले क़िस्त में है}-इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

-आनन्द.पाठक-




कोई टिप्पणी नहीं: