गुरुवार, 27 सितंबर 2018

एक सूचना----

  एक सूचना----

मित्रो !
---लगभग 6 महीने के ’अमेरिका-प्रवास’ के उपरान्त ,मैं  दिनांक 20-09-18 को  भारत  वापस आ गया
 अब  "उर्दू बह्र पर एक बातचीत" का सिलसिला शीघ्र ही पुन: शुरु करूँगा और बाक़ी बचे बह्र पर रोशनी डालने की कोशिश करूँगा
इन्शा अल्लाह
सादर
-आनन्द पाठक-

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल : कौन बेदाग़ है ---

एक ग़ज़ल

कौन बेदाग़ है  दाग़-ए- दामन नहीं ?
जिन्दगी में जिसे कोई उलझन नहीं ?

हर जगह पे हूँ मैं उसकी ज़ेर-ए-नज़र
मैं छुपूँ तो कहाँ ? कोई चिलमन नहीं

वो गले क्या मिले लूट कर चल दिए
लोग अपने ही थे कोई दुश्मन नहीं

घर जलाते हो तुम ग़ैर का शौक़ से
क्यों जलाते हो अपना नशेमन नहीं ?

बात आकर रुकी बस इसी बात पर
कौन रहजन है या कौन रहजन नहीं

सारी दुनिया ग़लत आ रही है नज़र
साफ़ तेरा ही मन का है दरपन नहीं

इस चमन को अब ’आनन’ ये क्या हो गया
अब वो ख़ुशबू नहीं ,रंग-ए-गुलशन नहीं

-आनन्द.पाठक--

शनिवार, 15 सितंबर 2018

चन्द माहिया: क़िस्त 54

चन्द माहिया  :क़िस्त 54

:1:
ये कैसी माया है
तन तो है जग में
मन तुझ में समाया है

:2:
जब  तेरे दर आया
हर चेहरा मुझ को
मासूम नज़र आया

:3:
ये कैसा रिश्ता है
देखा कब उसको
दिल रमता रहता है

:4:
बेचैन बहुत है दिल
कब तक मैं तड़पूं
बस अब तो आकर मिल

:5:
यादें कुछ सावन की
तुम न आए जो
बस एक व्यथा मन की

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल : झूठ का जब धुआँ---

एक ग़ज़ल :

झूठ का जब धुआँ ये घना हो गया
सच  यहाँ बोलना अब मना हो गया

आईना को ही फ़र्ज़ी बताने लगे
आइना से कभी सामना हो गया

रहबरी भी तिजारत हुई आजकल
जिसका मक़सद ही बस लूटना हो गया

जिसको देखा नहीं जिसको जाना नहीं
क्या कहें ,दिल उसी पे फ़ना हो गया

रफ़्ता रफ़्ता वो जब याद आने लगे
बेख़ुदी में ख़ुदी  भूलना हो गया

रंग चेहरे का ’आनन’ उड़ा किसलिए ?
ख़ुद का ख़ुद से कहीं सामना हो गया ?

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 3 सितंबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 53

चन्द माहिया  :क़िस्त 53

:1:
सब क़िस्मत की बातें
कुछ को ग़म ही ग़म
कुछ को बस सौग़ातें

:2:
कब किसने है माना
आज नहीं तो कल
सब छोड़ के है जाना

:3:
कब तक भागूँ मन से
देख रहा कोई
छुप छुप के चिलमन से

:4:
कब दुख ही दुख रहता
वक़्त किसी का भी
यकसा तो नहीं रखता

:5:
जब जाना है ,बन्दे !
काट ज़रा अब तो
सब माया के फन्दे


-आनन्द.पाठक-