शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

एक गजल : आँख मेरी भले अश्क से नम नहीं---

गजल

आँख मेरी भले अश्क से नम नहीं
दर्द मेरा मगर आप से  कम नहीं

ये चिराग--मुहब्बत बुझा दे मेरा
आँधियों मे अभी तक है वो दम नहीं

इन्कलाबी हवा हो अगर पुर असर
कौन कहता है बदलेगा मौसम नहीं

पेश वो भी खिराज़--अक़ीदत किए
जिनकी आँखों मे पसरा था मातम नहीं

एक तनहा सफर में रहा उम्र  भर
हम ज़ुबाँ भी नही कोई हमदम नहीं

तन इसी ठौर है मन कहीं और है
क्या करूँ मन ही काबू में,जानम नहीं

ये तमाशा अब 'आनन' बहुत हो चुका
सच बता, सर गुनाहों से क्या ख़म नहीं?


-आनन्द पाठक-

शनिवार, 11 अगस्त 2018

चन्द माहिया {सावन पे] : क़िस्त 52

चन्द माहिया  [सावन पे ] : क़िस्त 52


[नोट : मित्रो ! विगत सप्ताह सावन पे चन्द माहिए [क़िस्त 51] प्रस्तुत किया था
उसी क्रम में -दूसरी और आखिरी कड़ी प्रस्तुत कर रहा हूँ--]

:1:
जब प्यार भरे बादल
सावन में बरसे
भींगे तन-मन आँचल

:2:
प्यासी आँखें तरसी
उमड़ी तो बदली
जाने न कहाँ बरसी

:3:
उन पर न गिरे ,बिजली
डरता रहता मन
जब जब चमकी पगली

:4:
इक बूँद की आस रही
बुझ न सकी अबतक
चातक की प्यास वही

:5:
कितने बदलाव जिए
सोच रहा हूँ मैं
कागज की नाव लिए


-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 8 अगस्त 2018

चन्द माहिया सावन पे : क़िस्त 51

चन्द माहिया  [सावन पे ] : क़िस्त 51

:1:
सावन की घटा काली
याद दिलाती है
वो शाम जो मतवाली

:2:
सावन के वो झूले
झूले थे हम तुम
कैसे कोई भूले

:3:
सावन की फुहारों से
जलता है तन-मन
जैसे अंगारों से

;4:
आएगी कब गोरी ?
पूछ रही मुझ से
मन्दिर की बँधी डोरी

:5:
क्या जानू किस कारन ?
सावन भी बीता
आए न अभी साजन

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 4 अगस्त 2018

एक ग़ज़ल : ये आँधी ,ये तूफ़ां---

एक ग़ज़ल : ये आँधी ,ये तूफ़ाँ--

ये आँधी ,ये तूफ़ाँ ,मुख़ालिफ़ हवाएँ
भरोसा रखें, ख़ुद में हिम्मत जगायें

कहाँ तक चलेंगे लकीरों पे कब तक
अलग राह ख़ुद की चलो हम बनाएँ

बहुत दूर तक आ गए साथ चल कर
ये मुमकिन नहीं अब कि हम लौट जाएँ

अँधेरों को हम चीर कर आ रहे हैं
अँधेरों से ,साहब ! न हम को डराएँ

अगर आप को शौक़ है रहबरी का
ज़रा आईना भी कहीं देख आएँ

अभी  कारवाँ मीर ले कर है निकला
अभी से तो उस पर न उँगली उठाएँ

यहाँ आदमी की कमी तो नहीं है
चलो ’आदमीयत’ ज़रा ढूँढ  लाएँ

न मन्दिर, न मस्जिद, कलीसा न ’आनन’
नया पुल मुहब्बत का फिर से बनाएँ

-आनन्द.पाठक-