मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 28 [बह्र-ए-मुतदारिक -3]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 28 [बह्र-ए-मुतदारिक-3]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

---फिछली 2-क़िस्तों से बहर-ए-मुतदारिक पर बहस चल रही है जिस में अब तक मुतदारिक की सालिम ,मुरब्ब: ,मुसद्दस,मुसम्मन और उसकी मुज़ाअफ़  बह्र की चर्चा कर चुके हैं। साथ ही इस पर लगने वाले तमाम मुमकिनात [संभावित] ज़िहाफ़ात की भी चर्चा कर चुके है। साथ ही  बहर-ए-मुतदारिक सालिम मक़्तूअ अल आखिर ,मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून पर भी चर्चा कर चुके हैं और एक दिलचस्प वाक़या भी बयान कर चुके हैं । परन्तु बहर-ए-मुतदारिक मख़बून की बहस ख़तम नहीं हुई थी। बहस जारी है -------
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़बून का वज़न है
फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्
1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2  [ -ऐन-ब हरकत यानी मुतहर्रिक]
और कहा था कि ."तस्कीन-ए-औसत"  की अमल से और भी औज़ान [ वज़्न का जमा] बरामद किए जा सकते हैं जिसमे एक औज़ान दर्ज-ए-ज़ैल [ निम्न]  भी बरामद होगा

[क] फ़अ लन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्      [ -ऐन- ब सकून ]
  22-------- 22---------22----------22-   और इस बहर का नाम होगा  बह्र-ए--मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन"
एक उदाहरण लेते हैं

रह जाता पर्दा उल्फ़त का 
पलकों ने छलकाए   आँसू
अब इसकी तक़्तीअ भी कर के देखते हैं
 2     2 /  2   2   /  2   2   /  2   2 = 22---22---22--22
रह जा / ता पर् / दा  उल / फ़त का
2      2   /    2   2  / 2  2   / 2  2 = 22---22---22---22
पल कों /  ने छल  /का ए   /आँ सू
बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़बून  मुज़ाअफ़ का वज़न है

फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्---फ़इलुन्-- फ़इलुन्
1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2-- 1 1 2----1 1 2------1 1 2-----1 1 2
जैसा कि ऊपर कह चुके है [और पिछली किस्त में चर्चा भी कर चुके है ] कि इस मुज़ाहिफ़ बहर पर ’तस्कीन-ए-औसत ’ के अमल से अनेकानेक वज़न बरामद की जा सकती है जिसमें से एक वज़न निम्न्  भी होगी
फ़अ लुन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्    --फ़अ लुन्----फ़अ लुन्----फ़अ लुन्---फ़अ लुन्        [ -ऐन- ब सकून ]
[ख] 22-----------22----------22--------22--------22-----------22---------22----------22
और इस बहर का नाम होगा ’बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन मुज़ाअफ़ ---इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि ’ तस्कीन’ का अमल किस रुक्न या किस मुक़ाम पर किया गया है-ऐसी बह्र में ’तस्कीन’ का अमल किसी रुक्न पर.किसी मुक़ाम पर किया जा सकता है और यह जाइज भी है
और शायरी में ऐसी बह्र [16-रुक्नी] बह-ए-शिकस्ता भी होती है [ बह्र -ए-शिकस्ता पर किसी और मक़ाम पर तफ़्सील से चर्चा करेंगे]
अब एक दिलचस्प बात और ---चलते चलते--
जब बहर-ए-मुतक़ारिब के मुज़ाहिफ़ बहर की चर्चा कर रहे थे तो ऐसी ही शकल की बहर
22---22----22----22----22---22----- से साबका [सामना] हुआ था जिसे हम आप ’मीर’ की बहर कह कर आगे बढ़ गए थे । अब इन दोनो ’हम शकल बहर का ’तुलनात्मक अध्ययन" और उस में बुनियादी फ़र्क़ पर तफ़्सील अगले क़िस्त में पेश् करेंगे। सोसा छोड़ दिया है मैने यहाँ।

आज हम मुतदारिक की कुछ और मुज़ाहिफ़ बह्र की चर्चा करेंगे

[ग]  बहर-ए-मुतदारिक मुसद्दस  महज़ूज़ :  इस बहर की बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़अ
212-------212------2
हम जानते हैं कि
फ़ाइलुन [2 1 2] + हज़्फ़  = महज़ूफ़ ---फ़अ [2] यहाँ -ऐन-बसकून है यानी साकिन है और चूँकि हज़फ़ एक ख़ास ज़िहाफ़ है जो शे’र के ख़ास मुक़ाम ’अरूज़ और जर्ब" के लिए निर्धारित हैं
एक मिसाल [उदाहरण] लेते हैं [कुछ मिला नहीं तो ख़ुद साख़्ता (स्वयं का बनाया हुआ) ही कह दिया...कृपया मयार न देखियेगा ]

आप से क्या कहें हम
आँख मेरी है  क्यूँ नम ?

तक़्तीअ भी कर लेते है
2    1   2 /  2   1  2   / 2 =212--212--2
आ प से /  क्या क हें  /हम
2     1 2  / 2  1  2   / 2 = 212---212--2
आँ ख मे /री है  क्यूँ  /नम ?

[घ] बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन महज़ूज़ : इस बहर का बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ
212-------212-------212-----2

अपनी सूरत ज़रा तुम दिखा दो 
मेरे दिल की लगी को बुझा  दो

अब तक़्तीअ कर के देखते हैं
  2  1   2  / 2  1  2  / 2  1  2    / 2   =   212---212---212---2-
अपनी सू /रत ज़ रा /तुम दि खा /दो
2  1     2 /  2  1 2  /  2 1 2   / 2 = 212---212---212---2
मेरे दिल / की लगी /को बु झा  /दो

वही बात -यहाँ भी बह्र की माँग पर -नी- -रे-  पर की मात्रा गिरा कर इसे-1- के वज़न पर लिया गया है वरना तो ये -2- के वज़न पर के हर्फ़ हैं } अगर कहीं ज़रूरत पड़ी तो या कहीं बह्र की माँग हुई तो  इसे 2 के ही वज़न पर लेंगे
आप को इस वज़न पर और भी बहुत से अश’आर मिल जायेंगे .चाहें तो आप भी बना सकते है कोई शे’र या मिसरा।
चलिए एक और उदाहरण लेते हैं [ जनाब आरिफ़ ख़ान साहब के हवाले से]

नरम बिस्तर पे बे ख़्वाब था कल
आज सोता है जो पत्थरों  पर 

आप की तसल्ली के लिए ,इसकी भी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
  2    1    2  / 2  1  2 /   2  1  2 /  2 = 212---212---212--2
 नर म बिस/ तर पे बे /  ख़ा ब था /कल
2  1     2   /  2  1  2/   2  1   2   / 2 = 212---212---212--2
आ ज सो / ता है जो /  पत थ रों  / पर
यहाँ भी वही बात - -पे- -है-  पर मात्रा गिरा कर -1- की वज़न पर लिया गया है औए यह शायरी में जायज है।
इस बहर की मुज़ाअफ़ शकल  भी मुमकिन है

[च]  बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन महज़ूज़ मुज़ाअफ़   - इस बहर की बुनियादी वज़न है
फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ-//-फ़ाइलुन्---फ़ाइलुन्--फ़ाइलुन्--फ़अ
212-------212-------212-----2// 212-------212-------212-----2
 इसकी भी एक मिसाल देखते है [ डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

मेरा वादा है तुझ से यह हमदम , आँधियाँ आए तूफ़ान आए
ज़िन्दगी की डगर में सदा मैं  ,साथ तेरा निभाता   रहूँगा

 अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते है
2  1   2/ 2 1  2   / 2 1  2  / 2  //     2 1 2 / 2 1 2 / 2 1 2    /2 = 212--212---212--2 // 212---212---212---2
मेरा वा/दा है तुझ /से ये हम/दम //, आँधियाँ /आए तू/ फ़ान आ /ए
 2   1   2 /   2  1 2  / 2 1 2 / 2 //  2 1 2   / 2 1 2 / 2  1  2 / 2 = 212---212---212-2 // 212--212---212--2
ज़िन्दगी  /की डगर /में सदा  /मैं  // ,साथ ते/ रा निभा /ता   रहूँ /गा

 अब यह मत पूछियेगा कि --रा---है---ये---ए-- को -1- की वज़न पे क्यूँ  लिया ?अब् आप् जान् गए होंगे
अच्छा .हम लोगो ने मुतदारिक की ---- मख़्बून मुज़ाहिफ़  और महज़ूज़ मुज़ाहिफ़ की चर्चा ऊपर कर चुके हैं और तस्कीन के अमल की भी चर्चा कर चुके है
अब ऐसे बह्र की चर्चा करेंगे जो एक साथ  मख़्बून भी हो और महज़ूज़ भी है

{ छ] मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन महज़ूज़--- इस बहर का बुनियादी वज़न है
 फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ         -[यहाँ भी-ऐन-बसकून है]        [
 22-------------22--------22--------2
एक उदाहरण देखते है [ आरिफ़ हसन खान साहब की किताब से]

मुझ में बस तू ही तू है
मैं तेरा आईना   हूँ 

इसकी तक़्तीअ भी कर लेते हैं
2      2  / 2   2/  2  2 / 2 22---22---22---2
मुझ में /बस तू  /ही तू /है
2   2  / 2  2/  2  2 / 2 22---22----22--2
मैं ते /रा आ /ई ना  /  हूँ

इस बहर की मुज़ाअफ़ शकल भी मुमकिन है
[ज]  मुतदारिक मुसम्मन मख़्बून मुसक्किन महज़ूज़ मुज़ाअफ़     इस बहर का बुनियादी वज़न है
 
 [ज] फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ  // फ़अ लुन्--- फ़अ लुन्---फ़अ लुन्   ---फ़अ         -[यहाँ भी-ऐन-बसकून है]        [
 22-------------22--------22--------2   //   22-------------22--------22--------2

यह् बहर शिकस्ता भी है

एक उदाहरण देखते हैं

तुझ बिन घर का हर गोशा ,सूना सूना लगता है
अपना घर भी अब मुझको ,बेगाना सा लगता है

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
      22    /  2 2    /  2  2  / 2  // 2  2 / 2  2 /2  2     / 2 =   22---22---22---2//22 ---22---22--2
तुझ बिन / घर का /हर गो /शा //,सूना / सूना/ लग ता  /है
       2 2 /  2  2/  2    2    / 2 //  2 2  / 2 2 / 2    2  / 2 =22---22----22---2 // 22---22---22--2
 अपना /घर भी/ अब मुझ /को //,बे गा /ना सा/ लग ता /है

यूँ तो मुतदारिक पर दो ज़िहाफ़ के अमल से और भी वज़न बरामद किए जा सकते है मगर उन तमाम वज़न की ज़रूरत नहीं है
मानूस बहर की चर्चा कर चुका हूँ आप चाहे तो कोई ख़ास वज़न चुन कर शायरी कर सकते है /शे’र अश’आर कह सकते है जो वज़न और बहर से पाक होगी

यह बहस तो शायरी की आधी बहस ही चल रही है यानी अरूज़ की है वज़न की है बहर की है रुक्न-ओ-अर्कान की है
आधी बहस तो बलाग़त फ़साहत इल्म-ए-बयान की होती है } ख़ैर....
अगली क़िस्त में बहर-ए-मुतदारिक और बहर-ए-मुतक़ारिब पर तुलनात्मक अध्ययन पेश करेंगे


मुझे उमीद है कि मुतदारिक के इस मुज़ाहिफ़ बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

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