सोमवार, 30 जनवरी 2017

एक क़ता

                     एक क़ता

खुशियाँ चली गई हैं  मुझे कब की छोड़ कर 
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ,ख़ैर !

दो चार गाम चल के , गए  रास्ता बदल 
जीने को लोग जीते हैं  अपनों के भी बग़ैर 

रखना दुआ में याद कभी इस हक़ीर को 
जो आशना तुम्हारा जिसे कह रही हो ग़ैर

जिस मोड़ पर मिली थी ,वहीं मुन्तज़िर हूँ मै
काबा यहीं है मेरा यहीं आस्तान-ए-दैर 


-आनन्द पाठक-
08800927181
शब्दार्थ 
दो-चार गाम = दो चार  क़दम 
हक़ीर          = तुच्छ [कभी कभी लोग स्वयं को अति विनम्रता से भी कहते हैं]
आशना        = चाहने वाला 
मुन्तज़िर       =प्रतीक्षारत
आस्तान-ए-दैर = तुम्हारे दहलीज का पत्थर

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