गुरुवार, 5 जनवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 18 [ज़िहाफ़ात]

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उर्दू बह्र पर एक बातचीत :- क़िस्त 18 [ज़िहाफ़ात]
[Disclaimer Clause - वही जो क़िस्त -1 में है ]

कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो वतद-ए-मफ़रुक़ पर लगते हैं

वतद-ए-मफ़रुक़ की परिभाषा पहले भी लिख चुका हूँ ।एक बार फिर लिख रहा हूं
वतद-ए-मफ़रुक़ :- वो 3-हर्फ़ी कलमा जिस में पहला हर्फ़ हरकत ,दूसरा हर्फ़ साकिन और तीसरा हर्फ़ हरकत हो यानी     ’ हरकत+साकिन+ हरकत”
चूंकि दो हरकत के बीच में कुछ ’फ़र्क ’है [यानी एक साथ ,एक के बाद एक , जमा नही है] कारण कि  बीच में साकिन हर्फ़ आ आ गया इसी लिए इसे .मफ़रुक़’ कहते हैं
मगर एक बात
उर्दू जुबान में कोई लफ़्ज़ ऐसा नहीं होता आख़िरी हर्फ़  मुतहर्रिक होता हो  [यानी आखिरी लफ़्ज़ पर हरकत हो] दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उर्दू जुबान का हर लफ़्ज़ ’साकिन’ पर गिरता है तो फिर .मफ़रुक़ ’ लफ़्ज़ कौन से  होंगे?
यही बात ’सबब-ए-सकील ’[हरकत+ हरकत ] में भी उठी थी
पर हां ,दो तरक़ीब ऐसी है जिससे साकिन हर्फ़ पर एक हल्का सा ’हरकत [जबर,जेर,पेश जिसे संयुक्त रूप से ’एराब’ भी कहते है ] आ जाता है और वो तरक़ीब है --इज़ाफ़त और अत्फ़ की
गो इज़ाफ़त और अत्फ़ फ़ारसी की तरक़ीब है मगर उर्दू निज़ाम में भी  इसे अपना ली गई है [हालाँ  कि इसके लिए अरबी में ’अल आ उल’ का प्रयोग करते हैं
ख़ैर --एक शे’र की परोडी पढ़ रहा हूँ ।------
 खुदा जब ’अत्फ़’ करता है तो ’हरकत’ आ ही जाती है ......मूल शे’र तो आप ने सुना ही होगा.
जैसे फ़स्ल-ए-गुल ......, दर्द-ए-दिल......गुफ़्त-ओ-सुनीद ...शह्र-ए-वीरां  ....
अगर ख़ाली  लफ़्ज़    ...फ़स्ल .....दर्द....गुफ़्त.. मुफ़्त  .....शह्र ...रुत ...होता तो लाजिमन हर्फ़ उल आख़िर क्रमश:   ल्  .....द्......त्.....र्.....सब् ’साकिन’ होता  मगर जब इज़ाफ़त या अत्फ़ के साथ बोलते है तो इन हर्फ़ पर एक ठहराव या हल्का सा  वज़न आ जाता है या महसूस होता है  ...बस इन हरूफ़ [ ब0ब0 हर्फ़]  को मय हरकत समझेंगे

अरूज में  ’वतद-ए-मफ़रुक़’ को ’लातु ’...फ़ा’अ......तफ़्’अ...[ ’अ  -ऐन  मय हरकत है यहाँ ] आदि से दिखाते हैं 

  लातु [मफ़ऊलातु में ] ----जिस में लाम+अलिफ़+ तु = हरकत+साकिन+ हरकत है
’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में ..............जिस् में [ फ़े+अलिफ़+एन मय हरकत= हरकत+साकिन्+हरकत्
 तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .....जिस् में    [ ते+फ़े+एन् मय् हरकत् ]   = हरकत् +साकिन्+ हरकत्

अगर आप इजाजत दें तो एक दिलचस्प बात यहाँ और यहीं discuss कर लें---कारण बाद में बताऊँगा

फ़ा’अलातुन या फ़ाइलातुन --बहर-ए-रमल का बुनियादी रुक्न है और जिसका वज़न दोनो case  में 2 1 2 2 ही है मगर लिखने का तरीक़ा [उर्दू स्क्रिप्ट में ] दो क़िस्म  के है
एक तरीक़ा यह कि -सब हर्फ़ मिला कर लिखते है -जैसे ’फ़ाइलातुन ’ में तो इसे ’मुतस्सिल ’ शकल कहते है जो  ’सबब-ए-ख़फ़ी्फ़ (फ़ा) +वतद-ए-मज्मुआ [इला]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [तुन] से मिल कर बना है
और दूसरा तरीक़ा यह कि  कुछ हर्फ़ ’फ़ासिला ’देकर लिखते है  जैसे  फ़ा’अ ला तुन में तो इसे ’मुन्फ़सिल ’ शकल कहते हैं जो वतद-ए-मफ़रुक़ [फ़ा’अ] +सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [ ला ] +सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [तुन] से मिल कर बना है
और ख़ूबी यह कि दोनो ही शकल का वज़न 2  1 2 2  ही है -कोई फ़र्क़ नहीं।  मगर ज़िहाफ़ लगाने में ’फ़र्क़’ होगा । पहले case  में वतद-ए-मज्मुआ के ज़िहाफ़ात लगेंगे और दूसरे case  में वतद-ए-मफ़रुक़ के ज़िहाफ़ लगेगे
इस पर विस्तार से चर्चा तब करेंगे जब उर्दू के 19  बहर की individual चर्चा करेंगे [जो आगे आयेगा]

यही बात मुस् तफ़् इलुन् और् मुस् तफ़्’अ लुन् की भी है। यह् रुक्न् बहर-ए-रजज़ की बुनियादी रुक्न है और पहली शकल -मुस् तफ़् इलुन् को -मुतस्सिल् शक्ल् कहते है जब कि -मुस् तफ़्’अ लुन्- को मुन्फ़सिल् -शकल कहते हैं
मुस् तफ़् इलुन्  = सबब-ए-ख़फ़ीफ़ + सबब-ए-ख़फ़ीफ़् + वतद-ए-मज्मुआ  से मिल् कर् बना है  और इस पर वतद-ए-मज्मुआ के ज़िहाफ़ लगेंगे
मुस् तफ़्’अ लुन् = सबब-ए-ख़फ़ीफ़ + वतद-ए-मफ़रुक़ + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से मिल कर बना है  और इस पर वतद-ए-मफ़रूक़ के ज़िहाफ़ लगेंगे

इसमे भी ख़ूबी वही कि दोनो ही केस में रुक्न का वज़न 2 2 1 2 ही होगा
  एक बात और --जब हर्फ़ अलिफ़ लफ़्ज़ के शुरु में आयेगा तो वो हरकत में होगा -कारण कि उर्दू जुबान का कोई लफ़्ज़ साकिन से शुरु ही नहीं होता है [हिन्दी में भी नहीं होता है] मगर अलिफ़ [हम्ज़ा] [दोनो की आवाज़  /उच्चारण/तलफ़्फ़ुज़] एक जैसा है अगर लफ़्ज़ के बीच में या आख़िर में आये तो यह साकिन होगा । इसीलिए ’लातु’ [ लाम +अलिफ़ +साकिन } का अलिफ़ साकिन है
अब हम उन ज़िहाफ़ पर आते हैं जो वतद-ए-मफ़रुक़’ पर लगता है
चूँकि वतद-ए-मफ़रुक़ लफ़्ज़  कम ही मिलते है , लाजिमन ज़िहाफ़ भी कम ही होते हैं  और वो ज़िहाफ़ हैं
वक़्फ़........कस्फ़ [कश्फ़].......सलम 
आइए  इन ज़िहाफ़ात का अमल कैसे होगा ,देखते हैं

ज़िहाफ़ वक़्फ़ : किसी सालिम रुक्न में आने वाले वतद-ए-मफ़रुक़ के दूसरे वाले मुतहर्रिक को साकिन करना ’वक़्फ़’ कहलाता है । और मुज़ाहिफ़ को ’मौक़ूफ़ ’ कहते हैं ।यह ज़िहाफ़ अरूज़ और जर्ब से मख़सूस है
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से  3-रुक्न ऐसे हैं जिन में वतद-ए-मफ़रुक़ [हरकत+साकिन+हरकत[ आता है  जिनकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं और वो हैं
लातु [मफ़ऊलातु में ] ---- ’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में ..............  तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .....

 मफ़ऊलातु ( 2 2 2 1) +वक़्फ़  =  मफ़ ऊ ला त (2 2 2 1) यानी लातु का -तु- जो मुतहर्रिक है-को साकिन कर दिया तो बचा -त्- यानी मफ़ऊलात् [2 2 2 1] जिसे मानूस् रुक्न् -मफ़ऊलान् ( 2 2 2 1) बदल लिया
यह ज़िहाफ़ साधारणतया रुक्न  ’ मफ़ऊलातु’ तक ही सीमित है  इसका अमल ’ फ़ा’अ...या  तफ़्’अ पर नहीं कराया जा सकता -कारण् कि ये टुकड़े सालिम् रुक्न् के बीच् में आ रहे है  और् -’अ [ जो यहाँ मुतहर्रिक् है अभी ]इस् वक़्फ़् के अमल् से  -साकिन् हो जायेगा तो फिर सालिम रुक्न के बीच में दो-दो साकिन मुसलसल [लगातार] आ जायेगा जो लिहाज-ए-रुक्न  ज़ायज नहीं।

ज़िहाफ़ कस्फ़ :- इसे ’कश्फ़’ भी लिखते हैं। वतद-ए-मफ़रुक़ के दूसरे मुतहर्रिक को गिराना ’कस्फ़’ कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को मक्सूफ़ /मक्शूफ़ कहते हैं यह ज़िहाफ़ भी अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है
बज़ाहिर इसका अमल  भी उन्ही ऊपरवाले 3-अर्कान पर होगा जिसमें वतद-ए-मफ़रुक़ आता है

[मफ़ऊलातु (2 2 2 1) +कस्फ़   = मफ़ऊ ला [ 2 2 2 ] यानी लातु का दूसरा मुतहर्रिक -तु- गिरा दिया तो बाक़ी बचा यानी मफ़ऊला [2 2 2] जिसे मानूस रुक्न ’मफ़ऊ लुन [2 2 2] से बदल लिया
साधरणतया यह ज़िहाफ़ भी -मफ़ऊलातु -तक ही सीमित है
पर |technically  इसे ’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में ..............  तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .....पर भी अमल कराया  जा सकता है। देखते हैं कैसे?
 फ़ा’अ ला तुन् [ 2 1 2 2]  + कस्फ़  = फ़ा ला तुन [2 2 2] यानी फ़ा’अ का -’अ [जो मुतहर्रिक है ] को गिरा दिया तो बाक़ी बचा फ़ा ला तुन [2 2 2] जिसे मानूस रुक्न  ’मफ़ ऊ लुन [2 2 2 ] से बदल लिया
 मुस् तफ़्’अ लुन् [2 21 2]+कस्फ़    = मुस् तफ़् लुन् [2 2 2] यानी तफ़्’अ का -’अ [जो मुतहर्रिक् है] को गिरा दिया तो बाक़ी बचा मुस् तफ़् लुन् [2 2 2] जिसे मानूस रुक्न् ’मफ़् ऊ लुन् [2 2 2 ] से बदल् लिया

खूबी यह कि  तीनो केस में  मुज़ाहिफ़ रुक्न -मफ़ऊलुन-[2 2 2] ही रहता है

ज़िहाफ़ सलम :- अगर किसी रुक्न में वतद-ए-मफ़रुक़ आता है तो पूरा का पूरा  ’वतद’  ही गिरा देना  ’सलम’ कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को ;असलम’ कहते है और यह ज़िहाफ़ भी अरूज़ और जर्ब से मखसूस है
बज़ाहिर इसका अमल  भी उन्ही ऊपरवाले 3-अर्कान पर होगा जिसमें वतद-ए-मफ़रुक़ आता है
साधरणतया यह ज़िहाफ़ भी -मफ़ऊलातु -तक ही सीमित है
|technically  इसे ’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में ..............  तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .....पर भी लगाया जा सकता है।
’फ़ा’अ [ फ़ा’अ ला तुन् में [ 2 1 2 2 ] +सलम =  ला तुन्  यानी फ़ा’अ ला तुन से -फ़ा’अ- गिरा दिया तो बाक़ी बचा ला तुन [2 2] इसे हम वज़्न रुक्न ’फ़े’  लुन [2 2] से बदल लिया
तफ़्’अ [  मुस् तफ़्’अ लुन् ] .[2 2 1 2] +सलम =मुस् लुन् [2 2 ] यानी मुस् तफ़्’अलुन् से -तफ़्’अ गिरा दिया तो बाक़ी बचा मुस् लुन् [22] जिसे मानूस् हमवज़्न् रुक्न् ’फ़े’लुन् [22] से बदल् लिया

यानी इस केस में तीनो मुज़ाहिफ़ हम वज़्न है [22]

 अब तक हम ने उन एकल ज़िहाफ़ [फ़र्द ज़िहाफ़] की बात की जो सालिम अर्कान के खण्ड [ सबब और वतद ] पर लगते हैं । हालाँकि ज़िहाफ़ के इस चर्चा में बहुत से ’किन्तु-परन्तु’ थे पर हम ने उस पर विस्तार से चर्चा नहीं किया इसलिए कि उसकी यहां  ज़रूरत नहीं थी। इस चर्चा का आशय मात्र इतना ही है कि हमारे हिन्दी दाँ दोस्त , उर्दू शायरी के बह्र ,अरूज़,अर्कान ज़िहाफ़ आदि के बारे में मोटा मोटी जानकारी प्राप्त कर सके। यह चर्चा ’अरूज़’ की बहुत बारीकियों और बहुत गहराईयों में जाने की नही है।एकल ज़िहाफ़ से मेरा आशय उन ज़िहाफ़ात से है जो  रुक्न के किसी एक टुकड़े पर एक समय में एक बार ही अमल करते है और रुक्न की शकल बदल देते हैं जिसे हम मुज़ाहिफ़ रुक्न कहते है
अब तक हम उन ज़िहाफ़ात की चर्चा कर चुके हैं जो निम्न टुकड़ों पर लगते हैं

सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर  :-ख़ब्न.....तय्यी....कब्ज़्....कफ़्फ़्...क़स्र्...ह्ज़्फ़्....रफ़’अ.........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़
सबब-ए-सकील पर  :-इज़्मार.....अस्ब.....वक़्स.....अक् ल्  
वतद-ए-मज्मुआ पर:-खरम्.....सलम्......अजब्......कत्’अ........हज़ज़्.....अरज्......तमस्.........बतर्......इज़ाला....तरफ़ील्  
वतद-ए-मफ़रुक़ पर:- वक़्फ़........कस्फ़ [कश्फ़].......सलम 

अच्छा ,एक बात तो रह गई ...
हमने 2-हर्फ़ी कलमा [सबब] ....3-हर्फ़ी कलमा [वतद] की तो बात कर ली और इसी पर सारे ज़िहाफ़ का ज़िक़्र भी कर लिया मगर अरूज़ की किताबों मे 4-हर्फ़ी कलमा का भी ज़िक़्र है -उसकी चर्चा नहीं की। ज़रूरत ही नहीं पड़ी अभी तक।
मगर जानकारी के लिए एक संक्षिप्त चर्चा कर लेते है अभी
चार हर्फ़ी कलमा को ’फ़ासिला’ कहते है-जैसे अकसर....करतब.....मकतब....हरकत...वग़ैरह वग़ैरह। इस फ़ासिला के भी दो क़िस्म होती है और वो हैं----फ़ासिला सग़रा  और फ़ासिला कबरा
फ़ासिला सग़रा :- वो चार हर्फ़ी कलमा जिसमें  तीन हर्फ़ तो मुतहर्रिक हो और आख़िरी हर्फ़ साकिन हो  यानी  [ हरकत+हरकत ] +[ हरकत+साकिन ] यानी दूसरे शब्द में हम इसे सबब [2-हर्फ़ी] से भी तो दिखा सकते हैं
= सबब-ए-सकील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़

फ़ासिला कबरा = वो 5-हर्फ़ी कलमा जिसमें 4-हर्फ़ तो मुतहर्रिक हो और आखिरी हर्फ़ साकिन हो यानी [ हरकत+हरकत ] +[ हरकत+हरकत+साकिन ] उर्दू में ऐसे लफ़्ज़ बहुत कम है। शायद न के बराबर
=सबब-ए-सकील +वतद-ए-मज्मुआ
जब ’फ़ासिला’ को सबब और वतद के combination से दिखा सकते और उसी पर सारे ज़िहाफ़ात की चर्चा  भी कर सकते है  तो फ़ासिला के बारे में और गहराईयों में जाने की ज़रूरत नही समझता। हां अगर अरूज़ की किताबों में इस का ज़िक़्र  है तो ग़ैर ज़रूरी तो यक़ीनन नहीं होगा।
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अब अगली क़िस्त में ’मुरक़्क़ब ज़िहाफ़’ [मिश्रित ज़िहाफ़ ] की चर्चा करेंगे 

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....


[नोट् :- पिछले अक़्सात [ब0ब0 क़िस्त] के आलेख आप मेरे ब्लाग पर देख सकते हैं 

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or
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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

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