शनिवार, 11 नवंबर 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 34 [बह्र-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें-4]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 34 [बह्र-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें -4]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

----क़िस्त 30-से लेकर क़िस्त 33 तक] बह्र-ए-हज़ज की बहुत सी मुज़ाहिफ़ बह्र पर चर्चा कर चुके हैं।आज इस क़िस्त में  हम कुछ और मुज़ाहिफ़ बह्र पर चर्चा करेंगे 
अब् हमें नहीं लगता है कि मुरब्ब: ---मुसद्दस---मुसम्मन--मुज़ाइफ़  के बारे मैं कुछ और बताने की कोई ज़रूरत है और न ही  महज़ूफ़---मकफ़ूफ़---मक़्सूर---अखरब---क्या है ,के बारे में ।[ये सब ज़िहाफ़ात है जो सालिम रुक्न के अवयव [ज़ुज़] पे लगते हैं जिस से इनकी  तबादिल शकल बरामद होती है --ये सब उसके नाम है ] इन सब की चर्चा मैने पिछले अक़्सात [ ब0ब0 क़िस्त] में कर चुका हूँ
यहाँ जो हलन्त से हर्फ़ दिखाया गया है -उसे आप साकिन समझिए
जो-लु- दिखाया गया है उसे आप मुतहर्रिक [यानी लाम पर हरकत] समझिए
 निम्नलिखित बहरों के उदाहरण डा0 आरिफ़ हसन खान साहेब की किताब "मेराज-उल-अरूज़’ से साभार लिया गया है ।आप् भी चाहें तो ख़ुद्साख़्ता शे’र कह सकते हैं इन वज़न पर। इस हक़ीर ने भी कोशिश  की ,मगर फ़िलबदीह अश’आर न कह सका इन औज़ान पर । आइन्दा कोशिश करूँगा इन्शा अल्लाह , कामयाबी हासिल हो ।आप से गुज़ारिश है कि यहाँ पर जो शे’र उदाहरण के लिए दिए गये हैं वो डा0 साहब के ख़ुदसाख़्ता अश’आर है जो सिर्फ़ समझने और समझाने और बताने की अल गरज  कहे गये हैं । इस में आप शे’रियत न देखियेगा --तेल देखियेगा और तेल की धार देखियेगा। उनकी शे’रियत या फ़न्न-ए-शायरी देखने के लिये उनकी मुज़्मुआ गज़लियात किताब -" कुछ नज़्में कुछ ग़ज़लें" -देखियेगा।

[1]A बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु-----फ़ऊलुन्
221--------1221-------122 / 1221
उदाहरण--
जब याद तेरी दिल को सताए
अए माहजबीं  नींद न आये
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जब याद/   तिरी दिल कू / सताए
अए माह/  जबीं  नींद     / न आये

[1]B बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ मक़्सूर
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु-----फ़ऊलान्
221--------1221-------1221
उदाहरण
जाने से तेरे दिल हुआ वीरान
जैसे हो कोई उजड़ा हुआ शहर

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जाने से /    तिरे दिल हु / आ वीरान
जैसे हू / कुई उजड़ा    / हुआ शहर   [ शह्  र =21]

शायरी में ’महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[2]A  बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ महज़ूफ़ 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन्----फ़ऊलुन् 
221---------1212-------122
उदाहरण--
यह इश्क़ अजीब एक बला है
बख़्शा न बड़े बडों को इस ने

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

ये इश्क़ /  अजीब इक / बला है
बख़्शा न / बड़े बडों    /कू इस ने

[2]B बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ मक़्सूर 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन्----फ़ऊलान्
221---------1212-------1221
उदाहरण
था नाज़ बहुत कि दिल न देंगे
देखा जो उसे तो उड़ गए होश

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

था नाज़ /   बहुत कि दिल / न देंगे     [ न देंगे  =122= महज़ूफ़ है]
देखा जू/  उसे तो उड़  /   गए होश   [ गए होश = 1221= मक़सूर]
’महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[3]A बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दसअख़रब मक़्बूज़ मुख़्निक़ महज़ूफ़
मफ़ ऊलन्------फ़ाइलुन्----फ़ऊलुन्
222----------212----------122
अगर आप ऊपर के रुक्न [2]A-पर ’तख़्नीक’ का अमल करें [यानी " मफ़ऊलु---मफ़ाइलुन "-3 मुतहर्रिक [ लाम---मीम --फ़े] एक साथ आ गए ] तो आप को बहर [3]A बरामद हो जायेगा और इसका नाम भी वही होगा बस ’मुख़्नीक़’ और जोड़ देंगे
उदाहरण--
आँखे  भींगी तड़प उठा दिल
जब जब तेरा ख़याल   आया
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

आँखे  भीं / गी तड़प /उठा दिल
जब जब ते/ रा ख़या  /ल   आया

[3]B  बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ मुख़्निक़ मक़्सूर
मफ़ ऊलुन्------फ़ाइलुन्----फ़ऊलान्
222----------212----------1221
उदाहरण
कर लें जितनी जफ़ायें चाहे
चाहत से हम न आयेंगे  बाज़

  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

कर लें जित/ नी जफ़ा/ ये चाहे           [ य चाहे = 122= महज़ूफ़]
चाहत से    / हम न आ/ यगे  बाज़      [ यगे बाज़= 1221= मक़सूर]
महज़ूफ़’ और मक़सूर का ख़ल्त जायज है

[4]A बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ मजबूब 
मफ़ऊलु-------मफ़ाईलु----फ़ अल्
221-----------1221-------12
उदाहरण
प्यारी है ज़बां  सब से मेरी
चर्चा है ज़माने में  यही
  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

प्यारी है/  ज़बां  सब से/  मेरी
चर्चा है / ज़माने में      / यही


[4]B बहर-ए-हज़ज मुसद्दस अख़रब मक्फ़ूफ़ अहतम
मफ़ऊलु-------मफ़ाईलु----फ़ऊल्
221-----------1221------- 121
उदाहरण
बेमिस्ल हमारा है  ये देश
जन्नत से भी प्यारा है ये देश

  इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

बेमिस्ल   /हमारा है   / ये देश
जन्नत से / भी प्यारा है /ये देश
[नोट - इस बहर [4] में ’तख़्नीक़’ के अमल से और भी कई वज़न बरामद किए जा सकते है जो आपस में मुतबादिल होंगे जो जायज़ है।

[5] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब
मफ़ऊलु----मफ़ाईलुन्
221--------1222
उदाहरण
हैं लाख हसीं जग में
तुम सा न कोई लेकिन
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

हैं लाख     /  हसीं जग में
तुम सा न  / कुई लेकिन

[6]A   बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब महज़ूफ़
मफ़ऊलु-----फ़ऊलुन्
221-----------122-
उदाहरण
खुशरंग कोई गुल
तुम जैसा कहाँ  है
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

खुशरंग / कुई गुल
तुम जैसा/  कहाँ  है
[6]B   बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: अख़रब मक़्सूर
मफ़ऊलु------फ़ऊलान्
221-----------1221
उदाहरण
सब ताब पड़े माँद
देखे जो तुझे  चाँद

इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है
सब ताब /पड़े माँद
देखे जो  /तुझे  चाँद

[7]A बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्बूज़ मजबूब 
मफ़ा इलुन्------फ़ अल्-
1212----------12-
उदाहरण
तुम्हारी याद ने
खिलाये गुल नए
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

तुम्हारी या   / द ने
खिलाये गुल / न ए


[7]B बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्बूज़ अहतम
मफ़ा इलुन्------फ़ऊल्
1212---------- 121
उदाहरण
जो मुस्करायें आप
तो जल उठे चिराग़
इशारा मैं कर रहा हूँ ,तक़्तीअ आप कर लें --आसान है

जो मुस्करा  / ये आप
तो जल उठे / चिराग़

रुबाई की बहर : रुबाई की बह्र हज़ज से ही  पैदा होती हैं ,और 24- वज़न बरामद होते हैं ।चूँकि रुबाई उर्दू काव्य विधा की एक अलग स्वतन्त्र  इकाई है अत: इसकी चर्चा यहाँ करना मुनासिब नहीं .कभी अलग से स्वतन्त्र रूप से इस पर बातचीत करेंगे
आप की जानकारी के लिए थोड़ी सी चर्चा यहां कर देते है
रुबाई  की दो मूलभूत बहर है [जो हज़ज से ही निकलती है ]

[1] मफ़ऊलु-----मफ़ाईलु-----मफ़ाईलु-----फ़ अल् /फ़ऊल्
    221----------1221--------1221-------12-/ 121

[2] मफ़ऊलु-----मफ़ा इलुन्------मफ़ाईलु--- फ़ अल्/ फ़ऊल्
     2 2 1----------12 12---------1221------12-/121

इन्हीं दो बुनियादी बहरों पर् -तख़्नीक़- के अमल से 24-वज़न बरामद होते है और ये -24- वज़न आपस में मुतबादिल होते हैं [ यानी आपस में बदले जा सकते हैं ]
यानी रुबाई के चारो लाईनों में अलग अलग वज़न [ but out of these 24-vazan] लाए जा सकते हैं
बात यहीं छोड़े जाता हूँ -जब रुबाई के बह्र की चर्चा करेंगे तो बात यहीं से उठायेंगे
-----------------------------
ख़ुदा ख़ुदा कर , बहर-ए-ह्ज़ज का बयान पूरा हुआ। मैं यह दावा तो नहीं करता कि मैने हज़ज के सभी वज़न cover कर लिया है .पर हाँ ,बहुत हद तक   cover कर लिया है। आप चाहें तो हज़ज की और भी कई मुज़ाहिफ़ बहर बरामद कर सकते है

अगले किस्त में हम बहर-ए-हज़ज की उन तमाम बहूर /औज़ान  को एक साथ एक जगह सम्पादित [मुरत्तब] करेंगे जिनकी चर्चा हम गुजिस्ता अक़सात में कर चुके हैं जिससे  पाठको को एक जगह पढ़ने की सुविधा मिल सके।
अस्तु

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी बह्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का फ़क़त हिन्दी तर्जुमा समझिए बस ........
एक बात और--

न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
अदब से मुहब्ब्त ,अदब आशना  हूँ

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-




शनिवार, 4 नवंबर 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 33 [ बह्र-ए-हज़ज कि मुज़ाहिफ़ बह्रें-3]

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 33 [ बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें-3]


Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है

[क्षमाप्रार्थी हूँ विलम्ब से उपस्थित होने पर----

बिना पूछे जो अपनी सफ़ाई देता है
हो न हो मुजरिम दिखाई  देता  है

अत: विलम्ब के लिए आज सफ़ाई  पेश नहीं करूँगा। बस आप यूँ समझ लें ---कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी--वरना इतना ’विलम्ब’ नहीं होता। सच तो यह है कि बहर-ए-हज़ज के इतने मुज़ाहिफ़ बहर हैं कि उनके तज़्किरा [चर्चा ]करते करते मैं खुद ही बिखर गया --कि खुद को समेटूँ तो कहाँ से समेटूँ
ख़ैर--फिर एक कोशिश कर के आप के सामने हाज़िर हूँ --आप की दुआओं  का तलबगार हूँ


पिछले अक़्सात [क़िस्तों ] में  हम हज़ज की सालिम बह्र [मुरब: ,मुसद्दस.सालिम] की चर्चा कर चुके है [क़िस्त30]
और इसकी मुज़ाहिफ़ बहर महज़ूफ़ और मक़्सूर की भी चर्चा कर चुके हैं      [क़िस्त 31[
साथ ही इसकी मुज़ाहिफ़ बहर मक्बूज़ ,मक़्फ़ूफ़,मक़्फ़ूफ़+महज़ूफ़+मक़्सूर आदि की भी चर्चा कर चुका हूँ   [क़िस्त  32]

ख़र्ब’ और ’कफ़’ ज़िहाफ़ एक साथ लेते है देखते हैं क्या होता है

आज हम और ज़िहाफ़ की चर्चा करेंगे जो हज़ज [रुक्न मुफ़ाईलुन -1222 ] पर लगता है
आप घबराईए नहीं । ये सब ज़िहाफ़ academic discussion के लिए हैं और आप की जानकारी के लिए कर रहे हैं अगर आप सब मिला कर देखेंगे तो ऐसे बहर की संख्या सैकड़ों में बैठती है लेकिन कोई भी शायर इन तमाम बहूर में शायरी नहीं करता । ’मीर’ ने लगभग 30 बह्र , ग़ालिब ने- लगभग 20 -और इक़बाल ने  लगभग 51 बह्र प्रयोग किया है।
आप भी अपनी मनपसन्द बहर को चुन सकते हैं मगर तमाम बहर को पढ़ने समझने के बाद ।

एक बात और--ये बह्र और वज़न तो शायरी का मात्र एक हिस्सा [अवयव] है फ़न-ए-शायरी मेअसल बात तो भाव और कला पक्ष की है

ज़िहाफ़ ख़र्ब- एक मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है [मिश्रित ज़िहाफ़] है जो दो ज़िहाफ़ से मिल कर बना है --कफ़+ ख़रम  । मुज़ाहिफ़ को आप -"मक्फ़ूफ़ अख़रम" भी कह सकते हैं---’अख़रब’ भी कह सकते है ।
बज़ाहिर  ’ख़र्ब’ ज़िहाफ़ से  रुक्न का अखरब शकल [221 मफ़ ऊलु]   हासिल होगा [क़िस्त-31] यानी -लु- [लाम मय हरकत यानी ’लाम’ मुतहर्रिक है]
’कफ़’ ज़िहाफ़--- से रुक्न का ’मक्फ़ूफ़’ शकल  [ मफ़ाईलु  1221 ] हासिल होगा यानी यहाँ भी -लु - मय हरकत है यानी ’लाम’ मुतहर्रिक है
यानी ये दोनो ज़िहाफ़ अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर नहीं लाए जा सकते कारण कि दोनो में -लाम- मय हरकत है और कोई शे’र का हर्फ़ उल आखिर ’हरकत’ पर नहीं गिरता

और वैसे भी ज़िहाफ़ ;खर्ब’ और ख़रम  तो सदर/इब्तिदा के लिए मख़्सूस है

तो आख़िरी मुक़ाम [यानी अरूज़ और जर्ब पर अब क्या लाएं?  --कुछ नहीं बस हज़ज का सालिम रुक्न 1222 [मफ़ाईलुन] ही ला देते हैं -इसकी तो कोई मुमानियत [मनाही]  नहीं है और शे’र का  हर्फ़ उल आखिर लुन का नून साकिन है

अब बह्र का नाम होगा
[1] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर [आप चाहें तो इसे ’मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर भी कह सकते है-कारण वहीं -जो मैने ऊपर लिखा है।
मगर
 बह्र के नाम करण में अन्य प्रकार से [allied way] से समझने की नौबत ही क्यों सीधे सीधे [explicit way] नाम से और ज़िहाफ़ के अमल से पहचाना जाये तो ज़्यादा आसान होगा
तो मैं इस बह्र को -बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर - नाम से पहचानना चाहूंगा।यानी जैसे जैसे ज़िहाफ़ का क्रम है वैसे वैसे ही ।
 आप की क्या राय है?
अच्छा ! तो फिर मुसम्मन या मुसद्दस क्यों  जोड़ रहें है? जब ;रुक्न’ की संख्या तो साफ़ साफ़ बता रही है कि रुक्न 3 है या 4 है? ठीक .बिल्कुल ठीक। मुरब्ब: मुसद्दस मुसम्मन जर्ब-उल-मिसाल की तरह ज़ुबान पर इतने चढ़ गये है कि छोड़ने का मन नहीं करता ।Double check का काम करेगा।
ख़ैर----

[क] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर 
मफ़ऊलु----मफ़ाईलु---मफ़ाईलु------मफ़ाईलुन
221--------1221-------1221-------1222
उदाहरण
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से ही लेते है

दुनिया में कोई  दूसरा ऐसा नहीं ऎ हमदम
जैसा ये हसीं मेरा  वतन मेरा ये भारत है 
तक़्तीअ आसान है चाहे तो आप कर सक्ते है--इशारा मै कर देता हूं~

दुन या   म   /कु ई  दूस /र ऐसा न /हीं ऎ हम दम   ---हर्फ़ गिरा कर दिखा दिया जो शायरी में जायज है

जै सा य / हसीं  मेर / वतन मेरा/ य भा रत है ----  तदैव--
नोट-यह शे’र एक साख़्ता शे’र [समझाने की गरज से ]बनाया हुआ ]  है जो सिर्फ़  समझाने की गरज से लिखा गया है ---इसे आप कोई मयार का शे’र न समझ लें। चाहें तो आप भी ऐसे शे’र गढ़ सकते है ,कह सकते हैं।
ख़ैर-- ऊपर की वज़न को एक बार ज़रा ध्यान से देखें  मफ़ ऊलु-------मफ़ाईलु------बड़ी दिलचस्प बात निकलेगी। क्या है इसमे?? कुछ नहीं है--बस 2-रुक्न है और क्या । मगर मफ़ऊलु का ’लाम’
 मुतहर्रिक है--सामने म फ़ा.... का मीम और फ़े--मुतहर्रिक है यानी---[दो रुक्न में 3-मुतहर्रिक एक साथ आ गये तो- ’तख़्नीक़’’ का अमल लग जायेगा -अगर आप लगाना चाहें तो]।  तस्कीन-ए-औसत और अमल-ए-तख़्नीक़ के बारे में पहले ही बता चुका हूँ==चाहे तो एक बार आप देख लें -यानी बीच वाला ’मुतहर्रिक --मीम--[जो अभी मुतहर्रिक है] साकिन हो जायेगा। यानी लु म् [2] का हो जायेगा और बचा हुआ हिस्सा --फ़ा ---का वज़न 2 रहेगा
यानी एक नई बहर/वज़न मिल जायेगी
यानी नीचे लिखी बहर भी बरामद होगी [आप एक बार तख़्नीक़ का अमल [रुक्न 2 और 3 पर] करें

[ख] 221---1222---221--1222-  इस बहर का नाम होगा’हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़्फ़ूफ़ मक़्फ़ूफ़ मुख़्नीक़ सालिम अल आख़िर" । मुख़्नीक़---लफ़्ज़ इस लिए जोड़ दिया गया है ताकि सनद रहे कि यह बहर ’तख़्नीक़’ के अमल से बरमद हुई है
एक बात और ---इस तर्तीब   221---1222   // 221---1222  को बह्र-ए-शिकस्ता भी कह्ते हैं  ,जहाँ शे’र के मध्यान्तर में ’अरूज़ी-वक़्फ़ा’ कहते हैं  । बह्र-ए-शिकस्ता के बारे में पहले भी चर्चा कर चुका हूं~
इस बह्र का एक उदाहरण लेते है--
अल्लामा इक़बाल का  एक शे’र है

फिर बाद-ए-बहार आई , इक़बाल ग़ज़ल्ख़्वाँ हो
गुंचा है अगर गुल हो ! गुल है तो गुलिस्तां  हो 

एक हिन्दी फ़िल्म [बारादरी -तलत महमूद का गाया हुआ] है -दो लाईन लिख रहा हूँ। यू ट्यूब पर उपलब्ध है  https://www.youtube.com/watch?v=eOnw5V1SPVs

तस्वीर बनाता हूँ     //तस्वीर नहीं बनती
इक ख़्वाब सा देखा है// ताबीर नही बनती

इसकी तक़्तीअ कर देता हूं~
 2    2  1 - 1 2 2 2   //  2    2   1--1 2 2 2            =  221---1222 // 221--1222
तस् वीर / बनाता हूँ     //तस् वीर / नहीं बन ती
2      2  1  - 1  2 2  2//  2  2 1 - 1 2 2   2 =221---1222 // 221--1222
इक ख़ाब  /स देखा  है// ,ता बीर  नही बन ती यहाँ -से- को -स- [1] की वज़न पर पढ़ लिया जो जायज़ है

अगर आप गाना सुने तो आप को पता चलेगा कि ये कितनी दिलकश बहर है
इसी बहर में इस हक़ीर का भी 1 शे’र बर्दास्त कर लें

देखा तो नहीं तुमको ,लेकिन हो ख़यालों में
सीरत की तेरी मैने ,तस्वीर बना  ली है

 आप तक़्तीअ कर के बता दीजियेगा कि कहीं यह शे’र मैने बहर[वज़न] से ख़ारिज़ तो नहीं कर दिया।
एक बात और--
ये जो बीच में [शे’र के मध्यान्तर मे ]  // का जो निशान देख रहे हैं उसे शायरी के भाषा में ’अरूज़ी वक्फ़ा" [शेर में ठहराव का मुकाम] कहते हैं और इस की ख़ासियत यह है कि जो बात आप कह रहें हो वो  //  के पहले ही ख़तम हो जानी चाहिए यानी दूसरे भाग  // के बाद जा कर बात खत्म न हो। ऐसी बहर को बहर-ए-शिकस्ता भी कहते हैं।  इस मक़ाम पर ऐसा कोई लफ़्ज़ न आ जाये कि तक़्तीअ करते वक़्त कुछ हर्फ़ तो  // के इस पार रहे और बाक़ी हर्फ़ // के उस पार चला जाये ।पहली स्थिति में बहर ’ना-शिकस्ता ’ कहलायेगी  ।।यूं शे’र ज़िन्दा तो रहेगा मगर  आहंग की ख़ूबसूरती ख़त्म हो जायेगी । इस विषय पर डा0 शम्स्सुर्हमान फ़ारूक़ी साहब ने अपनी किताब ---------में विस्तार से चर्चा की है ।ख़ैर --बात निकली तो बात कर ली--
ऊपर जो गाना लिखा है वो ’परफ़ेक्ट’  बहर-ए-शिकस्ता की मिसाल है

[ग] 221---1221----1221----122/1221  इस बहर का नाम होगा ---बहर-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़्फ़ूफ़ महज़ूफ़/मक़्सूर

इस बहर की तुलना ऊपर की बहर [ख] से करें -आप को कोई विशेष अन्तर नहीं लगेगा । लगभग एक ही जैसा है -बस आख़िरी रुक्न में ज़रा सी तब्दीली है और वो तब्दीली है कि सालिम रुक्न ’ मफ़ाईलुन’ पर -’हज़्फ़’ और ’कस्र’ का ज़िहाफ़ लगा है और इसी लिए इसमें महज़ूफ़ और मक़्सूर जोड़ दिया है और इत्तिफ़ाक़न इन  दोनों का  आपस  में ख़ल्त जायज है
एक उदाहरण लेता हूँ [डा0 आरिफ़ हसन ख़ाँ साहब के हवाले से]

आशिक़ हूँ तेरा मैं तो ,मुझे चाहे न चाहे
मैने तुझे चाहा है ,निभाऊँगा हमेशा

मुझे उम्मीद है कि आप इस की तक़्तीअ कर सकते हैं ।चलिए एक कोशिश मैं भी करता हूँ आप भी करें
221-------/ 1221---/1221----/122
आशिक़ हूँ / तेरा मैं तो/ ,मुझे चाहे /न चाहे
221---/1221----/1 2 2 1    /1 2 2
मैने तु/ झे चाहा है /,निभाऊँगा /ह मे शा

[ बह्र की माँग पर यहाँ  मात्राएँ गिराई गईं है जो जायज भी है और रवा भी। आप भी चाहे तो ऐसा ही कोई मिसरा कह सकते हैं-
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अब हम बहर-ए-हज़ज की कुछ मज़ीद बहर पर बात करेंगे
[1] बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अखरब मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर
    मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन----मफ़ाईलुन----   [ ध्यान रहे -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]
    221---------1212--------1222--
उदाहरण---डा0 आरिफ़ हसन खां साहब के हवाले से

जब जब भी वफ़ा का ज़िक्र होता है
आती हैं ज़फ़ायें याद तेरी तब 
 इशारा मैं कर देता हूँ ,तक़्तीअ  आप कर के देख लें और निश्चिन्त हो जायें ----आप भी कुछ ऐसे ही मिसरा/शे’र कह सकते है --कोशिश तो करें।

जब जब भी /   वफ़ा का ज़िक / र होता है
आती हैं     /  ज़फ़ा ये या /    द तेरी तब

[2] बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस अख़रब मक़्बूज़ 
मफ़ऊलु-----मफ़ाइलुन----मफ़ाइलुन
221------------1212-------1212            ----   [ ध्यान रहे यहां भी  -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]

उदाहरण---उदाहरण कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से

जो बात यक़ीं से कह रहे हो तुम
बेलाग अगर नहीं तो कुछ  नहीं 

तक़्तीअ कर के देखते हैं
2    2  1 / 1 2  1  2    / 1 2 1 2
जो बात / यक़ीं से कह /रहे हो तुम   [ यहाँ पे -से- और-हो- से [वज़न] गिराया गया है जो रवा है जायज है

2  2 1 /  12 1 2  / 1 2  1  2
बेलाग / अगर नहीं /तो कुछ  नहीं    [ यहाँ भी  -तो- से वज़न गिराया गया है

[3] बहर-ए-हज़ज  मुसद्दस अखरब मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर
    मफ़ऊलु------मफ़ाईलु------मफ़ाईलुन---
   221---------1221-----------1222- ----  [ध्यान रहे यहां भी  -लु- यानी -लाम- मय हरकत यानी मुतहर्रिक है]
उदाहरण ---डा0 आरिफ़ खाँ साहब के हवाले से

दुनिया ही बदल दी थी मेरी हमदम
जब तूने मुझे प्यार से देखा  था 

इशारा मैं कर देता हूँ तक़्तीअ आप कर लें--

दुनिया ही/   बदल दी थी / मिरी हमदम [ यहाँ -ही- पर वज़न गिराया गया है जो रवा है और जायज़ है ]
जब तूने  /मुझे प्यार / से देखा  था        [ यहाँ -ने- और -से पर वज़न गिराया गया है जो रवा है और जायज़ है

अस्तु

अब अगले क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के कुछ और ऐसी ही मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे

आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

           न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’
           अदब से मुहब्बत ,   अदब -आशना  हूं


 --इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-मश्कूर हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-

आप अपनी राय से मुझे   akpathak3107@gmail.com पर अवगत करा सकते हैं।

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : मिलेगा जब भी वो हमसे---

मिलेगा जब भी वो हम से, बस अपनी ही सुनायेगा
मसाइल जो हमारे हैं  , हवा  में  वो   उड़ाएगा

अभी तो उड़ रहा है आस्माँ में ,उड़ने  दे उस को
कटेगी डॊर उस की तो ,कहाँ पर और जायेगा ?

सफ़र में हो गया तनहा ,तुम्हारे  साथ चल कर जो
वो यादों के चरागों को  जलायेगा  ,बुझायेगा

कहाँ तक खींच कर लाई ,तुझे यह ज़िन्दगी प्यारे
अगर तू लौटना चाहे , नहीं  तू  लौट पायेगा

इस आँगन का शजर है बस इसी उम्मीद में ज़िन्दा
परिन्दा जो गया है छोड़ , वापस लौट आयेगा

वो रिश्तों की लगाता बोलियाँ बाज़ार में जा कर
जिसे करनी तिजारत है वो रिश्ते क्या निभायेगा

अरे ! क्या सोचता रहता यहाँ पर बैठ कर ’आनन’
गये हैं लोग सब कुछ छोड़ ,तू  भी  छोड़ जायेगा 

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

एक ग़ज़ल : छूपाते ही रहे अकसर---

एक ग़ज़ल : छुपाते ही रहे अकसर--

छुपाते ही रहे अकसर ,जुदाई के दो चश्म-ए-नम
जमाना पूछता गर ’क्या हुआ?’ तो क्या बताते हम

मज़ा ऐसे सफ़र का क्या,उठे बस मिल गई मंज़िल
न पाँवों में पड़े छाले  ,न आँखों  में  ही अश्क-ए-ग़म

न समझे हो न समझोगे ,  ख़ुदा की  यह इनायत है
बड़ी क़िस्मत से मिलता है ,मुहब्बत में कोई हमदम

हज़ारों सूरतें मुमकिन , हज़ारों  रंग भी मुमकिन
मगर जो अक्स दिल पर है किसी से भी नहीं है कम

ख़िजाँ का है अगर मौसम ,दिल-ए-नादाँ परेशां क्यूँ
सभी मौसम बदलता है  ,बदल जायेगा ये मौसम

नहीं देखा सुना होगा  ,जुनून-ए-इश्क़ क्या होता
कभी ’आनन’ से मिल लेना ,समझ जाओगे तुम जानम

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

एक गज़ल : बहुत अब हो चुकी बातें-----


ग़ज़ल : बहुत अब हो चुकी बातें------

बहुत अब हो चुकी बातें तुम्हारी ,आस्माँ की
उतर आओ ज़मीं पर बात करनी है ज़हाँ की

मसाइल और भी है ,पर तुम्हें फ़ुरसत कहाँ है
कहाँ तक हम सुनाएँ  दास्ताँ  अश्क-ए-रवाँ की

मिलाते हाथ हो लेकिन नज़र होती कहीं पर
कि हर रिश्ते में रहते सोचते  सूद-ओ-जियाँ की

सभी है मुब्तिला हिर्स-ओ-हसद में, खुद गरज हैं
यहाँ पर कौन सुनता है  अमीर-ए-कारवां  की

वही शोले हैं नफ़रत के ,वही फ़ित्नागरी  है
किसे अब फ़िक़्र है अपने वतन हिन्दोस्तां की

हमें मालूम है पानी कहाँ पर मर रहा  है
बचाना है हमें बुनियाद  पहले इस मकाँ  की

तुम्हारे दौर का ’आनन’ कहो कैसा चलन है?
वही मारा गया जो  बात करता है ईमाँ  की

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
मसाइल =समस्यायें
अश्क-ए-रवाँ = बहते हुए आँसू
सूद-ओ-ज़ियाँ = हानि-लाभ/फ़ायदा-नुक़सान
मुब्तिला =लिप्त
हिर्स-ओ-हसद= लोभ लालच इर्ष्या द्वेष
पित्नागरी = दंगा फ़साद

रविवार, 24 सितंबर 2017

एक ग़ज़ल : ये गुलशन तो सभी का है---

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल :---ये गुलशन तो सभी का है----

ये गुलशन तो सभी का है ,तुम्हारा  है, हमारा है
लगा दे आग कोई  ये नही   हमको गवारा  है

तुम्हारा धरम है झूठा ,अधूरा है ये फिर मज़हब
ज़मीं को ख़ून से रँगने का गर मक़सद तुम्हारा है

यक़ीनन आँख का पानी तेरा अब मर चुका होगा
जलाना घर किसी का क्यूँ तेरा शौक़-ए-नज़ारा है?

सभी  तैयार बैठे हैं   डुबोने को मेरी कश्ती --
भँवर से बच निकलते हैं कि जब आता किनारा है

जो तुम खाते ’यहाँ’ की हो, मगर गाते ’वहाँ’ की हो
समझते हम भी हैं ’साहिब’!कहाँ किस का इशारा है

उठा कर फ़र्श से तुमको ,बिठाते हैं फ़लक पे हम
जो अपनी पे उतर आते ,जमीं पर भी उतारा है

ये मज़लूमों की बस्ती है ,यहाँ पर क़ैद हैं सपने
उठाते हाथ में परचम ,बदल जाता नज़ारा है

मुहब्बत की निशानी छोड़ कर जाना ,अगर जाना
कहाँ फिर लौट कर कोई कभी आता दुबारा है

यही तहज़ीब है मेरी ,यही है तरबियत ’आनन’
कि मेरी जान हाज़िर है किसी ने गर पुकारा है

-आनन्द पाठक-

शब्दार्थ
तरबियत  =पालन-पोषण

बुधवार, 9 अगस्त 2017

एक ग़ज़ल : वो जो चढ़ रहा था---

एक ग़ज़ल : वो जो चढ़ रहा था----

 वो जो चढ़ रहा था सुरूर था  ,जो उतर रहा है ख़ुमार है
वो नवेद थी तेरे आने की  , तेरे जाने की  ये पुकार  है

इधर आते आते रुके क़दम ,मेरा सर खुशी से है झुक गया
ये ज़रूर तेरा है आस्ताँ  ,ये ज़रूर   तेरा दयार   है

न ख़ता  हुई ,न सज़ा मिली , न मज़ा मिला कभी इश्क़ का
भला ये भी है कोई ज़िन्दगी ,न ही गुल यहाँ ,न ही ख़ार है

मेरी बेखुदी का ये हाल है ,दिल-ए-नातवाँ का पता नहीं
कि वो किस मकाँ का मक़ीन है , कि वो किस हसीं पे निसार है

ये जुनूँ नहीं  तो  है और क्या . तुझे आह ! इतनी समझ नहीं
ये लिबास है किसी और का ,ये लिबास तन का उधार है

ये ही आग ’आनन’-ए-बावफ़ा  ,तेरी आशिक़ी की ही देन है
तेरी सांस है ,तेरी आस है  ,  तेरी   ज़िन्दगी  की बहार है

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
नवेद = आने की शुभ सूचना
दिल-ए-नातवाँ =  दुखी दिल
मक़ीन              = निवासी/मकान मे रहने वाला

सोमवार, 17 जुलाई 2017

एक ग़ज़ल : दिल न रोशन हुआ----

एक ग़ज़ल :  दिल न रोशन हुआ-----

दिल न रोशन हुआ ,लौ लगी भी नही, फिर इबादत का ये सिलसिला किस लिए
फिर ये चन्दन ,ये टीका,जबीं पे निशां और  तस्बीह  माला  लिया किस लिए 

सब को मालूम है तेरे घर का पता ,हो कि पण्डित पुजारी ,मुअल्लिम कोई
तू मिला ही नहीं लापता आज तक ,ढूँढने का अलग ही मज़ा  किस लिए   

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ जाने कहाँ तक गईं ,लोग आने लगे बदगुमां हो इधर
यार मेरा अभी तक तो आया नहीं ,दिल है राह-ए-वफ़ा में खड़ा  किस लिए       

तिश्नगी सब की होती है इक सा सनम,क्या शज़र ,क्या बसर,क्या है धरती चमन 
प्यास ही जब नहीं बुझ सकी आजतक,फिर ये ज़ुल्फ़ों की काली घटा किस लिए 

बज़्म में सब तुम्हारे रहे आशना .  एक मैं ही रहा  अजनबी की तरह
वक़्त-ए-रुखसत निगाहें क्यों नम हो गईं,फिर वो दस्त-ए-दुआ था उठा किस लिए 

माल-ओ-ज़र ,कुछ अना, कुछ किया कजरवी, जाल तुमने बुना क़ैद भी ख़ुद रहा
फिर रिहाई का क्यूँ अब तलबगार है  ,दाम-ए हिर्स-ओ-हवस था बुना किस लिए   

तुम में ’आनन’ यही बस बुरी बात है ,प्यार से जो मिला तुम उसी के हुए
कुछ भी देखा नहीं ,क्या सही क्या ग़लत, प्यार में फिर ये  धोखा मिला किस लिए  

-आनन्द.पाठक-
08800927181
शब्दार्थ
तस्बीह = जप माला
मुअल्लिम= अध्यापक
निकहत-ए-ज़ुल्फ़= बालों की महक
तिशनगी  = प्यास
वक़्त-ए-रुखसत = जुदाई के समय
माल-ओ-ज़र  = धन सम्पति
अना = अहम
कजरवी =अत्याचार अनीति जुल्म
दाम-ए-हिर्स-ओ-हवस  = लोभ लालच लिप्सा के जाल

शनिवार, 15 जुलाई 2017

एक क़ता----

एक क़ता-----

भला होते मुकम्मल कब यहाँ पे इश्क़ के किस्से
कभी अफ़सोस मत करना कि हस्ती हार जाती है

पढ़ो ’फ़रहाद’ का किस्सा ,यकीं आ जायेगा तुम को
मुहब्बत में कभी ’तेशा’ भी बन कर मौत आती है

जो अफ़साना अधूरा था विसाल-ए-यार का ’आनन’
चलो बाक़ी सुना दो अब कि मुझको नीद आती है

-आनन्द.पाठक-

रविवार, 9 जुलाई 2017

एक ग़ैर रवायती ग़ज़ल : कहने को कह रहा है---

एक  ग़ैर रवायती ग़ज़ल : कहने को कह रहा है-----

कहने को कह रहा है कि वो बेकसूर है
लेकिन कहीं तो दाल में काला ज़रूर है

लाया "समाजवाद" ग़रीबो  से छीन कर 
बेटी -दमाद ,भाई -भतीजों  पे नूर है

काली कमाई है नही, सब ’दान’ में मिला
मज़लूम का मसीहा है साहिब हुज़ूर है

ऐसा  धुँआ उठा कि कहीं कुछ नहीं दिखे
वो दूध का धुला है -बताता  ज़रूर  है

’कुर्सी ’ दिखी  उसूल सभी  फ़ाख़्ता हुए
ठोकर लगा ईमान किया चूर चूर  है

सत्ता का ये नशा है कि सर चढ़ के बोलता
जिसको भी देखिये वो सर-ए-पुर-ग़रूर है

ये रहनुमा है क़ौम के क़ीमत वसूलते
’आनन’ फ़रेब-ए-रहनुमा पे क्यों सबूर है ?

-आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ -
सबूर = सब्र करने वाला/धैर्यवान
सर-ए-पुर ग़रूर =घमंडी/अहंकारी

शुक्रवार, 30 जून 2017

एक ग़ज़ल : मिल जाओ अगर तुम तो---

एक ग़ज़ल :  मिल जाओ अगर तुम---

मिल जाओ अगर तुम तो ,मिल जाये खुदाई है
क्यों तुम से करूँ परदा , जब दिल में सफ़ाई है

देखा तो नहीं अबतक . लेकिन हो ख़यालों में 
सीरत की तेरी मैने ,  तस्वीर   बनाई   है

लोगों से सुना था कुछ , कुछ जिक्र किताबों में  
कुछ रंग-ए-तसव्वुर से , रंगोली  सजाई  है

माना कि रहा हासिल ,कुछ दर्द ,या चश्म-ए-नम
पर रस्म थी उल्फ़त की,  शिद्दत  से निभाई है

ज़ाहिद ने बहुत रोका ,दिल है कि नहीं माना
बस इश्क़-ए-बुतां ख़ातिर ,इक उम्र  गँवाई  है

ये इश्क़-ए-हक़ीक़ी है ,या इश्क़-ए-मजाज़ी है
दोनो की इबादत में ,गरदन ही झुकाई  है

’आनन’ जो कभी तूने ,दिल खोल दिया होता
ख़ुशबू  तो तेरे दिल के ,अन्दर ही समाई  है
 
-आनन्द.पाठक-      मो0  08800927181

सीरत   = चारित्रिक विशेषताएं
रंग-ए-तसव्वुर= कल्पनाओं के रंग से
चस्म-ए-नम   = आँसू भरी आंख , दुखी
शिद्दत से = मनोयोग से
इश्क़-ए-हक़ीकी= आध्यात्मिक/अलौकिक प्रेम
इश्क़-ए-मजाज़ी = सांसारिक प्रेम

शुक्रवार, 23 जून 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 42

चन्द माहिया  :क़िस्त 42

:1:
दो चार क़दम चल कर
छोड़ तो ना दोगे ?
सपना बन कर ,छल कर

:2:
जब तुम ही नहीं हमदम
सांसे  भी कब तक
अब देगी साथ ,सनम !

:3:
जज्बात की सच्चाई
नापोगे कैसे ?
इस दिल की गहराई

:4;
सबसे है रज़ामन्दी
सबसे मिलते हो
बस मुझ पर पाबन्दी

:5:
क्या और तवाफ़ करूँ
इतना ही जाना
मन को भी साफ़ करूँ

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
तवाफ़ = परिक्रमा करना

रविवार, 11 जून 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 41

चन्द माहिया: क़िस्त 41

:1:

सदक़ात भुला मेरा
एक गुनह तुम को
बस याद रहा मेरा

:2:
इक चेहरा क्या भाया
हर चेहरे में वो
मख़्सूस नज़र आया

;3:
कर देता है पागल 
जब जब साने से
ढलता है तेरा आँचल

:4:
उल्फ़त की यही ख़ूबी
पार लगी उसकी
कश्ती जिसकी  डूबी

:5:
इतना ही समझ लेना
मै हूँ तो तुम हो
क्या और सनद देना


-आनन्द.पाठक-
08800927181
शब्दार्थ 
सदक़ात  = [सदक़ा का बहु वचन] अच्छे कार्य  .दान पुण्य, न्यौछावर आदि 
मख़्सूस   = ख़ास तौर से
साने से    = कंधे से
सनद       = प्रमाण-पत्र

गुरुवार, 1 जून 2017

एक ग़ज़ल : ज़िन्दगी न हुइ बावफ़ा आजतक---

एक ग़ज़ल : ज़िन्दगी ना हुई बावफ़ा आजतक------

ज़िन्दगी   ना  हुई  बावफ़ा आज तक
फिर भी शिकवा न कोई गिला आजतक

एक चेहरा   जिसे  ढूँढता  मैं  रहा
उम्र गुज़री ,नहीं वो मिला  आजतक

दिल को कितना पढ़ाता मुअल्लिम रहा
इश्क़ से कुछ न आगे पढ़ा  आजतक

एक जल्वा नुमाया  कभी  ’तूर’ पे
बाद उसके कहीं ना दिखा आज तक

आप से क्या घड़ी दो घड़ी  मिल लिए
रंज-ओ-ग़म का रहा सिलसिला आजतक

  एक निस्बत अज़ल से रही आप से
राज़ क्या है ,नहीं कुछ खुला आजतक

तेरे सजदे में ’आनन’ कमी कुछ तो है
फ़ासिला क्यों नहीं कम हुआ आजतक ?


-आनन्द.पाठक--
08800927181

शब्दार्थ
मुअल्लिम =पढ़ानेवाला ,अध्यापक
नुमाया = दिखा/प्रकट
तूर = एक पहाड़ का नाम जहाँ ख़ुदा
ने हजरत मूसा से कलाम [बात चीत] फ़र्माया था
निस्बत =संबन्ध
अज़ल =अनादि काल से

बुधवार, 24 मई 2017

एक ग़ज़ल : ज़रा हट के----ज़रा बच के---

एक मज़ाहिका ग़ज़ल :---ज़रा हट के ---ज़रा बच के---


मेरे भी ’फ़ेसबुक’ पे कदरदान बहुत हैं
ख़ातून भी ,हसीन  मेहरबान  बहुत हैं

"रिक्वेस्ट फ़्रेन्डशिप" पे हसीना ने ये कहा-
"लटके हैं पाँव कब्र में ,अरमान बहुत हैं"

’अंकल’ -न प्लीज बोलिए ऎ मेरे जान-ए-जाँ
’अंकल’, जो आजकल के हैं ,शैतान बहुत हैं

टकले से मेरे चाँद पे ’हुस्ना !’ न जाइओ
पिचके भले हो गाल ,मगर शान बहुत है

हर ’चैट रूम’ में सभी हैं जानते मुझे
कमसिन से,नाज़नीन से, पहचान बहुत है

पहलू में मेरे आ के ज़रा बैठिए ,हुज़ूर !
घबराइए नहीं ,मेरा ईमान बहुत है 

’बुर्के’ की खींच ’सेल्फ़ी’ थमाते हुए कहा 
"इतना ही आप के लिए सामान बहुत है"

’व्हाट्अप’ पे सुबह-शाम ’गुटर-गूँ" को देख कर
टपकाएँ लार शेख जी ,परेशान बहुत हैं

आदत नहीं गई है ’रिटायर’ के बाद भी
’आनन’ पिटेगा तू कभी इमकान बहुत है

बेगम ने जब ’ग़ज़ल’ सुनी ,’बेलन’ उठा लिया
’आनन मियां’-’बेलन’ मे अभी जान बहुत है

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
हुस्ना   = हसीना
इमकान = संभावना
"गुटर-गूं" = आप सब जानते होंगे नहीं तो किसी ’कबूतर-कबूतरी’ से पूछ लीजियेगा
हा हा हा

रविवार, 21 मई 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 40

चन्द माहिया : क़िस्त 40

:1:
जीवन की निशानी है
रमता जोगी है
और बहता पानी है

;2:
मथुरा या काशी क्या
मन ही नहीं चमका
घट क्या ,घटवासी क्या

:3:
ख़ुद को देखा होता
मन के दरपन में
क्या सच है ,पता होता

:4:
बेताब न हो , ऎ दिल !
सोज़-ए-जिगर तो जगा
फिर जा कर उन से मिल

:5;
ये इश्क़ इबादत है
दैर-ओ-हरम दिल में
और एक ज़ियारत है



-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
सोज़-ए-जिगर = अन्त: की अग्नि

शुक्रवार, 12 मई 2017

एक ग़ज़ल : हौसला है ,दो हथेली है---



हौसला है ,दो हथेली है , हुनर है
किस लिए ख़ैरात पे तेरी नज़र है

आग दिल में है बदल दे तू ज़माना
तू अभी सोज़-ए-जिगर से बेख़बर है

साजिशें हर मोड़ पर हैं राहजन के
जिस तरफ़ से कारवाँ की रहगुज़र है

डूब कर गहराईयों से जब उबरता
तब उसे होता कहीं हासिल गुहर है

इन्क़लाबी मुठ्ठियाँ हों ,जोश हो तो
फिर न कोई राह-ए-मंज़िल पुरख़तर है

ज़िन्दगी हर वक़्त मुझको आजमाती
एक मैं हूं ,इक मिरा शौक़-ए-नज़र है

लाख शिकवा हो ,शिकायत हो,कि ’आनन’
ज़िन्दगी फिर भी हसीं है ,मोतबर है 

-आनन्द.पाठक-
08800927181
शब्दार्थ
सोज़-ए-जिगर = दिल की आग
राहजन  = लुटेरे [इसी से राहजनी बना है]
गुहर   = मोती
पुरख़तर = ख़तरों से भरा
शौक़-ए-नज़र =चाहत भरी नज़र

रविवार, 7 मई 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 38

चन्द माहिया : क़िस्त 38
:1:

 उनका  मैं दीवाना
देख रहें ऐसे
जैसे मैं  बेगाना

:2:
कोरी न चुनरिया है
कैसे मैं आऊँ ?
खाली भी गगरिया है

;3:
कुछ भी तो नही लेती
ख़ुशबू ,गुलशन से
फूलों का पता देती

:4:
दुनिया का मेला है
सब तो अपने ही
दिल फिर भी अकेला है

:5:
मुझको अनजाने में
लोग पढ़ेंगे कल
तेरे अफ़साने में

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शनिवार, 6 मई 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 32 [ बहर-ए-हज़ज मुज़ाहिफ़ बह्रें-2]

उर्दू बहर पर एक बात चीत : क़िस्त 32 [ बहर-ए-हज़ज मुज़ाहिफ़ बह्रें-2]

         न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’

           अदब से मुहब्बत ,   अदब -आशना  हूं

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

----पिछली क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के मुज़ाहिफ़ बहर --’महज़ूफ़’ और मक़सूर की चर्चा कर चुका हूँ
-----इस क़िस्त में बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बहर ----मक़्बूज़     और  मक्फ़ूफ़ की चर्चा करूँगा

मुफ़ाईलुन[ 1222] +कब्ज़ =मक़्बूज़ =मफ़ाइलुन [1212]   यह आम  ज़िहाफ़ है
मुफ़ाईलुन[ 1222] +कफ़ = मक्फ़ूफ़ =मफ़ाईलु  [1 2 2 1]  लाम मय हरकत] यूँ तो यह ज़िहाफ़ भी आम है मगर उर्दू शायरी में यह ’अरूज़/जर्ब’ के मुक़ाम पर नहीं आ सकता कारण कि इस का आखिरी हर्फ़ लाम मय हरकत है जो ब नुक़्त-ए-शायरी रवा[उचित]  नहीं है

अब बहर-ए-हज़ज के मक़्बूज़ और मक्फ़ूफ़ शकल  के मानूस और मक़्बूल बहर की चर्चा करेंगे
[क] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्बूज़   : क़ब्ज़ आम ज़िहाफ़ है अत: शे’र के किसी मुक़ाम पर आ सकता है
मुफ़ाइलुन-----मुफ़ाइलुन
1212------1212
उदाहरण[ डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]
बढ़े चलो ,बढ़े चलो
बहादुरों   बढ़े  चलो
तक़्तीअ आप कर लें -आसान है इस की तक़्तीअ करना ।आप भी इसी वज़न पे शे’र कह सकते हैं --आसान है कोशिश करें।जी बिल्कुल--वज़न और बहर में शे’र कहना आसान है मगर बलाग़त--फ़साहत लताफ़त शे’रियत या तग़ज़्ज़ुल में शे’र कहना  मुश्किल है

[ख]  बहर-ए-ह्ज़ज मुसद्दस मक़्बूज़ 
मुफ़ाइलुन------मुफ़ाइलुन-----मुफ़ाइलुन
1212----------1212---------1212
उदाहरण :ऊपर के ही उदाहरण में तब्दीली कर के दिखाते है

बढ़े चलो ,डरो नहीं ,बढ़े चलो
बहादुरों विजय करो बढ़े चलो 

तक़्तीअ आप कर लें -आसान है इस की तक़्तीअ करना

[ग]  बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन----मुफ़ाइलुन-----मुफ़ाइलुन----मुफ़ाइलुन
1212---------1212--------1212--------1212
उदाहरण-ख़ुदसाख़्ता एक शे’र [ शे’रियत नहीं वज़न देखियेगा]

चढ़ान हो ,ढलाव हो पहाड़ हो जो सामने
दहाड़ दो कि दुश्मनों के दिल लगे भी काँपने

तक़्तीअ का इशारा भर कर देता हूं-तक़्तीअ आप कर लीजियेगा

चढ़ान हो/  ढलाव हो/  पहाड़ हो/  जो सामने
दहाड़ दो / कि दुश मनों / के दिल लगे /भी काँपने

[घ] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़ सालिम अल आख़िर
मुफ़ाइलुन-----मुफ़ाईलुन-----मुफ़ाइलुन---मुफ़ाईलुन
1212----------1222--------1212-------1222

उदाहरण-एक ख़ुद साख़्ता  शे’र कहने की कोशिश करते हैं, आप भी कर सकते है -आसान है [ मयार भले न बरक़रार रखें वज़न तो बरक़रार रखेंगे]

जहाँ जहाँ तुम्हारे नक्स-ए-पा पड़े दिखे जानम
वहीं वहीं पे सजदे में सर झुका दिया हूँ  सर अपना

अब तक़्तीअ भी देख लेते हैं
1 2  1  2  / 1 2 2   2   / 1 2 1 2 /  1 2  2 2 =1212---1222---1212---1222
जहाँ जहाँ/  तुम्हारे नक/स--पा पड़े /दिखे जानम
1  2  1  2 / 1 2   2  2  /  1 2 1 2  /  1  2    2 2 =1212---1222---1212---1222
वहीं वहीं  /पे सज दे में / झुका दिया/  हूँ  सर अप ना

अब ’ कफ़’ ज़िहाफ़ [मुज़ाहिफ़ मक्फ़ूफ़----मुफ़ाईलु [1221]  कहलाता है] लेते हैं }यूँ तो ’कफ़’ एक आम ज़िहाफ़ है मगर उर्दू शायरी में इसे ’अरूज़/जर्ब’ में प्रयोग नहीं किया जाता । कारण कि-मुफ़ाईलु [1221] में आख़िरी हर्फ़ -लु- मुतहर्रिक है और उर्दू शायरी में शे’र के आखिर में ’मुतहर्रिक’ हर्फ़ नहीं लाते हैं। उर्दू शायरी का मिज़ाज ही ऐसा है। अत: हमें अरूज़ /जर्ब के मुक़ाम पर हज़ज का सालिम रुक्न [मुफ़ाईलुन 1222 ] लाना ही होगा कि शे’र में आखिरी हर्फ़ साकिन पर [यहाँ -नून है ] गिरे
[च] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर
मुफ़ाईलु----मुफ़ाईलुन
1221 -------1222
उदाहरण
नहीं कुछ भी  हमारा है
ख़ुदा का ही  सहारा है

तक़्तीअ आप कर लें -आसान है । इशारा कर देता हूँ

नहीं कुछ भी / हमारा है
ख़ुदा का ही / सहारा है

[छ] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस मक्फ़ूफ़ सालिम अल आख़िर
मुफ़ाईलु---मुफ़ाईलु---मुफ़ाईलुन
1221-------1221-----12222
उदाहरण

नहीं कोई ज़माने में तिरे जैसा
नहीं कोई ज़माने में मिरे जैसा

तक़्तीअ आप कर लें-इशारा मैं कर देता हूँ

नहीं कोई/ ज़माने में / तिरे जैसा
नहीं कोई /ज़माने में  /मिरे जैसा


[ज]]  बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मकफ़ूफ़ सालिम अल आख़िर 
मफ़ाईलु-----मफ़ाईलु------मफ़ाईलु----मफ़ाईलुन
1221-----   1221--------1221-------1222
उदाहरण- [डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]-[मुसद्दस वाले शे’र से ही उदाहरण निकालते हुए ]

नहीं कोई ज़फ़ाकार ज़माने में तेरे जैसा
नहीं  कोई वफ़ादार ज़माने में मेरे जैसा

तक़्तीअ आप कर लें -इशारा मैं कर देता हूँ

नहीं कोई / ज़फ़ाकार / ज़माने में / तेरे जैसा

नहीं  कोई/  वफ़ादार /ज़माने में  /मेरे जैसा

अब हज़ज पर ज़िहाफ़ --’कफ़’----हज़्फ़---और ---क़स्र -----का अमल कर के देखते हैं कि क्या होता है

इस से दो अलग अलग बह्र बरामद होगी [झ ] और {त] । चूँकि किसी भी शे’र में ’महज़ूफ़’ और ’मक़्सूर’ का ख़ल्त जायज़ है तो एक ही बह्र में दिखा देते है आप की सुविधा के लिए वगरना दर हक़ीक़त ये दो मुख़्तिल्फ़ बहर हो सकती हैं

[झ] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़  
मुफ़ाईलु---मुफ़ाईलु------मुफ़ाईलु--- फ़ऊलुन
1221-----1221-------1221-------122

[त] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मक्फ़ूफ़ मक़्सूर 
मुफ़ाईलु---मुफ़ाईलु------मुफ़ाईलु---फ़ऊलान
1221-----1221-------1221-------1221

हम जानते हैं कि अरूज़ या जर्ब पर मुफ़ाईलु [1212] नहीं लाया जा सकता है कारण की -लाम- मय हरकत है और किसी शे’र का आख़िरी हर्फ़ ’हरकत’ पर नहीं गिरता । हाँ ’फ़ऊलुन 122] या फ़ऊलान [1221] लाया जा सकता है कारण कि लुन--या लान का आख़िरी हर्फ़ -नून- है जो  साकिन है

उदाहरण-[डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]
[ बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़ की मिसाल
मुफ़ाईलु---मुफ़ाईलु------मुफ़ाईलु--- फ़ऊलुन
1221-----1221-------1221-------122

कभी रोये ,कभी आह , भरी दिल कभी तोड़ा
सनम तेरी  मुहब्बत में  दिखाया हमें क्या क्या

तक़्तीअ आप कर लें --इशारा मैं कर देता हूँ

कभी रोये /कभी आह /भरी दिल क/भी तोड़ा
सनम तेरी /मुहब्बत ने / दिखाया ह /में क्या क्या

[नोट : बहर की माँग पर -जो जायज होगा ’मात्रा’ आप गिराते चलियेगा यानी वज़न दबाते चलियेगा

मुफ़ाईलु---मुफ़ाईलु------मुफ़ाईलु---फ़ऊलान
1221-----1221-------1221-------1221
उदाहरण-[डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के ही हवाले से]

घटा झूम के आई जो हर एक सिम्त से आज
कहीं उस परी पैकर ने बिखेरे  तो नही बाल 

तक़्तीअ आप कर लें --इशारा मै कर देता हूं~

घटा झूम / के आई जो /हर एक सिम्त /से यूँ आज
कहीं उस प /री पैकर ने/  बिखेरे  तो /नही बाल

1221  [ बड़ा दिलचस्प वाक़या आ गया। आख़िरी रुक्न --1221-- देखने में तो एक जैसा लगता है जैसे इस शे’र में और  अर्कान दिखाई दे रहे हैं। पर दोनो अलग अलग रुक्न है। सदर और हस्व का रुक्न 1221 तो मफ़ाईलु है यानी -लाम- मय हरकत जब कि जर्ब का रुक्न ’फ़ऊलान [1221] है -यानी -’नून’ साकिन है। आप को याद होगा बहुत पहले मैने कहा था कि 1221---- 2112----- 12222 -----जैसी अलामत बहुत दूर तक नहीं जाती ,गहराइयों में जाने पर यह 12222 वाली अलामत भी काम में नहीं आती । सीखने के प्रारम्भिक दौर में थोड़ी बहुत मदद करती है मगर गहराई में जाने पर मदद नहीं कर पाती । काम तो रुक्न का असल नाम ही काम आता है  --जैसे मुफ़ाईलु----फ़ऊलान --- फ़ऊलुन वग़ैरह वग़ैरह
ख़ैर--
Theoretically इस बहर की मुरब्ब: और मुसद्दस शकल हो सकती है--आप चाहें तो कोई शे’र की तबअ आज़माई [प्रयास] कर सकते हैं
यानी
मुरब्ब:
मुसद्दस :
आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

अब अगले क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के कुछ और मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे
अस्तु
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181









शनिवार, 29 अप्रैल 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 31 [ बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रे-1]

उर्दू बहर पर एक बातचीत :क़िस्त 31 [ बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ बह्रें-1]

          न आलिम ,न मुल्ला ,न उस्ताद ’आनन’

           अदब से मुहब्बत ,   अदब -आशना  हूं

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

---पिछली क़िस्त में बहर-ए-ह्ज़ज के मुरब्ब: ,मुसद्दस.मुसम्मन के सालिम बहर और उनकी मुज़ाअफ़ शकल पर बहस की थी
आज बहर-ए-हज़ज के ’मुज़ाहिफ़’ बहर पर चर्चा करेंगे
आप जानते हैं कि बहर-ए-हज़ज का बुनियादी सालिम रुक्न "मुफ़ाईलुन’[ 1 2 2 2] है अत: इस रुक्न पर लगने वाले  मुम्किनात ’ज़िहाफ़’ की चर्चा करेंगे
 ज़िहाफ़ात और उनके तरीक़ा-ए-अमल की चर्चा पहले ही कर चुके हैं
’मु फ़ाईलुन’ [ 1222] पर लगने वाले  मुम्किनात ज़िहाफ़
मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़

मुफ़ाईलुन[ 1222] +कब्ज़ =मक़्बूज़  =मफ़ाइलुन [1212]   यह ज़िहाफ़ आम है
मुफ़ाईलुन[ 1222] +कफ़ = मक्फ़ूफ़ =मफ़ाईलु  [1 2 2 1]    ][लाम मय हरकत]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +हज़्फ़ = महज़ूफ़ = फ़ऊ लुन [12 2  ]    =यह ज़िहाफ़  जर्ब/अरूज़ के लिए  मख़सूस
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम =अख़रम =मफ़ऊलुन [ 2 2 2] 
मुफ़ाईलुन[ 1222] +क़स्र =मक़्सूर = मफ़ाईल   [ 1221]  =फ़ऊलान [1221] से बदल लिया =यह ज़िहाफ़  जर्ब/अरूज़ के लिए ख़ास
मुफ़ाईलुन[ 1222] +बतर =अबतर = फ़अ लुन  [2 2]        
मुफ़ाईलुन[ 1222] +तस्बीग़ = मुस्सबीग़ = मफ़ाईलान [ 1 2 2 2 1] 

मुरक्क़ब ज़िहाफ़ 
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम+क़ब्ज़]   =अख़रम मक़्बूज़] = फ़ा इलुन [ 212] = [नोट इसे ’शतर’’ भी कहते है और मुज़ाहिफ़ को”अश्तर’ कहते हैं
मुफ़ाईलुन[ 1222] +बतर+क़ब्ज़ = अबतर मक़्बूज़   = फ़ अल   [ 1 2]  = लाम साकिन 
मुफ़ाईलुन[ 1222] +बतर + हज़्फ़ = अबतर महज़ूफ़  =  फ़अ       [2]       [-ऐन साकिन]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +बतर+ क़स्र = अबतर मक़्सूर = फ़ा अ     [ 2 1]  [-ऐन साकिन]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम+कफ़ = अखरम मक़्फ़ूफ़        = मफ़ऊलु  [2 2 1]  [ संयुक्त रूप से इसे ’अख़रब’ भी कहते है यानी    ख़र्ब= ख़रम+कफ़
मुफ़ाईलुन[ 1222] + ख़रम+हज़्फ़ = अखरम महज़ूफ़ =फ़अ लुन   [2 2]     [ -ऐन- साकिन]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम+क़स्र =अख़रम मक़्सूर =फ़अ लान [ 2 2 1 ]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +ख़रम_तस्बीग़ = अख़रम मुस्सबीग़ =मफ़ ऊ लान [ 2 2 2 1]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +कब्ज़+तस्बीग़ = मक़्बूज़ मुस्सबीग़ =मफ़ाइलान  [12121 ]
मुफ़ाईलुन[ 1222] +हतम [=बतर+क़ब्ज़+तस्बीग़]=अहतम  = फ़ऊल       [ 12 1]  [ लाम साकिन

घबराइए नहीं

कोई भी शायर इन तमाम मुमकिनात [संभावित] मुज़ाहिफ़ बहर में शायरी नहीं करता । वो तो academic discussion और जानकारी के लिए लिख दिया । परन्तु कोई मनाही भी नहीं है । आप चाहें तो कर सकते हैं ।ये आप के फ़नी ऎतबार और हुनर-ए-सुखन पर निर्भर करेगा
एक बात और
इन्ही हज़ज की मुज़ाहिफ़ बहरों पर तख़्नीक़ के अमल से ’ रुबाई’ के 24-औज़ान बरामद होते है। वैसे ही जैसे
बहर-ए-मुतक़ारिब और मुतदारिक के मुज़ाहिफ़ बहरों पर ’तस्कीन’ और तख़नीक के अमल से ’माहिया ’ के  24- औज़ान बरामद होते है---चूँकि यह दोनों ’स्निफ़-ए-सुख़न’ [ काव्य विधायें] उर्दू शायरी की स्वतन्त्र  ’काव्य विधा’ है अत: इस पर किसी दीगर मुक़ाम पर विस्तार से चर्चा करेंगे। शिगूफ़ा यहाँ छोड़े  जाता हूँ
एक बात और
अहले अरब ने [ अरब के अरूज़ियों ने] ज़िहाफ़ात के मुआमले में 3-क़ैद लगा रखी है
1 मुअक़्क़बा
2 मुरक़्क़बा
3 मुकन्नफ़ा
इस क़ैद पर , विस्तार मे किसी अन्य मुकाम पर चर्चा करेंगे। ’मुआक़बा’ के बारे में ज़रा संक्षिप्त में चर्चा कर लेते हैं यहां ।कारण कि  ’हज़ज’ पर मुअक़्क़बा ’ है यानी
------किसी एक single रुक्न में या दो consecutive रुक्न में  लगातार ’[यानी एक के बाद दूसरा] दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ एक साथ आ जाते है तो  सबब पर ज़िहाफ़ या तो लगेगा या नहीं लगेगा। अगर लगा तो सिर्फ़ किसी एक ही सबब  पर लगेगा ,दोनो ’सबब’ पर एक साथ नहीं लगेगा।ऐसी स्थिति 9-बह्रों में होती है । और वो बह्रें है  तवील---मदीद---वाफ़िर-----कामिल-----हज़ज-----रमल----मुन्सरह-----ख़फ़ीफ़- और--मुजतस
यानी बह्र-ए-हज़ज में मुअक़्कबा है ।

अब आप कहेंगे कि इस ’परिभाषा’ की या इस क़ैद की क्या ज़रूरत थी? अरूज़ी की किताब में सामान्यतया इस परिभाषा का ज़िक़्र नहीं दिखता।
ज़रूरत इस लिए पड़ी कि
हम जानते हैं कि किसी रुक्न पर ’ज़िहाफ़’ लगाते हैं तो एक ’मुज़ाहिफ़ रुक्न’ प्राप्त होता है । कभी कभी वही  ’मुज़ाहिफ़ रुक्न’ किसी और दूसरे तरीक़े  या दूसरे अमल से या दूसरे ज़िहाफ़ [मुफ़र्द या मुरक़्क़ब ] के अमल से भी प्राप्त हो सकता है ।तो फिर यह देखना पड़ेगा कि वो तरीक़ा कहीं [मुआक़िबा,---,---] की खिलाफ़वर्जी तो नहीं है  ।अगर ख़िलाफ़वर्जी है वह तरीक़ा उचित नहीं माना जायेगा ।
मुआक़बा की क़ैद इस लिए लगाई गई कि रुक्न में एक साथ 4-या -5 मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ न आ जाये । अरबी कलमात 4-या-5 मुतहर्रिक हर्फ़  तो ’स॒पोर्ट’ कर लेते है मगर  उर्दू शायरी ’सपोर्ट’ नही कर पाती । उर्दू शायरी मे 3- मुतहर्रिक आते ही ’तस्कीन’-ए-औसत का अमल ’सपोर्ट’ करने लगता है
और यह क़ैद इस् लिए  भी कि  कहीं ज़िहाफ़ लगाते लगाते  दो वज़न की शकल  एक जैसी न हो जाये कि भ्रम की स्थिति पैदा हो जाये
ख़ैर बात निकली  तो हो गई.....

यहाँ सभी मुमकिनात मुज़ाहिफ़ बह्र और उस पर भी तस्कीन और तख़नीक़ की  अमल का  चर्चा करना न ज़रूरी है , न मुनासिब है-- सिवा इस के कि उलझन पैदा हो । चर्चा तो इस लिए कर लिया कि वक़्त ज़रूरत काम आए।

अब हम यहाँ सिर्फ़ हज़ज के उन्ही मक़्बूल और मानूस मुज़ाहिफ़ बहर की चर्चा करेंगे जिस में आम तौर पर आम शो’अरा शायरी करते है और जो राइज़ हैं
[क] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: महज़ूफ़ 
मुफ़ाईलुन---फ़ऊलुन
1222----122
ऊपर देखें तो स्पष्ट  है कि मुफ़ाईलुन पर हज़्फ़ ज़िहाफ़ लगने से ’फ़ऊलुन [122] बरामद होता है जिसे महज़ूफ़ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ शे’र में अरूज़/जर्ब के लिए ख़ास है
और चूँकि एक शे’र में 4-रुक्न [यानी मिसरा मे 2-रुक्न] तो मुरब्ब: कहलाता है
एक उदाहरण [आरिफ़ ख़ान साहब के हवाले से]-ख़ुद साख़्ता शे’र है उनका

न जीते हैं   न मरते
तेरी फ़ुरक़त में हमदम

आप तक़्तीअ कर के देख सकते है -आसान है
1  2  2  2  / 1 2  2 =1222--122
न जीते हैं  / न मर ते
 1 2   2   2    / 1  2  2 =1222--122
तिरी फ़ुर क़त/ में हम दम
अगर इसी शे’र को ज़रा तब्दील कर के देखते हैं कि क्या होता है ---आप ख़ुद ही देख लें कि क्या होता है
न जीते हैं   न मरते  हैं = 1222---1222
तेरी फ़ुरक़त में ,ऎ हमदम = 1222---1222
बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: सालिम का वज़न आ गया
यानी कोई मिसरा आप के हाथ लग गया तो मुरब्ब: मुसद्दस मुसम्मन मफ़ज़ूफ़ मक़्सूर वग़ैरह  बनाना तो आप के बायें हाथ का खेल होगा-शर्त यह कि मिसरा अपना पूरा मुकम्मल अर्थ [महफ़ूम] की अदायगी करे।

 इसकी मुसद्दस और मुसम्मन शकल भी होती हैं  और नाम यूँ होगा
[ख] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़ 
मुफ़ाईलुन -----मुफ़ाईलुन---फ़ऊलुन
1222---------1222--------122
एक उदाहरण [तक़्तीअ] आप कर लीजियेगा
मीर की एक ग़ज़ल है जिसका एक शे’र है

सुख़न मुश्ताक़ है आलम हमारा
गनीमत है जहाँ  मे दम हमारा 

ग़ालिब की ग़ज़ल का भी एक शे’र ले लेते है कि बात ज़रा और साफ़ हो जाये

  हवस को है निशात-ए-कार क्या क्या
न हो मरना तो जीने   का मज़ा  क्या 

चलिए आप के लिए इस की तक्तीअ  किए देता हूँ
1  2    2  2   / 1 2  2  2   / 1 2  2  = 1222---1222---122
ह वस को है /नि शा ते का / र क्या क्या
1   2   2  2  / 1 2 2   2     / 1 2 2  = 1222---1222---122
न हो मरना /तो जी ने   का / मज़ा  क्या
इस शे’र शुद्ध रूप से  हज़ज ’महज़ूफ़’  की मिसाल है -कारण कि शे’र के अरूज़ और जर्ब -दोनो मुक़ाम पर ’फ़ऊलुन’ [ 122] यानी महज़ूफ़ है

[ग] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन महज़ूफ़ 

मुफ़ाईलुन---------मुफ़ाईलुन -----मुफ़ाईलुन---फ़ऊलुन
1222----------1222---------1222--------122
एक उदाहरण [तक़्तीअ आप कर लीजियेगा][एक ख़ुद साख़्ता शे’र इस ग़रीब हक़ीर का भी बर्दाश्त कर लें

हीं उतरेगा अब कोई   फ़रिश्ता आसमाँ से
उसे डर लग रहा होगा यहाँ  अहल-ए-ज़हाँ से

तक़्तीअ कर के देखते हैं
1  2   2  2 / 1    2  2  2    /  1  2    2    2   / 1 2 2 = 1222---1222----1222---122
नहीं उतरे / गा  अब कोई   / फ़ रिश ता  आ/ समाँ से
1  2   2  2    /   1 2  2 2 / 1 2  2   2  /  1 2 2  = 1222---1222---1222---122
उसे डर लग / रहा होगा / यहाँ  अह ले / ज़हाँ से

वैसे यह पूरी की पूरी ग़ज़ल ’महज़ूफ़’ में ही है--कहीं -मक़्सूर की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

[घ] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: मक़्सूर
मुफ़ाईलुन--फ़ऊलान   [ नून साकिन]
1222------1221
ऊपर देखें तो स्पष्ट  है कि मुफ़ाईलुन पर क़स्र  ज़िहाफ़ लगने से ’फ़ऊलान [1221 ] बरामद होता है जिसे ’मक़्सूर’ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ शे’र में अरूज़/जर्ब के लिए ख़ास है
एक उदाहरण [डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के हवाले से]

तड़पते हैं हर एक आन
तेरी फ़ुरक़त मे हम आह

तक़्तीअ कर के देखते हैं
1 2  2   2 /  1 2 2  1    =  1222----1221  [यहाँ हर एक आन --में अलिफ़ का वस्ल है अत: ’हरेकान ’का [ 1221 ] तलफ़्फ़ुज़ देता है
तड़पते हैं /हर एक आन
1 2   2    2    / 1 2  2 1 = 1222----1221
तेरी फ़ुरक़त /मे हम आह

इसकी मुसद्दस और मुसम्मन शकल भी हो सकती है

[च] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस मक़्सूर 

मुफ़ाईलुन--------मुफ़ाईलुन--फ़ऊलान   [ नून साकिन]
1222------ 1222------1221
एक उदाहरण [तक़्तीअ आप कर लीजियेगा]
मीर के उसी ग़ज़ल का मक़्ता है

खे रहते हैं दिल पर हाथ ऎ  ’मीर’
यही शायद  कि है सब ग़म हमारा

[इस मक़्ता में- अरूज़ के मुक़ाम पर --(हा) --थ ऎ ’मीर’ --- मक़्सूर [ 1221] है जब कि जर्ब में  -हमारा - ’महज़ूफ़’ [122]है और शायरी में इनका ख़ल्त [मिलावट] जाइज है ]क्यों? कारण ऊपर लिख दिया है

ग़ालिब के उसी ग़ज़ल का मक़्ता लेते है

बला-ए-जाँ है ;ग़ालिब’ उसकी हर बात 
इबारत क्या ,इशारत क्या ,अदा  क्या 

यहाँ मिसरा सानी तो ख़ैर -मुसद्दस महज़ूफ़-में ही और होना भी चाहिए कारण कि साहब ने मतला के दोनो शे’र में -महज़ूफ़- बाँध दिया था तो लाज़िमन मक्ता के मिसरा सानी में महज़ूफ़ बांधना ही था । मगर मक्ता के मिसरा में ऐसी कोई क़ैद नही सो ग़ालिब साहब ने इसे ’मक़्सूर’ में बांध दिया जो रवा भी और जाइज भी है
मिसरा उला की तक़्तीअ कर देता हूँ
1  2  2   2   / 1  2  2    2     / 1  2  2 1 = 1222---1222---1221
बला-ए-जाँ/  है ;ग़ालिब’ उस/ की हर बा त

एक बात आप ध्यान से देखे---ग़ालिब [उस्ताद] हों या ’मीर’ [ख़ुदा-ए-सुख़न] हों  किसी ने पूरी की पूरी ग़ज़ल सिर्फ़ मक़्सूर में ही हो--नहीं कही है। उन्होने मक़्सूर का सहारा कहीं कहीं और किसी किसी मिसरा में लिया है जो रवा है
इसका मतलब यह हुआ कि ख़ालिस मक़्सूर में पूरी की पूरी ग़ज़ल कहना वाक़ई मुश्किल का काम है।  जी निहायत मुश्किल का काम है ।मेरे ख़याल से - कारण कि जो शे’र के आख़िर में ’हर्फ़ उल आख़िर’ साकिन तो  है  ज़रूर- मगर अलिफ़ के बाद आता है  यानी ’अलिफ़’ जब आप के शे’र को ऊँचाई पर खीच रहा था ्यानी परवाज़ पर था कि अचानक उसे साकिन पर उतरना पड़ा , जो शे’र की रवानी को कम कर देता है ।यक़ीनन ’तक़्तीअ  में तो  फ़र्क नहीं  पड़ता है शे’र की रवानी में फ़र्क़ पड़ता है ।
अब ग़ालिब के शेर -में अरूज़ के मुक़ाम पर --की हर बात - को ही लें । की हर बा-- तक तो कोई कबाहत नहीं है श्रोता सुनता भी यही है -त- को ज़रा हल्का [लगभग न के बराबर ]  भी बोलेंगे तो श्रोता भाव से समझ जायेगा
ख़ैर---
[छ] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन मक़्सूर

मुफ़ाईलुन-----मुफ़ाईलुन--------मुफ़ाईलुन--फ़ऊलान   [ नून साकिन]
1222------1222------ 1222------1221
एक उदाहरण [डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से

मिरे हमदम तेरा दामन जो पकड़ेगा कोई ख़ार
तुझे उस लम्हा रह रह कर सताएगी  मेरी याद

तक़्तीअ के लिए एक इशारा कर देते है-तक़्तीअ आप कर लीजियेगा]

मिरे हमदम / तेरा दामन / जो पकड़ेगा / कोई ख़ार

तुझे उस लम/  हा रह रह कर/  सताएगी  /मेरी याद

एक बात ’महज़ूफ़’ और मक़्सूर के सन्दर्भ में

---यह ज़िहाफ़ आपस में एक दूसरे की जगह बदले जा सकते हैं । यानी एक मिसरा में ’महज़ूफ़’ और दूसरे मिसरे में ’ मक़्सूर’ लाया जा सकता है। लेकिन बह्र का नाम  -मिसरा सानी में [यानी जर्ब के मुक़ाम पर] प्रयुक्त मुज़ाहिफ़ के नाम से तय होगा
यानी अगर जर्ब में ’मक़्सूर’ का प्रयोग हुआ है तो बह्र का नाम होगा-- बहर-ए-हज़ज [ मुरब्ब:/मुसद्दस/मुसम्मन] मक़्सूर
और अगर  जर्ब में ’महज़ूफ़’ का प्रयोग हुआ है तो बह्र का नाम होगा-- बहर-ए-हज़ज [ मुरब्ब:/मुसद्द्स/मुसम्मन] महज़ू
ये ज़िहाफ़ आपस में क्यों मुतबद्दिल है? और वज़न में कोई फ़र्क़ क्यों नही पड़ता?

महज़ूफ़ [122] और मक़्सूर [1221] में मात्र एक ’साकिन’ अल आख़िर  ज़ियादत है और उसके पहले एक साकिन [ अलिफ़ का] और है ।अत: शे’र के अन्त में दो-साकिन’ एक साथ आ गए । जैसे दोस्त----बख़्त--- शिकस्त--याद ..ख़ार  -आदि आदि। अन्त में दो साकिन एक साथ आते है] ऐसे केस में तक्तीअ में मात्र ’एक साकिन’ ही शुमार होता है दूसरा साकिन नहीं ।अत: बह्र के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

अगली क़िस्त में --हम हज़ज पर लगने वाले अन्य ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र करेंगे

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
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