बुधवार, 28 दिसंबर 2016

उर्दू बह्र पर एक बात्तचीत : क़िस्त 14 [ज़िहाफ़ात]

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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 14 [ज़िहाफ़ात]
[Disclaimer Clause - वही जो क़िस्त -1 में है ]

- कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो ’सबब-ए-खफ़ीफ़’ [हरकत+साकिन] पर  लगते है 

...पिछली कड़ी [क़िस्त 13] में उन ज़िहाफ़ात की चर्चा कर रहे थे जो ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़  पर लगते हैं। और इस सिलसिले में हम 3-ज़िहाफ़ मसलन ज़िहाफ़ ’ख़ब्न’...तय्यी....कब्ज़ ..की चर्चा कर चुके हैं । इस आलेख में 8-और ज़िहाफ़ कफ़्फ़्......क़स्र्.......ह्ज़्फ़्.........रफ़’अ........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़......की चर्चा करेगे

ज़िहाफ़ क़फ़्फ़  :- अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म हो रहा है तो ’कफ़्फ़ ज़िहाफ़’ सातवें मुकाम पर साकिन को गिरा देता है और मुज़ाहिफ़ रुक्न का नाम ’मकूफ़्/मौकूफ़्’ कहलाता है
ज़ाहिर है कि रुक्न में  सातवां मुक़ाम तभी सम्भव है जब वो ’सुबाई रुक्न’[7-हर्फ़ी रुक्न] हो और अन्त में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता हो यानी [वतद(3)+सबब(2)+सबब-ए-ख़फ़ीफ़(2)  हो या सबब(2)+वतद(3)+सबब-ए-ख़फ़ीफ़(2)
और सातवें  मक़ाम पर ’साकिन’ ही होगा। बस इसी साकिन को गिराने का काम ज़िहाफ़ ’कफ़्फ़’ करता है । यह एक आम ज़िहाफ़ है
आप अगर 8-सालिम रुक्न[जिनकी चर्चा मैं पहले भी कर चुका हूं~) को ध्यान से देखे तो आप को ऐसे 2-रुक्न ऐसा है जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है और वो रुक्न हैं
                                  मफ़ा ई लुन् [1 2 2 2 ] ........फ़ाइलातुन् [  2 1 2 2]  [ ....लुन्...तु्न्....सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है जिसमें पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक है और दूसरा हर्फ़ साकिन है]
मफ़ा ई लुन् [1 2 2 2 ]+ कफ़्फ़     = मफ़ा ई लु  [1 2 2 1] यानी सातवें मक़ाम का ’न’ गिरा दिया रो बाक़ी बचा मफ़ा ई लु [यानी लाम मय हरकत]
फ़ा इला तुन् [ 2 1 2  2 ] क़फ़्फ़     = फ़ा इला तु      [2 1 2 1  ] यानी सातवें मुक़ाम से ’न’ गिरा दिया तो बाक़ी बचा  फ़ा इला तु   [यानी ’ते’ मय हरकत
यह ’आम ज़िहाफ़ ’ है
एक बात और जब किसी रुक्न पर[ख़ब्न और कफ़ ज़िहाफ़ एक साथ अमल करते है तो हम उसे ’मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ ’ कहते है और इस मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ का नाम है ’शकल’ और मुज़ाहिफ़ का नाम होगा ’मश्कूल’ - मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ [यानी मिश्रित ज़िहाफ़] की चर्चा बाद में करेंगे ।बात निकली तो बात याद आ गई} अभी तो हम ’मुनफ़र्द’ [यानी एकल] ज़िहाफ़ की चर्चा कर रहे है। अगला मुनफ़र्द ज़िहाफ़ है ’क़स्र’ जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगता है

ज़िहाफ़ क़स्र   :-अगर किसी रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है तो ज़िहाफ़ ’क़स्र’ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के ’साकिन’ को गिरा देता है और उस से पहले आने वाले ’मुतहर्रिक ’ को साकिन कर देता है और इस तरह बरानद होने वाली मुज़ाहिफ़ रुक्न को ’मक़्सूर’ कहते हैं। हम जानते ही हैं कि सबब-ए-ख़फ़ीफ़ = हरकत+साकिन होता है तो कस्र ज़िहाफ़ साकिन को गिरा देगा और हरकत को साकिन कर देगा } एक उदाहरण से समझाते है -----लुन्-- या ---तुन् -- सबब-ए-खफ़ीफ़ है जिसमें --लु-- तु-- तो मय हरकत [मुतहर्रिक] है और --न्-- साकिन है । ज़िहाफ़ ’कस्र’ इसी साकिन --न्-- को गिराएगा और --लु---तु-- को साकिन [यानी -लु को  और -तु  को --त--]कर देगा ।
हम जानते है  8-अर्कान में से 4-अर्कान ऐसे हैं जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है और वो हैं
मफ़ा ई लुन्.......फ़ा इला तुन्........मुस तफ़अ लुन्......फ़ऊ लुन्

मफ़ा ई लुन्  [ 12 2 2 ] +क़स्र      =  मफ़ा ई ल [12 2 1]     = यानी आखिरी --लुन्-- का --न्..--गिरा दिया और इस से पहले जो--लु--को साकिन --ल्--कर दिया
फ़ा इला तुन् [ 2 12 2 ] +क़स्र     = फ़ा इला  त [ 2 12 1]    = यानी आखिरी  --तुन्--का  --न्’- गिरा दिया और  --तु-- को साकिन - त्--कर दिया
मुस तफ़’अ लुन् [ 2 21 2] +क़स्र  = मुस तफ़’अ ल् [2 2 2]  = यानी आखिरी --लुन्-- का --न्-गिरा दिया और --लु--को साकिन --ल्--कर दिया । ध्यान देने की बात है कि यहाँ तफ़’अ में --’अ-- मुत्तहर्रिक है और --ल-- साकिन बचा तो दोनो मिल कर
[हरकत=साकिन] फिर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ बना लेते है इसी से इसका वज़न ’2’ लिखा यानी मुज़ाहिफ़ रुक्न को अब पढ़ेगे ’ मुस तफ़ अल’  जो किसी हम वज़न मानूस रुक्न --मफ़ ऊ लुन[2 2 2 ] से बदल लिया
फ़ऊ लुन्        [ 12 2     ] +क़स्र    = फ़ऊ ल      [12 1]     = यानी आखिरी --लुन्-- का --न् -गिरा दिया और --लु--को साकिन --ल्--कर दिया

ज़िहाफ़ हज़्फ़  :- अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है तो ज़िहाफ़ ’हज़्फ़’ उसे साकित [खत्म ]कर देता है और मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे ’महज़ूफ़’ कहते हैं [
हम जानते है कि 8-सालिम रुक्न में से 5-रुक्न ऐसे हैं जो ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ पर खत्म होता है और वो रुक्न  हैं
मफ़ा ई लुन्......फ़ा इला तुन्......फ़ा’अ ला तुन्....मुस तफ़’अ लुन्.... ....फ़ऊ लु न् [ यहा..’अ को ऐन मय हरकत समझें ]
मफ़ा ई लुन् [ 12 2 2 ] + हज़्फ़  = मफ़ा ई [ 12 2] यानी मफ़ाईलुन् का ’लु न्’ गिरा दिया बाक़ी बचा मफ़ा ई [12 2 } और इसे किसी मानूस हम वज़न रुक्न ’फ़ऊ लुन् [122] से बदल लिया
फ़ा इला तुन् [ 2 12 2]+ हज़्फ़   = फ़ा इला [ 2 12] यानी फ़ा इला तु न् का ’तुन्’ गिरा दिया बाक़ी बचा फ़ा इला [2 12] और इसे किसी मानूस हम वज़्न रुक्न ’फ़ा इलु न् [ 2 1 2] से बदल लिया
मुस तफ़’अ  लु न् [ 2 21 2 ]+ह्ज़्फ़ = मुस तफ़’अ [ 2 21] यानी मुस तफ़’अ लु न् का ’लु न्’ गिरा दिया बाक़ी बचा मुस तफ़’अ [2 21]
फ़ऊ लुन्   [12 2 ]+हज़्फ़         =  फ़ऊ [ 12 ] यानी फ़ऊ लुन से ’लुन’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’फ़ऊ’ जिसे किसी मानूस हम वज़न ’फ़ ’अल[1 2] से बदल लिया
यह् ज़िहाफ़् ’अरूज़/ज़र्ब ’ के लिए मख़्सूस है

ज़िहाफ़ रफ़’अ  :-अगर कोई रुक्न दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है तो ज़िहाफ़ ’रफ़’अ ’ पहले सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को साकित [गिरा देना/मिटा देना/हटा देना} कर देता है और जो मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे मरफ़ू’अ कहते है। हम जानते हैं कि 8 सालिम रुक्न मे से सिर्फ़ 2-रुक्न ही ऐसे हैं जो दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होते हैं और वो रुक्न हैं
मुस् तफ़् इलुन्.............मफ़् ऊ लातु
मुस् तफ़् इलुन् [2 2 1 2]+ रफ़’अ = तफ़् इलुन् [ 2 12] यानी मुस् तफ़् इलुन् से पहला सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मुस् को साकित् कर् दिया बाक़ी बचा तफ़् इलुन् जिसे मानूस् बहर् फ़ाइलुन् [2 12] से बदल् लिया ।यह् ज़िहाफ़् अरूज़् और जर्ब् के अलावा शे’र् के हर मुक़ाम् पर् आ सकता है
मफ़् ऊ लातु [ 2 2 21] + रफ़’अ = ऊ लातु [2 21] यानी मफ़् ऊ लातु से पहला सबब-ए-ख़फ़ीफ़् मफ़् को साकित् कर दिया बाक़ी बचा ऊ लातु जिसे मानूस बहर् मफ़् ऊ ल [2 2 1  ल मय् हरकत्] से बदल लिया । यह ज़िहाफ़् अरोज़् और् जर्ब् के अलावा शे’र के हर् मुकाम पर आ सकता है

 ज़िहाफ़ जद्द’अ :- अगर किसी ्सालिम रुक्न के शुरु में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ हो तो दोनो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को ’एक साथ’ गिरा देने का [साकित करने का ] काम ज़िहाफ़ जद्द’अ करता है और इस से जो मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे ’मज्दू’अ’ कहते हैं } आप जानते ही हैं कि 8-सालिम रुक्न में से 2-रुक्न ऐसे हैं जो दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है और वो है
मुस् तफ़् इलुन् .....और्....... मफ़् ऊ लातु

मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12]+ जद्द्’अ   = इलुन् [12] यानी मुस् तफ़् इलुन् से दोनो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मुस् ...तफ़् दोनो साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा ’इलुन्’(12] जिसे किसी मानूस् रुक्न्  ’फ़’अल् [12] से बदल् लिया।ख़याल् रहे यहाँ --’अ- मय् हरकत् है जो -ल्-के साथ् मिल् कर् -’अल्- सबब्-ए-ख़फ़ीफ़्  बन् गया । यह् ज़िहाफ़् अरूज़./जर्ब के लिए मख़्सूस् है यानी ख़ास् तौर् पर् निर्धारित् है।
मफ़् ऊ लातु    [2 2 2 1]+ जद्द्’अ  = लातु [2 1] यानी मफ़्ऊलातु से दोनो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मफ़् ..ऊ दोनो साकित् कर दिया तो बाक़ी बचा ’लातु’[ 2 1] जिसे मानूस् रुक्न्  फ़्’अ लु [2 1] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहां -’अ’ मय साकिन् है और् अ-लु-बज़ाहिर् मुतहर्रिक् है ।ज़ाहिर् है कि यह् ज़िहाफ़् किसी शे’र् के अरूज़् और् जर्ब् के मुक़ाम् पर् नही आ सकता कारण कि --लातु--में -तु- मुतहर्रिक् है और् उर्दू में कोई मिसरा/शे’र मुतहर्रिक् पर् ख़त्म् नही होता

ज़िहाफ़् जब्ब’अ :-अगर किसी सालिम रुक्न के आख़िर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आए तो ज़िहाफ़ ’जब्ब’अ इन दोनो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ को ’साकित’ [गिरा/मिटा/हटा] देता है और उस से बरामद मुज़ाहिफ़ रुक्न का नाम मजबूब है
हम जानते है कि 8-सालिम रुक्न में से सिर्फ़ 2-सालिम् रुक्न् ऐसे हैं जिसके आखिर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है और वो सालिम रुक्न हैं
मफ़ा ई लुन.........और......फ़ा’अ ला तुन  [यानी लुन और तुन ]
मफ़ा ई लुन् [12 2 2]+जब्ब्  = मफ़ा [12] यानी आखिर् के दो अस्बाब्-ए-ख़फ़ीफ़् --ई--लुन्.. को साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा .. मफ़ा[12]  जिसे मानूस् रुक्न् ’फ़’अल् (12] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहाँ -’अ मुतहर्रिक् है जो --ल् साकिन् से मिल् कर् ’अल् बना लिया यानी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़
फ़ा’अ ला तुन् [21 2 2]+जब्ब् = फ़ा’अ [2 1] यानी आखिर् के दो अस्बाब्-ए-ख़फ़ीफ़् --ला---तुन् को साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा फ़ा’अ [21] जिसे किसी मानूस् रुक्न् फ़’अ लु (21] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहाँ भी --’अ मय् हरकत् है
यह् ज़िहाफ़् भी अर्रोज़्/जर्ब् से मख़सूस् है
एक बात आप नोटिस कर रहे होंगे कि दोनो ज़िहाफ़ --ज़िहाफ़ जद्द’अ और ज़िहाफ़ जब्ब में अमल तो दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ एक साथ पर अमल कर रहा है बस फ़र्क इतना कि एक में अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ सालिम रुक्न के शुरु में आ रहा है [ जद्द’अ में ] तब अमल करता है जब कि दूसरे में सालिम रुक्न के आखिरी में आ रहा है जब्ब में]तब अमल करता है ।

ज़िहाफ़् हत्म्  :-अगर किसी सालिम रुक्न के आख़िर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आये तो ज़िहाफ़ ’हत्म’ आखिरी सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को गिरा देता है [यानी साकित कर देता है ] और उस से पहले वाले सबब-ए-ख़फ़ीफ़ केत साकिन को गिरा देता है और हरकत को साकिन कर देता है और् इस से जो मुज़ाहिफ़ रुक्न हासिल होता है उसे ’अहतम’ कहते हैं ।
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से 2-रुक्न ही ऐसे है जिसके आख़िर में 2-अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है और वो हैं
मफ़ा ई लुन.........और......फ़ा’अ ला तुन [यानी लुन और तुन]
मफ़ा ई लुन् [ 12 2 2]+ हत्म्     = मफ़ा’अ [12 1] यानी मफ़ा ई लुन् से  आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् --लुन्- को साकित् कर् दिया और् उस् से पहले जो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् -ई [ऎन्+ये] बचा उसमें से -ये - गिरा दिया और् उस् से पहले जो -ऎन् [जो अभी मुतहर्रिक् है ] को साकिन् कर् दिया तो हासिल् हुआ मफ़ा’अ [12 1] यहाँ -’अ- साकिन् है -ख़याल् रहे । इसे किसी मानूस् बहर्  फ़ऊल् [12 1] से बदल् लिया
फ़ा’अ ला तुन् [2 1 2 2] +हत्म्   = फ़ा’अ ल् [ 21 1] यानी फ़ा’अ ला तुन्  से आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् --तुन्- को साकित् कर दिया और् इस् से पहले के सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् [ला --लाम् अलिफ़्] से अलिफ़् साकिन् को गिरा दिया और् लाम् [ [ल] अभी मुतहर्रिक् है ] को साकिन् कर् दिया तो  हासिल् हुआ --फ़ा’अ ल् [22 ] जिसे किसी मानूस् रुक्न् - फ़’अ लुन  [2 2] -[-’अ साकिन है ] से बदल लिया

ज़िहाफ़ तस्बीग् :-अभी तक जितने ज़िहाफ़ात हमने देखे सब के अमल से सालिम रुक्न के हर्फ़ में नुक़सान ही नुक़सान ही हुआ ...कहीं सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का हर्फ़-ए-साकिन गिर गया [साकित[ हो गया ,,कभी हर्फ़-ए-हरकत ्साकिन हो गया तो कहीं खुद सबब ही साकित हो गया --यानी  हर्फ़/हरूफ़ का नुक़सान ही हुआ ऐसे ज़िहाफ़ात को ज़िहाफ़ बनुक़सान भी कह सकते हैं \
मगर ऐसा नहीं है कि हए ज़िहाफ़ हर्फ़ का नुक़सान ही करता है } कुछ ज़िहाफ़ ऐसे भी हैं जो हर्फ़ का इज़ाफ़ा भी करते है ।तस्बीग़ एक ऐसा ही ज़िहाफ़ है जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगता है
किसी रुक्न के आख़िर में अगर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [हरकत+साकिन] है  तो हरकत और साकिन के बीच में एक ’साकिन’ का इज़ाफ़ा कर देते है } इस अमल को तस्बीग़ कहते है और मुज़ाहिफ़ को ’मुस्बीग़’ कहते है और यह ज़िहाफ़ सिर्फ़ ’अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस [निर्धारित है
वो सालिम रुक्न जिसके अन्त में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है वो हैं
मफ़ा ई लुन्.............फ़ा इला तुन्....फ़ा’अ ला तुन्....मुस तफ़’अ लुन्...फ़ऊलुन्  [यानी लुन् ....तुन् ...]
मफ़ा ई लुन् [ 1 2 2 2]  + तस्बीग़ = मफ़ा ई लान् [ 1 2 2 2 1] यानी आखिरी  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ लुन्  [लाम्,,नून्  ] के बीच् एक् साकिन् ’अलिफ़्’ का इज़ाफ़ा कर् देते है तो लान् हो जायेगा
फ़ा इला तुन् [ 2 12 2 ]  +तस्बीग़्  =  फ़ा इला तान् [ 2 12 2 1] यानी आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् तुन् [ ते,,,नून्  ] के बीच् एक् साकिन् ’अलिफ़्’ का इज़ाफ़ा कर् देते है तो  --तान्- हो जायेगा
फ़ा’अ ला तुन् [ 21 2 2 ] -तस्बीग़्  =  फ़ा’अ ला तान् =       -----------तदैव----
मुस् तफ़्’अ लुन् [2 2 1 2 ]+तस्बीग़् = मुस् तफ़् इ लान्  =-----------तदैव----
फ़ऊलुन् [ 12 2]   +तस्बीग़्               = फ़ऊ लान् [ 12 21]     -----तदैव

अब तक हम ने सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात ..........खब्न.....तय्य...  क़ब्ज़.....कफ़्फ़्......क़स्र्.......ह्ज़्फ़्.........रफ़’अ........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़ [11] ज़िहाफ़ का ज़िक़्र कर चुके हैं

अब ज़िहाफ़ के बारे में एक -दो सवाल आप के ज़ेहन में भी उठ रहे होंगे

एक तो यह कि-- कि सालिम रुक्न पर ज़िहाफ़ लगने के बाद जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होती है उसे किसी मानूस रुक्न में क्यों बदलते हैं ? अगर न बदलें तो क्या होगा? क्या यह बदलना mandatory है या obligatory ??
अरूज़ की किताबें इस मसले पर ख़ामोश हैं । मगर हमें लगता है कि ज़िहाफ़ लगाने के बाद भी रुक्न .’फ़े’ल [फ़े..एन..लाम] ही रहता है अत: मुज़ाहिफ़ शक्ल में भी कम-अज कम [फ़े ऐन लाम इन 3-हर्फ़ से 2 हर्फ़ तो ज़रूर ही आए। अत: हमने जितने मानूस बहर के नाम लिखे थे उसमे कम से कम 3 हर्फ़ [फ़े...’एन ...लाम ] में से 2-हर्फ़ तो ज़रूर ही हैं
हमें तो लगता है कि मुज़ाहिफ़ रुक्न को मानूस रुक्न में बदलना न तो mandatory लगता है न तो obligatory हाँ   discretionary हो सकता है ।कारण कि जब हम मुज़ाहिफ़ रुक्न को मानूस रुक्न से बदलते है हमवज़न से ही बदलते है ।जब तक वज़न बरक़रार है तो बदले न बदलें क्या फ़र्क़ पड़ता है कम अज़ कम शे’र के तक़्ती’अ में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
दूसरी बात यह कि हम इतने ज़िहाफ़ क्यों पढ़े क्यों समझे ??जब कि बहुत से लोग बिना पढ़े भी तो शायरी करते हैं और कुछ लोग तो अच्छी शायरी करते है । सवाल वही है ---एक अच्छा अरूज़ी ,अच्छा शायर हो ज़रूरी नहीं और न ही यह ज़रूरी है कि एक अच्छा शायर अच्छा अरूज़ी भी हो ।पर हाँ---अगर एक अच्छा शायर ..अच्छा अरूज़ी भी हो तो समझिए कि सोने पे सुहागा या सोने में सुगन्ध होगा।
आप इन ज़िहाफ़ात के बारे में अच्छी तरह समझ लें तो मयार की शायरी कर सकते है या समझ सकते है या कम से कम ये तो समझ सकते कि हम कहाँ पर ग़लत कर रहें है
तीसरी बात यह कि इन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र इस लिए कर रहे है कि जब उर्दू शायरी के 19 बहूर [मुफ़र्द बहूर या  ,मुरक्क़ब बहूर ] के मुरब्ब:....मुसद्दस...मुसम्मन की individually  तफ़्सीलात पेश करेंगे तो इन ज़िहाफ़ात का भी ज़िक़्र होगा जैसे
बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ .बहर-ए-कामिल मुसम्मन मुज़्मर ..वग़ैरह वग़ैरह तो उन्हे समझने में आसानी होगी

और अन्त में---
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उन से मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत ख़यालबन्दी या ग़लत बयानी हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....
अस्तु
शेष अगली कड़ी में...................... उन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र करेंगे जो ’सबब-ए-सक़ील्’ पर लगते है 

-आनन्द.पाठक-
08800927181

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