शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 16 [ज़िहाफ़ात]

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 16 [ज़िहाफ़ात]

[ Disclaimer clause ---- वही जो क़िस्त 1 में है ]

पिछली क़िस्त में  सालिम अर्कान में ’सबब और उस  पर लगने वाले ज़िहाफ़ का ज़िक़्र कर चुके हैं
अब हम ’वतद’ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र करेंगे।

 अगरचे सबब और वतद की परिभाषा लिख चुके हैं। आप की सुविधा के लिए ’वतद’ की इस्तलाह [परिभाषा] एक बार फिर लिख रहे हैं
वतद :- उर्दू मे 3-हर्फ़ी कलमा को वतद कहते हैं  जैसे शह्र.... ,बह्र ....,ग़ज़ल,....नज़र.....असर ....ज़फ़र...कस्र ..नगर.. वग़ैरह वग़ैरह। इस के दो भेद होते है

वतद-ए-मज्मु’अ.:- यानी वो 3-हर्फ़ी कलमा जिसमें- पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक+दूसरा हर्फ़ मुतहर्रिक + तीसरा हर्फ़ साकिन हो ।
चूँकि पहला और दूसरा हर्फ़ मुतहर्रिक [एक साथ] ’जमा ’ हो गए इसलिए ऐसे कलमा को ’मज्मु’अ’ कहते हैं और अरूज़ में इसे 12 की वज़न से दिखाते हैं । रुक्न में इस वज़न को दिखाने के लिए -कहीं -फ़ऊ,...तो कहीं ..मुफ़ा...तो कभी     इला...तो कहीं -इलुन- तो कहीं -लतुन- से दिखाते हैं } अलामत जो  भी रखें वज़न [1 2]  ही रहेगा और इन सब में पहला और दूसरा हर्फ़ ’हरकत’ ही होगा ।
अगर इसे ऐसे समझे तो कैसा रहेगा-  वतद-ए-मज्मु’अ = ्मुतहर्रिक +सबब-ए-ख़फ़ीफ़
एक सवाल यह  है कि जब  वतद-ए-मज्मु’अ ,की वज़न दिखाने के लिए एक ही अलामत [जैसे मुफ़ा 1 2  या ऐसा ही कोई और ] काफ़ी था तो इतने अलामत बनाने की क्या ज़रूरत थी? इस मंच के कोई साहिब-ए-आलिम इसका जवाब देंगे

वतद-ए-मफ़रूक़ :- वो 3-हर्फ़ी कलमा जिसमें पहला हर्फ़ हरकत+दूसरा हर्फ़ साकिन+तीसरा हर्फ़ हरकत हो  ।इसका वज़न  21 से ही दिखाते है बस यह बताना पड़ता है या लिखना पड़ता है कि आख़िर हर्फ़ ’मय हरकत है ।
चूँकि दो हरकत फ़र्क़ पर है कारण कि बीच में साकिन आ गया अत: ऐसे 3-हर्फ़ी कलमा को को ’वतद-ए-मफ़रूक़’ कहते हैं ,,,जैसे ’लातु [बहर-ए-मुक़्तज़िब] में
      अगर इसे ऐसा समझें तो कैसा रहेगा  वतद-ए-मफ़रूक़ = सबब-ए-ख़फ़ीफ़ + मुतहर्रिक

बात चली तो  बात निकल आई ।उर्दू में जब कोई  लफ़्ज़ मुतहर्रिक पर  ख़त्म  नहीं होता -है -[साकिन पर ख़त्म होता है] तो फिर वतद-ए-मफ़रूक़ के मानी क्या जिसका   आख़िरी हर्फ़ पर ’हरकत’ है
जी बिलकुल सही। यही बात सबब-ए-सक़ील में भी उठी थी। तो समाधान यह था कि इज़ाफ़त की तरक़ीब और ’अत्फ़’ की तरक़ीब - हर्फ़ उल आखिर अगर साकिन है तो ’हरकत’  का आभास [वज़्न] देगा और यही बात यहाँ भी लागू होगी
दुहराने की ज़रूरत नहीं।फिर भी एक दो लफ़्ज़ आप की सुविधा के लिए लिख रहा हूँ

अहल-ए-नज़र.......जान-ओ-माल.......[बाक़ी कुछ आप  सोचें]
अच्छा ,एक बात और..

3-हर्फ़ी कलमा में एक सूरत ऐसे भी तो हो सकती है -- मुतहर्रिक +साकिन+साकिन -तो फिर ऐसे वतद का क्या नाम होगा???

आलिम जनाब  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब ने अपनी किताब ’आहंग और अरूज़’ में इसका नाम दिया है -’वतद-ए-मौक़ूफ़’। हमें ज़िहाफ़ समझने की इस वतद की ज़रूरत नहीं पड़ेगी-सो इस की तफ़्सीलात [विस्तार] में नहीं जाते हैं।
अब हम इन वतद पर लगने वाले ज़िहाफ़ पर आते हैं । पहले वतद-ए-मज्मु’अ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

वतद-ए-मज्मु’अ पर जो ज़िहाफ़ लगते है वो हैं
खरम्.....सलम्......अजब्......कत्’अ........हज़ज़्.....अरज्......तमस्.........बतर्......इज़ाला....तरफ़ील्  [10 ज़िहाफ़्]

 ख़रम् : अगर  कोई सालिम रुक्न ’वतद-ए-मज्मु’अ’ से शुरु होता है तो सर-ए-मज्मु’अ [यानी पहला मुतहर्रिक]को गिराने के अमल को ख़रम करना कहते है
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से  3-ऐसे सालिम् रुक्न है जो वतद-ए-मज्मु’अ से शुरु होता है और वो हैं
मफ़ाईलुन.[ 1 2 2 2 ]..........फ़ऊ लुन [1 2 2 ]..............मफ़ा इ ल तुन.[ 1 2 1 1 2 ]....
इस ज़िहाफ़ की ख़ूबी यह कि इन तीनों पर अमल तो एक जैसा है मगर तीनों अर्कान में  इस ज़िहाफ़ के नाम अलग अलग है पर तीनो में इसे ’ख़रम’ करना ही कहते हैं

ज़िहाफ़ ख़रम :- मफ़ाईलुन [1 2 2 2 ] +ख़रम = फ़ाईलुन [2 2 2 ] यानी  मफ़ा से सर-ए-वतद यानी ’मीम’ को गिरा दिया  यानी ख़रम कर दिया तो बाक़ी बचा  फ़ा ई लुन [2 2 2] जिसे किसी मानूस हमवज़्न रुक्न  मफ़ ऊ लुन [2 2 2] से बदल लिया । मुज़ाहिफ़ रुक्न  को  ’अख़रम’ कहते हैं
ज़िहाफ़ सलम:- फ़ऊ लुन [12 2] + खरम       =ऊ लुन [2 2] यानी फ़ऊ से सर-ए-वतद ’फ़े’ गिरा दिया यानी ख़रम कर दिया तो बाक़ी बचा ’ऊ लुन’{ 22] जिसे किसी  मानूस हमवज़्न रुक्न फ़े’अ लुन [2 2] से बदल लिया [ यहाँ  -एन- साकिन है ।इस से बरामद  मुज़ाहिफ़ रुक्न को ’असलम’ कहते हैं
ज़िहाफ़ अज़ब :- मफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2] +ख़रम= फ़ा इ ल तुन [ 2 1 1 2 ] यानी मफ़ा -से सर-ए-वतद का ’फ़े’ गिरा दिया तो बाक़ी बचा -फ़ा इ ल तुन [ 2 1 1 2] जिसे किसी मानूस हम वज़्न रुक्न  ’मुफ़ त इ लुन’ [2 1 1 2] से बदल लिया मुज़ाहिफ़ को ’अज़ब ’ कहते हैं
एक बात और -- ये तीनो ज़िहाफ़  शे’र के सदर और इब्तिदा मुक़ाम से मख़्सूस है [ सदर और इब्तिदा के बारे में पहले ही लिख चुका हूँ ]

ज़िहाफ़ क़त्’अ :-अगर् किसी सालिम रुक्न के आखिर में ’वतद मज्मु’अ’ आता हो तो  इसके साकिन को गिरा देना और उस से पहले आने वाले मुतहर्रिक को साकिन कर देना ’क़त’अ’ कहलाता है । और मुज़ाहिफ़ को ’मक़्तू’अ’ कहते हैं
बज़ाहिर वतद-ए-मज्मु’अ के आख़िर में ’साकिन’ ही होगा और उससे पहले मुतहर्रिक ही होगा [परिभाषा ही ऐसी है]
8-सालिम रुक्न में से  3-रुक्न ऐसे हैं जिस के आखिर मे ’वतद-ए-मज्मु’अ’ आता है और वो हैं
फ़ा इलुन् [ 2 12 ].......मुस तफ़ इलुन् [ 2 2 12 ].........मु त फ़ा इलुन् [1 1 2 12 ]

फ़ा इलुन् [ 2 12 ] + क़त्’अ = फ़ा इल् [2 2] यानी वतद्-ए-मज्मु’अ -इलुन[12]- जो रुक्न के आख़िर में आया है -का साकिन -नून-गिरा दिया और उसके पहले जो मुतहर्रिक -लु- है को साकिन कर दिया तो बाक़ी बचा  फ़ा इल् [2 2]  जिसे किसी मानूस् हम वज़्न रुक्न् फ़े’अ लुन् [2 2 ] से बदल् लिया --यहाँ -एन् साकिन् है

मुस् तफ़् इलुन् [ 2 2 1 2] +कत्’अ = मुस् तफ़् इल् [2 2 2] यानी वतद्-ए-मज्मु’अ -इलुन्[12]-जो रुक्न् के आख़िर् में आ रहा है-का साकिन् ’नून्’ गिरा दिया और् उस् से पहले आने वाले मुतहर्रिक् -लु- को साकिन् कर् दिया तो बाक़ी बचा -मुस् तफ़् इल् -[2 2 2] जिसे किसी मानूस् हमवज़्न रुक्न  -मफ़् ऊ लुन् [2 2 2] से बदल् लिया

मु त फ़ा इलुन् [ 1 1 2 1 2] +क़त्’अ = मु त् फ़ा इल् [ 1 1 2 2 ] यानी जो बात् ऊपर् है वही बात् -इलुन्-पर यहां भी। तो बाक़ी बचा मु त फ़ा इल् [ 1 1 2 2 ] जिसे किसी हम वज़न् मानूस् रुक्न् -फ़ इ ला तुन् [1 1 2 2] से बदल् लिया [यहाँ एन् मय हरकत् है]
यह ज़िहाफ़ अरूज़ और जर्ब के लिए मख़्सूस है

ज़िहाफ़् हज़ज़् :- अगर किसी सालिम रुक्न के आख़िर में वतद मज्मु’अ हो तो उसको साकित [यानी गिरा देना] करने के अमल को हज़ज़ कहते हैं  और मुज़ाहिफ़ को ’अहज़ ’ भी कहते हैं और ’महज़ूफ़’ भी कहते हैं। ’महज़ूफ़’ ज़्यादे प्रचलित है
आप जानते  हैं  कि सालिम अर्कान में 3-रुक्न ऐसे हैं कि जिसके आख़िर में ’वतद मज्मुआ’ आता है और वो रुक्न हैं
फ़ा इलुन् [ 2 12 ].......मुस् तफ़्इलुन् [ 2 2 12 ].........मु त फ़ा इलुन् [1 1 2 12 ]

फ़ा इलुन [2 12 ] +हज़ज़ = फ़ा [2] = यानी फ़ा इलुन [2 12] के आख़िर में जो वतद मज्मु’अ ’इलुन’[12] है को साकित कर दिया तो बाक़ी बचा ’फ़ा’[2] जिसे मानूस हम वज़्न रुक्न -फ़े’अ [ 2] -[यहाँ -एन-साकिन है ] से बदल लिया
मुस् तफ़् इलुन् [  2 2 12]+ हज़ज़् = मुस् तफ़् [2 2] = यानी मुस् तफ़् इलुन् का आखिर में जो वतद् मज्मु’अ  इलुन् [12] है- को साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा मुस् तफ़् [2 2] जिसे मानूस् हमवज़्न रुक्न् -फ़े’अ लुन् [2 2] से बदल लिया   [ यहाँ -एन्- ब सकून् है]
मु त फ़ा इलुन् [ 1 1 2 1 2 ]+ह्ज़ज़्= मु त फ़ा [1 1 2 ] = यानी मु त फ़ा इलुन् में जो आख़िर में जो वतद् मज्मु’अ है -इलुन्- [12] उसे साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा मु त फ़ा [ 1 1 2] जिसे मानूस् हम वज़्न रुक्न्  फ़े’अलुन् [1 1 2] से बदल् लिया -यहाँ पर् -एन्- मय हरकत् है
यह ज़िहाफ़ भी  अरूज़ और जर्ब के लिए मख़्सूस है

इस् सिलसिले के बाक़ी 5- ज़िहाफ़.... अरज्......तमस्.........बतर्......इज़ाला....तरफ़ील्  का ज़िक़्र अगली क़िस्त 17 में करेंगे
और अन्त में---
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....


[नोट् :- पिछली  क़िस्त के आलेख आप मेरे ब्लाग पर देख सकते हैं 

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गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 15 [ज़िहाफ़ात]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :- क़िस्त 15 [ज़िहाफ़ात]

[Disclaimer Clause : -वही जो क़िस्त 1 में है-

कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो ’सबब-ए-सकील’  [हरकत+हरकत] पर ही लगते हैं  । [सबब-ए-सकील के बारे में पिछली क़िस्त 11 में लिखा  जा चुका है ।एक बार फिर लिख रहा हूं~
आप जानते है सबब के 2-भेद होते है
सबब-ए-ख़फ़ीफ़  : वो 2  हर्फ़ी कलमा जिसमें पहला हर्फ़ मुतहर्रिक [यानी पहले हर्फ़ पर हरकत हो] और दूसरा हर्फ़ साकिन हो
सबब-ए-सक़ील  :- वो  2 हर्फ़ी कलमा  जिसमे पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक हो और दूसरा हर्फ़ भी मुतहर्रिक हो
आप जानते हैंकि उर्दू जुबान में  किसी लफ़्ज़ का पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक तो होता है पर आख़िरी हर्फ़ [हर्फ़ उल आख़िर] मुतहर्रिक नहीं होता बल्कि साकिन होता है
तो फिर सबब-ए-सक़ील के मानी  क्या ?

दिल्...विल् ...सिल् ...मिल्...सिल   ... सबमें आखिरी हर्फ़् साकिन् है और् पहले हर्फ़् पर हरकत् [ज़ेर की हरकत] है

अब दिले-नादां ....ग़मे-दिल ..जाने-जानाँ   ...दिलो-जान पर ज़रा  ग़ौर फ़र्माए आप को ...ल....म....न...पर थोड़ा भार या वज़न देना पड़ता है  यानी ल..म..न..पर थोड़ा  जबर आ जाता है यानी इन हर्ह के तलफ़्फ़ुज़ में उतना फ़्री नही फ़ील करते है जितना फ़्रीडम दिल्...विल् के ’ल्’ में फ़ील करते हैं
बस यही दिले-नादां ...ग़मे-दिल ..शब-ए-ग़म जैसी तर्क़ीब से दिल...ग़म...शब,,,,जान... के    ....ल...म...ब...न....पर हरकत आ गई--जबर की हरकत
अब दिले-नादां में  ’दिल’  [तर्क़ीब को इज़ाफ़त कहते है] -ल- पर हरकत [जबर का] आ गई और द पर तो हरकत है ही [ज़ेर का] अत: यहां~ दिल --सबब-ए-सक़ील है वरना  independently  दिल् तो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है
ग़मे-दिल          में  ’ग़म’ [ तर्क़ीब को इज़ाफ़त कहते है[ के दोनो हर्फ़ पर हरकत है अत: यहाँ  गम .....सबब-ए-सक़ील है   वरना independently ग़म्   तो  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है
शबे-ग़म          में   ’शब’  [तर्क़ीब को इज़ाफ़त कहते है के दोनो हर्फ़ पर  हरकत है अत: यहाँ ,.....शब..... सबब-ए-सक़ील है वरना  independently शब् तो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है
यही बात् नीचे की तरक़ीब में भी है जिसे अत्फ़ कहते हैं
दिलो-जान       मे  ’दिल’ [तर्क़ीब को अत्फ़ कहते है  -दिल-के दोनो हर्फ़ पर हरकत है अत: सबब-ए-सक़ील है
शब-ओ-रोज़   में  शब   [तर्क़ीब को अत्फ़ कहते है]-शब-के दोनो हर्फ़ पर हरकत है अत: सबब-ए-सक़ील है

चलिए अब ज़िहाफ़ पर आते हैं जो सबब-ए-सकील पर लगते है वो हैं.....इज़्मार.....अस्ब.....वक़्स.....अक् ल्  [4-ज़िहाफ़]

ज़िहाफ़ इज़्मार : अगर कोई रुक्न सबब-ए-सक़ील [हरकत+हरकत} से शुरु होता है तो  दूसरे मुक़ाम पर आने वाले मुतहर्रिक  को साकिन कर देना इज़्मार कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को ’मुज़्मर’ कहते है
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से सिर्फ़ एक ही रुक्न ऐसा है जिसके शुरु में ’सबब-ए-सक़ील’ आता है और वो सालिम रुक्न है
मु त फ़ा ’अलुन [1 1 2 12] .....जिसमें मु.[हरकत]..त[हरकत] ... सबब-ए-सक़ील है और और दूसरे मुक़ाम पर जो --त--[ते है] को साकिन करना है यानी -त्- हो गया तो बाक़ी बचा मुत् फ़ा’अ लुन् [ 2 2 12] जिसको मानूस् बहर् ’मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12] से बदल लिया।  यहा मु त [1 1] सबब-ए-सक़ील इज़्मार की अमल से --मुत् [2] सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो गया
आप् जानते हैं कि सालिम रुक्न ’मुतफ़ाइलुन’ बह्र-ए-कामिल का बुनियादी रुक है अत: यह ज़िहाफ़ भी बहर-ए-कामिल से ही मख़सूस है

ज़िहाफ़ अस्ब  : सबब-ए-सक़ील का दूसरा [second] मुतहर्रिक अगर किसी रुक्न के ’पाँचवे’ मुक़ाम पर आये तो उस को साकिन करना ’अस्ब’ कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को ’मौसूब’ कहते हैं
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से सिर्फ़ 1-रुक्न ऐसा है जिसमें सबब-ए-सक़ील का दूसरा हर्फ़ ’पाँचवें’ मुक़ाम पर आता है और वो रुक्न है
मफ़ा इ ल तुन् [ 12 1 1 2] में  इ ल [ 1 1] सबब-ए-सक़ील है और -ल- पांचवे मुक़ाम् पर है को  ज़िहाफ़ अस्ब साकिन कर् देता है तो बाक़ी बचा मफ़ा इल् तुन् [12 2 2] जिसे हम् वज़न् मानूस् रुक्न्  मफ़ाईलुन् [12 2 2 ] से बदल् लिया
 अब यहाँ  इल [1 1]  सबब-ए-सक़ील  ज़िहाफ़ अस्ब की अमल से से ’ इल्[2] सबब-ए-ख़फ़ीफ़  हो गया
आप जानते है कि सालिम रुक्न --मफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2] बहर-ए-वाफ़िर की बुनियादी रुक्न है अत: यह ज़िहाफ़ बहर-ए-वाफ़िर से मख़सूस है
ज़िहाफ़ वक्स :  सबब-ए-सक़ील के  second position पर आने वाले हर्फ़ को गिराना वक़्स कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को  ’मौक़ूस’ कहते है
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से सिर्फ़ 1-रुक्न ऐसा है जो सबब-ए-सक़ील से शुरु होता है और वो रुक्न है ’मु त फ़ाइलुन [1 1 2 12]  इसमें से दूसरे मुक़ाम पर [त -मुतहर्रिक है ] को गिरा दिया तो बाक़ी बचा ] ’मु फ़ा इलुन [1 2 1 2]

ज़िहाफ़ अक्ल् :- सबब्-ए-सक़ील का दूसरा हर्फ़ [मुतहर्रिक] अगर किसी सालिम रुक्न के ’पाँचवें’ मुक़ाम पर आए तो उसको गिराना ’अक्ल् कहलाता है और मुज़ाहिफ़ को ;मौकूल् कहते हैं
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से सिर्फ़ एक रुक्न ऐसा है जिसमें सबब-ए-सक़ील का दूसरा मुतहर्रिक ’पाँचवे’ मुकाम पर आता है जिसका नाम है --’मफ़ा इ ल तुन ’
मफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2] के पाँचवें मुक़ाम पर  आने वाले ’ल’ को गिरा दिया तो बाक़ी बचा -मफ़ा इ तुन’ [12 12 ] जिसे किसी मानूस हम वज़न  बहर ’मफ़ाइलुन [12 12] से बदल लिया

अब एक काम आप के लिए छोड़े जा रहा हूँ

आप ज़िहाफ़ इज़्मार और ज़िहाफ़ वक़्स को एक साथ पढ़ें --तो फ़र्क़ साफ़ नज़र आयेगा
आप ज़िहाफ़ अस्ब  और ज़िहाफ़ अक्ल को एक साथ पढ़ें---तो फ़र्क़  साफ़ नज़र आयेगा
 
 अब सबब [ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ और सबब-ए-सक़ील ] पर लगने वाले ज़िहाफ़ात का बयान ख़त्म हुआ
और अन्त में---
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....
अस्तु
शेष अगली कड़ी में...................... अब उन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र करेंगे जो ’वतद’ पर लगते है 

[नोट् :- पिछली कड़ी आप मेरे ब्लाग पर भी देख सकते हैं 

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बुधवार, 28 दिसंबर 2016

उर्दू बह्र पर एक बात्तचीत : क़िस्त 14 [ज़िहाफ़ात]

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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 14 [ज़िहाफ़ात]
[Disclaimer Clause - वही जो क़िस्त -1 में है ]

- कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो ’सबब-ए-खफ़ीफ़’ [हरकत+साकिन] पर  लगते है 

...पिछली कड़ी [क़िस्त 13] में उन ज़िहाफ़ात की चर्चा कर रहे थे जो ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़  पर लगते हैं। और इस सिलसिले में हम 3-ज़िहाफ़ मसलन ज़िहाफ़ ’ख़ब्न’...तय्यी....कब्ज़ ..की चर्चा कर चुके हैं । इस आलेख में 8-और ज़िहाफ़ कफ़्फ़्......क़स्र्.......ह्ज़्फ़्.........रफ़’अ........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़......की चर्चा करेगे

ज़िहाफ़ क़फ़्फ़  :- अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म हो रहा है तो ’कफ़्फ़ ज़िहाफ़’ सातवें मुकाम पर साकिन को गिरा देता है और मुज़ाहिफ़ रुक्न का नाम ’मकूफ़्/मौकूफ़्’ कहलाता है
ज़ाहिर है कि रुक्न में  सातवां मुक़ाम तभी सम्भव है जब वो ’सुबाई रुक्न’[7-हर्फ़ी रुक्न] हो और अन्त में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता हो यानी [वतद(3)+सबब(2)+सबब-ए-ख़फ़ीफ़(2)  हो या सबब(2)+वतद(3)+सबब-ए-ख़फ़ीफ़(2)
और सातवें  मक़ाम पर ’साकिन’ ही होगा। बस इसी साकिन को गिराने का काम ज़िहाफ़ ’कफ़्फ़’ करता है । यह एक आम ज़िहाफ़ है
आप अगर 8-सालिम रुक्न[जिनकी चर्चा मैं पहले भी कर चुका हूं~) को ध्यान से देखे तो आप को ऐसे 2-रुक्न ऐसा है जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है और वो रुक्न हैं
                                  मफ़ा ई लुन् [1 2 2 2 ] ........फ़ाइलातुन् [  2 1 2 2]  [ ....लुन्...तु्न्....सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है जिसमें पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक है और दूसरा हर्फ़ साकिन है]
मफ़ा ई लुन् [1 2 2 2 ]+ कफ़्फ़     = मफ़ा ई लु  [1 2 2 1] यानी सातवें मक़ाम का ’न’ गिरा दिया रो बाक़ी बचा मफ़ा ई लु [यानी लाम मय हरकत]
फ़ा इला तुन् [ 2 1 2  2 ] क़फ़्फ़     = फ़ा इला तु      [2 1 2 1  ] यानी सातवें मुक़ाम से ’न’ गिरा दिया तो बाक़ी बचा  फ़ा इला तु   [यानी ’ते’ मय हरकत
यह ’आम ज़िहाफ़ ’ है
एक बात और जब किसी रुक्न पर[ख़ब्न और कफ़ ज़िहाफ़ एक साथ अमल करते है तो हम उसे ’मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ ’ कहते है और इस मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ का नाम है ’शकल’ और मुज़ाहिफ़ का नाम होगा ’मश्कूल’ - मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ [यानी मिश्रित ज़िहाफ़] की चर्चा बाद में करेंगे ।बात निकली तो बात याद आ गई} अभी तो हम ’मुनफ़र्द’ [यानी एकल] ज़िहाफ़ की चर्चा कर रहे है। अगला मुनफ़र्द ज़िहाफ़ है ’क़स्र’ जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगता है

ज़िहाफ़ क़स्र   :-अगर किसी रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है तो ज़िहाफ़ ’क़स्र’ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के ’साकिन’ को गिरा देता है और उस से पहले आने वाले ’मुतहर्रिक ’ को साकिन कर देता है और इस तरह बरानद होने वाली मुज़ाहिफ़ रुक्न को ’मक़्सूर’ कहते हैं। हम जानते ही हैं कि सबब-ए-ख़फ़ीफ़ = हरकत+साकिन होता है तो कस्र ज़िहाफ़ साकिन को गिरा देगा और हरकत को साकिन कर देगा } एक उदाहरण से समझाते है -----लुन्-- या ---तुन् -- सबब-ए-खफ़ीफ़ है जिसमें --लु-- तु-- तो मय हरकत [मुतहर्रिक] है और --न्-- साकिन है । ज़िहाफ़ ’कस्र’ इसी साकिन --न्-- को गिराएगा और --लु---तु-- को साकिन [यानी -लु को  और -तु  को --त--]कर देगा ।
हम जानते है  8-अर्कान में से 4-अर्कान ऐसे हैं जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है और वो हैं
मफ़ा ई लुन्.......फ़ा इला तुन्........मुस तफ़अ लुन्......फ़ऊ लुन्

मफ़ा ई लुन्  [ 12 2 2 ] +क़स्र      =  मफ़ा ई ल [12 2 1]     = यानी आखिरी --लुन्-- का --न्..--गिरा दिया और इस से पहले जो--लु--को साकिन --ल्--कर दिया
फ़ा इला तुन् [ 2 12 2 ] +क़स्र     = फ़ा इला  त [ 2 12 1]    = यानी आखिरी  --तुन्--का  --न्’- गिरा दिया और  --तु-- को साकिन - त्--कर दिया
मुस तफ़’अ लुन् [ 2 21 2] +क़स्र  = मुस तफ़’अ ल् [2 2 2]  = यानी आखिरी --लुन्-- का --न्-गिरा दिया और --लु--को साकिन --ल्--कर दिया । ध्यान देने की बात है कि यहाँ तफ़’अ में --’अ-- मुत्तहर्रिक है और --ल-- साकिन बचा तो दोनो मिल कर
[हरकत=साकिन] फिर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ बना लेते है इसी से इसका वज़न ’2’ लिखा यानी मुज़ाहिफ़ रुक्न को अब पढ़ेगे ’ मुस तफ़ अल’  जो किसी हम वज़न मानूस रुक्न --मफ़ ऊ लुन[2 2 2 ] से बदल लिया
फ़ऊ लुन्        [ 12 2     ] +क़स्र    = फ़ऊ ल      [12 1]     = यानी आखिरी --लुन्-- का --न् -गिरा दिया और --लु--को साकिन --ल्--कर दिया

ज़िहाफ़ हज़्फ़  :- अगर कोई रुक्न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर ख़त्म होता है तो ज़िहाफ़ ’हज़्फ़’ उसे साकित [खत्म ]कर देता है और मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे ’महज़ूफ़’ कहते हैं [
हम जानते है कि 8-सालिम रुक्न में से 5-रुक्न ऐसे हैं जो ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ पर खत्म होता है और वो रुक्न  हैं
मफ़ा ई लुन्......फ़ा इला तुन्......फ़ा’अ ला तुन्....मुस तफ़’अ लुन्.... ....फ़ऊ लु न् [ यहा..’अ को ऐन मय हरकत समझें ]
मफ़ा ई लुन् [ 12 2 2 ] + हज़्फ़  = मफ़ा ई [ 12 2] यानी मफ़ाईलुन् का ’लु न्’ गिरा दिया बाक़ी बचा मफ़ा ई [12 2 } और इसे किसी मानूस हम वज़न रुक्न ’फ़ऊ लुन् [122] से बदल लिया
फ़ा इला तुन् [ 2 12 2]+ हज़्फ़   = फ़ा इला [ 2 12] यानी फ़ा इला तु न् का ’तुन्’ गिरा दिया बाक़ी बचा फ़ा इला [2 12] और इसे किसी मानूस हम वज़्न रुक्न ’फ़ा इलु न् [ 2 1 2] से बदल लिया
मुस तफ़’अ  लु न् [ 2 21 2 ]+ह्ज़्फ़ = मुस तफ़’अ [ 2 21] यानी मुस तफ़’अ लु न् का ’लु न्’ गिरा दिया बाक़ी बचा मुस तफ़’अ [2 21]
फ़ऊ लुन्   [12 2 ]+हज़्फ़         =  फ़ऊ [ 12 ] यानी फ़ऊ लुन से ’लुन’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’फ़ऊ’ जिसे किसी मानूस हम वज़न ’फ़ ’अल[1 2] से बदल लिया
यह् ज़िहाफ़् ’अरूज़/ज़र्ब ’ के लिए मख़्सूस है

ज़िहाफ़ रफ़’अ  :-अगर कोई रुक्न दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है तो ज़िहाफ़ ’रफ़’अ ’ पहले सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को साकित [गिरा देना/मिटा देना/हटा देना} कर देता है और जो मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे मरफ़ू’अ कहते है। हम जानते हैं कि 8 सालिम रुक्न मे से सिर्फ़ 2-रुक्न ही ऐसे हैं जो दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होते हैं और वो रुक्न हैं
मुस् तफ़् इलुन्.............मफ़् ऊ लातु
मुस् तफ़् इलुन् [2 2 1 2]+ रफ़’अ = तफ़् इलुन् [ 2 12] यानी मुस् तफ़् इलुन् से पहला सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मुस् को साकित् कर् दिया बाक़ी बचा तफ़् इलुन् जिसे मानूस् बहर् फ़ाइलुन् [2 12] से बदल् लिया ।यह् ज़िहाफ़् अरूज़् और जर्ब् के अलावा शे’र् के हर मुक़ाम् पर् आ सकता है
मफ़् ऊ लातु [ 2 2 21] + रफ़’अ = ऊ लातु [2 21] यानी मफ़् ऊ लातु से पहला सबब-ए-ख़फ़ीफ़् मफ़् को साकित् कर दिया बाक़ी बचा ऊ लातु जिसे मानूस बहर् मफ़् ऊ ल [2 2 1  ल मय् हरकत्] से बदल लिया । यह ज़िहाफ़् अरोज़् और् जर्ब् के अलावा शे’र के हर् मुकाम पर आ सकता है

 ज़िहाफ़ जद्द’अ :- अगर किसी ्सालिम रुक्न के शुरु में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ हो तो दोनो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को ’एक साथ’ गिरा देने का [साकित करने का ] काम ज़िहाफ़ जद्द’अ करता है और इस से जो मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे ’मज्दू’अ’ कहते हैं } आप जानते ही हैं कि 8-सालिम रुक्न में से 2-रुक्न ऐसे हैं जो दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है और वो है
मुस् तफ़् इलुन् .....और्....... मफ़् ऊ लातु

मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12]+ जद्द्’अ   = इलुन् [12] यानी मुस् तफ़् इलुन् से दोनो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मुस् ...तफ़् दोनो साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा ’इलुन्’(12] जिसे किसी मानूस् रुक्न्  ’फ़’अल् [12] से बदल् लिया।ख़याल् रहे यहाँ --’अ- मय् हरकत् है जो -ल्-के साथ् मिल् कर् -’अल्- सबब्-ए-ख़फ़ीफ़्  बन् गया । यह् ज़िहाफ़् अरूज़./जर्ब के लिए मख़्सूस् है यानी ख़ास् तौर् पर् निर्धारित् है।
मफ़् ऊ लातु    [2 2 2 1]+ जद्द्’अ  = लातु [2 1] यानी मफ़्ऊलातु से दोनो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् मफ़् ..ऊ दोनो साकित् कर दिया तो बाक़ी बचा ’लातु’[ 2 1] जिसे मानूस् रुक्न्  फ़्’अ लु [2 1] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहां -’अ’ मय साकिन् है और् अ-लु-बज़ाहिर् मुतहर्रिक् है ।ज़ाहिर् है कि यह् ज़िहाफ़् किसी शे’र् के अरूज़् और् जर्ब् के मुक़ाम् पर् नही आ सकता कारण कि --लातु--में -तु- मुतहर्रिक् है और् उर्दू में कोई मिसरा/शे’र मुतहर्रिक् पर् ख़त्म् नही होता

ज़िहाफ़् जब्ब’अ :-अगर किसी सालिम रुक्न के आख़िर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आए तो ज़िहाफ़ ’जब्ब’अ इन दोनो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ को ’साकित’ [गिरा/मिटा/हटा] देता है और उस से बरामद मुज़ाहिफ़ रुक्न का नाम मजबूब है
हम जानते है कि 8-सालिम रुक्न में से सिर्फ़ 2-सालिम् रुक्न् ऐसे हैं जिसके आखिर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है और वो सालिम रुक्न हैं
मफ़ा ई लुन.........और......फ़ा’अ ला तुन  [यानी लुन और तुन ]
मफ़ा ई लुन् [12 2 2]+जब्ब्  = मफ़ा [12] यानी आखिर् के दो अस्बाब्-ए-ख़फ़ीफ़् --ई--लुन्.. को साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा .. मफ़ा[12]  जिसे मानूस् रुक्न् ’फ़’अल् (12] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहाँ -’अ मुतहर्रिक् है जो --ल् साकिन् से मिल् कर् ’अल् बना लिया यानी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़
फ़ा’अ ला तुन् [21 2 2]+जब्ब् = फ़ा’अ [2 1] यानी आखिर् के दो अस्बाब्-ए-ख़फ़ीफ़् --ला---तुन् को साकित् कर् दिया तो बाक़ी बचा फ़ा’अ [21] जिसे किसी मानूस् रुक्न् फ़’अ लु (21] से बदल् लिया ।ख़याल् रहे यहाँ भी --’अ मय् हरकत् है
यह् ज़िहाफ़् भी अर्रोज़्/जर्ब् से मख़सूस् है
एक बात आप नोटिस कर रहे होंगे कि दोनो ज़िहाफ़ --ज़िहाफ़ जद्द’अ और ज़िहाफ़ जब्ब में अमल तो दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ एक साथ पर अमल कर रहा है बस फ़र्क इतना कि एक में अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ सालिम रुक्न के शुरु में आ रहा है [ जद्द’अ में ] तब अमल करता है जब कि दूसरे में सालिम रुक्न के आखिरी में आ रहा है जब्ब में]तब अमल करता है ।

ज़िहाफ़् हत्म्  :-अगर किसी सालिम रुक्न के आख़िर में दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आये तो ज़िहाफ़ ’हत्म’ आखिरी सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को गिरा देता है [यानी साकित कर देता है ] और उस से पहले वाले सबब-ए-ख़फ़ीफ़ केत साकिन को गिरा देता है और हरकत को साकिन कर देता है और् इस से जो मुज़ाहिफ़ रुक्न हासिल होता है उसे ’अहतम’ कहते हैं ।
हम जानते हैं कि 8-सालिम रुक्न में से 2-रुक्न ही ऐसे है जिसके आख़िर में 2-अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है और वो हैं
मफ़ा ई लुन.........और......फ़ा’अ ला तुन [यानी लुन और तुन]
मफ़ा ई लुन् [ 12 2 2]+ हत्म्     = मफ़ा’अ [12 1] यानी मफ़ा ई लुन् से  आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् --लुन्- को साकित् कर् दिया और् उस् से पहले जो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् -ई [ऎन्+ये] बचा उसमें से -ये - गिरा दिया और् उस् से पहले जो -ऎन् [जो अभी मुतहर्रिक् है ] को साकिन् कर् दिया तो हासिल् हुआ मफ़ा’अ [12 1] यहाँ -’अ- साकिन् है -ख़याल् रहे । इसे किसी मानूस् बहर्  फ़ऊल् [12 1] से बदल् लिया
फ़ा’अ ला तुन् [2 1 2 2] +हत्म्   = फ़ा’अ ल् [ 21 1] यानी फ़ा’अ ला तुन्  से आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् --तुन्- को साकित् कर दिया और् इस् से पहले के सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् [ला --लाम् अलिफ़्] से अलिफ़् साकिन् को गिरा दिया और् लाम् [ [ल] अभी मुतहर्रिक् है ] को साकिन् कर् दिया तो  हासिल् हुआ --फ़ा’अ ल् [22 ] जिसे किसी मानूस् रुक्न् - फ़’अ लुन  [2 2] -[-’अ साकिन है ] से बदल लिया

ज़िहाफ़ तस्बीग् :-अभी तक जितने ज़िहाफ़ात हमने देखे सब के अमल से सालिम रुक्न के हर्फ़ में नुक़सान ही नुक़सान ही हुआ ...कहीं सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का हर्फ़-ए-साकिन गिर गया [साकित[ हो गया ,,कभी हर्फ़-ए-हरकत ्साकिन हो गया तो कहीं खुद सबब ही साकित हो गया --यानी  हर्फ़/हरूफ़ का नुक़सान ही हुआ ऐसे ज़िहाफ़ात को ज़िहाफ़ बनुक़सान भी कह सकते हैं \
मगर ऐसा नहीं है कि हए ज़िहाफ़ हर्फ़ का नुक़सान ही करता है } कुछ ज़िहाफ़ ऐसे भी हैं जो हर्फ़ का इज़ाफ़ा भी करते है ।तस्बीग़ एक ऐसा ही ज़िहाफ़ है जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगता है
किसी रुक्न के आख़िर में अगर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [हरकत+साकिन] है  तो हरकत और साकिन के बीच में एक ’साकिन’ का इज़ाफ़ा कर देते है } इस अमल को तस्बीग़ कहते है और मुज़ाहिफ़ को ’मुस्बीग़’ कहते है और यह ज़िहाफ़ सिर्फ़ ’अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस [निर्धारित है
वो सालिम रुक्न जिसके अन्त में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है वो हैं
मफ़ा ई लुन्.............फ़ा इला तुन्....फ़ा’अ ला तुन्....मुस तफ़’अ लुन्...फ़ऊलुन्  [यानी लुन् ....तुन् ...]
मफ़ा ई लुन् [ 1 2 2 2]  + तस्बीग़ = मफ़ा ई लान् [ 1 2 2 2 1] यानी आखिरी  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ लुन्  [लाम्,,नून्  ] के बीच् एक् साकिन् ’अलिफ़्’ का इज़ाफ़ा कर् देते है तो लान् हो जायेगा
फ़ा इला तुन् [ 2 12 2 ]  +तस्बीग़्  =  फ़ा इला तान् [ 2 12 2 1] यानी आख़िरी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् तुन् [ ते,,,नून्  ] के बीच् एक् साकिन् ’अलिफ़्’ का इज़ाफ़ा कर् देते है तो  --तान्- हो जायेगा
फ़ा’अ ला तुन् [ 21 2 2 ] -तस्बीग़्  =  फ़ा’अ ला तान् =       -----------तदैव----
मुस् तफ़्’अ लुन् [2 2 1 2 ]+तस्बीग़् = मुस् तफ़् इ लान्  =-----------तदैव----
फ़ऊलुन् [ 12 2]   +तस्बीग़्               = फ़ऊ लान् [ 12 21]     -----तदैव

अब तक हम ने सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ात ..........खब्न.....तय्य...  क़ब्ज़.....कफ़्फ़्......क़स्र्.......ह्ज़्फ़्.........रफ़’अ........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़ [11] ज़िहाफ़ का ज़िक़्र कर चुके हैं

अब ज़िहाफ़ के बारे में एक -दो सवाल आप के ज़ेहन में भी उठ रहे होंगे

एक तो यह कि-- कि सालिम रुक्न पर ज़िहाफ़ लगने के बाद जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होती है उसे किसी मानूस रुक्न में क्यों बदलते हैं ? अगर न बदलें तो क्या होगा? क्या यह बदलना mandatory है या obligatory ??
अरूज़ की किताबें इस मसले पर ख़ामोश हैं । मगर हमें लगता है कि ज़िहाफ़ लगाने के बाद भी रुक्न .’फ़े’ल [फ़े..एन..लाम] ही रहता है अत: मुज़ाहिफ़ शक्ल में भी कम-अज कम [फ़े ऐन लाम इन 3-हर्फ़ से 2 हर्फ़ तो ज़रूर ही आए। अत: हमने जितने मानूस बहर के नाम लिखे थे उसमे कम से कम 3 हर्फ़ [फ़े...’एन ...लाम ] में से 2-हर्फ़ तो ज़रूर ही हैं
हमें तो लगता है कि मुज़ाहिफ़ रुक्न को मानूस रुक्न में बदलना न तो mandatory लगता है न तो obligatory हाँ   discretionary हो सकता है ।कारण कि जब हम मुज़ाहिफ़ रुक्न को मानूस रुक्न से बदलते है हमवज़न से ही बदलते है ।जब तक वज़न बरक़रार है तो बदले न बदलें क्या फ़र्क़ पड़ता है कम अज़ कम शे’र के तक़्ती’अ में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
दूसरी बात यह कि हम इतने ज़िहाफ़ क्यों पढ़े क्यों समझे ??जब कि बहुत से लोग बिना पढ़े भी तो शायरी करते हैं और कुछ लोग तो अच्छी शायरी करते है । सवाल वही है ---एक अच्छा अरूज़ी ,अच्छा शायर हो ज़रूरी नहीं और न ही यह ज़रूरी है कि एक अच्छा शायर अच्छा अरूज़ी भी हो ।पर हाँ---अगर एक अच्छा शायर ..अच्छा अरूज़ी भी हो तो समझिए कि सोने पे सुहागा या सोने में सुगन्ध होगा।
आप इन ज़िहाफ़ात के बारे में अच्छी तरह समझ लें तो मयार की शायरी कर सकते है या समझ सकते है या कम से कम ये तो समझ सकते कि हम कहाँ पर ग़लत कर रहें है
तीसरी बात यह कि इन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र इस लिए कर रहे है कि जब उर्दू शायरी के 19 बहूर [मुफ़र्द बहूर या  ,मुरक्क़ब बहूर ] के मुरब्ब:....मुसद्दस...मुसम्मन की individually  तफ़्सीलात पेश करेंगे तो इन ज़िहाफ़ात का भी ज़िक़्र होगा जैसे
बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन महज़ूफ़ .बहर-ए-कामिल मुसम्मन मुज़्मर ..वग़ैरह वग़ैरह तो उन्हे समझने में आसानी होगी

और अन्त में---
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उन से मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत ख़यालबन्दी या ग़लत बयानी हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....
अस्तु
शेष अगली कड़ी में...................... उन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र करेंगे जो ’सबब-ए-सक़ील्’ पर लगते है 

-आनन्द.पाठक-
08800927181

सोमवार, 26 दिसंबर 2016

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : किस्त 13 [ज़िहाफ़ात]

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उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 13 [ज़िहाफ़ात]
[Disclaimer Clause - वही जो क़िस्त -1 में है ]

- कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो ’सबब-ए-खफ़ीफ़’ [हरकत+साकिन] पर  लगते है 

   फिछल कड़ी [क़िस्त 11 और 12] में ज़िहाफ़ात के बारे में कुछ चर्चा कर चुका हूँ कि ज़िहाफ़ क्या होते है उर्दू शायरी में इस की क्या अहमियत है ,ज़िहाफ़ात के बारे में जानना क्यों ज़रूरी है ,नहीं जानेंगे तो क्या होगा आदि आदि। साथ ही यह भी चर्चा कर चुका हूँ कि ज़िहाफ़ कितने प्रकार के होते हैं -मुफ़रद ज़िहाफ़ क्या होते है ,,मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ क्या होते हैं ,आम ज़िहाफ़ क्या होते है ख़ास ज़िहाफ़ क्या होते है  आदि आदि।
आज इस कड़ी में  ये ज़िहाफ़ सालिम रुक्न पर कैसे अमल करते है  पर चर्चा करेंगे

आप जानते ही हैं कि
1- ज़िहाफ़ हमेशा ’सालिम रुक्न’ पर ही अमल करते हैं और वो भी सालिम रुक्न के टुकड़े [ज़ुज़] पर ही लगते है और यह टुकड़े[अवयव] होते है --सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ,सबब-ए-सकील ,वतद-ए-मज्मुआ.वतद-ए-मफ़रुक़ । इन्ही  के combination , permutation से सालिम रुक्न बनते हैं। इन् टुकड़ों के बारे में पिछली क़िस्तों [अक़्सात] में चर्चा कर चुके है ।आगे बढ़ने  से पहले  एक बार आप उन्हे  देख लें तो अच्छा रहेगा।
2- ज़िहाफ़ कभी मुज़ाहिफ़ [जिस पर ज़िहाफ़ already लग चुका है पर न्हीं लगता ।यह अरूज़ के बुन्यादी असूल के ख़िलाफ़ है
आज हम उन ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे जो सालिम रुक्न  के ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ पर लगते हैं
आप की सुविधा के लिए ,कुछ ज़िहाफ़ के नाम लिख रहा हूं
ख़ब्न.....तय्यी....कब्ज़्....कफ़्फ़्...क़स्र्...ह्ज़्फ़्....रफ़’अ.........जद्द’अ.....जब्ब्......हतम् ......तस्बीग़
और इन्के मुज़ाहिफ़ नाम क्रमश: है 
मख़्बून्.......मुतव्वी.......मक़्बूज़्......मौकूफ़्.....मक़्सूर्.......महज़ूफ़्.....मरफ़ू’अ......मज्द’अ........मज्बूब्.......अहतम्......मुस्बीग़.
हम जानते हैं कि उर्दू शायरी में सालिम रुक्न्  की संख्या 8 है [जिसकी चर्चा हम् पहले भी कर चुके हैं] जिसमें  या तो ’सबब-ए-खफ़ीफ़’ आता है या सबब-ए-सकील आता है
सबब-ए-ख़फ़ीफ़ : वो दो हर्फ़ी कलमा जिसका  पहला हर्फ़ ’मुत्तहर्रिक और दूसरा हर्फ़ साकिन् हो । यानी  सबब-ए-ख़फ़ीफ़=हरकत+साकिन् जैसे  फ़ा....लुन्....तुन्...मुस्.....तफ़्..ई.[ऎन् + यी से मिलकर्] ..आदि या गम्.....दिल्...अब् ....तुम् ....हम्     ..ख़ुद् वग़ैरह् वग़ैरह् }आप ने हिन्दी फ़िल्म का एक गाना ज़रूर सुना होगा ---दिल् विल् प्यार् वार् मैं क्या जानू रे ! इसमे ’दिल्...विल्..प्या.....वा  सब सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् है
अब हम सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ के अमल की क्रमश: चर्चा करेंगे

ख़ब्न = अगर कोई सालिम रुक्न्  ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ’से शुरु होता है तो दूसरे मुक़ाम पर साकिन् हर्फ़ के गिराने  के अमल को ’ख़ब्न्’ कहते हैं। और इस अमल के बाद जो मुज़ाहिफ़ रुक्न् बरामद होती है उसे ’मख़्बून्’कहते है
सबब-ए-ख़फ़ीफ़ में दूसरा हर्फ़ यक़ीनन्  साकिन् ही होगा -परिभाषा ही है उस का ]
पिछली कड़ी में हम जिन 8-रुक्न्  की चर्चा कर चुके हैं उसमें से निम्न् लिखित अर्कान् ही सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होता है और् इसी ज़ुज [टुकड़े] पर ज़िहाफ़ का अमल होगा॥देखिए कैसे।

[फ़ा]इलुन्.......[फ़ा]इलातुन्......[मुस]तफ़ इलुन्.......[मफ़]ऊलात  ... जिस ज़ुज़ /टुकड़ा/अवयव पर ज़िहाफ़ ख़ब्न का अमल होता है उसे मै्ने कोसीन [कोष्ठक] [  ] में दिखा दिया है

फ़ाइलुन्        [2 1 2] + खब्न = फ़े इ लुन्  [1 1 2 ]    यानी फ़ा से ’अलिफ़’ गिरा दिया तो  बाक़ी बचा ’फ़े’[1] मय हरकत---मुत्तहर्रिक
फ़ाइलातुन्     [2 1 2 2] + ख़न् = फ़ इलातुन् [1 1 2 2]  यान् फ़ा से ’अलिफ़’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’फ़े [1] मय हरकत.....मुतहर्रिक
मुस् तफ़् इलुन्[2 2 1 2] +ख़न्    = मु तफ़् इलुन्[ 12 1 2 ] यान् मुस से ’सीन्’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’मीम [1] मय हरकत ....मुत्तहर्रिक
मफ़् ऊ लातु [ 2 2 2  1] + ख़न् = म ऊ ला तु  [ 1 2 2 1 ] यान् मफ़ से ’फ़े’ गिरा दिया बाक़ी बचा ’मीम[1] मय हरकत....मुत्तहर्रिक

[मफ़् ऊ लातु ]-इस रुक्न् मे ध्यान देने की बात है कि हर्फ़ उल आखिर यानी  आखिरी हर्फ़ ’तु’ पर हरकत है अत: इसे किसी शे’र के अरूज़ और जर्ब के मुकाम पर नही  लाया जा सकता कारण  कि उर्दू में कोई लफ़्ज़ मुत्तहर्रिक[यानी हर्फ़् हरकत ] पर नहीं ख़त्म होता है जब कि  अरूज़ और जर्ब किसी मिसरा का ’आखिरी’ मुक़ाम होता है
अब एक बात और ध्यान देने की है कि किसी ज़िहाफ़ की अमल से सालिम रुक्न -  मुज़ाहिफ़ शकल मे बदल जाती है और यह मुज़ाहिफ़ शकल हर वक्त किसी मानूस  [लोकप्रिय/राइज़/प्रचलित] फ़े’ल  की शक्ल में नहीं होता जैसे मस् तफ़् इलुन् के case मे ’मु तफ़् इलुन्’ हो गया जो मानूस [लोकप्रिय] फ़े’ल  नही  है और नही मफ़् ऊलातु का ’म ऊ लातु’। ऐसे case में हम इसे equivalent वज़न् से बदल लेते हैं जैसे म तफ़् इलुन् [1212 ] को प्रचलित फ़ाइल  ’मफ़ाइलुन् [1212 ] से और म ऊलातु [1 2 2 1] को प्रचलित वज़न् फ़ऊलातु [1 2 2 1] से बदल लिया

एक बात फ़े’अल् के बारे में में भी कर लेते है ---अगर आप ध्यान् से देखे तो 8-अर्कान् के हिज़्ज़े में  तीन् हर्फ़--फ़े...ऐन्....लाम....] invariably 1 या 2 हर्फ़  ज़रूर आता है इसी लिए इसे ’फ़े’अल्  कहते है
लगे हाथ  अरूज़ में उन 8-अर्कान् के अतिरिक्त  कुछ प्रचलित लोकप्रिय अफ़ाअ’ल [ब0ब0 फ़े’अल] [जिसे अर्कान् ,औज़ान् असूल या तफ़ा’अल भी कहते हैं ] के नाम मय वज़न् के जिसमे फ़े..एन्..लाम..आता है लिख रहा हूँ कि आगे काम आयेगा
1 मुफ़ ऊलुन् [2 2 2)
2 मफ़ऊल    [2 2  1) ...लाम मय हरकत
3 फ़ालुन्       [2 2    )
4 फ़े अ’लुन्  [1 1 2] --ऐन् मय हरकत
5 फ़ाइलातु    [2 1 2 1)  ते मय हरकत
6 मुफ़ त इलुन्[2 1 1 2)
7 फ़ाल          [2 1)
8 फ़ेअ’ल      [1 2)
9 मफ़ा इलुन् [1 2 2 1)
10 फ़ इला तुन् [1 12 2)
11       मु तफ़ा इलुन् [1 12 12 ) मीम और ते यहाँ मुत्तहर्रिक है
12 फ़ इ लातु     [1 1 2 1 )    ते मय हरकत  

चलिए ,अब दूसरे ज़िहाफ़ जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर अमल करते हैं ,की चर्चा करते है

तय्यी :- अगर किसी सालिम रुक्न के शुरु में दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो तो चौथे स्थान पे साकिन हर्फ़ के गिराने के काम जो ज़िहाफ़ करता है उसका नाम ’तय्यी’ है और  रुक्न की जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद होती है उसे ’मुत्तवी’ कहते हैं
ज़ाहिर है कि जब रुक्न  दो सबब-ख़फ़ीफ़ [हरकत+साकिन,हरकत+साकिन]के साथ शुरु होगा तो चौ्थे स्थान पर  यक़ीनन और बज़ाहिर ’साकिन’ ही होगा और इसी को गिराने का अमल ’तय्यी’ ज़िहाफ़ करता है
पिछली कड़ी में जिन 8-सालिम अर्कान का ज़िक़्र कर चुके हैं उसमें से 2 ही रुक्न ऐसे हैं जो दो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से शुरु होते हैं और वह रुक्न हैं----मुस् तफ़् इलुन  और ...मफ़् ऊ लातु

मुस् तफ़् इलुन् [2 2 1 2]+ तय्य    = मुस् त इलुन [2 1 1 2] यानी तफ़ से ’फ़े’ गिरा दिया बाक़ी बचा मुस त इलुन  ---’ते’ मय हरकत
मफ़् ऊ लातु    [2 2 2  1] +तय्य    =मुफ़्  ’अ लातु [ 2  1 2 1] यानी "ऊ’ [एन+वाव] से ’वाव’ गिरा दिया बाक़ी बचा ऎन --मय हरकत जिसे ’फ़ा ’अ लातु [2 1 2  1] हम वज़्न रुक्न से बदल लिया [यहां -’अ-ऐन मय हरकत  है
[मफ़् ऊ लातु ]  यद्दपि यह ज़िहाफ़ आम ज़िहाफ़ की श्रेणी में आता है  जो शे’र के किसी मुक़ाम पर आ सकता है परन्तु यह शे’र के अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर नही आ सकता कारण वह कि उर्दू में कोई लफ़्ज़/मिसरा  मुत्तहर्रिक[यानी हरकत पर खत्म न्हीं होता] क्योंकि  अरूज़ और जर्ब किसी मिसरा का ’आखिरी’ मुक़ाम होता है और यहाँ तो हर्फ़ उल आख़िर ’तु’ मुत्तहर्रिक है

क़ब्ज़ :- अगर किसी सालिम रुक्न वतद [ वतद-ए-मज्मुआ या वतद-ए-मफ़रुक़] से शुरु होता है और उसके फ़ौरन बाद सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है पाँचवे मुक़ाम पे साकिन को गिराने का काम क़ब्ज़्  ज़िहाफ़् करता है । इस के बाद जो  मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होती है उसे ’मक़्बूज़’ कहते है   । ज़ाहिर है कि वतद [3-हर्फ़ी कलमा] के बाद अगर सबब [2 हर्फ़ी कलमा ] आयेगा तो पाँचवे मक़ाम पर ’सबब का साकिन’ ही आयेगा और ज़िहाफ़ कब्ज़ इसी साकिन को गिराता है
हम जानते है कि 8-सालिम रुक्न में से 3-रुक्न ऐसे हैं जो वतद से शुरू होते हैं और फ़ौरन उसके बाद सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता है जो निम्न हैं
मफ़ाईलुन्..........फ़ाअ’लातन्.........फ़ऊलन्

मफ़ाईलुन् {1 2 2 2 ] +कब्ज़   = मफ़ा ई लुन् [1 2 1 2]  यानी पाँचवें मक़ाम पर जो ’ये’ आ रहा है  [ऐन+ये (सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ] का ’ये’  गिरा दिया बाक़ी बचा ’ऐन’ मय हरकत
फ़ा’अलातुन् [2 1 2 2] +क़ब्ज़   = फ़ा’अ ल तुन् [2 1 1 2] यानी पाँचवें मुकाम पर ’ला’ का जो अलिफ़ आ रहा हैुसे गिरा दिया तो बाक़ी बचा फ़ा’अ ल तुन् [ लाम मय हरकत बचा ] इस मुज़ाहिफ़ को मानूस रुक्न मुफ़् त ’अ लुन् [21 1 2 ] से बदल लिया ।
फ़ऊ्लुन्     [ 1 2 2]  + क़ब्ज़    = फ़ऊ लु  [ 1 2 1]  यानी पाँचवें मुक़ाम पर जो ’लुन’ का ’नून’ आ रहा है गिरा दिया [यानी नून साकिन को साकित कर दिया ] तो बाक़ी बचा फ़ऊ ल[ 1 2 1]  लाम मय हरकत

इन ज़िफ़ाफ़ शुदा रुक्न्  [मफ़ाईलुन् 1222]-- बह्र-ए-हजज़  या फ़ाइलातुन् [2122] --बह्र-ए-रमल या फ़ऊलुन्[122]  -बह्र-ए- मुतक़ारिब ] पर् शे’र  आगे की क़िस्त में कभी  सुनाएँगे  जब इन बहर की अलग से तफ़्सील से पेश करेंगे
अभी तो बहर-ए-सबब पर लगने वाले बाक़ी ज़िहाफ़ ........कफ़्फ़...क़स्र....ह्ज़्फ़....रफ़अ.........जद्दअ.....जब्ब......हतम् ......तस्बीग़ की चर्चा तो बाक़ी है   अगली क़िस्त में शनै: शनै: चर्चा करेंगे

और अन्त में---
एक बात और-- उर्दू से देवनागरी करने में हो सकता है कि उर्दू लफ़्ज़ के मूल तलफ़्फ़ुज़ में कुछ फ़र्क़ आ गया हो मगर मूल क़वायद और अमल में कोई फ़र्क़ नही है ।यहाँ ’अलिफ़’ को --अ-- से तथा ’एन’ को --’अ--से और नून साकिन को -न्- [या साकिन को हलन्त् लगा कर] दिखाने की कोशिश की है 

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उन से मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत ख़यालबन्दी या ग़लत बयानी हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।
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अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
 ज़िहाफ़ात के कुछ निशाँ और भी हैं......


शेष अगली कड़ी में......................................

आनन्द पाठक-
08800927181

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 12 [ज़िहाफ़ात]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 12 [ज़िहाफ़ात]

[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]

पिछली क़िस्त 11- में उर्दू शायरी में ज़िहाफ़ात की एक लम्बी सूची लगाई थी जिसमे 2 कम 50 ज़िहाफ़ के नाम थे। पर ज़िहाफ़ की लम्बी-चौड़ी सूची देख कर आप घबराइए नहीं- न इतने ज़िहाफ़ आप को याद करने हैं और न इतने ज़िहाफ़ के प्रयोग करने की आप को ज़रूरत ही पड़ेगी । आप जानते हैं कि उर्दू शायरी में 19-बह्र प्रचलित है और कोई भी शायर इन तमाम बहूर में न तो शायरी ही करता और न ही सारे ज़िहाफ़ात का प्रयोग  करता । वो तो कुछ चुनिन्दा और मक़्बूल बहरों में ही शायरी करता है और कुछ गिने चुने ज़िहाफ़ का ही प्रयोग करता है ।
एक बात और।  इन 48 ज़िहाफ़ात में 1-से लेकर  11 तक  ज़िहाफ़ तो ऐसे हैं कि जो अरबी बह्र, बह्र-ए-कामिल और बह्र-ए-वाफ़िर में ही  प्रयोग होते है । बह्र-ए-कामिल तो खुद में ऐसी दिलकश बह्र है कि इसमें भी 2-3 ज़िहाफ़ से ज़्यादा की ज़रूरत ही नहीं पड़ती । बह्र-ए-वाफ़िर उर्दू शायरी में कोई मानूस[दिलकश] बह्र नहीं मानी जाती है और शायर लोग इसमें न के बराबर ही शायरी करते है और किया भी होगा तो आँटे में नमक के बराबर ।बह्र-ए-वाफ़िर की कोई ख़ास  ग़ज़ल नज़र से गुज़री नहीं । हां यदि आप बह्र-ए-वाफ़िर में प्रयोग के तौर पर  ग़ज़ल कहना चाहें तो अलग बात है।आसमान खुला है।

1-       कुछ ज़िहाफ़ ऐसे भी है जिनका तरीक़ा-ए-अमल [प्रयोग विधि] विभिन्न अरकान पर तो  एक जैसा होता है .मगर भिन्न  भिन्न बह्र में इसका नाम अलग अलग होता है  जैसे  ’खरम’। अगर कोई रुक्न ’वतद-ए-मज्मुआ’[हरकत+हरकत+साकिन] से शुरु होता है[[ बज़ाहिर पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक ही होगा  तो   इस के पहले ’मुत्तहर्रिक  को गिराने] का अमल ’ख़रम’ कहलाता है’। अब आप जानते है कि ऐसे 3  सालिम रुक्न  हैं जो ’वतद-ए-मज्मुआ’ से शुरु होते है
’फ़े ऊ लुन   ----   मफ़ा ई लुन ----- मफ़ा इ ल तुन  [क्रमश:  फ़े ऊ......मफ़ा.....मफ़ा...वतद-ए-मज्मुआ है .]  पहला हर्फ़ ’मुत्तहर्रिक’ है इनके गिराने का अमल ’ख़रम’  कहलाता है मगर  तीनो रुक्न में ज़िहाफ़ का नाम अलग-अलग होता है
”फ़ेऊलुन’ के case में इस ज़िहाफ़ को  ’सलम [मुज़ाहिफ़ का नाम ’अस्लम] कहते हैं ....। मफ़ाईलुन के केस में इस ज़िहाफ़ को ’खरम’ [मुज़ाहिफ़ का नाम अखरम ] कहते हैं । जब कि ’मफ़ा इ ल तुन’ के केस में इस ज़िहाफ़ को ’अज़ब’ [मुज़ाहिफ़ का नाम अयज़ब ] कहते हैं अगरचे तीनो सालिम रुक्न पर एक ही अमल किया गया  जिसे ’खरम’ करना ही कहते है । है न अज़ब बात !
[ वतद-ए-मज्मुआ की परिभाषा  ]--क़िस्त 11 में दी जा चुकी है]

2-   पिछली क़िस्त [क़िस्त11] में  48 ज़िहाफ़ात की एक सूची लगाई थी जिसमें दोनों क़िस्म के ज़िहाफ़ थे---मुफ़र्द ज़िहाफ़[एकल ज़िहाफ़]  और मुरक़्क़ब ज़िहाफ़[मिश्रित ज़िहाफ़]

मुफ़र्द ज़िहाफ़ [एकल ज़िहाफ़] वह ज़िहाफ़ हैं जो सालिम रुक्न में किसी अवयव[टुकड़ा][यानी वतद. या सबब]  पर ’अकेले  ही और  independently   और एक ही बार " अमल करते हैं और फिर वो सालिम रुक्न ’मुज़ाहिफ़ नाम अख़्तियार कर लेती है   यहां पर  पाठकों की सुविधा के लिए कु  ’मुफ़र्द ज़िहाफ़’ के नाम लिख रहा हूँ[

खब्न....तय्य.....क़ब्ज़....कफ़्फ़.....क़स्र....हज़्फ़......रफ़अ .....जद्अ.....जब्ब......हत्म......तस्बीग़......अज़्मार......अस्ब......वक़्स......अक्ल......ख़रम....सलम.....अज़ब.....क़तअ....अर्ज....हज़ज़.....तम्स...बतर.....इज़ाला......तरफ़ील...वक़्फ़.....कस्फ़....सलम.....[28 ]
साथ ही साथ इनके मुज़ाहिफ़ नाम  पहले भी लिख चुका हूं~  एक बार फिर क्रमश: लिख  रहा हूँ
मख़्बून......मुत्तवी......मक़्बूज़......मकूफ़......मक़्सूर......महज़ूफ़......मरफ़ूअ......मज्दूअ......मज्बूब......अहत्म......मुस्बीग़....मुज़्मर.....मौसूब......मौक़ूस......मौक़ूल......अख़रम...असलम.....अज़ब......मक़्तूअ......अरज...अहज़.....मत्मूस .....अबतर......मज़ाल.....मरफ़ल.. ...मौवक़ूफ़... मक्सूफ़......असलम [28]

ये तो ज़ाहिर है कि इतने ज़िहाफ़ किसी एक रुक्न पर नहीं लगते। हर ज़िहाफ़ का तरीक़ा-ए-अमल मुख़्तलिफ़ है जो  मुख़्तलिफ़ रुक्न  पर ही लगते है और वो भी या तो रुक्न के सबब पर लगेगे या वतद पर लगेगे ।ये ज़िहाफ़ सालिम अर्कान पर कैसे अमल करते हैं ,आगे पेश करुँगा
3- कुछ  ज़िहाफ़ मुरक़्क़ब [ मिश्रित] होते हैं जो 2-या दो से अधिक ज़िहाफ़ से मिल कर बनते  हैं और ये मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ सालिम रुक्न के अलग अलग टुकड़ों पर[सबब या वतद] एक साथ लगते है ।
मुरक्क़ब ज़िहाफ़ [मिश्रित ज़िहाफ़ -दो ज़िहाफ़ एक साथ ] वो ज़िहाफ़ होते हैं जो सालिम रुक्न के अवयव[टुकड़े./ज़ुज़ यानी वतद सबब] एक साथ independently & concurrently  पर अलग अलग  लगते है  ।यह नहीं कि किसी टुकड़े पर एक ज़िहाफ़ लगा दिया और जो मुज़ाहिफ़ शकल बरामद हुई उस मुज़ाहिफ़ पर दूसरे ज़िहाफ़ का अमल कर दिया ।नहीं । यह  अरूज़ की  बुनियादी असूल के खिलाफ़ है ।इन के तरीक़ा-ए-अमल बाद में पेश करुँगा। यहां~ पर पाठकों की सुविधा के लिए कुछ ’मुरक़्कब ज़िहाफ़’  और उनके ’मुज़ाहिफ़ ’का नाम लिख रहा हूँ

मुरक़्क़ब ज़िहाफ़= मिल कर बना है मुज़ाहिफ़ नाम

ख़ब्ल =खब्न+ तय्य मख़्बूल
सकल =ख़ब्न+कफ़्फ़ मस्कूल
ख़र्ब        =ख़रम+कफ़्फ़ अख़रब
सरम = सलम+कब्ज़ असरम
सतर         =ख़रम+क़ब्ज़ अस्तर
ख़ज़ल = इज़्मार+तय्य मख़्ज़ूल
क़स्म =अस्ब+अज़्ब अक़सम
जम्म         = अज़्ब+नक़्ल अजम
नक़्श =अस्ब +कफ़्फ़ मन्क़ूश
अक़्श = अज़्ब+नक़्श अक़श
क़तफ़ =अस्ब+हज़्फ़ मक़्तूफ़
ख़लअ = ख़ब्न+ क़तफ़ मख़्लूअ
नह्र          = जद्दअ+कस्फ़ मन्हूर
सलख़ = जब्ब+ वक़्फ़ मस्लूख़
दर्स         =क़स्र+बतर मद्रूस
जहफ़ = बतर+हज़्फ़ मजहूफ़
रबअ =ख़ब्न +बतर मर्बूअ
----
[17]
ये ज़िहाफ़ सालिम रुक्न को कैसे प्रभावित [modify] करते हैं आगे की कड़ियों में विस्तार से लिखेंगे।

एक सवाल यह उठता है कि इन सभी ज़िहाफ़ात के बारे में,इसके अमल के बारे में जानना ज़रूरी है क्या?बिना जाने या समझे काम नहीं चल सकता है क्या? इस के बग़ैर शायरी नहीं की जा सकती है क्या?जी! बिल्कुल की जा सकती है और लोग करते भी हैं । फ़ेसबुक पर हर दूसरा व्यक्ति ग़ज़ल कह रहा है -बहुत से लोग अच्छी ग़ज़ल भी कह रहे हैं  । अगर आप अरूज़ जानते है...ज़िहाफ़ समझते है तो मयार की शायरी कर सकते हैं है । आप को यह पता चल सकेगा कि आप ’सही /मयार’ से कितने दूर या कितने पास हैं ।

4- हर ज़िहाफ़  शे’र के हर मुकाम पर  नहीं आ सकता ।।इन ज़िहाफ़ात में से कुछ ही ज़िहाफ़ ऐसे है जो शे’र किसी भी मुकाम पे आ सकते है जिन्हें हम ’आम ज़िहाफ़’ कहते हैं । मुकाम के बारे मह पिछली क़िस्त [11] में चर्चा कर चुके है यह मुकाम हैं   सदर.  हस्व..अरूज़....इब्तिदा....हस्व...जर्ब। पाठकों की सुविधा के लिए कुछ आम ज़िहाफ़ के नाम लिख रहा हूँ

खब्न.....तय्य...  क़ब्ज़.....कफ़ *......रफ़अ......इज़्मार....अस्ब...वक़्स....अक़्ल.....ख़ब्ल...सकल *.....ख़ज़ल....,नक़्स......[इनके मुज़ाहिफ़ नाम ऊपर लिख चुका हूँ]    
   
* नोट :- यह वो ज़िहाफ़ हैं जो कहने को तो आम ज़िहाफ़ है शे’र के किसी मुकाम पर theoretically तो आ सकता है मगर ये ज़िहाफ़ ’अरूज़ और जर्ब के मुकाम पर नहीं लगाते कारण कि जब यह  ज़िहाफ़ सालिम रुक्न पर अमल करते है तो जो मुज़ाहिफ़ शकल प्राप्त होती है उस मुज़ाहिफ़ रुक्न में हर्फ़ अल आखिर [आखिरी हर्फ़[ मुत्तहर्रिक बच जाता है और हम जानते हैं कि उर्दू शायरी में कोई लफ़ज़/शे’र मुत्तहर्रिक पर नहीं खत्म होता

5- कुछ ज़िहाफ़ ऐसे हैं जिन्हे हम ’ख़ास ज़िहाफ़’ कहते है जो शे’र के ख़ास मुकाम [ सदर---अरूज़---इब्तिदा....जर्ब] के लिए ही मख़्सूस होते हैं । जो ज़िहाफ़ ’सदर’ के मुकाम के लिए मख़्सूस है वह इब्तिदा’ के लिए भी मख़्सूस होता है कारण कि दोनो ही मुकाम से ही मिसरा शुरु होता है ।यही बात ’अरूज़’ और ’जर्ब के लिए भी समान रूप से लागू होता है।कारण कि मिसरा इसी मुकाम पर ख़त्म होता है ।पाठकों की सुविधा के लिए कुछ ’ख़ास’ ज़िहाफ़ के नाम लिख रहा हूँ ।
सदर/इब्तिदा के मुकाम पर लगने वाले ज़िहाफ़ात----

ख़रम......सलम....अज़ब......खर्ब.....सरम...सतर....क़सम......जम्म.....अक़स......

अरूज़/जर्ब के मुकाम पर लगने वाले ज़िहाफ़-----

क़स्र......हज़्फ़....जद्दअ......जब्ब......तस्बीग़......क़तअ......अरज......हज़ज़......तम्स......बतर...इज़ाला......तरफ़ील....वक़्फ़...कस्फ़...सलम.....कतफ़......ख़लअ......नह्र......सलख......दरस......हजफ़...रब्बअ......

अब अगली क़िस्त में इन्ही तमाम ज़िहाफ़ात में से उन ज़िहाफ़ात का ज़िक्र करेंगे जो ’सबब-ए-खफ़ीफ़’ पर लगता है।

और अन्त में---
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उन से मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत ख़यालबन्दी या ग़लत बयानी हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
अस्तु
शेष अगली कड़ी में......................................

-आनन्द.पाठक-
08800927181

रविवार, 18 दिसंबर 2016

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त11 [ज़िहाफ़ात]

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 11[ज़िहाफ़ात]

[नोट : मित्रों ,बहुत दिनों बाद इस मंच पर लौटा हूँ ,बिलम्ब के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ । कुछ तो दीगर काम में व्यस्तता , इसी बीच अपना  रिटायर्मेन्ट  फिर अमेरिका  व ब्राज़ील की यात्रा.... पिताश्री का स्वर्गवास आदि के कारण मंच पर न आ सका। 

 कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यों कोई बेवफ़ा  नहीं   होता   ----बशीर बद्र

खैर ---अब गिला शिकवा भी क्या ...जब ताख़ीर हो गई तो बहाना भी क्या...।
  

Discliamer clause -वही जो किस्त 1 में है ]


इसी सिलसिले में, क़िस्त 10 में उर्दू बहर में ज़िहाफ़ात की बात की थी जिसमें ज़िहाफ़ात के कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा की गई थी जैसे ज़िहाफ़ात क्या होते हैं ...उर्दू शायरी में इस की क्या अहमियत है.....ज़िहाफ़ात के बारे में जानन क्यों ज़रूरी है।वग़ैरह वग़ैरह ।पाठकों की सुविधा के लिए क़िस्त 10 का  link  यहाँ लगा रहा हूँ 
http://urdu-se-hindi.blogspot.in/2014/12/10_4.html

आलिम जनाब कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब  की किताब [आहंग और अरूज़] के हवाले से ज़िहाफ़ात की संख्या लगभग 48 बताई गई है }हालाँकि इन 48 ज़िहाफ़ात की सूची एक मुश्त तो नहीं दी गई है मगर अपने एक मित्र की आग्रह पर अन्य स्रोतों से मैने इकठ्ठा किया जो आप की सेवा में लिख रहा हूँ
ज़िहाफ़ हमेशा सालिम रुक्न के ’अयवयों’ पर लगते है जिससे सालिम रुक्न की शकल [वज़न] बदल जाती है और जो रुक्न  बरामद होती है उसे ’मुज़ाहिफ़’ कहते है जैसे ’खब्न’ जिहाफ़ के अमल से जो मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद होगा उसका नाम ’मख़्बून’ होगा  जो ख़र्ब ज़िहाफ़ के अमल से बरामद होगा उसका मुज़ाहिफ़ नाम ’अख़रब’ होगा या जो क़तअ ज़िहाफ़ के अमल से बरामद होगा उस का मुज़ाहिफ़ नाम ’मक़्तूअ’ होगा ....वग़ैरह वग़ैरह

नाम-ए-ज़िहाफ़ नाम-ए-मुज़ाहिफ़

1 अस्ब मौसूब
2 अज़ब अज़ाब
3 अक़्ल मौक़ूल
4 नक़्स मन्क़ूस
5 क़त्फ़ मक़्तूफ़
6 क़स्म अक़साम
7 ह्जम अहज़म
8 अक़स अक़ास
9 इज़्मार मुज़्मार
10 वक़स मव्क़ूस
------------------------
11 ख़ज़्ल मख़्ज़ूल
12 ख़ब्न मख़्बून
13 तय्य मुतव्वी
14 क़ब्ज़ मक़्बूज़
15       कफ़ मौकूफ़
16 ख़ब्ल मख़्बूल
17 शक्ल मश्कूल
18 तस्बीग़ मुस्बाग़
19 तज़ील मुज़य्यल
20        तरफ़ील मुरफ़्फ़ल
--------------------------
21 क़स्र मक़्सूर
22 हज़्फ़ महज़ूफ़
23 क़तअ मक़्तूअ
24 हज़ज़ अह्ज़ज़
25 वक़्फ़ मौव्क़ूफ़
26 कस्फ़[कश्फ़] मक्सूफ़[मक्शूफ़]
27 सलम असलम
28 नहर मन्हूर
29 बतर अबतर
30 तख्लीअ मुतख़्लअ
--------------------
31 ख़ज़्म मख़्ज़ूम
32 तशीश मुश्शश
33 ख़रम अख़रम
34 सलम असलम
35 सरम असरम
36 सतर असतर
37 ख़र्ब अख़रब
38 रफ़अ मरफ़ूअ
39        जब्ब मजबूब
40 अरज़ इराज़
-----------
41 इज़ला मज़ाल
42 ख़लअ मख़्लूअ
43 जद्दअ मज़्दूअ
44 सल्ख़ मस्लूख़
45 रब्बअ मरबूअ
46 तम्स मत्मूस
47 जम्म अज़्म
48 हत्म
-------------------------------------
नोट :
2- उक्त लिस्ट अरूज़ के कई मुस्तनद किताबों से मुरत्तब किया है
3- ज़िहाफ़ात की संख्या पर मतभेद हो सकता है क्यों कि कई ज़िहाफ़ ;तस्कीन-ए-औसत’ और तख़्नीक के अमल से भी बनाये जाते  हैं 
4-सभी ज़िहाफ़ सभी रुक्न पर नहीं लगते -कुछ ज़िहाफ़ रुक्न में  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगते है ,कुछ सबब-ए-सकील पर लगते है कुछ वतद-ए-मज़्मूआ और कुछ वतद-ए-मफ़रूक़ पर लगते है
5- 1-से लेकर 11 तक के ज़िहाफ़ तो सिर्फ़ अरबी बहर - बहर-ए-कामिल और बहर-ए-वाफ़िर पर लगते है 
6- कुछ ज़िहाफ़ है जो आम ज़िहाफ़ कहलाते है वो शे’र के किसी मुकाम [ सदर...हस्व...अरूज़...इब्तिदा....जर्ब] पर लग सकते हैं जब कि ख़ास ज़िहाफ़ सदर..इब्तिदा या जर्ब या अरूज़ के मुकाम के लिए ही मख़्सूस है
7- रुक्न पर जिहाफ़ लगने के बाद रुक्न मुज़ाहिफ़ नाम अख़्तियार कर लेता है
8- हो सकता है कि देवनागरी लिपि में तर्जुमा करने पर तलफ़्फ़ुज़ में फ़र्क़ नज़र आए जैसे यहाँ ’ऐन या अलिफ़ को ’अ’ से ही लिखा जा सका  है
8-उर्दू शायरी में ज़िहाफ़ खुद में एक विस्तॄत विषय है 
ऊपर मैने कहा है -ज़िहाफ़ हमेशा सालिम रुक्न के ’अयवयों’ पर अमल करते है -
अब सवाल यह है सालिम रुक्न कितने होते है ?
और यह सालिम रुक्न के ’अवयव’ [ज़ुज] क्या हैं ?[इसी सालिम लफ़्ज़ से मुसल्लम बना है -मुर्ग मुसल्लम ,गोभी मुसल्लम]
यद्द्पि पहले की क़िस्तों में  ’सालिम रुक्न’ और उनके अवयवो’ की चर्चा कर चुका हूँ -ज़िहाफ़ के अमल को समझने के लिए एक बार पुन: यहाँ चर्चा करना मुनासिब होगा

हम सब जानते है कि उर्दू शायरी में 8- सालिम रुक्न हैं जो निम्न हैं इनको इनके ’अवयव’ के साथ लिख रहा हूँ यानी ये सालिम किन किन जुज़ [ अवयव] से मिल कर कैसे बना है  । इन अवयवों [ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ,सबब-ए-सकील ,वतद-ए-मज़्मुआ ,वतद-ए-मफ़रूक़ ]के तफ़्सीलात आगे पेश करूँगा]

1-फ़ऊ लुन  [ 12 2 ]   = वतद मज़्मुआ{फ़ऊ 12}     + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ {लुन 2} --यह बह्र-ए-मुतक़ारिब का बुनियादी रुक्न है
2-फ़ा इलुन   [ 2 12 ]    = सबब-ए-ख़फ़ीफ़{ फ़ा 2]+  वतद-ए-मज़्मुआ{इलुन 12} --यह बह्र-ए-मुतदारिक़ का बुनियादी रुक्न है
3- मफ़ा ई लुन [12 2 2 ]     = वतद-ए-मज़्मुआ[मफ़ा 12)+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़(ई2}+सबब-ए-खफ़ीफ़[लुन 2} -  यह बहर हज़ज का बुनियादी रुक्न है
4-फ़ा इला तुन [ 2 12 2 ] = सबब-ए-ख़फ़ीफ़{फ़ा 2)+वतद-ए-मज़्मुआ{इला 12]+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़(तुन 2) -- यह बह्र-ए-रमल का बुनियादी रुक्न है
5-मुस तफ़ इलुन [ 2 2 12] = सबब-ए-ख़फ़ीफ़ {मुस2]+सबब-ए-खफ़ीफ़{तफ़2) +वतद-ए-मज़्मुआ (इलुन 12)    - यह बहर-ए-रजज़ का बुनियादी रुक्न है
6-मुफ़ा इल तुन [ 12 1 1 2]      = वतद-ए-मज़्मुआ[मुफ़ा 12)+सबब-ए-सकील(इ ल 11]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़[तुन12]    -  यह बह्र-ए-वाफ़िर का बुनियादी रुक्न है
7- मुत फ़ा इलुन [ 1 1 2 1 2] = सबब-ए-सकील-(मु त 1 1)  + सबब-ए-ख़फ़ीफ़(फ़ा 2)+वतद-ए-मज़्मुआ(इलुन 12} -- यह बह्र-ए-कामिल का बुनियादी रुक्न है
8 -मुफ़ ऊ लातु  [2 2 2 1 ]       =  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ (मुफ़2)    + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ (ऊ 2) + वतद-ए-मफ़रूक(लातु 21) -- बहर-ए-मुक़्तज़िब

रुक्न- ’मफ़ऊलातु’- सालिम रुक्न तो है पर किसी शे’र के अरूज़ या जर्ब के मुकाम पर नहीं आ सकता -कारण कि जो आखिरी हर्फ़ ’तु’ है वो मुत्तहर्रिक है और उर्दू शायरी में किसी शे’र के अन्त  [आखिर में] ’मुत्तहर्रिक’ पर खत्म नहीं होता /
[हर्फ़ मुत्तहर्रिक ,साकिन. साकित  के बारे में पहले भी चर्चा कर चुके हैं आगे एक बार फिर चर्चा करेंगे  जिस से ज़िहाफ़ात समझने में सुविधा होगी ] यही कारण है कि रुक्न ’मफ़ऊलातु’ शे’र के मुकाम अरूज़ और जर्ब के मुकाम पर नहीं आ सकता अगर आयेगा भी तो अपने ’मुज़ाहिफ़’ शकल में आयेगा
[ शे’र के मुकाम  सदर---इब्तिदा...हस्व..अरूज़...जर्ब.. की पहले भी चर्चा कर चुके हैं एक बार फिर आगे चर्चा करेंगे जिससे ज़िहाफ़ात समझने में सुविधा होगी।
अगर आप ऊपर के 8-सालिम रुक्न पर गौर फ़र्माए तो बहुत सी दिलचस्प बातें आप को मिलेंगी। चलिए ,चलते चलते उस पर भी चर्चा कर लेते हैं
1- रुक्न 1 और 2 हिन्दी से उर्दू में आई और बाद में आईं
2- शुरु में 3-8 तक के अर्कान तक ही उर्दू  शायरी में आए 
3-अगर आप रुक्न क्र0  3,4,और 5 में  1..2...2...2.. गिर्दान [चक्र] की लोकेशन पर ध्यान दें तो क्रमश: अपने पूर्व स्थान से एक स्थान आगे खिसक रहा है । दर अस्ल यह अर्कान एक निश्चित नियम से बरामद किए जाते है जिसे अरूज़ की भाषा में ’दायरा’ [सर्किल या वृत्त] कहते हैं । यहां हमें ’दायरे’ के बारे में विस्तार से जाने की ज़रूरत नहीं है } हमारा काम इतना से ही चल जायेगा
4- अगर आप ध्यान से देखें तो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के लिए  कहीं ’लुन’ ...कहीं ’तुन’ ...कहीं ’मुस’...कहीं ’तफ़’...कहीं ’फ़ा’ ..तो कहीं ’मुफ़’ लिखा है हालाँ कि सबका वज़न ’2’ ही है -। शायद सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के लिए कोई एक ही अवयव -जैसे ’फ़ा’ ही काफी होता ...मगर नहीं । ऐसा क्यों होता है ,मत पूछियेगा --क्लासिकी अरूज़ी की किताबों में ऐसा ही लिखा है और हम सब ऐसा ही मानते आए हैं और ऐसी ही तफ़ाईल से शायरी करते हैं
5- यही बात वतद-ए-मज़्मुआ के बारे में भी है जिसके लिए ऊपर हम ने कहीं ’फ़ऊ...कहीं मफ़ा....कहीं ’इलुन’ ....का प्रयोग किया है 
6- उर्दू में ’फ़ा इला तुन’ और ’मुस तफ़ इलुन’ दो प्रकार से लिखते है---एक तो सब हर्फ़ मिला कर लिखते है जिसे ’मुतास्सिल शकल’ कहते है  और दूसरे में हर्फ़ में कुछ फ़ासिला देकर लिखते हैं जिसे ’मुन्फ़सिल शकल’ कहते है ।हालाँकि दोनो शक्लों में ’वज़न ’ एक सा ही रहता है  हाँ दोनो शकलों के ’ज़िहाफ़’  अलग अलग  होते है ।हमें यहां~ बहुत गहराई में जाने की ज़रूरत नहीं है -
अब लगे हाथ हर्फ़ के ’हरकत’ और साकिन की भी चर्चा कर लें
उर्दू के हरूफ़-ए-तहज्जी [वर्ण माला] में ---- हर्फ़ है जो सभी साकिन है । साकिन हर्फ़ को आप ऐसे ही समझिए जैसे संस्कॄत में  न् ..त्...म्....क्...बोलते है यानी जुबान पर बिना किसी ’हरकत’ दिए बोलते है -
लेकिन कब ’कमल’ बोलते हैं तो मतलब  
कमल  =  क्+अ  + म्+अ+ल्+अ  --यानी क् ,म्, ल्  तो साकिन् है और ’अ’ इन्हे हरकत दे रहा है 
उर्दू में मात्रा कि जगह ’ जबर; ज़ेर,पेश तश्दीद तन्वीन आदि प्रयोग करते है जब कि हिन्दी में अ...आ..इ...ई.. आदि प्रयोग करते है यानी आप यह समझ लें कि जिस हर्फ़ पर ’जबर...ज़ेर..पेश..लगा हो वो हर्फ़ को हरकत देगा ऐसे हर्फ़ को मुतहर्रिक कहते हैं
बज़ाहिर उर्दू में कोई लफ़्ज़ [ जो हर्फ़ से बनता है] ’साकिन’ से शुरु नही होता [हिन्दी में भी नहीं होता] मगर खत्म साकिन पर ही होता है यानी उर्दू में कोई लफ़्ज़ ’हरकत’ पे खत्म नहीं होता यही कारण था कि मैने ऊपर लिखा था कि रुक्न ’मफ़ऊलातु’ [जिसमें आखिरी हर्फ़ पर हरकत है] किसी शेर के आखिर में इसी रूप में नही आ सकता।
हिन्दी में कदाचित्...तत्पश्चात्...श्रीमान् के बजाय कदाचित....तत्पश्चात...श्रीमान लिखते जा रहे हैं यानी तत्सम का फ़ैशन खत्म होता जा रहा है यानी ’साकिन’ भी हरकत होता जा रहा है 
फिर उर्दू की बात पर ही आ रहे हैं---- ऊपर ’लुन’ में ’न’[यानी नून]  साकिन है मगर ’लातु’ में ’तु’ [यानी ’ते’ पर हरकत है
अदि हम यह कहें कि ’कमल’ के ’क’ में से हरकत हटा दे तो ’क’ -साकिन हो जायेगा
यदि हम यह कहें कि ’क’ को साकित कर दिया --तो उसका मतलब ’क’ हट गया [हरकत साकिन सहित]
यदि हम यह कहें कि ’लुन’ को साकित कर दिया ...इसका मतलब रुक्न से ’लुन’ हट गया यानी साकित हो गया 
यदि हम यह कहे के ’लुन’[लाम+नून]  यहा लाम पे हरकत है और नून साकिन है ] कि नून को साकित कर दिया और लाम को साकिन तो इसका मतलब ये हुआ कि लाम से हरकत हटा दिया
जिस हर्फ़ पर ’हरकत’ लगा हुआ हो -उसे ’मुतहर्रिक कहते है
चलते चलते .सबब-ए-ख़फ़ीफ़ की भी चर्चा कर लेते हैं
सबब-ए-ख़फ़ीफ़ ----- वह दो हर्फ़ी लफ़्ज़ जिसमें पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक [जिस हर्फ़ पर हरकत लगा हो] और दूसरा हर्फ़ साकिन हो 
जैसे अब...बस....फ़ा..लुन...मुस...तफ़...आदि जिसमे पहला हर्फ़ मुत्तहर्रिक और दूसरा हर्फ़ साकिन है 
अब में  अलिफ़+बे 
फ़ा  में   फ़े + अलिफ़
मुस  में  मु  मुतहर्रिक है ’स’ साकिन है 
अच्छा ’अलिफ़’ जब लफ़्ज़ के शुरु में आये तो ’मुत्तहर्रिक’ होगा जब लफ़्ज़ के आखिर में आयेगा तो ’साकिन ’होगा --कारण कि उर्दू में कोई लफ़्ज़ साकिन से नहीं शुरु होता है और न ही मुतहर्रिक पे खत्म होता है
सबब-ए-सकील ........वह दो हर्फ़ी लफ़्ज़ जिसमे पहला हर्फ़ मुतहर्रिक हो [यानी पहले हर्फ़ पर हरकत लगा हो ] और दूसरा हर्फ़ भी मुत्तहर्रिक हो [यानी दूसरे हर्फ़ पर भी हरकत लगा हो]
बह्र-ए-कामिल में जो ’मु त’ देखर रहे है उस में मीम और ते  दोनो पर हरकत है  ’मु त . कोई लफ़्ज़ नहीं है वो तो बस सबब-ए-सकील को समझाने के लिए एक अलामत बना लिया गया है उर्दू में ऐसा कोई लफ़्ज़ हो ही नही सकता जिसके आखिरी हर्फ़ पर ’हरकत’ लगी हो 
वतद-ए-मज़्मुआ  --- वो तीन हर्फ़ी लफ़्ज़ जिसमे पहला हर्फ़ ’हरकत’+दूसरा हर्फ़ हरकत+तीसरा हर्फ़ साकिन हो  यानी  दो मुतहर्रिक हर्फ़ एक जगह जमा हो गए इसीलिए इसे ’मज्मुआ’ कहते है 
’फ़ऊ’ = फ़े+एन+वाव  = हरकत+हरकत+साकिन
इलुन  = एन+लाम+नून  =हरकत +हरकत+साकिन
मफ़ा   = मीम+फ़े+ अलिफ़= हरकत+हरकत+साकिन
वतद-ए-मफ़रुक़------- वो तीन हर्फ़ी लफ़्ज़ जिसमे पहले हर्फ़ पर हरकत+दूसरा हर्फ़ साकिन+तीसरा हर्फ़ हरकत हो 
जैसे मफ़ऊलातु में ’लातु’  । लातु = लाम +अलिफ़+ते = हरकत+साकिन+हरकत  [यानी दो मुत्तहर्रिक के बीच मे फ़र्क़ है यानी बीच में साकिन आ गया इस लिए इसे मफ़रूक़ कहते है 

अब चलते चलते शे’र के मुकामात की भी चर्चा कर लेते है -कारण कि ज़िहाफ़ात की चर्चा में इसका ज़िक़्र आयेगा

                                        किसी भी .शे’र में दर्ज-ए-ज़ैल मुकाम होते है

सदर.....हस्व...............हस्व     .....अरूज़
इब्तिदा----हस्व-.....हस्व...............जर्ब

यानी शे’र के मिसरा उला के पहले मुकाम को”सदर’ कहते है और आखिरी मुकाम को ’अरूज़’
और शे;र के मिसरा सानी के पहले मुकाम को ’इब्तिदा’ और आखिरी मुकाम  को  ’जर्ब’ कहते है
और दोनो मिसरा के बीच के मुकाम को ’हस्व’ कहते है
बात स्पष्ट करने के लिए इस हक़ीर फ़क़ीर का एक शे’र लेते है...........

मैं राह-ए-तलब का मुसाफ़िर हूँ  ’आनन’
मेरी इब्तिदा  मेरी   दीवानगी   है 

सदर        /  हस्व        /हस्व           /अरूज़
मैं राह-ए/   -तलब का/   मुसाफ़िर / हूँ  ’आनन’

इब्तिदा  /  हस्व    /हस्व     / जर्ब
मेरी इब्/ तिदा मे/री  दीवा/ नगी   है 

यह बात बतानी इस लिए भी ज़रूरी थी कि कुछ ज़िहाफ़ ’आम’ होते हैं जो शे’र के किसी मुकाम पर आ सकते  है ,जब कि कुछ ज़िहाफ़ ख़ास होते है जो ख़ास मुकाम [ सदर ...अरूज़...इब्तिदा...जर्ब] के लिए मख़्सूस होते है 
और अन्त में ------
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उन से मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत ख़यालबन्दी या ग़लत बयानी हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
अस्तु
शेष अगली कड़ी में......................................

-आनन्द.पाठक-
08800927181