शनिवार, 26 मार्च 2016

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : हमें खुदा की कसम !

                                    ग़ज़ल ०५१

            हमें ख़ुदा की क़सम! याद आइय़ाँ क्या क्या !
            जफ़ा के भेष में वो आशनाइय़ाँ  क्या क्या !

            उम्मीद-ओ-आरज़ू जी में बसाइय़ाँ क्या क्या
            फ़रेब इश्क़  में दानिस्ता ख़ाइयाँ  क्या क्या !

            ख़ुदी से कुछ न मिला, बे-ख़ुदी से कुछ न मिला
            हरीम-ए-शौक़ में ज़ेहमत उठाइयाँ क्या क्या !

            इन्हीं से याद है ताज़ा गये ज़माने की
            हमें अज़ीज़ है तेरी जुदाइयाँ क्या क्या !

            मियान-ए-काबा-ओ-बुतख़ाना गुम खड़े थे हम
            नज़र जो ख़ुद पे पड़ी तुझ को पाइय़ाँ क्या क्या !

            न दीद की कोई सूरत , न वस्ल की उम्मीद
            फिर उस पे हैं मिरी बे-दस्त-ओ-पाइयाँ क्या क्या!

            फ़रेब-ए-दश्त-ए-तमन्ना में मुझ को छोड़ गयीं
            ख़याल-ओ-ख़्वाब की मेहशर नुमाइयाँ क्या क्या !

            न तेरी दोस्ती अच्छी , न दुश्मनी  अच्छी
            बना रख़्ख़ी हैं ये तू ने ख़ुदाइयाँ क्या क्या !

            मक़ाम-ए-इश्क़ में ’सरवर,तुझे भी ले डूबीं
            तिरी अना ये तिरी ख़ुद-नुमाइयाँ क्या क्या !

                                    -सरवर


            हरीम-ए-शौक़  में           = शौक़ के महल में
            मियान-ए-काबा-ओ-बुतख़ाना= मन्दिर-मस्जिद के बीच में
            बे-दस्त-ओ-पाइयाँ           =बेबसी
            फ़रेब-ए-दश्त-ए-तमन्ना =तमन्नाओं के फ़रेब
            अना                     =अहम
           
           


                  

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (28-03-2016) को "होली तो अब होली" (चर्चा अंक - 2293) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'