शनिवार, 26 मार्च 2016

जनाब डा0 आरिफ़ हसन ख़ान के च्झन्द माहिये

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अश्कों से नहीं बुझती
तेरी जुदाई में
ये कैसी अगन भड़की
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ऎ मौला हिम्मत दे
उस को भुला पाऊँ
मुझे इतनी ताक़त दे
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मैं ने हर दर्द सहा
होंट सिए फिर भी
अश्कों ने किया रुसवा
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उड़ता था बुलन्दी पर
क़िस्मत ने नोचे
क्यूँ मेरे बालो-पर
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मुझे लूट लिया तूने
जीवन भर के लिए
ये दर्द दिया तूने

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डा0 आरिफ़ हसन ख़ान

[ख़्वाबों की किर्ची--- [माहिया संग्रह से]

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