शनिवार, 26 मार्च 2016

जनाब डा0 आरिफ़ हसन ख़ान के च्झन्द माहिये

      36
अश्कों से नहीं बुझती
तेरी जुदाई में
ये कैसी अगन भड़की
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ऎ मौला हिम्मत दे
उस को भुला पाऊँ
मुझे इतनी ताक़त दे
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            38
मैं ने हर दर्द सहा
होंट सिए फिर भी
अश्कों ने किया रुसवा
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            38
उड़ता था बुलन्दी पर
क़िस्मत ने नोचे
क्यूँ मेरे बालो-पर
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मुझे लूट लिया तूने
जीवन भर के लिए
ये दर्द दिया तूने

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डा0 आरिफ़ हसन ख़ान

[ख़्वाबों की किर्ची--- [माहिया संग्रह से]

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : हमें खुदा की कसम !

                                    ग़ज़ल ०५१

            हमें ख़ुदा की क़सम! याद आइय़ाँ क्या क्या !
            जफ़ा के भेष में वो आशनाइय़ाँ  क्या क्या !

            उम्मीद-ओ-आरज़ू जी में बसाइय़ाँ क्या क्या
            फ़रेब इश्क़  में दानिस्ता ख़ाइयाँ  क्या क्या !

            ख़ुदी से कुछ न मिला, बे-ख़ुदी से कुछ न मिला
            हरीम-ए-शौक़ में ज़ेहमत उठाइयाँ क्या क्या !

            इन्हीं से याद है ताज़ा गये ज़माने की
            हमें अज़ीज़ है तेरी जुदाइयाँ क्या क्या !

            मियान-ए-काबा-ओ-बुतख़ाना गुम खड़े थे हम
            नज़र जो ख़ुद पे पड़ी तुझ को पाइय़ाँ क्या क्या !

            न दीद की कोई सूरत , न वस्ल की उम्मीद
            फिर उस पे हैं मिरी बे-दस्त-ओ-पाइयाँ क्या क्या!

            फ़रेब-ए-दश्त-ए-तमन्ना में मुझ को छोड़ गयीं
            ख़याल-ओ-ख़्वाब की मेहशर नुमाइयाँ क्या क्या !

            न तेरी दोस्ती अच्छी , न दुश्मनी  अच्छी
            बना रख़्ख़ी हैं ये तू ने ख़ुदाइयाँ क्या क्या !

            मक़ाम-ए-इश्क़ में ’सरवर,तुझे भी ले डूबीं
            तिरी अना ये तिरी ख़ुद-नुमाइयाँ क्या क्या !

                                    -सरवर


            हरीम-ए-शौक़  में           = शौक़ के महल में
            मियान-ए-काबा-ओ-बुतख़ाना= मन्दिर-मस्जिद के बीच में
            बे-दस्त-ओ-पाइयाँ           =बेबसी
            फ़रेब-ए-दश्त-ए-तमन्ना =तमन्नाओं के फ़रेब
            अना                     =अहम
           
           


                  

रविवार, 20 मार्च 2016

चन्द माहिया : होली पे.....

समस्त पाठकों को होली की शुभकामनाओं के साथ.......

चन्द माहिया : होली पे.....

:1:

भर दो इस झोली में
प्यार भरे सपने
आ कर इस होली में

:2:

मारो ना पिचकारी
कोरी है तन की
अब तक मेरी सारी

:3:
रंगोली आँगन की
देख रही राहें
रह रह कर साजन की

:4:
मन ऐसा रँगा ,माहिया !
जितना मैं धोऊँ
उतना ही चढ़ा ,माहिया !

:5:
इक रंग ही सच्चा है
प्रीत मिला दे तो
सब रंग से अच्छा है

-आनन्द.पाठक-
09413395592

गुरुवार, 10 मार्च 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 30

चन्द माहिया : क़िस्त 30

:1:
तुम से जो जुड़ना है
इस का मतलब तो
अपने से बिछुड़ना है

:2:
आने को तो आ जाऊँ
रोक रहा कोई
मैं कैसे ठुकराऊँ

:3:
इक लफ़्ज़ मुहब्बत है
जिसकी ख़ातिर में
दुनिया से अदावत है

:4;
दीदार हुआ जब से
जो भी रहा बाक़ी
ईमान गया तब से

:5:
जब तू ही मिरे दिल में
ढूँढ रहा किस को
मैं महफ़िल महफ़िल में

आनन्द.पाठक
09413395592

शनिवार, 5 मार्च 2016

एक ग़ज़ल : यूँ तो तेरी गली से....



यूँ तो तेरी गली से , मैं बार  बार गुज़रा
लेकिन हूँ जब भी गुज़रा ,मैं सोगवार गुज़रा

तुमको यकीं न होगा ,गर दाग़-ए-दिल दिखाऊँ
राहे-ए-तलब में कितना ,गर्द-ओ-गुबार गुज़रा

आते नहीं हो अब तुम ,क्या हो गया है तुमको
क्या कह गया हूँ ऐसा ,जो नागवार  गुज़रा

दामन बचा बचा कर ,मेरे मकां से बच कर
राह-ए-वफ़ा से हट कर ,मेरा निगार  गुज़रा

मैं चाहता था कितना तुझको ख़बर न होगी
राह-ए-वफ़ा से तेरा  सजदागुज़ार  गुज़रा

सारे गुनाह मेरे  हैं साथ साथ चलते
दैर-ओ-हरम के आगे ,मैं शरमसार गुज़रा

रिश्तों की वो तिज़ारत करता नहीं था,’आनन’
मेरी तरह से वो भी था गुनहगार गुज़रा

-आनन्द पाठक-
09413395592

राह-ए-तलब = प्रेम के मार्ग में