सोमवार, 25 जनवरी 2016

डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के चन्द माहिये : क़िस्त 07

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मेरा सब कुछ छूट गया
आई ये रुत कैसी
दिल मेरा टूट गया
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होटों को न खोलूँगा
तेरी ख़ुशी के लिए
जीवन भर रो लूँगा
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हर ठेस पे रिसता हूँ
तुझ से बिछड़ कर मैं
इक जख़्म सरापा हूँ
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पिघलेंगे ये पत्थर
इन पे अगर गुज़रे
जो गुज़री है मुझ पर
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दिल मेरा तोड़ चला
मैं ने जिसे चाहा
वो मुझको छोड़ चला

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डा0 आरिफ़ हसन ख़ान

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