शनिवार, 30 जनवरी 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 28

:1:
सौ बुत में नज़र आया
इक सा लगता है
जब दिल में उतर आया

:2:
जाना है तेरे दर तक
ढूँढ रहा हूँ मैं
इक राह तेरे घर तक

:3:
पंछी ने कब माना
मन्दिर मस्जिद का
होता है अलग दाना

:4:
किस मोड़ पे आज खड़े
क़त्ल हुआ इन्सां
मज़हब मज़ह्ब से लड़े

:5;
इक दो अंगारों से
क्या समझोगे ग़म
दरिया का ,किनारों से

-आनन्द.पाठक-
09413395592

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मंगलवार, 26 जनवरी 2016

एक ग़ज़ल : उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या....




उन्हें हाल अपना सुनाते भी क्या
भला सुन के वो मान जाते भी क्या

अँधेरे  उन्हें रास आने  लगे
चिराग़-ए-ख़ुदी वो जलाते भी क्या

अभी ख़ुद परस्ती में है मुब्तिला
उसे हक़ शनासी बताते भी क्या

नए दौर की  है नई रोशनी
पुरानी हैं रस्में ,निभाते भी क्या

जहाँ भी गया मैं  गुनह साथ थे
नदामत जदा,पास आते भी क्या

उन्हें ख़ुद सिताई से फ़ुरसत नहीं
वो सुनते भी क्या और सुनाते भी क्या

दम-ए-आख़िरी जब कि निकला था दम

पता था उन्हें, पर वो आते  भी क्या

जहाँ दिल से दिल की न गाँठें खुले
वहाँ हाथ ’आनन’ मिलाते भी क्या

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ;-
ख़ुदपरस्ती =अपने आप को ही सब कुछ समझने का भाव
मुब्तिला = ग्रस्त ,जकड़ा हुआ
हक़शनासी =सत्य व यथार्थ को पहचानना
नदामत जदा = लज्जित /शर्मिन्दा
खुदसिताई =अपने मुँह से अपनी ही प्रशंसा करना

सोमवार, 25 जनवरी 2016

डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के चन्द माहिये : क़िस्त 07

            31
मेरा सब कुछ छूट गया
आई ये रुत कैसी
दिल मेरा टूट गया
-----
            32
होटों को न खोलूँगा
तेरी ख़ुशी के लिए
जीवन भर रो लूँगा
-----
            33
हर ठेस पे रिसता हूँ
तुझ से बिछड़ कर मैं
इक जख़्म सरापा हूँ
-------
            34
पिघलेंगे ये पत्थर
इन पे अगर गुज़रे
जो गुज़री है मुझ पर
-------
            35
दिल मेरा तोड़ चला
मैं ने जिसे चाहा
वो मुझको छोड़ चला

--------------
डा0 आरिफ़ हसन ख़ान

शनिवार, 16 जनवरी 2016

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 048 : सुना है अर्बाब-ए-अक़्ल-ओ-दानिश...

अह्बाब-ए-ब्लाग
एक मुद्दत के बाद आप सब से जनाब सरवर साहब की एक ग़ज़ल के साथ मुख़ातिब हो रहा हूँ
ताख़ीर के लिए माज़रतख़्वाह हूँ
जनाब सरवर साहब की ग़ज़लों को यहाँ लगाने का सिलसिला शुरु किया था जो मेरी ही कोताही के वज़ह से टूट गया था ..आप की  ग़ज़ले रेख़्ता साईट पर भी दस्तयाब है मगर वो ग़ज़लें जो वहाँ नहीं हैं यहाँ चस्पा कर रहा हूँ जिस से आप सब भी उनकी फ़न-ए-शायरी से वाक़िफ़ हो सकें
..अब एक बार फिर से वही सिलसिला शुरु कर रहा हूं~  शायद आप सब को पसन्द आए


      ग़ज़ल ०४८

                  सुना है अर्बाब-ए-अक़्ल-ओ-दानिश हमें यूँ दाद-ए-कमाल देंगे
                  "जुनूँ के दामन से फूल चुन कर ख़िरद के दामन में डाल देंगे!"

                  ज़रा बतायें कि आप कब तक फ़रेब-ए-हुस्न-ओ-जमाल देंगे
                  सुकूं के बदले में तुहफ़ा-ए-ग़म, क़रार ले के मलाल देंगे ?

                  हम अपने दिल से ख़याल-ए-दैर-ओ-हरम को ऐसे निकाल देंगे
                  तमाम अज़्जा-ए-कुफ़्र-ओ-इमां बस एक सजदे में डाल देंगे !

                  जिन्हें तमीज़-ए-वफ़ा नहीं है, जिन्हें शऊर-ए-जुनूँ नहीं है
                  भला वो किस तरह राह-ए-ग़म में हिसाब-ए-हिज्र-ओ-विसाल देंगे?

                  ज़बां की रंगीं-नवाईयों से ,बयां की जल्वा-तराज़ियों से
                  निगार-ए-उर्दू को हर घड़ी हम खिराज-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल देंगे!

                  तुम्हें है क्यों अश्क-ए-ग़म पे हैरत ,यही तो होता है आशिक़ी में
                  सवाल अगर दिल-फ़िगार होगा,जवाब भी हस्ब-ए-हाल देंगे !

                  खुमार-ए-बादा,ख़िराम-ए-आहू,निगाह-ए-नर्गिस,नवा-ए-बुलबुल
                  किसी ने इन का पता जो पूछा तो हम तुम्हारी मिसाल देंगे !

                  वो एक लम्हा दम-ए-जुदाई जो ज़ीस्त का ऐतिबार ठहरा
                  उस एक लम्हे ने जो दिया है ,कहाँ ये सब माह-ओ-साल देंगे?

                  न इनकी  बातों में आना "सरवर"!ये अह्ल-ए-दुनिया हैं फ़ित्ना-परवर
                  हज़ार बातें बना बना कर तुम्हें ये दम भर में टाल देंगे !

                                            -सरवर-
            अर्बाब-ए-अक़्ल = समझदार लोग
            ख़िरद              = अक़्ल/बुद्धि
            अज्ज़ा             =टुकड़े
            ख़िराज             =महसूल/चुंगी
            दिल फ़िगार         =घायल दिल
            ख़िराम-ए-आहू       = हिरणी की चाल
            नवा-ए-बुलबुल       =बुलबुल की आवाज़
            फ़ित्ना परवर        =फ़सादी/झंझटी

                  

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

चन्द माहिया :क़िस्त 27

चन्द माहिया :क़िस्त 27

:1:
वो शान से चलते हैं
जैसा हो मौसम
ईमान बदलते हैं

:2:
एक आस अभी बाक़ी
तेरे आने की
इक साँस अभी  बाक़ी

:3:

इक रंग-ए-क़यामत है
इठला कर चलना
कुछ उनकी आदत है

:4:
गर्दिश में रहे जब हम
दूर खड़ी दुनिया
पर साथ खड़े थे ग़म

:5:
कब एक सा रहता है
सुख-दुख का मौसम
मौसम तो बदलता है

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शनिवार, 2 जनवरी 2016

एक ग़ज़ल : अगर आप....




अगर आप जीवन  में होते न दाखिल
कहाँ ज़िन्दगी थी ,किधर था मैं गाफ़िल

न वो आश्ना है  ,न हम आश्ना  है
मगर एक रिश्ता अज़ल से है हासिल

नुमाइश नहीं है ,अक़ीदत है दिल की
मुहब्बत है ने’मत .इबादत  में शामिल

हज़ारों तरीक़ों से वो  आजमाता
खुदा जाने कितने अभी है मराहिल

मसीहा न कोई ,न कोई मुदावा 
कहाँ ले के जाऊँ ये टूटा हुआ दिल

जो पूछा कि होतीं क्या उल्फ़त की रस्में
दिया रख गया वो हवा के मुक़ाबिल

इसी फ़िक़्र में उम्र गुज़री है "आनन’
ये दरिया,ये कश्ती ,ये तूफ़ां ,वो साहिल

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
मराहिल  =पड़ाव /ठहराव [ ब0ब0 - मरहला]
आशना    =परिचित /जान-पहचान
अज़ल  से  = अनादि काल से
अक़ीदत  = दृढ़ विश्वास
मुदावा     =इलाज