शनिवार, 18 जुलाई 2015

एक ग़ज़ल : रास्ता इक और आयेगा निकल...


रास्ता इक और आयेगा निकल
हौसले से दो क़दम आगे तो चल

लोग कहते हैं भले ,कहते रहें
तू इरादों मे न कर रद्द-ओ-बदल

यूँ हज़ारो लोग मिलते हैं यहाँ
’आदमी’ मिलता कहाँ है आजकल

इन्क़लाबी सोच है उसकी ,मगर
क्यूँ बदल जाता है वो वक़्त-ए-अमल

इक मुहब्बत की अजब तासीर से
लोग जो पत्थर से हैं ,जाएं पिघल

इक ग़म-ए-जानाँ ही क्यूँ हर्फ़-ए-सुखन
कुछ ग़म-ए-दौराँ भी कर ,हुस्न-ए-ग़ज़ल

खाक से ज़्यादा नहीं हस्ती तेरी
इस लिए ’आनन’ न तू ज़्यादा उछल

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शब्दार्थ
ग़म-ए-जानाँ  = अपना दर्द
ग़म-ए-दौराँ   = ज़माने का दर्द
जौक़-ए-सुखन = ग़ज़ल लिखने/कहने का शौक़
हुस्न-ए-ग़ज़ल = ग़ज़ल का सौन्दर्य
वक़्त-ए-अमल = अमल करने के समय

4 टिप्‍पणियां:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत सुन्दर शव्दों से सजी है आपकी गजल ,उम्दा पंक्तियाँ ..

kamlesh kumar diwan ने कहा…

hosle se do kadam aage ..achchi gajal hai

आनन्द पाठक ने कहा…

aao Saxena ji

Thanks a lot
Hausalaah afzaayee kA SHUKRIYA
saadar
anand pathak

GathaEditor Onlinegatha ने कहा…

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