शनिवार, 27 जून 2015

एक ग़ज़ल : तेरे बग़ैर भी....

तेरे बग़ैर भी कोई तो ज़िन्दगी होगी
चिराग़-ए-याद से राहों में रोशनी होगी

कहा था तुमने हमेशा जो साथ देने का
ये बात मैने ही तुमसे ग़लत सुनी होगी

निगाह-ए-शौक़ से मैं हर्फ़ हर्फ़ पढ़ लूँगा
लबों पे बात जो आ कर रुकी रुकी होगी

यहाँ से ’तूर’ बहुत दूर है मेरे ,जानाँ !
कलाम उनसे कि तुमसे ,वफ़ा वही होगी

सितम का दौर भी इतना न आजमा मुझ पर
अगर मैं टूट गया फिर क्या आशिक़ी होगी !

तमाम बन्द भले हो गए हों दरवाजे
मगर उमीद की खिड़की तो इक खुली होगी

कहाँ कहाँ न गया चाह में तेरे ’आनन’
मेरे जुनूँ की ख़बर क्या तुझे कभी होगी ?

-आनन्द.पाठक-
09413395592

5 टिप्‍पणियां:

Tushar Rastogi ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को शनिवार, ०४ जुलाई, २०१५ की बुलेटिन - "दिल की बात शब्दों के साथ" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह !

Kavita Rawat ने कहा…

तमाम बन्द भले हो गए हों दरवाजे
मगर उमीद की खिड़की तो इक खुली होगी
कहाँ कहाँ न गया चाह में तेरे ’आनन’
मेरे जुनूँ की ख़बर क्या तुझे कभी होगी ?

..बहुत सुन्दर ....

Kavita Rawat ने कहा…

तमाम बन्द भले हो गए हों दरवाजे
मगर उमीद की खिड़की तो इक खुली होगी
कहाँ कहाँ न गया चाह में तेरे ’आनन’
मेरे जुनूँ की ख़बर क्या तुझे कभी होगी ?

..बहुत सुन्दर ....

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 तुषार जी/जोशी जी/कविता जी
आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद
सादर
-आनन्द.पाठक-
09413395592