बुधवार, 6 अगस्त 2014

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल :हिकायत-ए-ख़लिश-ए-जान-ए-बेकरार...

ग़ज़ल ०४७

हिकायत-ए-ख़लिश-ए-जान-ए-बेक़रार न पूछ !
शुमार-ए-शाम-ओ-सहर ऐ निगाह-ए-यार! न पूछ !

हमारे दिल की ख़बर हम से बार बार न पूछ !
जो सच कहेंगे तो गुज़रेगा ना-गवार ! न पूछ !

जो आ रही है शब-ए-ग़म वो कैसे गुज़रेगी ?
गुज़र चुकी जो मिरी शाम-ए-इन्तिज़ार, न पूछ!

शराब-ओ-शे’र-ओ-ग़ज़ल,नग़्मा-ओ-रबाब-ओ-चंग
रम-ए-नफ़स का ये सामान-ए-ऐतिबार! न पूछ !

मैं अपने सामने हूँ और नज़र नहीं आता !
गु़बार-ए-ख़ातिर-ए-हस्ती-ए-नाबकार न पूछ !

कहाँ कहाँ न मिला हम को दाग़-ए-रुस्वाई ?
दराज़-दस्ती-ए-दामान-ए-तार-तार न पूछ !

शिकस्तगी ही ता’रुफ़ को मेरे काफी है
मेरे नुमूद-ओ-हक़ीक़त ,मिरा दयार न पूछ !

विसाल हिज़्र-ए-मुसलस्सल का इस्तिआरा है
मआल-ए-वस्ल! ज़हे-रंग-ए-ख़ू-ए-यार न पूछ !

हम अह्ल-ए-दिल हैं समझते हैं राज़-ए-हस्त-ओ-बूद
खिज़ां के भेष में रंगीनी-ए-बहार ? न पूछ !

मक़ाम-ए-शौक़ में किन मंज़िलों से गुज़रा है !
ये तेरा अपना ही "सरवर"!ये जाँनिसार ! न पूछ

-सरवर
हिकायत =हाल-चाल
रबाब-ओ-चंग =साज/वाद्य यंत्र यानी ख़ुशियां
रम-ए-नफ़स =सांसों की भाग-दौड़ यानी ज़िन्दगी
नाबकार =व्यर्थता
नुमूद =धूम-धाम/शान-ओ-शौक़त/तड़क-भड़क
इस्तिआरा =मूर्त रूप/बा शक्ल
हस्त-ओ-बूद = जीवन का अस्तित्व




प्रस्तुताकर्ता
-आनन्द पाठक-
09413395592

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