शुक्रवार, 13 जून 2014

माहिया : डा0 आरिफ़ हसन ख़ान [किस्त -05]



         21
ये दर्द सहूँ कब तक
काश ,मिरे दिल पर
अब मौत ही दे दस्तक
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22
तुझे दूर से चाहूँगा
जब तक ज़िन्दा हूँ
ये फ़र्ज़ निबाहूँगा
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23
तेरी राह सजाऊँगा
अपनी पलकों से
हर ख़ार उठाऊँगा
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24
अब कोई नहीं अपना
तू भी छोड़ चला
एक तेरा सहारा था
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25
ये दर्द सहूँगा मैं
तेरी ख़ुशी के लिए
अब अश्क पीऊँगा मैं
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प्रस्तुत कर्ता
-आनन्द.पाठक
09413395592

1 टिप्पणी:

Aradhana Rai ने कहा…

खुबसूरत----- ग़ज़ल कहूँ या नज़म
इक आबशारी तेरी बज़्म