गुरुवार, 22 मई 2014

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : लरज़ रहा है दिल....



लरज़ रहा है दिल-ए-सौगवार आँखों में
खटक रही है शब-ए-इन्तिज़ार आँखों में !

ज़रा न फ़र्क़ ख़ुदी और बेख़ुदी में रहा
न जाने क्या था तिरी मयगुसार आँखों में

यह दर्द-ए-दिल नहीं,है बाज़गस्त-ए-महरुमी
ये अश्क-ए-ग़म नहीं, है ज़िक्र-ए-यार आँखों में

सुरूर-ए-ज़ीस्त से खाली नहीं ख़िज़ां हर्गिज़
मगर है शर्त  रची हो बहार आँखों में

ज़रा ज़रा से मिरे राज़ खोल देता है
छुपा है कौन मिरा राज़दार  आँखों में ?

मक़ाम-ए-शौक़ की सरमस्तियां, अरे तौबा !
सुरूर-ए-आशिक़ी दिल में ख़ुमार आँखों में

क़दम क़दम पे तिरी याद गुल खिलाती है
यह किसने भर दिया रंग-ए-बहार आँखों में?

नबर्द-आज़मा दुनिया से क्या हुआ "सरवर"
कुछ और बढ़ गया अपना वकार आँखों में !

-सरवर

लरज़ रहा है =काँप रहा  है
बाज़गस्त        =प्रतिध्वनि/गूँज
सरमस्तियां -उन्माद
नवर्द-आज़्मा =लड़ाकू
वकार -इज्ज़त

3 टिप्‍पणियां:

Tushar Raj Rastogi ने कहा…

आपकी इस रचना को आज दिनांक २२ मई, २०१४ को ब्लॉग बुलेटिन - पतझड़ पर स्थान दिया गया है | बधाई |

Kaushal Lal ने कहा…

बहुत सुन्दर....

बेनामी ने कहा…

I could not resist commenting. Perfectly written!

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