गुरुवार, 22 मई 2014

क़ाफ़िया -एक चर्चा-2



पिछले दिनों, मेरे कुछ मित्रों ने इस मंच पर अपनी कुछ ग़ज़लें पेश की थीं । कुछ ग़ज़लें वस्तुत: क़ाबिल-ए-दाद थीं। कुछ अश’आर  कामयाब और पुरअसरात भी थे । काफी लोगों ने सराहा।वाह वाह भी किया। कुछ में शे’रियत तग़ज़्ज़ुल और ख़यालात इतने उम्दा थे कि सरसरी निगाह  से ग़ज़ल में कुछ कमी मालूम नहीं हुई। हरचन्द मैने एक कमी की जानिब हल्का सा इशारा भी किया था मगर बात सही जगह नहीं पहुँची। और वो कमी थी क़ाफ़िया बन्दी की।

चाँद चाहे जितना खूबसूरत हसीन हो और उसमें दाग़ है तो उस दाग़ की गाहे-बगाहे चर्चा तो होती ही है

यह चर्चा उन पाठको के लिए है जो ग़ज़ल कहने का ज़ौक़-ओ-शौक़ फ़र्माते है और सही ग़ज़ल ,बहर .वज़न क़ाफ़िया रदीफ़ के प्रति मुहब्बत रखते हैं । आप सभी इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखते होंगे कि ग़ज़ल ’लिखना’ तो  आसान है पर ’कहना’ मुश्किल है तुकबन्दी ग़ज़ल तो नहीं होती।

ग़ज़ल -1
तबस्सुम के बिना चेहरा किसी का खिल नहीं सकता
किसी के हुस्न का जादू  किसी  पर  चल नहीं सकता

मोहब्बत   की   निगाहों   से   सभी   को   देखनेवाला
 का फूल  दुनिया में  कहीं भी  खिल नहीं सकता
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हमेशा   नेकियों   की   रोशनी   है   जिसकी  राहों  में
बदी की  राह पर ' घायल'  कभी वो  चल नहीं सकता 

[क़ाफ़िया ..खिल....ढल...जल...खिल...बाँधा गया है]

ग़ज़ल 2
मुझे मालूम है तुम बिन कभी दिल खिल नहीं सकता
सहन कर अब जुदाई का कभी इक पल नहीं सकता

तुम्हारा साथ तो माफ़िक बहुत इस दिल को आता है
मगर इस राह पर मैं और आगे चल नहीं सकता

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वफ़ा बदनाम हो मुझको ’ख़लिश’ बर्दाश्त ना होगा
दिया इक बार जो वापस कभी ले दिल नहीं सकता

[क़ाफ़िया ...खिल...पल...साहिल...दिल..खुल...चल..बांधा गया है]

ग़ज़ल 3

दरमियां फ़ासला नहीं होता
काश ! तुम से मिला नहीं होता

चन्द रोज़ और याद आओगे
उम्र भर रतजगा नहीं होता

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ख़्वाब  सच्चाइयों मैं ढलने दो
नींद में फ़ैसला नहीं होता
[क़ाफ़िया ---पता...रास्ता..आप सा...ख़ुदा..बाँधा गया है]

इन तीनों ग़ज़लों में जो एक बात common है वो है क़ाफ़िया का ठीक से न लगना] हम क्रमश: इन पर विचार करते हैं

ग़ज़ल -1 और ग़ज़ल -3

मतला में के मिसरा उला में क़ाफ़िया ’खिल’ और मिसरा सानी में ’चल’ बाँधा है .जो हमक़ाफ़िया नहीं है। शायद इस ग़ज़ल में क़ाफ़िया ’ल’[लाम] समझ लिया गया है जब कि क़ाफ़िया ’इल’ का है [ हर्फ़-ए-रवी लाम है और माकिब्ला हरकत ज़ेर की है-लाम साकिन है]
खिल के साथ मिल ...दिल...साहिल...ही आयेगा ।यदि मिसरा उला में ’चल’ बाँधा है तो मिसरा सानी में जल...फल...पल...हलचल बाँधना चाहिए था । अत: क़ाफ़िया उलझ गया।

मान लेते हैं कि मतला में क़ाफ़िया ;दिल’ और खिल’ बाँधा होता तो लाज़िम होगा कि आईन्दा अश’आर में क़ाफ़िया ’साहिल”’.....महफ़िल...मिल...ही [यानी हर्फ़-ए-रवी ’लाम’ माकिब्ला हरकत ज़ेर की] आयेगा

मान लेते हैं अगर मतला में काफ़िया ’चल....पल...बाँधा है तो लाजिमी होगा कि आइन्दा अश’आर में क़ाफ़िया ....टल..फल कल... [हर्फ़-ए-रवी ’लाम’ माकिब्ला हरकत ’जबर’ ] ही बाँधा जायेगा
क़ाफ़िया मतला से ही तय होता है

ग़ज़ल -3
इस ग़ज़ल में वहीं ग़लती है जो उपर लिखा है ।मतला के मिसरा उला में ’फ़ासला और मिसरा सानी में ’मिला’ बाँधा है।
चलिये ’फ़ासला’ को ’फ़ासिला’ पढ़ लेते हैं[उर्दू में फ़ासला को फ़ासिला: भी बोलते हैं और यही सही तलफ़्फ़ुज़ भी है जिसे शायर नें फ़ासला लिखा है -फ़ासिला लिखता तो ज़्यादा सही होता ।कम अज़ कम मिला से हमक़ाफ़िया तो हो जाता ] तो ’मिला’ क़ाफ़िया दुरुस्त है

मगर बाद के क़वाइफ़ [काफ़िया का ब0ब0] ग़लत है ।कारण वही जो ऊपर लिखा है। फ़ासिला ...मिला का हम क़ाफ़िया काफ़िला सिलसिला...वग़ैरह हो सकते है ...रतजगा..रास्ता..ख़ुदा...नहीं हो सकता ..क्योंकि ये हमक़ाफ़िया नहीं है

शायद मेरे दोस्त  ने ’आ’ का क़ाफ़िया समझ लिया\

यहाँ क़ाफ़िया ’आ’ का नहीं हैं । अलिफ़ तो सिर्फ़ हर्फ़-ए-रवी का ’वस्ल ’ है हर्फ़--ए-रवी ’ल’[लाम है]

हाँ अगर वो मतला में मिसरा उला में ’-ला’ और मिसरा सानी में ’-जा’....-गा’...-ता...’ बाँधते तो फिर बाक़ी क़वाइफ़ दुरुस्त है

हो सकता है कि मेरा ख़याल ग़लत भी हो अत:सभी  दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि मेरी ग़लत बयानी की निशान्दिही करें ताकि मैं आइन्दा अपने को सही कर सकूं।

सादर
-आनन्द.पाठक
09413395592

1 टिप्पणी:

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

आपने फिर से सही लिखा है, कवाफ़ी के इस ऐब को अरूज़ में ऐब-ए-इक्वा नाम दिया गया है, जिसे अक्सर सिनाद का ऐब भी कह दिया जाता है, पर सिंनाद का ऐब तभी होता है जब हर्फ़े रवी के पूर्व दीर्घ स्वर का विरोध पैदा हो जैसे 'खाता और पीता'में पैदा हो रहा है|