गुरुवार, 15 मई 2014

माहिया : डा0 आरिफ़ हसन खान [क़िस्त 04]

16
इन हिज्र की रातों में
आग बरसती है
अकसर बरसातों में
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17
मैं रोना भूल गया
ख़ुश्क हुईं आँखें
जिस दिन से तू बिछड़ा
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18
हर साँस में तू ही तू
गुल में बसी जैसे
भीनी भीनी ख़ुशबू
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19
तस्वीर बनाता हूँ
दिल को लहू कर के
मैं तुझ को सजाता हूँ
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20
आकाश को छू लेता
साथ जो तू देती
क़िस्मत भी बदल देता



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