गुरुवार, 22 मई 2014

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : लरज़ रहा है दिल....



लरज़ रहा है दिल-ए-सौगवार आँखों में
खटक रही है शब-ए-इन्तिज़ार आँखों में !

ज़रा न फ़र्क़ ख़ुदी और बेख़ुदी में रहा
न जाने क्या था तिरी मयगुसार आँखों में

यह दर्द-ए-दिल नहीं,है बाज़गस्त-ए-महरुमी
ये अश्क-ए-ग़म नहीं, है ज़िक्र-ए-यार आँखों में

सुरूर-ए-ज़ीस्त से खाली नहीं ख़िज़ां हर्गिज़
मगर है शर्त  रची हो बहार आँखों में

ज़रा ज़रा से मिरे राज़ खोल देता है
छुपा है कौन मिरा राज़दार  आँखों में ?

मक़ाम-ए-शौक़ की सरमस्तियां, अरे तौबा !
सुरूर-ए-आशिक़ी दिल में ख़ुमार आँखों में

क़दम क़दम पे तिरी याद गुल खिलाती है
यह किसने भर दिया रंग-ए-बहार आँखों में?

नबर्द-आज़मा दुनिया से क्या हुआ "सरवर"
कुछ और बढ़ गया अपना वकार आँखों में !

-सरवर

लरज़ रहा है =काँप रहा  है
बाज़गस्त        =प्रतिध्वनि/गूँज
सरमस्तियां -उन्माद
नवर्द-आज़्मा =लड़ाकू
वकार -इज्ज़त

क़ाफ़िया -एक चर्चा-2



पिछले दिनों, मेरे कुछ मित्रों ने इस मंच पर अपनी कुछ ग़ज़लें पेश की थीं । कुछ ग़ज़लें वस्तुत: क़ाबिल-ए-दाद थीं। कुछ अश’आर  कामयाब और पुरअसरात भी थे । काफी लोगों ने सराहा।वाह वाह भी किया। कुछ में शे’रियत तग़ज़्ज़ुल और ख़यालात इतने उम्दा थे कि सरसरी निगाह  से ग़ज़ल में कुछ कमी मालूम नहीं हुई। हरचन्द मैने एक कमी की जानिब हल्का सा इशारा भी किया था मगर बात सही जगह नहीं पहुँची। और वो कमी थी क़ाफ़िया बन्दी की।

चाँद चाहे जितना खूबसूरत हसीन हो और उसमें दाग़ है तो उस दाग़ की गाहे-बगाहे चर्चा तो होती ही है

यह चर्चा उन पाठको के लिए है जो ग़ज़ल कहने का ज़ौक़-ओ-शौक़ फ़र्माते है और सही ग़ज़ल ,बहर .वज़न क़ाफ़िया रदीफ़ के प्रति मुहब्बत रखते हैं । आप सभी इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखते होंगे कि ग़ज़ल ’लिखना’ तो  आसान है पर ’कहना’ मुश्किल है तुकबन्दी ग़ज़ल तो नहीं होती।

ग़ज़ल -1
तबस्सुम के बिना चेहरा किसी का खिल नहीं सकता
किसी के हुस्न का जादू  किसी  पर  चल नहीं सकता

मोहब्बत   की   निगाहों   से   सभी   को   देखनेवाला
 का फूल  दुनिया में  कहीं भी  खिल नहीं सकता
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हमेशा   नेकियों   की   रोशनी   है   जिसकी  राहों  में
बदी की  राह पर ' घायल'  कभी वो  चल नहीं सकता 

[क़ाफ़िया ..खिल....ढल...जल...खिल...बाँधा गया है]

ग़ज़ल 2
मुझे मालूम है तुम बिन कभी दिल खिल नहीं सकता
सहन कर अब जुदाई का कभी इक पल नहीं सकता

तुम्हारा साथ तो माफ़िक बहुत इस दिल को आता है
मगर इस राह पर मैं और आगे चल नहीं सकता

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वफ़ा बदनाम हो मुझको ’ख़लिश’ बर्दाश्त ना होगा
दिया इक बार जो वापस कभी ले दिल नहीं सकता

[क़ाफ़िया ...खिल...पल...साहिल...दिल..खुल...चल..बांधा गया है]

ग़ज़ल 3

दरमियां फ़ासला नहीं होता
काश ! तुम से मिला नहीं होता

चन्द रोज़ और याद आओगे
उम्र भर रतजगा नहीं होता

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ख़्वाब  सच्चाइयों मैं ढलने दो
नींद में फ़ैसला नहीं होता
[क़ाफ़िया ---पता...रास्ता..आप सा...ख़ुदा..बाँधा गया है]

इन तीनों ग़ज़लों में जो एक बात common है वो है क़ाफ़िया का ठीक से न लगना] हम क्रमश: इन पर विचार करते हैं

ग़ज़ल -1 और ग़ज़ल -3

मतला में के मिसरा उला में क़ाफ़िया ’खिल’ और मिसरा सानी में ’चल’ बाँधा है .जो हमक़ाफ़िया नहीं है। शायद इस ग़ज़ल में क़ाफ़िया ’ल’[लाम] समझ लिया गया है जब कि क़ाफ़िया ’इल’ का है [ हर्फ़-ए-रवी लाम है और माकिब्ला हरकत ज़ेर की है-लाम साकिन है]
खिल के साथ मिल ...दिल...साहिल...ही आयेगा ।यदि मिसरा उला में ’चल’ बाँधा है तो मिसरा सानी में जल...फल...पल...हलचल बाँधना चाहिए था । अत: क़ाफ़िया उलझ गया।

मान लेते हैं कि मतला में क़ाफ़िया ;दिल’ और खिल’ बाँधा होता तो लाज़िम होगा कि आईन्दा अश’आर में क़ाफ़िया ’साहिल”’.....महफ़िल...मिल...ही [यानी हर्फ़-ए-रवी ’लाम’ माकिब्ला हरकत ज़ेर की] आयेगा

मान लेते हैं अगर मतला में काफ़िया ’चल....पल...बाँधा है तो लाजिमी होगा कि आइन्दा अश’आर में क़ाफ़िया ....टल..फल कल... [हर्फ़-ए-रवी ’लाम’ माकिब्ला हरकत ’जबर’ ] ही बाँधा जायेगा
क़ाफ़िया मतला से ही तय होता है

ग़ज़ल -3
इस ग़ज़ल में वहीं ग़लती है जो उपर लिखा है ।मतला के मिसरा उला में ’फ़ासला और मिसरा सानी में ’मिला’ बाँधा है।
चलिये ’फ़ासला’ को ’फ़ासिला’ पढ़ लेते हैं[उर्दू में फ़ासला को फ़ासिला: भी बोलते हैं और यही सही तलफ़्फ़ुज़ भी है जिसे शायर नें फ़ासला लिखा है -फ़ासिला लिखता तो ज़्यादा सही होता ।कम अज़ कम मिला से हमक़ाफ़िया तो हो जाता ] तो ’मिला’ क़ाफ़िया दुरुस्त है

मगर बाद के क़वाइफ़ [काफ़िया का ब0ब0] ग़लत है ।कारण वही जो ऊपर लिखा है। फ़ासिला ...मिला का हम क़ाफ़िया काफ़िला सिलसिला...वग़ैरह हो सकते है ...रतजगा..रास्ता..ख़ुदा...नहीं हो सकता ..क्योंकि ये हमक़ाफ़िया नहीं है

शायद मेरे दोस्त  ने ’आ’ का क़ाफ़िया समझ लिया\

यहाँ क़ाफ़िया ’आ’ का नहीं हैं । अलिफ़ तो सिर्फ़ हर्फ़-ए-रवी का ’वस्ल ’ है हर्फ़--ए-रवी ’ल’[लाम है]

हाँ अगर वो मतला में मिसरा उला में ’-ला’ और मिसरा सानी में ’-जा’....-गा’...-ता...’ बाँधते तो फिर बाक़ी क़वाइफ़ दुरुस्त है

हो सकता है कि मेरा ख़याल ग़लत भी हो अत:सभी  दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि मेरी ग़लत बयानी की निशान्दिही करें ताकि मैं आइन्दा अपने को सही कर सकूं।

सादर
-आनन्द.पाठक
09413395592

गुरुवार, 15 मई 2014

माहिया : डा0 आरिफ़ हसन खान [क़िस्त 04]

16
इन हिज्र की रातों में
आग बरसती है
अकसर बरसातों में
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17
मैं रोना भूल गया
ख़ुश्क हुईं आँखें
जिस दिन से तू बिछड़ा
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18
हर साँस में तू ही तू
गुल में बसी जैसे
भीनी भीनी ख़ुशबू
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19
तस्वीर बनाता हूँ
दिल को लहू कर के
मैं तुझ को सजाता हूँ
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20
आकाश को छू लेता
साथ जो तू देती
क़िस्मत भी बदल देता



बुधवार, 7 मई 2014

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल :ख़ुशा-वक़्तए कि वादे कर के

ग़ज़ल

ख़ुशा-वक़्तए कि वादे कर के तुम हम से मुकरते थे
"यही रातें थीं और बातें थीं वो दिन क्या गुजरते थे"!

रहीन-ए-सद-निगाह-ए-शौक़ थी सब जल्वा-आराई
नज़र पड़ती थी जितनी उन पे वो उतना निखरते थे

क़यामत-ख़ेज़ वो मंज़र भी इन आँखों ने देखा है
क़यामत हाथ मलती थी जिधर से वो गुज़रते थे

यही है जिसकी चाहत में रहे गुमकर्दा-ए-मंज़िल?
यही दुनिया है सब जिसके लिए बेमौत मरते थे?

हिसार-ए-ज़ात से बाहर अजब इक और आलम था
तिरे जल्वे सिमटते थे ,तिरे जल्वे  बिखरते थे

अना की किर्चियां बिखरी पड़ी थी राह-ए-आख़िर में
ये आईने तो हमने ज़िन्दगी भर ख़ूब बरते थे

हमारी बेबसी यह है कि अब हैं खु़द से बेगाना
कभी वो दिन थे अपने आप पर हम फ़क्र करते थे

किसी के ख़ौफ़-ओ-ग़म का ज़िक्र क्या है जान-ए-फ़ुर्क़त में
वो आलम था कि हम ख़ुद अपने ही साये से डरते थे

हुई मुद्दत कि हम हैं और शाम-ए-दर्द-ए-तन्हाई
कहाँ हैं सब वो चारागर हमारा दम जो भरते थे

ख़ुदा रख़्खे सलामत तेरा जज़्ब-ए-आशिक़ी "सरवर"
सुना है वो भरी महफ़िल में तुझको याद करते थे

-सरवर

खुशा-वक़्तए =अरे वाह ! क्या ख़ूब !
रहीन-ए-सद-निगाहे शौक़ =प्यार भरी सौ नज़रों की वज़ह से
            हिसार-ए-ज़ात से = अपने आप के घेरे से
अना          =अहम
किर्चियां         =टुकड़े
हैज़ान-ए-फ़ुर्क़त = जुदाई की बेचैनी




प्रस्तोता
आनन्द.पाठक
09413395592

मंगलवार, 6 मई 2014

माहिया : डा0 आरिफ़ हसन ख़ान [क़िस्त-03]

तू माँग के देख ज़रा
तेरी ख़ुशी के लिए
मैं जान भी दे दूँगा
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12
ये तो नहीं सोचा था
खो देंगे तुझ को
जब तुझ को चाहा था
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13
फेरी जो नज़र तू ने
आँख झपकते ही
सब मंज़र थे सूने
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14
आँधी हूँ ,बगूला हूँ
तुझ से बिछड़ कर मैं
ख़ुद आप को भूला हूँ
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15
शायद कोई पत्थर हूँ
ज़िन्दा जो अब तक
मैं तुझ से बिछड़ कर हूँ

क़ाफ़िया : एक चर्चा 1

अहबाब-ए-ब्लाग
आदाब
हाल ही में ,अपने ब्लाग ’गीत ग़ज़ल गीतिका’ पर दर्ज़-ए-ज़ैल एक रवायती ग़ज़ल पेश किया था


ऐसे समा गये हो ,जानम मेरी नज़र में
तुम को ही ढूँढता हूँ हर एक रहगुज़र में

इस दिल के आईने में वो अक्स जब से उभरा
फिर उसके बाद कोई आया नहीं नज़र में

पर्दा तो तेरे रुख पर देखा सभी ने लेकिन
देखा तुझे नुमायां ख़ुरशीद में ,क़मर में

जल्वा तेरा नुमायां हर शै में मैने देखा
शम्स-ओ-क़मर में गुल में मर्जान में गुहर में

वादे पे तेरे ज़ालिम हम ऐतबार कर के
भटका किए हैं तनहा कब से तेरे नगर में

आये गये हज़ारों इस रास्ते पे ’आनन’
तुम ही नहीं हो तन्हा इस इश्क़ के सफ़र में

शब्दार्थ
शम्स-ओ-क़मर में =चाँद सूरज में
मर्जान में ,गुहर में= मूँगे में-मोती में

----मेरे एक दोस्त ने सवाल उठाया कि चूँकि मतले में क़ाफ़िया मैने ’नज़र’ और ’रहगुज़र ’ बाँधा है तो आइन्दा ’अश’आर के क़वाइफ़ भी ’ज़र’ पर ही ख़त्म होने चाहिए।अत:ग़ज़ल में क़ाफ़िया ’क़मर’... गुहर..सफ़र ...ना रवा और नादुरुस्त है
मैनें अपनी जानिब से वज़ाहत पेश कर दी है जो मैं अपने ब्लाग के पाठकों की जानकारी व सुविधा के लिए यहाँ भी लगा रहा हूँ
अगर इस वज़ाहत में अगर मुझ से कोई ग़लती हो गई हो तो दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि आप मुझे ज़रूर मुतवज्जेह करायें जिस से मैं खुद को सही कर सकूँ

मैनें [जितना मुझे आता है या जितना मैं इधर-उधर से पढ़ा और समझ सका हूँ ] अपनी तरफ़ से वज़ाहत कर दी है मैं चाहूँगा कि इस मंच के अन्य आलिम मेम्बरान इस वज़ाहत पर मज़ीद रोशनी डाले तो दीगर मेम्बरान जो ग़ज़ल कहने और लिखने का ज़ौक़-ओ-शौक़ ्फ़र्माते हैं ,मुस्तफ़ीद हो सकें

आ0 ......
आदाब
पहले तो आप का शुक्रिया अदा कर दूँ कि इस ग़ज़ल को आप ने बड़ी शिद्दत और मुहब्बत से पढ़ा और अपनी राय ज़ाहिर की मतला में ’नज़र ’ के साथ ’रहगुज़र’ बाँधा है तो आने वाले अश’आर में ’ज़र’ क़ाफ़िया ही आना चाहिए
आप की निशानदिही कुछ हद तक सही है कि मतला में क़ाफ़िया अगर ’नज़र’ और रह गुज़र’ बाँधा है तो इल्तिज़ाम[लाज़िम] हो जाता है कि आईन्दा अश’आर में भी यही क़ाफ़िया ’ज़र’ मुस्तमिल हो।

ये सारा मुबहम [भ्रम] ’हिन्दी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल" की है । मुस्तक़्बिल में एक मज़्मून इसी मौज़ू पर तफ़सील से राकिम करेंगे ।इन्शा अल्लाह।

फ़िलहाल ,अगर यह गज़ल उर्दू स्क्रिप्ट में लिखी गई होती तो उर्दू के निकात-ए-सुखन के मुताबिक़ इस ग़ज़ल में क़ाफ़िया ’ज़र’ नहीं ’र’ माकिब्ला जबर की हरकत  [’रे’ यहाँ हर्फ़-ए-रवी] है जो साकिन है और जो आईन्दा अश’आर में लाया भी गया है

मतला के मिसरा ऊला में नज़र को अगर उर्दू स्क्रिप्ट में लिखें तो [नून जोये रे ] से लिखेंगे यानी नज़र का ’ज़’ ज़ोये से है जब कि मिसरा सानी में रहगुज़र का ’ज़’ ’ज़े’ से है और दोनों ही मुख़्तलिफ़ हर्फ़ हैं और मुख़तलिफ़ आवाज़ भी है [ये बात दीगर है कि दोनो की सौत [आवाज़ों] में फ़र्क़ अमूमन महसूस नहीं होता और हिन्दी में सारे ’ज़’ एक जैसा ही सुनाई पड़ता है

इसी मुख़्तलिफ़ हर्फ़ की बिना पर ग़ालिब की 2-ग़ज़ल से बात वाज़ेह कर रहा हूँ

आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी जुल्फ़ के सर होने तक

 जिसमें उन्होने मतला में काफ़िया "र’[हर्फ़ रे- हर्फ़-ए-रवी है और साकिन भी है] बाँधा है ’सर’ नहीं बाँधा ,सबब ये कि असर का ’स’ [अरबी वाला हर्फ़ ’से’ वाला है] जब कि ’सर’ का ’स’[हर्फ़ सीन वाला ’स’ है] और दोनो ही मुखतलिफ़ हर्फ़ हैं। इस लिए बाद में सर का क़ाफ़िया न लगा कर ’र’ का क़ाफ़िया लगाया है उन्होने।
फिर बाद में गुहर,जिगर,नज़र सहर बाँधा है जो ऐन क़वायद-ए-क़ाफ़िया के मुताबिक़ है
अगर आप बोर न हो रहे हों और अगर इजाज़त हो तो एक मिसाल और दे दूँ कि बात मज़ीद वाज़ेह हो जाय
’ग़ालिब’ का ही एक और मतला है

वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ
वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ

 फिर आइन्दा अश’आर में उन्होने ज़माल ख़त-ओ-ख़ाल ख़याल...वगैरह वग़ैरह बाँधा है -’साल’ नहीं तज़्वीज़ किया
कारण वही ’विसाल’ का ’स’[हर्फ़ सुवाद वाला है] जब कि ’साल’ का ’स’-हर्फ़ सीन वाला है। कहने का मतलब ये कि जब दोनों ही हर्फ़ मुखतलिफ़ है तो फिर ’र’ का क़ाफ़िया लाना जायज़ और दुरुस्त है

 अब अपनी ग़ज़ल के क़ाफ़िया पे आते है

मतला में नज़र और रहगुज़र बांधा हैं और दोनो का मक्तूबी ’ज़’ अलग अलग है नज़र का ’ज़’[ हर्फ़ ज़ोय वाला है जब कि गुज़र का ’ज़’ -हर्फ़ ’ ज़े’ वाला है और दोनो मुख़तलिफ़ है आइन्दा अश’आर मे ’र’ का ही क़ाफ़िया चलेगा ’ज़र’ का नहीं
और ’र’ यहाँ [ हर्फ़-ए-रवी है साकिन और मुक़य्यद भी है]

हाँ ,अगर मतला में ’नज़र’ के साथ मंज़र या ;मुन्तज़र’ लाता तो फिर लाज़िम होता कि ’आइन्दा अश’आर मे ’ज़र’ का ही क़ाफ़िया बाँधा जाये

ये तो रही बात निकात-ए-सुखन उर्दू ग़ज़ल की

हिन्दी ग़ज़ल में साकिन हर्फ़ का ्कोई concept नहीं है ज़्यादातर क़ाफ़िया ’सौती क़ाफ़िया’ [ सुनने के आधार पर ही बाँधते हैं या जैसा कि हिन्दी में बोला जाता है] ही बांधा जाता है
यही कारण है कि दुष्यन्त कुमार जी ’शहर’ का वज़न हिन्दी में [श हर 1-2]  में बाँधा है जब कि उर्दू वाले इसे [2-1 शह र] में बाँधते हैं

उम्मीद करता हू कि बात शायद वाज़ेह हो गई होगी । ये मेरा ज़ाती ख़याल है आप का इस से मुत्तफ़िक़ [सहमत] होना ज़रूरी नहीं

आप तो जानते है कि इल्म-ए-क़ाफ़िया खुद में एक तवील दर्स है और इधर उधर से थोड़ा बहुत मुताअला: कर सका हूँ समझ सका हूँ ,लिख दिया । हो सकता है कि मैं ग़लत भी होऊं

-आनन्द.पाठक
09413395592