शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

माहिया : डा0 आरिफ़ हसन ख़ान [क़िस्त-2]

-----........----क़िस्त 2

6
आँखों से लहू बरसा
तुझ से जुदा हो कर
मैं जीने को तरसा
-----
7
जीने का मज़ा अब क्या
तू ने नज़र फेरी
वीरान हुई दुनिया
-------
8
कोई भी नहीं अपना
मेरी आँखों में
अब कोई नहीं सपना
------
9
ये भी कोई जीना है
घुट घुट कर हर दम
बस आँसू पीना है
-----
10
सब आँसू पी लूँगा
तुझ को न ठेस लगे
मर मर के मैं जी लूँगा
------


प्रस्तोता

आनन्द.पाठक
09413395592

कोई टिप्पणी नहीं: