रविवार, 20 अप्रैल 2014

जनाब ’सरवर’ की एक ग़ज़ल : अजीब कैफ़-ओ-सुकूँ.....



अजीब कैफ़-ओ-सुकूँ तेरी जुस्तजू में था
गुमां-नवर्द मैं सेहरा-ए-आरज़ू में था

न शायरी में,न ही जाम-ए-मुश्कबू में था
वो लुत्फ़ जो तिरे अन्दाज़-ए-गुफ़्तगू में था

इक उम्र मैं रहा सदफ़िक्र-ए-ला-इलाह में गुम
मगर अयाँ तू मिरी एक ज़र्ब-ए-हू में था

रहा हमेशा मुहब्बत की आबरू बन कर
वो इज़्तिराब जो मेरी रग-ए-गुलू में था

तिरे ख़याल ने कब फ़ुर्सत-ए-नज़ारा दी
हज़ार कहने को दुनिया-ए-रंग-ओ-बू में था

जहां में किसको मिला शौक़-ओ-जज़्बा-ए-मंसूर
ये  एहितिराम-ए-मुहब्बत किसू किसू में था

खु़द अपने आप से बेगाना कर गया मुझको
सुरूर-ओ-कैफ़-ए-ख़ुदी जो तिरे सुबू में था

नमाज़-ए-इश्क़ में "सरवर" कहाँ पे जा पहुँचा
वो काबा-रू था जहाँ मंज़िल-ए-वुज़ू में था !

-सरवर-
शब्दार्थ

क़ैफ़-ओ-सुकूँ =नशा और शान्ति
गुमां-नवर्द =गुमान की कश्मकश
            सहरा-ए-आरज़ू =आशा का रेगिस्तान
सद =सैकड़ों
अयाँ =जाहिर
ज़र्ब-ए-हू =दिल से निकली आवाज़
रग-ए-गुलू = गले की नस
जज़्ब-ए-मंसूर       = मंसूर की जज़्बात की तरह
                                (मंसूर एक वली जिन्होंने ’अनलहक़’ कहा था और इस अपराध में
                                 उनकी गर्दन उड़ा दी गई थी)
काबा-रू में =परम पवित्र स्थिति में
मंज़िल-ए-वुज़ू में =इबादत का पहला क़दम

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

माहिया : डा0 आरिफ़ हसन ख़ान [क़िस्त-2]

-----........----क़िस्त 2

6
आँखों से लहू बरसा
तुझ से जुदा हो कर
मैं जीने को तरसा
-----
7
जीने का मज़ा अब क्या
तू ने नज़र फेरी
वीरान हुई दुनिया
-------
8
कोई भी नहीं अपना
मेरी आँखों में
अब कोई नहीं सपना
------
9
ये भी कोई जीना है
घुट घुट कर हर दम
बस आँसू पीना है
-----
10
सब आँसू पी लूँगा
तुझ को न ठेस लगे
मर मर के मैं जी लूँगा
------


प्रस्तोता

आनन्द.पाठक
09413395592

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

माहिया - डा0 आरिफ़ हसन खान

दोस्तो !
पिछले पोस्ट में मैने वादा किया था कि डा0 आरिफ़ हसन खान साहब की किताब "ख़्वाबों की किरचें [माहिया संग्रह] से कुछ माहिया आप सब के ज़ेर-ए-नज़र पेश करूँगा
डा0 आरिफ़ हसन खान साहब के बारे में मुख़्तसर तआर्रुफ़ इसी  मंच पर लगा चुका हूं और माहिया निगारी के बारे में भी लिख चुका हूँ

तो लीजिए पेश है डा0 साहब के कुछ माहिए

1
ऎ काश न ये टूटें
दिल में चुभती हैं
इन ख़्वाबों की किरचें
--------
2
मिट्टी के खिलौने थे
पल में टूट गए
क्या ख़्वाब सलोने थे
-------
3
अब नींद नहीं आती
जब से गया साजन
याद उसकी है तड़पाती
-------
4
सब सपने टूट गए
थे जो कभी अपने
वो साजन रूठ गए
-------
5
मेरा हमदम रूठ गया 
एक आईना था 
दिल छन से टूट गया
-------
[...क्रमश:  ...}


प्रस्तोता
आनन्द.पाठक
09413395592