मंगलवार, 18 मार्च 2014

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल :हयात मौत का ही ....


मित्रो !
बहुत दिनों बाद , आलिम उस्ताद मोहतरम सरवर आलम राज़ ’सरवर’ की एक ग़ज़ल आप की नज़र इस ब्लाग पे लगा रहा हूं शायद पसन्द आये


ग़ज़ल 

हयात मौत का ही एक शाख़साना लगे
हमें ख़ुद अपनी हक़ीक़त भी इक फ़साना लगे

गुमान, आगही तू, मैं ,उमीद, नौ-उमीदी
हमें सभी ग़म-ए-हस्ती का कारख़ाना लगे

जो दर्द है वह तिरे कर्ब की निशानी है
जो साँस है वह तिरे याद का बहाना लगे

परे है सरहद-ए-इद्राक से वुजूद तिरा
अगर मैं सोचूँ तुझे ,मुझको इक ज़माना लगे

ये मेरी आरज़ूमन्दी !ये मेरी महरूमी
ख़ुदा ख़ुदा तो रहे पर ख़ुदा ख़ुदा ना लगे


खु़दी ने खोल दिए राज़-ए-बेख़ुदी हम पर
क़दम क़दम पे हमें तेरा आस्ताना लगे

वो तेरी याद की ख़ुश्बू ,उमीद का आहट
समंद-ए-शौक़ को गोया कि ताज़याना लगे

ज़माना तुझ को ख़िरदमंद लाख गर्दाने
मगर हमें तो ऐ "सरवर"! तू इक दिवाना लगे

-सरवर-

शाख़्साना =बात में बात/दूसरा रूप
कारख़ाना =झमेले की जगह
क़ुर्ब =पास रहने की/सोहबत की
सरह्द-ए-इद्राक =  अपनी समझ के बूते से बाहर
आस्ताना =चौखट
समंद--ए-शौक़ = तमन्नाओं के घोड़े
ताज़ियाना = चाबुक
ख़िरदमंद = अक़्ल मंद


रविवार, 16 मार्च 2014

डा0 आरिफ़ हसन ख़ान : एक संक्षिप्त परिचय

मित्रो !

अपने पिछले पोस्ट में "उर्दू शायरी में माहिया निगारी" पर एक मज़्मून लिखा था जिसे काफी सराहा गया ।साथ में  यह भी कहा था कि आइन्दा पोस्ट में डा0 आरिफ़ हसन खान साहब की किताब " ख़्वाबों की किरचें’ [माहिया मज़्मूआ’]  से उनकी तख़लीक [रचना] माहिया इस ब्लाग पर सिलसिलेवार लगाऊँगा । यह किताब उर्दू में लिखी हुई है जिसका मैने हिन्दी में नक़्ल-ए-तहरीर [transliteration] कर दिया है जिससे हमारे हिन्दीदाँ दोस्त डा0 साहब के इस फ़न-ए-शायरी से मुतर्रिफ़ [परिचित] हो सकें
             साथ में यह भी लिखा था कि ये सिलसिला शुरू करने के पहले ,डा0 साहब का मुख़्तसर त’आर्रुफ़ [संक्षिप्त परिचय] लगाऊँगा जिससे उनके अदबी हैसियत [साहित्यिक प्रतिभा] से हम आप सब वाक़िफ़ हो सकें
  चुनांचे ,पेश है
डा0 आरिफ़ हसन खां : एक परिचय

यूँ तो डा0 आरिफ़ हसन खां किसी परिचय के मुहताज नहीं है । उर्दू अदब में एक जाना पहचाना नाम .एक मुस्तनद अरूज़ी एक नामचीन शायर हैं। आप ने उर्दू ज़ुबान की ख़िदमत करते हुए अनेक किताबें लिखीं मज़ामीन [लेख] लिखे हैं। उर्दू अदब में आप को 36 साल का अनुभव है । इस ब्लाग के पाठकों के लिए उनका एक मुख़्तसर तआर्रुफ़ [संक्षिप्त परिचय] लगा रहा हूँ जिससे उनके व्यक्तित्व को और अदबी हैसियत को समझने में आसानी होगी
आप का पूरा नाम आरिफ़ हसन खां है ,तखल्लुस ’आरिफ़’ है । आप की पैदाईश की तारीख यूँ तो रिकार्ड में 02-07-1951 दर्ज है [ दर हक़ीक़त 20-11-1951 है] और ग्राम रायपुर ,तहसील क़ायमगंज ज़िला फ़र्रुखाबाद [उ0प्र0] है। आप ने B.Sc-[आनर्स] कमेस्ट्री से किया ।बाद आप ने MA(Urdu) & PhD अलीगढ़ विश्वविद्यालय से किया। आप वर्तमान में हिन्दू कालेज मुरादाबाद[उ0प्र0] में असोसिएट प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष हैं
आप ने अपना रिसर्च ’कलाम-ए-मीर का फ़नी मुतालअ [मीर के कलाम का एक साहित्यिक अध्ययन] पर किया था और अब बहुत से शोध विद्द्यार्थियों आप के दिशा निर्देशन में अपना रिसर्च कर रहे हैं।
आप ने अब तक अनेक किताबें लिखीं है जिसमें से मुख्यत: निम्न हैं
1 मेराज़-उल-अरूज़ [2nd Edition ] [1st Edition in 2000] 2013
2 नवा-ए-फ़रोज़ां 2011
3 कुछ नज़्में कुछ ग़ज़लें 2011
4 तल्खीस-ए-बह्र-उल-फ़साहत 2008
5 म’अरूज़ात-ए-अरूज़-ओ-क़ाफ़िया 2004
6 ख़्वाबों की किरचें 2000
7 औराक़-उल- अरूज़ [ डा0 साबिर सम्भली के साथ] 1994
8 आसान-इल्म-ए-बयान[ 5 editions] 1988 -से लेकर 2007 तक
9 मुन्तखब सनाए बदाए’ [ 5 editions] 1988- से लेकर 2007 तक
10 मता’-ए-ग़म 1986
इस के अलावा डा0 साहब ने बहुत से आलेख लिखे जो विभिन्न स्तरीय [मयारी]पत्र-पत्रिकाओं [रिसाईल] में प्रकाशित हुए है और साथ ही आप ने कई अदबी किताबों की समीक्षायें और आलोचनायें भी लिखीं हैं कई seminars  में और अनेक मंचों पर अपने आलेख भी पढ़े हैं
आप को उर्दू साहित्य की खिदमत के लिए और कई मयारी किताबोंकी तख्लीक़ [रचना] के लिए समय समय पर प्रतिष्ठित सरकारी ,ग़ैर सरकारी संस्थानों से पुरस्कारों से नवाज़ा गया है और सम्मानित किया गया है \ सब की फ़ेहरिस्त लगाना यहाँ मुनासिब न होगा।

डा0 साहब ने अपनी एक किताब ’ख़्वाबों की किरचें’[ उर्दू में -माहिया संग्रह ] की एक प्रति बड़ी मुहब्बत से इस हक़ीर राकिम उस्सतूर को भेंट के तौर पेश की है जिसका मैने हिन्दी लिप्यन्तरण [Hindi Transliteration]  कर दिया है । इस किताब के माहिये इस ब्लोग पर सिलसिलेवार लगाता चलूंगा जिससे हमारे अहबाब-ए-हिन्दी को उर्दू शायरी की सरगरमियों का पता चलता रहे और मयारी माहिया निगारी [स्तरीय माहिया लेखन] से भी वाक़िफ़ हों और लुत्फ़ अन्दोज़ हों ।

सादर
-आनन्द.पाठक
09413395592

[नोट : अगले क़िस्त में ख़्वाबों की किरचें से माहिया का क़िस्तवार सिलसिला शुरू करेंगे]





गुरुवार, 13 मार्च 2014

माहिया निगारी : एक वज़ाहत [स्पष्टीकरण]

मित्रो !
  पिछले दिनों इसी मंच पर एक आलेख ’उर्दू शायरी में माहिया निगारी’ लगाया था।एक सदस्य को ’माहिया ’-शब्द इतना पसन्द आया कि वो अपनी हर कविता के पहले ’माहिया’ शब्द का लेबल लगाने लगे जो वस्तुत: माहिया नहीं है। हमें लगता है कि शायद मैं ’माहिया निगारी’ ठीक से समझा न सका या वो इसे ठीक से समझ नहीं सके

उनके ’समझने’ का दोष नहीं ’आनन’
हाय! अफ़सोस कि हम समझा न सके

हमें लगता है कि इस लेख में कुछ स्पष्टता और चाहिए सो एक बार फिर प्रयास कर रहा हूँ समझाने का शायद मैं कामयाब होऊँ

इससे पहले की मज़ीद वज़ाहत पेश करूँ एक माहिया का link लगा रहा हूँ इसे आप सुने। इस के दिलकश आवाज़ ,इसकी संगीत ,इसके भाव ,इसके दर्द इसके माधुर्य से परिचित हों
जगजीत सिंह और चित्रा सिंह का गाया हुआ माहिया है
http://www.youtube.com/watch?v=5CV6w01O95Q

"कोठे ते आ माहिया 
मिलणा ता मिल आ के
नहीं ता ख़स्मा नूँ खा माहिया"

[नोट : यहाँ ’माहिया’ शब्द ,’प्रेमिका’ के लिए आया है ,इस शब्द का माहिया लेखन  से कोई संबंध नहीं है} माहिया के माने ही होता है -’प्रेमिका’ [beloved]

हिन्दी फ़िल्म ’फागुन’[1958]  के एक गीत का link लगा रहा हूँ ,इसे भी आप सुने और माहिया का रसस्वादन करें

http://www.youtube.com/watch?v=kt3KuQ7fHYo
मुहम्मद रफ़ी और आशा भोसले ने गाया है

" तुम रूठ के मत जाना
मुझ से क्या शिकवा
दीवाना है दीवाना


यूँ हो गया बेगाना
तेरा मेरा क्या रिश्ता
ये तू ने नहीं जाना
 
यह माहिया है

दरअस्ल माहिया 3- लाईनों की एक काव्य विधा है [ख़याल रहे रुबाई 4-लाइनों की काव्य विधा है] जिसमें पहली और तीसरी लाईन में ’क़ाफ़िया’ होता है और दूसरी लाईन में काफ़िया नही होता अगर हो तो मनाही भी नहीं है
ख़याल रहे हर 3-लाईन की कविता ;माहिया’ नहीं होती [ 3-लाईन की हाइकू भी होती है]

माहिया का एक अपना अरूज़ी निज़ाम [ विशेष छन्द-मात्रा विन्यास] है । पहली लाईन और तीसरी लाईन का वज़न समान होता है और उसमें 12 मात्रा का वज़न होता है  जब कि दूसरी लाईन में 10-मात्रा का वज़न होता है
सबसे सरल और सहज वज़न का arranagement  निम्न ढंग से हो सकता है

पहली लाईन =22 22 22 =12
दूसरी लाईन =22 22 2 =10  [ 2-मात्रा कम है. ]
तीसरी लाईन =22 22 22 =12  [पहली लाईन के वज़न के बराबर]

मोटा मोटी आप 2 को गुरू और 1 को लघु शब्द समझें

[यूँ तो पहली और तीसरी लाईन के वज़न 2 2 ] को तख़नीक की अमल से 16 क़िस्म के वज़न और दूसरी लाईन के 8 क़िस्म के वज़न बनाये जा सकते हैं ।यहाँ पर इसका विवेचना करना उचित नहीं है कारण कि यह विषय को और दूरूह और confuse कर देगा। कभी वक़्त मिला तो इस पर ’माहिया के अरूज़ी निज़ाम ’ पर अलग से एक आलेख लिखूंगा]

हाँ तो मैं कह रहा था कि सबसे सरल वज़न

22   22   22
22   22  2
22   22  22

[ [एक गुरु को दो लघु 1 1 में तोड़ा जा सकता है ,मगर आखिरी 2 को कभी नही तोड़ते यानी हर मिसरे के अन्त में गुरू आना लाजिमी है यही माहिया को हुस्न प्रदान करता है

उदाहरण के  तौर पर कुछ माहिया और लगा रहा हूँ।  मेरे एक मित्र  प्राण शर्मा जी अपनी कुछ माहिया भेजी है ,उन्ही में से [2-माहिया क्षमा-याचना सहित] लगा रहा हूँ और साथ ही साथ ’तक़्तीअ’ भी करता चलूंगा जिससे बात और स्पष्ट हो जाय

आँखों  में पानी है 
हर इक प्राणी की 
इक  राम  कहानी है 

अब इनकी तक़्तीअ कर के देखते हैं
22     / 22       /22 =12
आँखों / में पा/नी है
2  2      /  2 2  / 2 =10
हर इक /प्राणी/ की
2     2  /1   1  2 / 2 2 =12
इक  रा/म  कहा/नी है       [यहाँ दुसरे रुक्न [में 1 1 के वज़्न को 2 समझे यानी दो लघु+ 1 गुरु]
----------------

कुछ ऐसा लगा झटका 
टूट गया पल में 
मिट्टी का हर मटका 



2   2      /1 1   2  / 2   2 =12
कुछ ऐ /स लगा /झटका
2  1 1/ 2   2   / 2 =10
टूट ग/या पल /में
22      /  2  2    /2 2 = 12
मिट्टी/ का हर/ मटका


एक माहिया  हिम्मत शर्मा जी का लगा रहा हूँ कहते हैं जिसे सबसे पहली माहिया निगारी का शरफ़[सम्मान] हासिल है

इक बार तो मिल साजन
आ कर देख ज़रा
टूटा हुआ दिल साजन

अब इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं
2   2    / 1  1   2      / 2 2 =12
इक बा/र तो मिल/ साजन    =10   [यहाँ ’तो’ पे मात्रा गिरी है और इसे ’त’ की वज़्न पे पढ़ेंगे]
2      2  /    2 1 1 /  2
आ कर/ देख ज़/रा
2  2    / 2  2       / 2 2 =12
टूटा /हुआ दिल/ साजन [यहाँ ’हुआ’ को ’हुअ’ के वज़न पर पढ़ेंगे]

और एक माहिया जनाब हैदर कुरेशी साहब का लगा रहा हूँ जिन्हे उर्दू शायरी में माहिया का प्रवर्तक माना जाता है

फूलों को पीरोने में
सूई तो चुभनी थी
इस हार के होने में

अब इसकी तक़्तीअ कर के देखतें हैं
2  2/ 1  1 2 /2 2 =12
फूलों / को पीरो/ने में     [यहाँ को और पी पे मात्रा गिरा कर क और पि [1 1] के वज़न पे पढ़ना है]

2 2  /2  2 /2 =10
सूई तो/ चुभ  नी/ थी   [सूई तो में ई और तो पे वज़्न गिरा कर पढ़ेंगे

2      2/ 1 1  2   /2  2 =12
इस हा/र के हो/ने में [ दूसरे रुक्न  ’ र के हो ’ में ’के’ को क की वज़न पर पढ़ना पड़ेगा]


अब चलते चलते एक माहिया इस हक़ीर का भी बर्दाश्त कर लें

ये हुस्न का जादू है 
सर तो सज्दा में 
कब दिल पे क़ाबू है 

अब इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं
2  2 /1 1 2  /2 2    =12
ये हुस/न का जा/दू है [यहाँ ’का’ को ’क’ के वज़न पर पढ़ेगे
2      2/   2     2/   2        =10
सर तो/ सज दा/ में
2      2   / 2       2  /2 2        12
कब  दिल/ पे क़ा/बू  है



अगर आप ध्यान से देखेंगे तो एक बात साफ़ ज़ाहिर होगी कि हर मिसरा का आखिरी पद  2 के वज़्न पे है।

अत: अब स्पष्ट हो गया होगा कि मेरे उक्त मित्र ने माहिया का लेबल देकर जो भी कवित्त लिखा वो ’माहिया ’ नहीं था

उम्मीद करता हूँ कि बात कुछ  स्पष्ट हुई होगी

अस्तु
-आनन्द.पाठक
09413395592



मंगलवार, 11 मार्च 2014

उर्दू शायरी में माहिया निगारी

अहबाब-ए-ब्लाग
आदाब
’मुद्दत हुई है यार को मेहमां किए हुए"---मुद्दत के बाद इस ब्लाग पे लौटा हूं”
’कुछ तो मज़बूरियाँ रहीं होंगी’----मुआफ़ी के तहत ताख़ीर [विलम्ब] और ग़ैर हाज़िरी के लिए माज़रतख़्वाह [क्षमा प्रार्थी ]हूं
ज़माने में और भी काम होते हैं इस ब्लागिंग के सिवा,,...]
ख़ैर
इस बार आप की ख़िदमत में एक मज़्मून ’उर्दू शायरी में माहिया निगारी"-पेश कर रहा हूँ
इस के बाद डा0 आरिफ़ हसन खान साहब का एक मुख़्तसर तआर्रुफ़ पेश करूंगा 
फिर ये सिलसिला आगे बढ़ता चलेगा और डा0 साहब की किताब ’ ख़्वाबों की किरचें ’ [माहिया संग्रह] से माहिये सिलसिलेवार लगाता चलूँगा।
उम्मीद ही नहीं ,यक़ीन भी है कि डा0 साहब के माहिए आप  अहबाब को पसन्द आयेंगे
-आनन्द.पाठक

उर्दू शायरी में ’माहिया निगारी’[माहिया लेखन]

उर्दू शायरी में वैसे तो बहुत सी विधायें प्रचलित हैं जैसे क़सीदा,मसनवी,मुसम्मत,क़ता,रुबाई,तरजीह बन्द.तरक़ीब बन्द मुस्तज़ाद,फ़र्द,मर्सिया,हम्द,ना’त,मन्क़बत,ग़ज़ल,नज़्म वगैरह।परन्तु इन सबमें ज़्यादा लोकप्रिय विधा ग़ज़ल ही है । इन सब के अपनी अरूज़ी इस्तलाहत [परिभाषायें] है, अपने असूल है ,अपनी क़वायद हैं। ना’त के साथ तो सबसे ख़ास बात ये है कि ना’त नंगे सर नहीं पढ़ते ।ना’त पढ़ते वक़्त ,शायर सर पर रुमाल ,कपड़ा ,तौलिया या टोपी रख कर पढ़ते हैं। यह बड़ी मुक़द्दस [पवित्र] विधा है।
परन्तु हाल के कुछ दशकों से उर्दू शायरी में 2-अन्य विधायें बड़ी तेजी से प्रयोग में आ रहीं हैं- माहिया निगारी और हाईकू ।हाईकू यूँ तो जापानी काव्य विधा है मगर इस का प्रयोग ’हिन्दी’ और उर्दू दोनों में समान रूप से किया जा रहा है।अभी ये शैशवास्था में हैं।परन्तु माहिया उर्दू शायरी में बड़ी तेजी से मक़बूल हो रही है।
’माहिया’ वैसे तो पंजाबी लोकगीत में सदियों  से प्रचलित है और काफी लोकप्रिय भी है जैसे हमारे पूर्वांचल में ’कजरी’ ’चैता’ लोकगीत हैं ।परन्तु माहिया को उर्दू शायरी का विधा बनाने में पाकिस्तान के शायर [जो आजकल जर्मनी में प्रवासी हैं] हैदर क़ुरेशी साहब का काफी योगदान है। माहिया का शाब्दिक अर्थ ही होता प्रेमिका [beloved ] और इसकी [theme] ग़ज़ल की तरह हिज्र-[-वियोग] ही है परन्तु आप चाहे तो और theme पे माहिया कह सकते है ,मनाही नहीं है ।बहुत से गायकों ने और पंजाब के आंचलिक गायकों ने माहिया गाया है। दृष्टान्त के लिए एक [link] लगा रहा हूँ जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने गाया है जो पंजाबी में बहुत ही मशहूर और लोकप्रिय माहिया है http://www.youtube.com/watch?v=5CV6w01O95Q

"कोठे ते आ माहिया 
मिलणा ता मिल आ के
नहीं ता ख़स्मा नूँ खा माहिया"

आप सभी ने हिन्दी फ़िल्म फ़ागुन [1958]  [भारत भूषण और मधुबाला] संगीत ओ पी नैय्यर का वो गीत ज़रूर सुना होगा जिसे मुहम्मद रफ़ी और आशा भोंसले जी ने गाया है

" तुम रूठ के मत जाना
मुझ से क्या शिकवा
दीवाना है दीवाना

यूँ हो गया बेगाना
तेरा मेरा क्या रिश्ता
ये तू ने नहीं जाना

यह माहिया है ।
दरअस्ल माहिया 3-मिसरों की उर्दू शायरी में एक विधा है जिसमें पहला मिसरा और तीसरा मिसरा हम क़ाफ़िया [और हमवज़्न भी] होते हैं और दूसरा मिसरा हमकाफ़िया हो ज़रूरी नहीं । दूसरे मिसरे में 2-मात्रा [एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़] कम होता है।
डा0 आरिफ़ हसन खां जो उर्दू के मुस्तनद अरूज़ी और शायर हैं जो मुरादाबाद [उ0प्र0] में क़याम फ़र्माते हैं ।डा0 साहब उर्दू साहित्य जगत और शैक्षिक जगत में एक नामाचीन हस्ती है,आप ने उर्दू में दर्जनों किताबें लिखीं और अवार्ड प्राप्त किए हैं। [शायद मेरी उर्दू आशनाई देखते हुए] बतौर-ए-सौगात आप ने अपनी एक किताब ’ख़्वाबों की किरचें’ [माहिया संग्रह] की एक लेखकीय प्रति बड़ी मुहब्बत से मुझें भेंट में किया है

यह किताब उर्दू में है और इस में 117 माहिया संकलित है। अपने हिन्दीदां दोस्तों की सुविधा के लिए इस किताब को मैंने बड़े शिद्दत-ओ- शौक़ से हिन्दी में ’लिप्यन्तरण’[Transliteration] किया है और डा0 साहब से नज़र-ए-सानी भी करा लिया है। ।आप ने बड़ी ख़लूस-ओ-मुहब्बत से इस बात की इजाज़त दे दी है कि हिन्दी के पाठकों के लिए इसे मैं अपने ब्लाग [www.hindi-se-urdu.blogspot.in] पर सिलसिलेवार लगा सकता हूं
माहिया के बारे में चन्द हक़ायक़ उन्हीं किताब से [जो उन्होने तम्हीद [प्राक्कथन/भूमिका]के तौर पर लिखा है हू-ब-हू दर्ज-ए-ज़ैल [निम्न लिखित] है
चन्द हक़ायक़ [कुछ तथ्य]

माहिया दरअस्ल पंजाब की अवामी शे’री सिन्फ़ [साहित्यिक विधा] है।उर्दू में इसे मुतआर्रिफ़ [परिचित] कराने का सेहरा [श्रेय]  सरज़मीन पंजाब के एक शायर हिम्मत राय शर्मा के सर है जिन्होने फ़िल्म ’ख़ामोशी’ के लिए 1936 में माहिया लिख कर उर्दू में माहिया निगारी का आग़ाज़ किया।
इस के तक़रीबन 17 साल बाद क़तील शिफ़ाई ने पाकिस्तानी फ़िल्म ’हसरत’ के लिए 1953 में माहिए लिखे।क़मर जलालाबादी ने 1958 में फ़िल्म ’फ़ागुन’ के लिए माहिए लिखे। इस के बाद चन्द और फ़िल्मों के लिए भी शायरों ने माहिए लिखे जो काफी मक़बूल [लोकप्रिय] हुए।लेकिन माहिए लिखे जाने का ये सिलसिला चन्द फ़िल्मों के बाद मुनक़तअ  [ख़त्म] हो गया और बीसवीं सदी की आठवीं औए नौवीं दहाई [दशक] में माहिया शो’अरा [शायरों] की अदम तवज्जही [उपेक्षा] का शिकार रहा । लेकिन सदी की आख़िरी दहाई माहिया के हक़ में बड़ी साज़गार साबित हुई और एक बार फिर शो’अरा ने माहियों की तरफ़ न सिर्फ़ तवज्जो दी बल्कि माहिया निगारी एक तहरीक [आन्दोलन] की शकल में नमूदार [प्रगट] हुई। गुज़िश्ता [पिछले] पाँच-छ: साल की मुद्दत में शायरों की एक बड़ी तादाद इस सिन्फ़ की तरफ़ मुतवज्ज: [आकर्षित] हुई है। माहिया निगारी की इस तहरीक में जर्मनी में मुक़ीम [प्रवासी] पाकिस्तानी शायर हैदर क़ुरेशी की कोशिशों को बहुत दख़ल है और बिला शुबह [नि:सन्देह] बहुत से शायर इन की तहरीक पर ही इस सिन्फ़ की तरफ़ मुतवज्ज हुए। वजह जो भी ,बहरहाल गुज़िश्ता 5-6 साल में मुख़तलिफ़ [विभिन्न]अदबी रिसाईल ने [साहित्यिक पत्रिकाओं ने] माहिये पर मज़ामीन [कई आलेख ] शायअ [प्रकाशित]किए। कुछ ने माहिया नम्बर [विशेषांक] और माहिए पर गोशे [ स्तम्भ ] निकाले और माहिए की शमूलियत [शामिल करना] तो अब तक़रीबन हर एक अदबी रिसाले में होती ही है।
माहिये के सिलसिले में एक बहस अभी नाक़िदीन[ आलोचकों] और शो’अरा में जारी है कि इस का दुरुस्त वज़न क्या है? बाज़ [कुछ लोगों ] के नज़दीक [ और अक्सरीयत [बहुत लोगों ] का यही ख़याल है] कि माहिया का पहला और तीसरा मिसरा हम वज़न [और हम क़ाफ़िया भी] होते हैं जबकि दूसरा मिसरा इन के मुक़ाबिले में एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ कम होता है । लेकिन बाज़ के नज़दीक तीनों मिसरों का वज़न बराबर होता है। बहर हाल अक्सरीयत के ख़याल को तर्जीह [ प्रधानता] देते हुए माहिया के का दुरुस्त वज़्न पहले और तीसरे मिसरे के लिए फ़एलुन् ,फ़एलुन् .फ़एलुन् /फ़एलान्] मुतदारिक मख़बून /मख़बून मज़ाल] और दूसरे मिसरे के लिए फ़ेलु .. फ़ऊल्.. फ़अल्/फ़ऊल् [मुतक़ारिब् असरम् मक़्बूज़् महज़ूफ़् /मक़सूर्] है। इन दोनों औजान [वज़्नों] पर बित्तरतीब [क्रमश:] तकसीन और तख़नीक़ के अमल हैं। मुख़तलिफ़ मुतबादिल औज़ान [वज़न बदल बदल कर विभिन्न वज़्न के रुक्न] हासिल किए जा सकते हैं [तफ़सील [विवेचना ] के लिए मुलाहिज़ा कीजिए राकिम उस्सतूर [इन पंक्तियों के लेखक] की किताब ’ मेराज़-उल-अरूज़’ का बाब माहिए के औज़ान]। अकसर-ओ-बेशतर[प्राय:] शायरों ने इन औज़ान में ही माहिए कहे हैं
राकिम-उस्सतूर को माहिए कहने का ख़याल पहली बार उस वक़्त आया जब ’तीर-ए-नीमकश’ में तबसिरे [समीक्षा] के लिए बिरादर गिरामी डा0 मनाज़िर आशिक़ हरगानवी ने अपनी मुरत्तबकर्दा[सम्पादित की हुई] किताब ’रिमझिम रिमझिम’ इरसाल की।इस पर तबसिरे के दौरान दिल में ख़्वाहिश पैदा हुई कि चन्द माहिये लिखे जाएं । चुनांचे [अत:] चन्द माहिए लिखे और ’तीर-ए-नीमकश’ अप्रैल 1997 के शुमारे [अंक] में शामिल किए।फिर उन्हीं की फ़रमाइश पर ’कोहसार’ के लिए चन्द माहिए लिखे।
इस वज़्न में ऐसी दिलकशी है कि राक़िम-उस्सतूर[इन पंक्तियों के लेखक] के नज़दीक एक मख़सूस [ख़ास] क़िस्म के जज़्बात की तर्जुमानी के लिए इस से ज़ियादा मौज़ूँ [उचित] कोई दूसरी हैयत नहीं।बहरहाल गुज़िश्ता दिनों जो चन्द माहिए मअरज़े वजूद में  आए उन्हीं मे से कुछ नज़र-ए-क़ारईन [पाठकों के सामने ] हैं। ख़ाशाक [घास-फूस] के इस ढेर में शायद एक-आध ऐसी तख़्लीक़ [रचना] भी हो जो क़ारईन [पाठकों] के दिल को छू सके।

आरिफ़ हसन ख़ान
मुरादाबाद
----------------------------
उर्दू शायरी में माहिया के लिए निम्न बुनियादी औज़ान मुकर्रर किए गये हैं

फ़एलुन् ,फ़एलुन् .फ़एलुन्   [22   22  22
फ़एलुन् ,फ़एलुन् .फ़ा     [22 22 2]
फ़एलुन् ,फ़एलुन् .फ़एलुन् [22   22  22 ]

डा0 आरिफ़ हसन खां साहब ने अपनी किताब ’मेराज़-उल-अरूज़;[उर्दू में ] में माहिया के निज़ाम-ए-औज़ान पर काफी तफ़सील से लिखा है बुनियादी वज़न पर तख़्नीक़ के अमल से पहले और तीसरे मिसरे [हमक़ाफ़िया और हमवज़न भी] के लिए 16 औज़ान और दूसरे मिसरे के लिए 8 औज़ान मुक़र्रर किए जा सकते हैं ठीक वैसे ही जैसे रुबाई के लिए 24-औज़ान मुक़र्रर किए गये हैं।
यह विधा उर्दू शायरी में इतनी तेजी से मक़बूल हो रही है कि अब तो कई शायर इस पर तबाआज़्माई [कोशिश] कर रहे हैं । नमूने के तौर पे कुछ माहिया दीगर शायरों के लगा रहा हूँ जिससे आप लोग भी आनन्द उठायें
कहा जाता है कि सबसे पहला माहिया ,हिम्मत राय शर्मा जी ने एक फ़िल्म के लिए 1936 में लिखा था

इक बार तो मिल साजन
आ कर देख ज़रा
टूटा हुआ दिल साजन
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जनाब हैदर क़ुरेशी साहब का [जिन्हें उर्दू शायरी में माहिया के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है] का एक माहिया है

फूलों को पीरोने में
सूई तो चुभनी थी
इस हार के होने में
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एक माहिया हरगानवी साहिब का है
रंगीन कहानी दो
अपने लहू से तुम
गुलशन को जवानी दो

यहाँ यह कहना ग़ैर मुनासिब न होगा कि माहिया निगारी में शायरात [महिला शायरों ]ने भी तबाआज़्माई की है 1-2 उदाहरण देना चाहूंगा
आँगन में खिले बूटे
ऐसे मौसम में 
वो हम से रहे रूठे
-सुरैया शहाब

खिड़की में चन्दा है
इश्क़ नहीं आसां
ये रुह का फ़न्दा है
--बशरा रहमान

मंच के पाठकों के लिए आरिफ़ खां साहब की किताब[ख़्वाबों की किरचें]  से नमूने के तौर पर चन्द माहिया  लगा रहा हूँ जिससे आप लोग भी लुत्फ़-अन्दोज़ हों
1
ऎ काश न ये टूटें
दिल में चुभती हैं
इन ख़्वाबों की किरचें
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2
मिट्टी के खिलौने थे
पल में टूट गए
क्या ख़्वाब सलोने थे
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3
आकाश को छू लेता
साथ जो तू देती
क़िस्मत भी बदल देता
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4
पिघलेंगे ये पत्थर
इन पे अगर गुज़रे
जो गुज़री है मुझ पर
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5
वो दिलबर कैसा है
मुझ से बिछुड़ कर भी
मेरे दिल में रहता है

अस्तु

यार ज़िन्दा सोहबत बाक़ी
आनन्द पाठक
09413395592