मंगलवार, 27 अगस्त 2013

पत्ता पत्ता बूटा बूटा - एक चर्चा

पत्ता पत्ता बूटा बूटा....एक चर्चा 

यह ’मीर’ का मत्ला [एक शे’र] है

पत्ता पत्ता  बूटा बूटा  हाल   हमारा जाने है 
जाने न जाने गुल ही न जाने,बाग तो सारा जाने है

मीर का पूरा नाम मीर मुहम्मद तक़ी था मीर और ’मीर’ उनका तख़ल्लुस था । मीर और उर्दू के एक बुलन्द-पा शायर थे
उर्दू के जो अदब आश्ना है या जो ग़ज़ल से थोड़ा बहुत भी ज़ौक़-ओ-शौक़ फ़र्माते है उन्हें मीर के बारे बतलाने की ज़रूरत नहीं है ।मीर की अदबी हैसियत का अन्दाज़ा इसे से भी लगाया जा सकता है कि उन को उर्दू अदब (साहित्य] में ’ख़ुदा-ए-सुख़न’ के लकब [उपाधि] से नवाज़ा गया है। ये लकब उनकी शायरी की ख़याल बुलन्दी के बिना[आधार] पर है

हमारे एक मित्र ने ’न जाने न जाने  ’पर कुछ शंका प्रगट किया कि ’ न जाने’ 2-बार आने से कहीं ’निगेटिव’ भाव तो नहीं पैदा हो रहा है। हालाँ कि उन्होंने बड़ी सादगी और मासूमियत से यह एतिराफ़ किया कि--वह शायर का वह ऊंचा अंदाज़ समझ न सके हैं; तड़प, बेकसी और बेबसी अभी भी उनकी समझ के बाहर है | इसीलिए गज़लों को   और उसके व्याकरण को समझने में अपने आप को वह गोबर- गणेश समझते हैं  |
ख़ैर उनके इस साफ़गोई का अन्दाज़ बड़ा ही दिलकश लगा- कौन न मर जाय इस सादगी पे ऎ ख़ुदा -

सच तो यही है कि ’मीर’ के शे’र या ग़ज़ल समझने कि लिए हमारे मित्र ही क्या ,हम आप और भी बहुत से लोग ना-काफी हैं और ख़सूसन तब, जब कि अपने ज़माने के लगभग सभी उस्ताद शायर भी मीर का लोहा मानते थे और मानते हैं

ख़ैर मूल बात पे आते हैं

बात जब मीर की चली तो पहले मीर के बारे में 2-4 बात कर लेते हैं ,फिर उनके इस शे’र पे आते हैं
’ग़ालिब’ -जिनके बारे में कहा जाता है कि उनकी शायरी पर सबसे ज़्यादा तब्सरा किया गया और मज़्मून लिखे गये । उनका यह शे’र तो आप सबने सुना ही होगा

हैं और भी दुनिया में सुखनबर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ’ग़ालिब’ का है ’अन्दाज़-ए-बयां’ 

और
वही ग़ालिब ,मीर के बारे में क्या बुलन्द ख़्याल रखते हैं आप भी-,सुन लीजिये

मीर के शे’र का अहवाल कहूँ क्या ग़ालिब
जिसका दीवान कम अज़ गुलशन-ए-कश्मीर नहीं

[ यानी ,ऎ ग़ालिब , मीर के शे’र की हम क्या बात करें ,अरे! मीर का दीवान [ग़ज़ल संग्रह] तो कश्मीर के किसी बाग़ से कम नहीं]
वैसे मीर के 6-दीवान मुरत्तब [सम्पादित] हुये हैं ।वैसे दोनो ही उस्ताद शायर ’अक़बराबाद [आज का आगरा] के थे जो बाद मे ग़ालिब दिल्ली चले गये थे और मीर साहब लखनऊ।
यानी ग़ालिब नें "क्या कहूँ"-कह कर सारी बातें कह दी ,कुछ बचा नहीं और उनके दीवान की तुलना गुलशने-कश्मीर से कर जो इज्ज़त बख़्शी है या हैसियत नवाज़ी है ,वो क़ाबिल-ए-रश्क़ है
इसी मुत्तलिक़ एक दूसरा शे’र भी सुन लीजिए

रेख़्ता के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब
कहते है अगले ज़माने में कोई मीर भी था

रेख़्ता -उर्दू का पुराना नाम है यानी पहले के शायर रेख़्ता[यानी उर्दू] में ही शायरी करते थे
गोया ग़ालिब भी मानते हैं कि ’मीर’ भी कोई चीज़ हैं ।
अगर ग़ालिब जैसे अज़ीमुश्शान शायर [प्रतिष्ठित शायर]   यह कहे कि

’ग़ालिब’ अपना तो अक़ीदा है ,ब क़ौल-ए-’नासिख़’
आप बे-बहरा हैं जो मोतक़दे  ’मीर’ नहीं 

[यानी ’नासिख़’ ने जो कहा है कि यह आप की ये बद किस्मती है गर  आप मीर की शायरी के क़ायल नहीं हैं -मैं भी यही सोचता हूँ ]
और यह ’नासिख़’ साहब?
जनाब ’नासिख़’ खुद अपने ज़माने के लखनऊ के एक मशहूर शायर थे जिन्होने उर्दू शायरी को एक मुकाम पे पहुँचाया था।
’आप बे-बहरा हैं जो मोतक़दे  ’मीर’ नहीं’--यह  मिसरा उन्हीं का  है जिसके हवाले से ’ग़ालिब’ ने मज़्कूरा [जिसका ऊपर ज़िक्र हो चुका है] शे’र कहा है

और अकेले ग़ालिब ही क्यों ,अमूमन सभी उस्ताद शायरों ने’ ’मीर’ के बारे में अपने अपने  अन्दाज़ से ऐसे ही ख़्याल ज़ाहिर किए हैं
अब ’ज़ौक़ का ही देखिये ! ’ज़ौक़ ’ने क्या कहा है’ -हाय ये न हो सका उनसे- के अन्दाज़ की बेबसी महसूस करते हैं मीर के अन्दाज़ के

न हुआ पर न हुआ ’मीर’ का अन्दाज़ नसीब
’ज़ौक़’ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल पे  मारा

तो फिर अकबर इलाहाबादी की मज़बूरी और बेकसी को आप क्या कहेंगे जो ख़ुद एक मशहूर शायर थे ।जनाब ने तो दोनों यानी नासिख़ और ज़ौक़ दोनो को एक साथ लपेट कर  फ़र्माते हैं -आप भी देखिए

मैं हूँ क्या चीज़ जो इस तर्ज़ पे जाऊँ ’अक़बर’
’नासिख़’-ओ-’ज़ौक़’ भी जब चल न सके ’मीर’ के साथ

मौलाना हसरत मोहानी जो ख़ुद उर्दू शायरी में अपना एक अलग मुकाम रखते है .मीर के बारे में उनका छलकता हुआ दर्द देखिए--कि वो दिल कहाँ से लाऊँ के अन्दाज़ में किस तरह बयान करते हैं

शे’र मेरे भी हैं पुर-दर्द वलेकिन ’हसरत’
मीर का शैवा-ए-ग़ुफ़्तार कहाँ से लाऊँ

नूह नारवी ,जो दाग़ के शागिर्द थे ,का यह मिसरा भी सुन लें कि क्या बेकसी है उनकी इस इसरार में और मीर की शायरी के बारे में

बड़ी मुश्किल से तक़्लीद-ए-जनाब--ए-’मीर’ होती है 

कहने का मतलब यह कि जब उर्दू के उस्ताद शायर भी मीर की शायरी का लोहा मानते थे या है तो हमारी आप की क्या बिसात है

इतनी सारी बातें कहने का मक़सद यही है कि मीर का वो शे’र और उसकी बुलन्दी अगर हम और हमारे मित्र की समझ में नहीं आते हैं तो कोई ग़लत बात नहीं , कोई आश्चर्य की बात नहीं ।
मगर हम सभी अपनी अपनी  फ़हम [समझ] और तमीज से अर्थ {मा’नी) लगाने के लिए आज़ाद तो ज़रूर हैं। शे’र का मा’नी समझना या लगाना तो बस एक कैलि्डियोस्कोप की तरह है जब देखिए एक नया सा ही लगे है ।बस आप इसे घुमाते जाइए ..और हर बार नया नया पैटर्न [मा’नी]  बनता जायेगा ..नये नये अर्थ लगाते जाइए -लुफ़्त अन्दोज़ होते जाइए

अब हम मौज़ू [विषय] पर आते हैं
शे’र था

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है 
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है 

मीर की यह पूरी ग़ज़ल कविता-कोश से साभार, लगा रहा हूँ कि आप सभी लोग उसकी ग़ज़ल्लीयत की तासीर[प्रभाव ] से मुत्तस्सिर [प्रभावित ] हों

पूरी गज़ल इस तरह से है ... (कविता कोश से साभार)

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है


लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश के बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मै-ओ-ख़ोर की तितली का तारा जाने है


आगे उस मुतक़ब्बर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद् ख़ुदा को वो मग़रूर ख़ुद-आरा जाने है


आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़िआँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है


चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है


क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्यद बच्चा
त'एर उड़ते हवा में सारे अपनी उसारा जाने है


मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-कनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है


क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है


आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है


रख़नों से दीवार-ए-चमन के मूँह को ले है छिपा य'अनि
उन सुराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है


तशना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है 

मत्ला और मक़्ता मिला कर सब 11-अश’आर हैं

यह ग़ज़ल इतनी लोक प्रिय है कि लता मंगेशकर जी से लेकर मेहदी हसन साहब ,बेग़म अख़्तर ,तक जगजीत सिंह से लेकर हरिहरन तक दर्ज़नों पेशेवर और ग़ैर पेशेवर गायकों ने इस ग़ज़ल को अपने अपने अन्दाज़ में गाया है और हर ने यही समझा कि उनकी गायकी इस सन्दर्भ में मुकम्मल [final] है ,ठीक उसी प्रकार जब हर आदमी किसी शे’र का अर्थ लगाता है और उसे अपनी समझ से ठीक ही समझता है और सही समझ कर ही अर्थ लगाता है । जिसमें उसे आनन्द आये वही सही है उसके लिए।
अगर आप You Tube पे देखेंगे तो दर्ज़नों link मिल जायेंगे\ आप की सुविधा के लिए एक link लगा रहा हूँ [जगजीत सिंह वाला]
http://www.youtube.com/watch?v=x2DuKyUV42A 

आप जब सुनेंगे तो देखेंगे कि ग़ज़ल का वज़न और बहर में होने का क्या मायने है कि गायक के स्वर को को कहीं भी अटक feel नहीं है
मगर ,न जाने क्यो कलाकारों  ने इस ग़ज़ल के चन्द अश’आर ही गाये हैं ।मीर की पूरी ग़ज़ल किसी ने नहीं गाई है ।पता नहीं क्यों? शायद time का constrain रहा हो
ख़ैर

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है 
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है 

उस मित्र  का कहना था कि जाने न जाने ...फिर न जाने 2-बार आने से negative अर्थ या भाव तो नहीं निकल रहा है।
सच तो यह है कि वो शे’र का जिसका लब-ओ-लहज़ा और अन्दाज़-ए-गफ़्तगू [बात चीत की style में हो और उसमें ज़्यादे ’अन्वय’ न करना पड़े जो सीधे दिल को छूती है यानी बात चीत का flow बरक़रार रहे, तो अच्छा रहता है
कुछ शो’अरा तो बे मतलब और बेवज़ह  अश’आर में  भर्ती के लफ़्ज़ या अल्फ़ाज़ ठूंसे देते हैं जिस से शे’र अपनी रवानी [natural flow ] और आब-ओ-ताब [चमक] खो देता है  जो महज तुकबन्दी के सिवा कुछ नहीं होता।
इन्हीं तुकबन्दियों पर शरद तैलंग [कोटा निवासी] का  एक तंज़ शे’र पढ़ा था

सिर्फ़ तुक़बन्दियां ही हैं काफी नहीं 
शायरी कीजिए शायरी की तरह 

मगर कुछ शो’अरा [शायरों] को यह फ़न ख़ुदा दाद [भगवान की दी हुई] है और उन्हें इस हुनर में महारत हासिल है और कुछ तो इसे  मश्क़-ओ-अमल [मिहनत और exercise] से हासिल करते है
 मत्ला वाला शे’र ,मीर के इसी ख़ुदा दाद हुनर का नतीज़ा है कि....

मीर  के दिल की तड़प देखिए ,उनकी बेकसी देखिए कि ’पत्ता पत्ता ’की मैं क्या बात करूँ अरे यहाँ तक कि ’बूटा बूटा ’[crippers] तक को  भी पता है ......। यहां पर जो पत्ता या बूटा का 2-बार इस्तेमाल किया है शे’र में जान डाल दिया है ।शेर को बुलन्द कर दिया वगरना शे’र फ़ीका फ़ीका सा लगता। आप स्वयं देखे --यदि हम यह बात ऐसे कहें ’अरे ! ये बात तो मुहल्ले के हर बच्चे को पता है --या ऐसे कहें कि ये बात तो ’मुहल्ले के बच्चे बच्चे [तक] को पता है ...बात तो एक है मगर भाव में फ़र्क़ है ।आप को किस में ज़्यादा वज़न [बात में stress]मालूम होता है ? ईमानदारी से बताईयेगा।

 यही बात ’बूटा बूटा ’ की भी है
बात को वाज़ेह [स्पष्ट] करने के लिए इस शे’र में वज़न बरक़रार रखते हुए कुछ तब्दीली करते हैं [मीर साह्ब की मुआफ़ी के तहत] देखते हैं -क्या होता है?

पत्ता ,भौरा ,कलियां ,बूटा हाल हमारा जाने हैं - इस शे’र में कोई ग़लती नहीं ,न वज़न के लिहाज से ,न environment के लिहाज से न मानी की लिहाज से। आख़िर भौरा ..कलियां भी तो बाग के ही part हैं। अब इस मिसरे को आप  आँख बन्द कर धीरे धीरे गुनगुनायें और बतायें कि बात किसमें ज़्यादा बनी या बन रही है --आप की बेबसी और बेकसी किस में ज़्यादा झलक रही है । हो सकता है आप को कोई ज़्यादा फ़र्क़ नज़र न आये वैसे ही जैसे आंख का डाक्टर आप का चश्मा [नज़र] टेस्ट करता है तो एक मुकाम पे पहुँच कर आप के नज़र की fine tuning check करता है कभी axis घुमाता है कभी additional लेन्स लगाता है फिर पूछता है आप को इस में ज़्यादा अच्छा लगता है या उस में ? फ़र्क़ होता है --थोड़ा ही सही मगर होता है ,होता है ज़रूर।यह बात तो आप भी मानते हैं।

पत्ता पत्ता बूटा बूटा Vs पत्ता ,भौरा,कलियां बूटा...में आप को कौन सा मिसरा ज़्यादा वज़न अहसास कराता है ?
वही बात मिसरा सानी मे..भी है

जाने न जाने गुल ही न जाने .....सारी कायनात को पता है [हमारे दिल का हाल ] बच्चे बच्चे को मालूम है .गली-कूचे तक को मालूम है बाग बगीचे तक को मालूम है सबको मालूम है ,पर ख़ुदा जाने , न जाने क्यों उन को ही नहीं मालूम बस [किस को ? अरे! उन्हीं गुल जी को] मानो जैसे वो [गुल] इस दुनिया में रहते ही नहीं ..कैसे निस्पॄह हैं -कैसे बे तवज़्ज़ोह हैं मुझ पर...उनको छोड़-कर सबको मालूम ।-क्या उपालम्भ है ..और गुल की क्या बेरुखी है ,बे नियाज़ी देखिए  ...क्या लब-ओ-लहज़ा है शिकायत कर ने का ...और जब मीर ने जब आखिरी में यह कह दिया कि ’बाग तो सारा जाने है"- [तो -पर ध्यान दीजिएगा कि बात को कहाँ से कहाँ  खीच कर ले जा रहा है यह एक लफ़्ज़ ’ तो ’] एक लम्बी साँस छोड़ दिया ’मीर साहब ने ,थक गये हों जैसे उस गुल की बेरुखी से ..बेनियाज़ी से -..हैफ़ ![हाय ,अफ़्सोस] अब क्या बचा रह गया इस बाग में....कि वो गुल जो ’मेरा सूरते-हाल न जाने है ..हद हो गई जनाब उनके इस बेरूखी की..।

कभी कभी एक लफ़्ज़ [यहां पे ’तो’]किसी शे’र को मानी के किस बुलन्दी तक पहुंचा देता है , पता ही नहीं चलता
देखिए इस शे’र में इस ’तो’ ने क्या कमाल दिखा दिया ।अब आप पूछेंगे कि क्या कमाल दिखा दिया? तो जनाब आप ’तो’ हटा दीजिए फिर देखिए
इस मिसरा को ऐसा कर देते हैं-----जाने न जाने गुल ही न जाने ,गुलशन सारा जाने है [चूँकि मिसरा वज़न में रखना है इस लिए ’गुलशन’ लिखा -इसमें ’तो’ घुसाने की जगह नहीं मिल रही है [घुसायेगे तो मिसरा बह्र से ख़ारिज़ हो जायेगा यह भी ख़्याल रखना है]
गुलशन सिर्फ़ जानता है मगर ’बाग [को] तो मालूम है मेरा सूरत-ए-हाल उसने भी ’तो’ नहीं बताया उस ’गु्ल’ को।हाय रे मेरी बदक़िस्मती,बद बख़्ती....

।ऐसा ही एक लफ़्ज़ है ’गोया’ -जो मोमिन के एक शे;र को कहाँ से कहाँ तक पहुंचा दिया। उम्मीद है आप ने इशारा समझ लिया होगा । अगर कभी मौक़ा मिला तो उस पर भी तब्सरा करूंगा।

गो कि इस शे’र की वज़ाहत और भी की जा सकती है - इश्क़े-हक़ीकी और इश्क़े-मज़ाजी की रोशनी में । मज़्मून यूँ ही काफी तवील[लम्बा] हो चला है सो यह मुनासिब जगह नहीं है

अन्त में यही कहना है कि अच्छा और सच्चा शे’र -समझ में आ गया तो हीरा ,नहीं तो कंकड़ ।यही कारण है कि शे’र देखने में या ’लिखने में ’ जितना आसन लगता है .कहना उतना आसान नहीं

और सच्चा शे’र वो जो दो लाईनो[मिसरों] में ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा सिमट कर भर दे और फैले तो कायनात बन जाये

 यहां जाने न जाने गुल ही न जाने -जो 3 बार जाने का प्रयोग हुआ है वो शे’र के वज़न को कहाँ से कहाँ तक उठा दे रहा है }यही इसकी ख़सूसियत है इस शे’र में एक भी ’भर्ती’ का लफ़्ज़ नहीं है

उमीद है कि अपनी फ़हम से कुछ हद तक अपनी बात कहने में कामयाब हुआ हूंगा


-आनन्द.पाठक
09413395592

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