शनिवार, 12 जनवरी 2013

उर्दू बह्र पर एक बातचीत - किस्त - 4 [ बह्र-ए-रमल)

उर्दू बह्र पर एक बातचीत (क़िस्त -4)

बह्र-ए-रमल [2 1 2 2 ]

[Disclaimer clause ;वही जो क़िस्त -1 में है]



[पिछली बातचीत में बह्र-ए-हज़ज [1 2 2 2 ] का ज़िक्र कर चुका हूं ।डा0 कुँअर बेचैन ने जिसका हिन्दी नाम "कोकिल छन्द रखा है]



अब आगे बढ़ते हैं .....]



उर्दू में एक और मान्य प्रचलित बह्र है -बह्र-ए-रमल - जिसका बुनियादी रुक्न है ’फ़ा इ ला तुन् ’जिसका वज़न है [2 1 2 2 ] और यह भी एक सालिम रुक्न है।यह भी बह्र-ए-ह्ज़ज की मूल रुक्न ’मफ़ा ई लुन ’ की तरह एक सबाई (7-हर्फ़ी) रुक्न है

डा0 कुँअर बेचैन ने इस बह्र का नाम ’बिन्दु अंकन छन्द’ रखा है। उन्हीं के शब्दों में -"’रमल शब्द अरबी भाषा का है।इस शब्द का अर्थ उस विद्या से है जिससे भविष्य में होने वाली घटनायें बता दी जाती हैं ।इस विद्या का मूल आधार नुक़्ते (ब0ब0 निक़ात) [बिंदियां] हैं ,इसी अर्थ के आधार पर हम इसे ’बिन्दु अंकन छन्द’ नाम दे रहे हैं।इस बह्र के विषय प्रेरणात्मक भी हो सकते हैं और उपदेशात्मक भी।"



ख़ैर ,नाम में क्या रखा है । वैसे मेरे ख़याल से ’रमल’ नाम भी कोई बुरा नहीं है

वैसे तो यह बह्र सालिम रुक्न की हैसियत रखता है मगर न जाने क्यों उर्दू में इस बह्र की सालिम शकल (मुसद्दस सालिम या मुसम्मन सालिम) में बहुत कम अश’आर कहे गयें है .प्राय: इस बह्र की मुज़ाहिफ़ शक्ल (ख़ास तौर पर मह्ज़ूफ़ ज़िहाफ़ की शकल) में ज़्यादा अश’आर कहे गये जो ज़्यादा आहंगख़ेज़ (लयपूर्ण) हैं ।ख़ैर.....



यह रुक्न भी ’सबब’(2 हर्फ़ी कलमा) और ’वतद (3 हर्फ़ी कलमा) के योग [combination ] से बना है वैसे ही जैसे बह्र-ए-हज़ज का रुक्न [मफ़ा ई लुन] बना था । देखिए कैसे



फ़ा इला तुन् =सबब +वतद + सबब

= 2 + ( 1 2) + 2

=2 1 2 2

बात वही .

उर्दू में सबब के 2 भेद और वतद के 3 भेद होते है

उर्दू शायरी में इस का ख़ास महत्व है कारण कि उनके यहां हर्फ़ हरक़त और साकिन से वज़न derive करते है जब कि हिन्दी में साकिन का Concept नहीं है [संस्कृत की बात और है]

इसी लिए मैने पहले ही कह दिया है कि यह मज़्मून हिन्दी दोस्तों के नुक़्त-ए-नज़र से लिख रहा हूँ जिन्हे उर्दू ग़ज़ल कहने और पढ़ने समझने का शौक़ है और वो कुछ कहना चाह्ते है यह मज़ामीन शायद उर्दू अदीब या अरूज़ी के नुक़्ते नज़र ज़्यादा कामयाब या मुस्तफ़ीद न हों।

बह्र-ए-रमल की भी परिभाषा भी वही है जो और सालिम बह्र के साथ है जैसे

[1] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 4-बार (यानी मिसरा में 2-बार ] आता है तो बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम कहते हैं



2 1 2 2 / 2 1 2 2 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2 1 2 2 / 2 1 2 1 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्



[2] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 6 बार (यानी मिसरा में 3-बार) आये तो बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम कहलायेगी



2122 /2122 /2122 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2122 /2122 /2122 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्



[3] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 8 बार (यानी मिसरा में 4-बार) आता है तो यह बह्र "बह्र-ए-मुसम्मन सालिम’ कहलाती है



2122 /2122 /2122/ 2122 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्/ फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2122 /2122 /2122 / 2122 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् /फ़ा इला तुन् /फ़ा इला तुन्



[4] और अगर यह रुक्न किसी शे’र में 16 बार (यानी मिसरा मेम 8-बार ) आता है तो यह 16-रुक्नी बहर "बह्र-ए- मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम" कहलायेगी

2122 /2122/2122/2122/2122/2122/2122/2122

2122/ 2122/2122/2122/2122/2122/2122/2122



जैसा कि ऊपर कह चुका हूँ अगर्चे (यद्दपि) यह बहर सालिम रुक्न की हैसियत रखता है मगर इस की सालिम शक्ल में बहुत कम अश’आर कहे गये है-पता नही क्यों? इसकी ’मुज़ाहिफ़’ शकल ही ज़्यादा मुस्तमिल (इस्तेमाल में) है

फिर भी कुछ इधर उधर से अरुज़ की किताबों से ,इन्टर्नेट से खोज कर क़ारीं (पाठकों) की सहूलियत को मद्द-ए-नज़र और बात वाज़ेह करने के लिए लगा रहा हूँ । अहबाब(दोस्तों) से दस्तबस्ता (करबद्ध) गुज़ारिश है कि इस बह्र के सालिम शक्ल की कोई और मिसाल मिले तो राकिम-उल-हरूफ़ (इस लेखक को) ज़रूर आगाह कीजिएगा”

जनाब ’सरवर ’ साहब ने ’क़तील सिफ़ाई साहब के शे’र की बह्र-ए-रमल मुसम्मन सालिम’ की निशानदेही की है आप भी मुलाह्ज़ा फ़र्माये



था ’क़तील’ इक अहल-ए-दिल अब उस को भी क्यों चुप लगी है

एक हैरत सी है तारी ,शहर भर के दिलबरों पर

‘ -क़तील सिफ़ाइ

जो डुबाना था मुझे तो क्यों मुझे साहिल दिया था

तोड़ना ही था अगर तो क्यों मुझे यह दिल दिया था



-डा0 कुँअर बेचैन (ग़ज़ल का व्याकरण से)

रू-ब-रू हर बात कहना है यक़ीनन ज़ीस्त आदत

अपने बेगाने सभी हम से ख़फ़ा हैं क्या करें हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }



अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं कि बात कहां तक वाज़ेह (साफ़)हुई

2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

था ’क़तील’ इक/ अहल-ए-दिल अब /उस को भी क्यों /चुप लगी है

एक हैरत /सी है तारी /,शहर भर के/ दिलबरों पर

‘ -क़तील सिफ़ाइ

{’को’ ’है’ का वज़न 1- पर पढ़ें ]

अब आप देखेंगे कि 2122(फ़ा इला तुन) की तकरार (आवॄति) मिसरा में 4-बार आया है इसलिए बज़ाहिर (स्पष्ट है )यह मुसम्मन शकल है । अब इसी बह्र में एक दूसरा शे’र लेते हैं और इसकी तक़्तीअ करते हैं

2 1 2 2 /2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

जो डुबाना/ था मुझे तो /क्यों मुझे सा /हिल दिया था

तोड़ना ही/ था अगर तो /क्यों मुझे यह /दिल दिया था



-डा0 कुँअर बेचैन (ग़ज़ल का व्याकरण से)-साभार

इसी बह्र में एक और शे’र लेकर बात और साफ़ करते हैं

2 1 2 2/ 2 1 2 2/ 2 1 2 2/ 2 1 2 2

रू-ब-रू हर/ बात कहना/ है यक़ीनन/ ज़ीस्त आदत

अपने बेगा/ने सभी हम /से ख़फ़ा हैं /क्या करें हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }-साभार

अब एक मिसाल बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम का भी देख लेते है



हिज्र में तन्हाई का आलम अजब था

डूब कर यादों में तेरी सो गये हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }-साभार

और अब इस की तक़्तीअ भी कर लेते हैं

2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

हिज् र् में तन्/ हाइ का आ /लम अजब था

डूब कर या/दों में तेरी /सो गये हम



यानी 2122 (फ़ा इला तुन्) का गिर्दान (मिसरा में 3-बार) और शे’र में 6-बार आया है इस लिए यह रमल मुसद्द्स सालिम कहलायेगी



एक बात ग़ौर फ़र्मायें



ऊपर के शे’र मिसरा उला में और मिसरा सानी में ’में’ दोनो जगह आया है मगर दोनो जगह इसका वज़न मुख़्तलिफ़ ( भिन्न) है

मिसरा-ऊला में इस का वज़न 2- करार पाता है जब की मिसरा सानी में 1-करार पा रहा है\ जानते हैं क्यों ?

क्योंकि’ रुक्न’ यही तलब कर रहा है बह्र की यही मांग है ।वगरना मिसरा सानी बहर से ख़ारिज़ हो जायेगा । यही है शे’र की नज़ाकत और बारीकियाँ



मिसाल के तौर पर अज़ीम शो’अरा (शायरों) के कलाम लगाने का मक़सद यह भी है कि हम आप उनके मयार-ए-सुखन से वाक़िफ़ हों और वक़्तन-फ़-वक़्तन (समय समय पर )हम अपने अपने कलाम भी देखें कि उस Bench mark से हम कहाँ है और हमारी कोशिश अभी कितनी मश्क़ तलब है

आप सभी कारीं (पाठकों) से गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें



सादर

-आनन्द.पाठक

09413395592

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