शनिवार, 5 जनवरी 2013

उर्दू बह्र पर एक बात चीत..बह्र-ए-मुत्क़ारिब (क़िस्त 1)


[दोस्तो ! बहुत दिनों बाद अपने इस ’साईट’ पर लौटा हूं~ वज़ह तो कोई  ख़ास तो नहीं बस मैं  दीगर कामों की मस्रूफ़ियत कह सकता हूं~ और आप मेरी कोताही कह सकते है। अब गिला शिकवा भी क्या ...जब ताख़ीर हो गई तो बहाना क्या...।


ख़ैर..इस बार अपने हिन्दी दां दोस्तों की ख़ातिर मज़्मून का एक सिलसिला शुरु कर रहा हूं ,,,..शायद आप लोग जो ग़ज़ल कहने का शौक़ फ़र्माते हैं इस सिलसिले से कुछ मुस्तफ़ीद (लाभान्वित) हो सकें
बा अदब....]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत (क़िस्त 1)
बहर्-ए-मुतक़ारिब्( 122)

[disclaimer clause : इस मज़्मून (लेख) का कोई भी हिस्सा हमारा नहीं है और न ही मैने कोई नई चीज़ खोज की है ।ये सारी चीज़े उर्दू के अरूज़ की किताबों में आसानी से मिलती है ।जो कुछ मैने  हिन्दी ,उर्दू की किताबों से ,चन्द उर्दू के मज़ामीन (मज़्मून का ब0ब0) ,रिसालों से इन्टेर्नेट पे द्स्तयाब (उपलब्ध) सामग्री और उर्दू की इन्टेरनेट की मज़लिस महफ़िल फ़ोरम से  पढ़ा,समझा,सीखा उसी की बिना (आधार) पर लिख रहा हूं। मैं खास तौर से आ0 कुंवर बेचैन की किताब (ग़ज़ल का व्याकरण (हिन्दी में )  जनाब सरवर आलम राज़’सरवर’ साहेब के मज़ामीन ’आसान अरूज़ और शायरी की बुनियादी बातें-उर्दू में ) शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी साहेब कि किताब .से . और कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहेब की किताब ’आहंग और अरूज़" (उर्दू में) से मदद ली है }मैं इन अज़ीम शो’अरा और लेखकों का मम्नून (आभारी ) हूं

यह बात मैं इस लिए भी लिख रहा हूं कि बाद में मुझ पर सरक़ेह (चोरी) का इल्जाम न लगे
ख़ुदा मुझे इस कारफ़र्माई की तौफ़ीक़ दे
एक बात और

यदि कोई पाठकगण इन लेखों का या सामग्री का कहीं उपयोग करना चाहें तो नि:संकोच ,बे-झिझक प्रयोग कर सकते हैं अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि मैं कोई नई चीज़ तो कह नहीं रहा हूं  और न ही  मैने कुछ इज़ाद किया है ।


मैं कोई अरूज़ी (उर्दू छन्द शात्र का ज्ञाता) भी नहीं हूं और न ही ऐसी कोई मुझ में सलाहिअत (योग्यता एवं दक्षता)  है मगर  .’अमित’ भाई  के हुक्म की तामील में कुछ बातें यहाँ लिख रहा हूं।  ’अमित’ भाई और  इस बज़्म के और मेम्बरान  भी अच्छे शायर है और अरूज़ के जानकार हैं ,उमीद करता हूं कि इस मज़्मून में अगर कहीं कोई नुक़्स नज़र आये तो रह्नुमाई करेंगे और मेरी हिमाकत को नज़र अन्दाज़ करेंगे
   मेरा यह मानना है कि एक अच्छा अरूज़ी एक अच्छा शायर भी हो ,ज़रूरी नहीं और यह भी ज़रूरी नही कि एक अच्छा शायर अच्छा अरूज़ी भी हो। अगर दोनों चीज़ें एक साथ हो तो फिर ....सोने में सुगन्ध कहें या सोने पे  सुहागा.....}

यह आलेख हिन्दी दोस्तों की उर्दू अदब आश्नाई देख कर लिखी जा रही है और बहर के वज़न पर ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है  अत: गुज़ारिश है कि इस को उसी नुक़्त-ए-नज़र( दृष्टि कोण) से देखा जाय कारण यह कि हिन्दी में ....हरकत ...’साक़ित’...साकिन..हर्फ़ का कन्सेप्ट उतना नहीं है जब कि उर्दू में रुक़्न की तामीर में इनका बहुत ख़्याल रखा जाता है

अज़किब्ला (इस से पहले) उर्दू की सालिम बहूर (बह्र का ब0ब0) का ज़िक्र कर चुका हूं उसी में से
 ,एक मानूस-ओ-मक़्बूल (लोकप्रिय) बह्र है " मुतक़ारिब बह्र" जिसका बुनियादी रुक़्न है ’फ़ ऊ लुन्’ और जिसका वज़न है 122.यह 5-हर्फ़ी रुक़्न है ।वैसे  कहा तो यह जाता है कि पहले 7-हर्फ़ी (फ़ाइलातुन..मुस्तफ़िलुन ...वग़ैरह) वज़अ हुई (अस्तित्व) और 5-हर्फ़ी बह्र बाद में वज़अ हुईं
सालिम बह्र सबब (2- हर्फ़ी लफ़्ज़) और वतद (3-हर्फ़ी लफ़्ज़) की तकरार (आवॄति) से बनती है । हिन्दी में ग़ज़ल कहने के लिए इस बह्र के बारे में अभी इतना ही जानना काफी है वरना
उर्दू में सबब के 2-क़िस्म है

 (1) सबब-ए-ख़फ़ीफ़    वज़्न 2
(2)  सबब-ए-शकील     वज़्न 2
और

वतद (वतद का जमा अवताद ) के 3 किस्में है
(1) वतद-ए-मज़्मुआ      वज़्न 12
(2) वतद-ए-मफ़्रूक़        वज़्न 21
(3) वतद-ए-मौक़ूफ़

इन सब बुनियादी इस्तिहालात (परिभाषाओं) का ज़िक्र मुनासिब मुकाम पर समय समय पर करते रहेंगे.उर्दू स्क्रिप्ट् में यहां दिखाना तो मुश्किल है अभी तो बस इतना  ही समझ लीजै कि ’सबब’ का वज़्न 2 और वतद का वज़्न (12) या (21)

फ़ ऊ लुन् = वतद + सबब
=  (फ़े ऎन वाव )+ (लाम नून)
= ( 1 2) +(2)     [नोट करें ;-फ़े का वज़्न 1 और ऎन और वाव एक साथ लिखा और बोला जायेगा तो वज़्न 2)
            = 122   यह बह्र मुतक़ारिब की मूल रुक़्न है
यह रुक़्न अगर किसी
मिसरा  में 2 बार और शे’र में 4 बार आता है तो उसे बह्र-ए-मुतक़ारिब ’मुरब्बा’ सालिम कहेंगे (मुरब्बा=4)
-----     3  बार -------    6 बार आता है तो उसे बह्र-ए-मुतक़ारिब ’मुसद्दस’  सालिम कहेंगे(मुसद्दस=6)
---------  4 बार .................8 बार आता है तो उसे बहर-ए-मुतक़ारिब ’मुस्समन’ सालिम कहेंगे(मुसम्मन=8)

--------   8 बार ...............16 बार आता है तो इसे भी , मुस्समन’ ही कहते है बस  उसमें ’मुइज़ाफ़ी’ लफ़्ज़.मुसम्मन से पहले.जोड़ देते है जिससे यह पता चले कि यह ’मुस्समन’ की दो-गुनी की हुई बहर है
खैर
यह बह्र इतनी मधुर और आहंगखेज़ (लालित्य पूर्ण ) है कि  इस बह्र में बहुत से शो;अरा नें बहुत अच्छी और दिलकश ग़ज़ल कहे  हैं
खुमार बाराबंकी साहब की इसी बह्र में एक गज़ल है  आप भी मुलाहिज़ा फ़र्मायें
मत्ला पेश है

न हारा है इश्क़ और,न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है ,हवा चल रही है

्तक़्तीअ  पर बाद में जाइएगा पहले इस शे’र की शे;रियत देखिए .क्या बात कही है ..इश्क़ और दुनिया ...दिया और हवा सब अपना अपना काम कर रहें है बग़ैर अन्जाम की परवाह किए बग़ैर

खैर इसकी तक़्तीअ पर आते है

122    /  122 /122    /122
न हारा/ है इश्क़ और/न दुनिया/थकी है
122    /122/   122  /122
दिया जल/रहा है/हवा चल/ रही है

इसलिए कि अगर मिसरा को बह्र और वज़्न में पढना है तो ’है’ को दबा कर (मात्रा गिरा कर कि 1 का वज़्न आये) प्र्र पढ़ना  पढ़ेगा
[-"इश्क़ और '- को 22 के  वज़न पर  पढ़ना पड़ेगा यानी ’इश्क़’ को  ’इश’ और "और" को "अर’  की वज़न पर पढ़ना पड़ेगा

एक बात और
इस शे’र में 122 की आवॄति 8-बार हुई है(यानी एक मिसरा में 4 बार आया है) अत: यह मुस्समन(8) हुआ
चूंकि 122 अपनी मूल स्वरूप (बिना किसी बदलाव के बिना किसी काट-छाँट के पूरा का पूरा ,गोया मुसल्लम)में हर बार रिपीट् हुआ अत्: यह "सालिम’ बहर हुआ
अत: इस बहर का नाम -हुआ "बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम’
चन्द अश’आर आलिम जनाब  इक़बाल साहब का लगा रहा हूं बहुत ही मानूस(प्रिय) ग़ज़ल है
सितारों से आगे जहां और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं

कनाअत न कर आलमे-रंगो-बू पर
चमन और भी  आशियां और भी हैं

तू तायर है परवाज़ है काम तेरा
तिरे सामने आसमां और भी है

इन अश’आर की शे’रिअत देखिए और महसूस कीजिए ..यहां काफ़िया की तुकबन्दी नहीं रदीफ़ का मिलान नहीं शे’र का वज़्न (गुरुत्व) और असरपज़ीरी देखिए और फिर देखिए की हम लोगों की गज़ल या शे’र कहां ठहरते हैं (यानी कहीं नहीं)
अब इसके तक़्तीअ पर एक नज़र डालते हैं
122    /122    /122    /122
सितारों /से आगे /जहाँ औ /र भी हैं
अभी इश्क़/ के इम्ति/हाँ औ/ र भी हैं     (इश्क़ को ’इश् क’ की वज़न पर पढ़ें और ’इम्तिहां’ को ’इम’ ’ति’ की वज़्न पर पढ़ें क्योंकि बहर की यहां पर यही माँग है)

क़नाअत /न कर आ/लमे-रंगो/-बू पर
चमन औ/र भी आ/शियां  औ/र भी हैं

तू तायर/ है परवा/ज़ है का/म तेरा
तिरे सा/मने आ/समां औ/र भी हैं

यहां भी ’से’ और ’है’ देखने में तो वज़न 2 का लगता है लेकिन इसे 1 की वज़्न पे पढ़्ना होगा(यानी मात्रा गिरा कर पढ़ना होगा) कारण कि बहर की यही मांग है यहां पे।यह भी बह्र-ए-मुत्क़ारिब मुसम्मन सालिम की मिसाल है कारण वही कि इस बह्र में भी सालिम रुक्न( फ़ ऊ लुन 122) शे’र में 8-बार (यानी मिसरा में 4-बार) प्रयोग हुआ है

इसी सिलसिले में और इसी बहर में चन्द अश’आर इस ख़ादिम खाकसार का भी बर्दास्त कर लें
122    /122    /122 /122
खयालों /में जब से/ वो आने/ लगे हैं
122     /122       122  / 122
हमीं ख़ुद /से ख़ुद को /बेगाने/ लगे हैं

122    /122        /122  /122
वो रिश्तों/ को क्या ख़ा/स तर्ज़ी/ह देते
122      /122    /122  /122
जो रिश्तों /को सीढ़ी /बनाने /लगे हैं

122     /122     /122    /122
अभी हम/ने कुछ तो /कहा भी /नहीं है
122   /  122       /122/ 122
इलाही /! वो क्यों मुस्क/राने लगे हैं   (मुस्कराने =मुस कराने की तर्ज़ पे पढ़े)
ये भी मुतकारिब मुसम्म्न सालिम बह्र है


कई पाठकों ने लय (आहंग) पर भी समाधान चाहा है.कुछ लोगों की मानना है कि अगर लय (आहंग) ठीक है तो अमूमन ग़ज़ल बहर में होगी। मैं इस से बहुत इत्तिफ़ाक़ (सहमति) नहीं रखता ,मगर हां,अगर ग़ज़ल बह्र में है तो लय में ज़रूर होगी ।कारण कि रुक्न और बह्र ऐसे ही बनाये गयें हैं कि लय अपने आप आ जाती है ’फ़िल्मी गानों में जो ग़ज़ल प्रयोग किए गये हैं उसमें लय भी है ..सुर भी है..ताल भी है ..तभी तो दिलकश भी है
उदाहरण के लिए फ़िल्म का एक गीत लेता हूँ आप सब ने भी सुना होगा इसकी लय भी सुनी होगी इसका संगीत भी सुना होगा(अभी फ़िल्म का नाम याद नहीं आ रहा है)...गाना है

इशारों इशारों में दिल लेने वाले ,बता ये हुनर तूने सीखा कहां से
निगाहों निगाहों से जादू चलाना ,मेरी जान सीखा है तूने जहाँ से

अब मैं इस की तक़्तीअ कर रहा हूं
122   /122  /  122   /  122  / 122  / 122  /122    /122
इशारों /इशारों/ में दिल ले /ने वाले /,बता ये/ हुनर तू/ने सीखा /कहां से
122   /122    /122   /122  / 122  /  122 /  122  /122
निगाहों /निगाहों /से जादू /चलाना ,/मेरी जा/न सीखा/ है तूने /जहाँ से

जब आप ये गाना सुनते हैं तो आप को लय कहीं भी टूटी नज़र नही आती...क्यो?
क्यों कि यह मतला सालिम बहर में है और सही वज़न में हैं
यहां ’में’ ’नें’ ’से’ मे’ ’है’  देखने में तो वज़न 2 लगता है लेकिन बहर का तक़ाज़ा है कि इसे 1-की वज़न में पढ़ा जाय वरना सुर -बेसुरा हो जायेगा..वज़न से ख़ारिज़ हो जायेगा (इसी को उर्दू में मात्रा गिराना कहते हैं) मेरी को ’मिरी’ पढ़ेंगे इस शे’र में
ऐसा भी नहीं है कि जहाँ आप ने ’में’ ’नें’ ’से’ मे देखी मात्रा गिरा दी ,वो तो जैसे ग़ज़ल की बह्र मांगेंगी वैसे ही पढ़ी जायेगी
 ऊपर के गाने में रुक़्न शे’र में 16-बार यानी मिसरा में 8-बार प्रयोग हुआ है अत: यह 16-रुकनी शे’र है मगर है मुस्समन ही
अत: इस पूरी बहर का नाम हुआ,.....बहर-ए-मुक़ारिब मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम
आप भी इसी बहर में शे’र कहें ..शायद कुछ बात बने..(शे’र


अभी हम ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’ सालिम पर ही चर्चा करेंगे जब तक कि ये बह्र आप के ज़ेहन नशीन न हो जाय। इस बह्र के मुज़ाहिफ़ (रुक्न पे ज़िहाफ़ ) शक्ल की चर्चा बाद में करेंगे
 यह ज़रूरी नहीं कि आप ’मुसम्मन’सालिम (शे’र मे 8 रुक्न) में ही  ग़ज़ल कहें
आप चाहें तो मुसद्द्स सालिम (शे’र में 6 रुक्न) में भी अपनी बात कह सकते है
मैं मानता हूँ कि मुरब्ब सालिम (शे’र में 4 रुक़्न) में अपनी बात कहना मुश्किल काम है मगर असम्भव नहीं है अभी तक इस शक्ल के शे’र मेरी नज़र से गुज़रे नहीं है.अगर कभी नज़र आया तो इस मंच पर साझा करुंगा
मगर बह्र-ए-मुतक़ारिब की मुसम्मन शक्ल इतनी मानूस (प्रिय) है कि अज़ीम शो’अरा (शायरों) ने इसी शक्ल में बहुत सी ग़ज़ल कही है। मैं इसी बहर की यहां 1-ग़ज़ल लगा रहा हूँ। यहां लगाने का मक़सद सिर्फ़ इतना है कि लगे हाथ हम-आप शे’र की मयार (स्तर) और उसके शे’रियत के bench mark से भी वाकिफ़ होते चलें और यह देखें कि हमें इस स्निफ़ (विधा) में और मयार में कहाँ तह जाना है ।तक़्तीअ आप स्वयं कर लीजिएगा .एक exercise भी हो जायेगी

मक़्बूल शायर जनाब इक़बाल साहब का एक  ग़ज़ल लगा रहा हूं ।आप ग़ज़ल पढ़े नहीं सिर्फ़ गुन गुनायें और दिल में महसूस करें

इसकी बुनावाट देखिए ,मिसरों का राब्ता(आपस में संबन्ध) देखिए अश’आर की असर पज़ीरी(प्रभाव) देखिए और इसका लय (आहंग) देखिए और फिर लुत्फ़ अन्दोज़ होइए

122/122//122/122
तिरे इश्क़ का इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख मैं क्या चाहता हूँ

सितम हो कि हो वादा-ए-बेहिजाबी
कोई बात सब्र आज़मा चाहता हूँ

ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ

ज़रा-सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना
वही लनतरानी सुना चाहता हूँ

कोई दम का मेहमां हूं ऎ अहले-महफ़िल
चिराग़े-सहर हूँ  बुझा चाहता हूँ

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बेअदब हूँ  सज़ा चाहता हूँ

नोट : इश्क़ को  ’इश् क (2/1) की वज़न में पढ़े
     ’इन्तिहा’ को इन् तिहा (2/12) की वज़्न् पे पढ़ें

वादा-ए-बेहिजाबी  =पर्दा हटाने का वादा
लनतरानी       =शेखी बघारना
चिराग़-ए-सहर    =भोर का दीपक

शायद ये प्रस्तुति शायद आप के काम आये ,इस उमीद से
सादर
आनन्द.पाठक
09413395592






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