शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

उर्दू बहर पर एक बातचीत --क़िस्त 8



[Disclaimer clause  : -वही भाग 1 का ]

[प्राक् कथन-- इस मज़मून [आलेख] के भाग-7 तक इस मंच पर तथा अपने Blog                    
 www.urdu-se-hindi.blogspot.in पर लगा चुका हूँ ,पाठकगण यदि देखना चाहें तो वहाँ देख सकते हैं

 मुद्दत के बात फिर इस सिलसिले पर लौट रहा हूँ ।ताख़ीर[विलम्ब] के लिए माज़रत [क्षमा] चाहूंगा । ताख़ीर का सबब यह कि मेरी मस्रूफ़ियत दीगर कामों में जैसे अन्य मंच पर चर्चा परिचर्चा में भाग लेना ,गीत ग़ज़ल व्यंग्य हास-परिहास लेखन में व्यस्त हो जाना आदि आदि। अंग्रेजी में इसे All in One ,Good for none कहते हैं जिसका मैं जीता जागता उदाहरण हूँ।

मेरे ब्लाग के मित्रों और  मंच के अन्य मित्रों की इच्छा का मान रखते हुए यह सिलसिला एक बार फिर शुरु कर रहा हूँ ।ख़ुदा इस कारफ़र्माई की तौफ़ीक़ अता करे ।]

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जैसे किसी काव्य के दो-पहलू होते है ,वैसे ही उर्दू शायरी में भी दो-पहलू हैं
1-कला पक्ष ---में भाषा ,अलंकार छन्द कव्य सौष्ठ्व बह्र वज़न फ़साहत आदि रख सकते हैं
2-भाव पक्ष ----में रस ,तग़ज़्ज़ुल,रंग,तख़य्युल, शे’रियत लताफ़त-ओ-बलाग़त आदि रख सकते हैं

आप तो जानते ही होंगे कि उर्दू शायरी में मुस्तमिल [इस्तेमाल में] बहूर [बह्र का ब0ब0] अरबी और फ़ारसी से आया है । अरबी की बहुत सी बह्रें उर्दू में अब राईज़ [प्रचलित] नहीं है ।
 दौर-ए-हाज़िर [वर्तमान समय में] उर्दू शायरी में 19-बह्रें राइज हैं ,दर्ज़-ए-ज़ैल [ निम्न लिखित] हैं

नाम वज़न   रुक्न
सालिम बहूर
1 बह्र-ए-मुतक़ारिब 1 2 2 फ़ ऊ लुन्
2 बह्र-ए-मुत्दारिक़ 2 1 2 फ़ा इ लुन्
3 बह्र-ए-हज़ज 1 2 2 2 मफ़ा ई लुन्
4 बह्र-ए-रमल 2 1 2 2 फ़ा इला तुन्
5 बह्र-ए-रजज़ 2 2 1 2 मुस तफ़ इलुन्
   मुक़्तज़िब 2 2 2 1     मफ़ ऊ लात
*6 बह्र-ए-वाफ़िर 1 2 1 1 2   मफ़ा इ ल तुन्
7 बह्र-ए-कामिल 1 1 2 1 2   मु तफ़ा इ लुन्

मुरक़्क़ब बहूर

8 बह्र-ए-तवील 1 2 2 + 1 2 2 2 [ फ़ऊलुन्+मफ़ाईलुन्]
9 बह्र-ए-मदीद 2 1 2 2 + 2 1 2 [फ़ाइलातुन्+फ़ाइलुन् ]
10 बह्र-ए-बसीत 2 2 1 2 + 2 1 2 [मुस तफ़ इलुन्+फ़ाइलुन्]
11  बह्र-ए-मुशाकिल 2 1 2 2 + 1 2 2 2 + 1 2 2 2 [फ़ाइलातुन्+ मफ़ाईलुन्+मफ़ाईलुन्]
**12 बह्र-ए-मुन्सरिअ 2 2 1 2 + 2 2 2 1 [मुस तफ़ इलुन्+ मफ़ ऊ लात]
**13 बह्र-ए-मुक़्तज़िब 2 2 2 1 + 2 2 1 2 [मफ़ ऊ लात +मुस तफ़ इलुन्]
**14  बह्र-मज़ारिअ 1 2 2 2 + 2 1 2 2 [मफ़ाईलुन्+फ़ाइलातुन्]
**15  बह्र-ए-मुज्तस   2 2 1 2 + 2 1 2 2 [मुस तफ़ इलुन्+ फ़ाइलातुन्]
**16  बह्र-ए-ख़फ़ीफ़ 2 1 2 2 + 2 2 1 2 + 2 1 2 2 [ फ़ाइलातुन्+मुस तफ़ इलुन्+फ़ाइलातुन्]
**17  बह्र-ए-सरीअ 2 2 1 2 +2 2 1 2 + 2 2 2 1   [  मुस तफ़ इलु्न्+मुस तफ़ इलुन्+मफ़ ऊ लात]
**18  बह्र-ए-क़रीब 1 2 2 2 + 1 2 2 2 + 2 1 2 2  [मफ़ाईलुन्+ मफ़ाईलुन्+फ़ाइलातुन्]
**19 बह्र-ए-ज़दीद    2 1 2 2 + 2 1 2 2 + 2 2 1 2 [फ़ाइलातुन्+फ़ाइलातुन्+मुस तफ़ इलुन्]

घबड़ाइए नहीं । । मैं  तो बस जो इधर उधर से कुछ पढ़ा अपने हिन्दी दाँ दोस्तों के बताने समझने व समझाने के लिए लिख रहा हूँ।ताईराना नज़र {विहंगम दृष्टि}से इस लिए लिख रहा हूँ कि आप को शे’र-ओ-शायरी और उसकी तासीर समझने में सुविधा हो।ग़ज़ल और तुकबन्दी में फ़र्क महसूस कर सके । शरद तैलंग जी का एक शे’र है-

सिर्फ़ तुकबन्दियां ही हैं काफी नहीं
शायरी कीजिए शायरी की तरह

 यहाँ कुछ बातें स्पष्ट कर दें

[1]-कि एक अच्छा ’अरूज़ी’ [ बह्र /छन्द शास्त्र को जानने वाला ] एक अच्छा ’शायर’ भी हो ज़रूरी नहीं और यह भी ज़रूरी नहीं कि एक अच्छा ’शायर" एक अच्छा ’अरूज़ी’ भी हो। दोनो अलग अलग बाते हैं। अगर एक ही शख़्स में ये दोनो सिफ़त [गुण] हो तो समझिए सोने में सुगन्ध भी है।

[1]अ-कि आप बग़ैर इल्म-ए-अरूज़ [छन्द शास्त्र की ग्यान ] के भी शायरी कर सकते हैं वैसे ही कि बिना राग के ज्ञान के बिना फ़िल्मी गाना गाते है। किसी उस्ताद शायर की ग़ज़ल के सहारे सहारे कभी चुटकी बजा कर ,कभी टेबल थपथपा कर बह्र मिला सकते है। दर हक़ीक़त कुछ लोग ऐसा करते भी हैं और दिन में 2-4 "ग़ज़ल" लिख भी लेते है मगर इस से आप को ग़लत-सही का अन्दाज़ा नहीं लग सकता।

[1] ब--- कि ग़ज़ल सिर्फ़ बहर ,वज़न,रुक्न ,रदीफ़ या काफ़िया का पैमां बन्दी ही नहीं होता। वो इस से भी आगे बहुत कुछ होता है

[2]---कि बह्र-ए-मुतक़ारिब और बह्र मुतदारिक़ का रुक्न 5-हर्फ़ी है और इसका ईज़ाद बाद में हुआ यानी 7-हर्फ़ी रुक्न का ईज़ाद पहले हुआ था।

[2]अ-- बहर 6 और 7 अरबी शायरी का है ।अगर आप ग़ौर से देखे तो बहर-ए-वाफ़िर [12 112] ,बहर-ए-कामिल [112 12 ] का बरअक्स [प्रतिबिम्ब mirror image] है | बह्र-ए-कामिल खुद मे इतनी मक़्बूल और आहंग्ख़ेज़ बहर है इसी बहर में अल्लामा इक़बाल की एक ग़ज़ल बड़ी मशहूर है---

कभी ऎ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़िर ,नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में  [11212--1121--11212-11212]
कि हज़ारों सिजदे तड़प रहे हैं ,मेरी इक जबीन-ए-नियाज़ में

जो मैं सर-ब-सिजदा हुआ कभी ,तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम-आश्ना ,तुझे क्या मिलेगा  नमाज में 

कहने का मतलब ये है कि ऐसे मानूस बहर में कम ही शे’र या ग़ज़ल  देखने को मिलते हैं

[3]-अगर आप ग़ौर फ़र्मायें तो देखेंगे कि 7-हर्फ़ी रुक्न[1 से लेकर 5 तक और मफ़ऊलात तक] में 1 की रोटेशन कैसे बदल रही है यानी आप कल्पना करें कि 2 -2 -2- 1 किसी वृत्त पर हो और आप तीन -तीन  अंक एक साथ का गिर्दान लें तो किसी न किसी बह्र का वज़न बनता जायेगा । अरूज़ की भाषा में इस वृत को ’दायरा’ कहते हैं

[4]- मफ़ऊलात को ’सालिम’ बह्र में नहीं रखा गया जब कि इसके रुक्न [2 2 2 1 ] सालिम हैं। कारण कि यह रुक्न अपने सालिम शक्ल में इस्तेमाल नहीं होती । क्यों ? इस लिए कि उर्दू शायरी में मिसरा या शे’र का आख़िरी ’हर्फ़’ साकिन होता है जब कि ’मफ़ऊलात’ का आखिरी हर्फ़ ’त’ पे हरकत है । अगर इस रुक्न को मुसद्दद [ मिसरे में 3 रुक्न -मफ़ऊलात -,मफ़ऊलात-मफ़ऊलात ] या ’मुसम्मन में [ मिसरे में 4 रुक्न] बांधे तो आखिरी ’हर्फ़’ जो होगा वो हरकत पे ख़त्म होगा जो उर्दू के शे’र में ज़ायज नहीं माना जाता है। तब ?? इसी लिए इस रुक्न की ’मुज़ाहिफ़’[ बदली हुई] शक्ल इस्तेमाल करते हैं जिससे ’मिसरे’ का आख़िरी ’हर्फ़’ साकिन पे गिरे।
[ पाठकों की जानकारी के लिए- हिन्दी  में आजकल ’साकिन’ और ’हरकत’ का concept  नहीं है । संस्कृत में है।
साकिन को मोटा मोटी आप यूँ समझे ’हलन्त’ लगा हुआ वर्ण जैसे तत्पशचात्...कदाचित्..अकस्मात्. और हरकत को आप मोटा मोटी यूँ समझे जैसे ’रात’ ’बात’ यानी ’त’ पर जबर या फ़त्ता: का [हरकत] है]

[5]- ऊपर एक से लेकर सात तक ’सालिम’ बह्रें कहलाती है कारण कि इसके रुक्न बिना किसी काट-छांट या कतर-ब्योंत के अपने सालिम शक्ल में ही इस्तेमाल में होती हैं । इन सालिम बह्र पे मैं इसी मंच पे सोदाहरण चर्चा कर चुका हूं [ क़िस्त 1 से क़िस्त 7 तक] में  देखा जा सकता है

मुतक़ारिब बहर में ये फ़िल्मी गीत भी आप ने सुना होगा
बह्र-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम में यह गाना

"इशारों इशारों में दिल लेने वाले,  [122---122--122--122]
बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से" 
या
तुम्हें प्यार करते हैं करते रहेंगे
 कि दिल बन के दिल में धड़कते रहेंगे

या बह्र-ए-हजज़ मुसम्मन सालिम [1222] में यह गाना

ख़ुदा भी आस्मां से जब ज़मीं पे देखता होगा [1222--1222--1222--1222]
मेरे महबूब को किसने बनाया सोचता  होगा

 फ़िल्मी गीत का मिसाल देने का मक़सद फ़क़त इतना ही है कि आप बहर की आहंग [लय] मौसिकी [संगीत] तअस्सुर[प्रभाव] और दिलकशी से कितना मुत्तस्सिर [प्रभावित] होते हैं जब कोई ग़ज़ल बह्र में होती है । बह्र से ख़ारिज़ गज़ल की बात ही क्या करना

[आप ’तक़्तीअ’ कर के देख भी सकते हैं ,ऐसे बहुत से फ़िल्मी गीत या ग़ज़ल मिल जायेंगे जो किसी न किसी बहर में होंगे]

[6]- ऊपर 8 से लेकर 19 तक की बह्र को ’मुरक़्क़ब’ [यानी मिश्रित ] बहर कहते हैं । कारण कि ये बहर दो या तीन रुक्न से मिल कर बनती है ।ये रुक्न मुसद्दस या मुसम्मन की सूरत में अलग अलग ही गिने जाते हैं यानी बह्र-ए-तवील की अगर कोई मुसम्मन शकल होगी तो मिसरा ऊला में रुक्न की सूरत होगी [1 2 2 + 1 2 2 2 ,1 2 2 + 1 2 2 2 ] जब कि बह्र तवील का अफ़ाईल है [ 1 2 2 + 1 2 2 2 ]

[6[अ] बज़ाहिर [स्पष्टतया] बहर 8 से लेकर 14 तक ,मिसरा या तो मुरब्ब[शे’र में 4-रुक्न] या मुसम्मन [शे’र में 8-रुक्न] में ही बाँधा जा सकता है । मुसद्दस [ शे’र में 6-रुक्न] तो क़त्तई नहीं बांधा जा सकता।

[7]- बह्र **12-से लेकर **19 तक और बह्र-ए-वाफ़िर [**6] ,उर्दू शायरी में जब भी बाँधी गईं तो मुज़ाहिफ़ शकल में ही बांधी गईं। दीगर अल्फ़ाज़ में हम यह कह सकते हैं कि ये बहरें अपनी ’मुज़ाहिफ़" शकल में ही मुस्तमिल रहीं ।

[7]अ--11 ,16,17,18,और 19 बहर , ग़ज़ल में अपनी मुसद्दस शक्ल में इस्तेमाल होती हैं कारण साफ़ है कि ये बह्रें तीन रुक्न मिला कर तो बना है तो किसी शे’र में छह ही रुक्न तो आयेंगे न। मुसम्मन में तो कत्तई नहीं बाँधा जा सकता।

 [7] ब---इन बह्र्रों में हालाँकि  मुसम्मन शकल बाँधने में कोई मनाही नहीं है और अगर कभी कोई शायर मुसम्मन शकल में शेर कहना चाहे तो उसके लिए अलग से शर्त निर्धारित है जिसकी चर्चा मैं अगले किसी क़िस्त में करूँगा जब इन बहर की चर्चा करूंगा

[8]- इन 19 बह्रों के अलावा भी उर्दू शायरी में और बहुत से बह्रें इस्तेमाल में होती हैं । आखिर वो बह्रे कहाँ से आती हैं या कैसे बनती हैं? ये बहरें ’ज़िहाफ़’ से बनती है । जब किसी सालिम रुक्न पे ’ज़िहाफ़’ लगाते हैं तो रुक्न की शकल और नाम बदल जाते हैं । उर्दू शायरी मे 49-क़िस्म के ज़िहाफ़ हैं जिसमें से कुछ ज़िहाफ़ तो कुछ ख़ास बहर पे लगते है ,और कुछ शे’र के  ख़ास location[ पे लगते हैं .यानी इब्तिदा अरूज़/जर्ब] के लिए मख़्सूस [ ख़ास तौर से निर्धारित ] हैं इनके अपने क़वानीन [कानून] और क़वायद [क़ायदे] हैं । ऐसे तर्मीम शुदा बहरें लगभग 19-20 के आस पास बैठती हैं [ फ़ेहरिस्त {सूची} इसी मंच पर कभी लगा दूँगा}

[9]- घबराईए नहीं । अरूज़ सीखना और समझना कोई मुश्किल नहीं । सीखने के बाद ये सब आसान सा हो जाता है।
अगर हम ये 19-बहर और ज़िहाफ़ लगी बह्रें यानी मुज़ाहिफ़ बहरें और जोड़ लें तो ऐसे बहूर की तादाद सैकड़ों में [लगभग 200] के आसपास बैठती है

[10] - मगर आप घबराईए नहीं । कोई भी शायर इन 200 बहरों में अपनी शायरी नहीं करता और न उस से इसकी उम्मीद की जाती है । हर शायर के अपने ख़ास पसन्द दीदा बहर होते है। जिस पर उनका अधिकार होता है और वो उसी बहर में शायरी करते है जो उनको दिलकश लगता है ।अब बह्र-ए-कामिल को ही ले लीजिये । आहंगखेज़ और दिलकश बहर होने के बावज़ूद शायरों नें इस बहर में शायरी करने से  न जाने क्यों गुरेज़ किया ।इस बहर की मिसाल कम ही देखने को आती है ।इसी तरह ,अगर अज़ीम शो’अरा अगर कुछ ही बह्र में शायरी फ़र्मायेंगे तो मुस्तक़बिल [भविष्य ] में वो बहरें धीरे धीरे ख़त्म जायेंगी। ग़ालिब के दीवान में 19-अक़्साम [क़िस्में] [सालिम ,मुरक्क़ब और मुज़ाहिफ़ सब मिला कर ]  बह्र मिलते हैं-ऐसा कहा जाता है॥,जब कि मीर तक़ी मीर के छह दीवान में 28 क़िस्म के बहर का प्रयोग हुआ है

[11]- दरस्ल शायरी सिर्फ़ बहर ,रदीफ़ ,क़ाफ़िया ,वज़न फ़साहत का ही खेल नहीं बल्कि तग़ज़्ज़ुल शे’रियत ,बलाग़त-ओ-लताफ़त [काव्य सौष्ठव] तख़्ख़्य्युल .लसानी, तसव्वुरात का खेल है इसके बग़ैर शे’र बेमानी .फ़ीका .सपाट..बेजान  है भले ही वो शे’र या ग़ज़ल बहर में हो ,रदीफ़ में हो या क़ाफ़िया बन्दी सही ही क्यों न हो।सच्चा शे’र तो दो मिसरों में कायनात का तसव्वुफ़ समेटने की बात है

[12] -घबराईए नहीं ।  बिना अरूज़ जाने  आप भी ’एक दिन में चार ग़ज़ल ’-कह सकते हैं मगर अरूज़ समझने अरूज़ जानने  के बाद चार दिन में एक शे’र भी सरज़द [निस्सृत] नहीं होता । सच्चे शे’र की तो बात ही छॊड़ दीजिए। ये बात मैं अपनी ज़ाती तज़ुरबात के बिना[आधार] पर कह रहा हूँ । पहले जब अरूज़ नहीं पढ़ा था तो मैं भी एक दिन में ’तथाकथित’ ग़ज़ल लिख लेता था। मगर अब  नहीं होता .लगता है कि जो शे’र कह रहा हूँ उस शे’र में जान नहीं है ,सपाट है ,नाक़िस [बेकार] है । फिर भी कुछ न कुछ नाक़िस शे’र कहने की कोशिश करता ही रहता हूँ । ख़ैर आजकल तो हर कोई ग़ज़ल कह रहा है।

[13]- आप अगर ग़ज़ल कहने का इब्तिदाईया शौक़-ओ-ज़ौक़ फ़र्माते हैं तो दो चार मानूस[प्रिय] बहर चुन लें और उसी में ग़ज़ल कहने की कोशिश करें कि कम अज कम बहर और वज़न तो सही हो।

कभी मौक़ा मिला तो मुरक़्क़ब बहरों पर भी आइन्दा अक़्सात [क़िस्तों ] में चर्चा करूंगा। शायद उस से पहले ज़िहाफ़ पे चर्चा लाजिमी होगा बाईस कि[कारण कि] ज़िहाफ़ सालिम रुक्न पे ही लगती है और इन्ही सालिम बहूर से कई ’मुज़ाहिफ़’ बहरें बनती हैं

और अन्त में 
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उन से मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत ख़यालबन्दी हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं उसे दुरुस्त कर सकूं और  बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।
अस्तु

-आनन्द.पाठक
09413395592



मंगलवार, 27 अगस्त 2013

पत्ता पत्ता बूटा बूटा - एक चर्चा

पत्ता पत्ता बूटा बूटा....एक चर्चा 

यह ’मीर’ का मत्ला [एक शे’र] है

पत्ता पत्ता  बूटा बूटा  हाल   हमारा जाने है 
जाने न जाने गुल ही न जाने,बाग तो सारा जाने है

मीर का पूरा नाम मीर मुहम्मद तक़ी था मीर और ’मीर’ उनका तख़ल्लुस था । मीर और उर्दू के एक बुलन्द-पा शायर थे
उर्दू के जो अदब आश्ना है या जो ग़ज़ल से थोड़ा बहुत भी ज़ौक़-ओ-शौक़ फ़र्माते है उन्हें मीर के बारे बतलाने की ज़रूरत नहीं है ।मीर की अदबी हैसियत का अन्दाज़ा इसे से भी लगाया जा सकता है कि उन को उर्दू अदब (साहित्य] में ’ख़ुदा-ए-सुख़न’ के लकब [उपाधि] से नवाज़ा गया है। ये लकब उनकी शायरी की ख़याल बुलन्दी के बिना[आधार] पर है

हमारे एक मित्र ने ’न जाने न जाने  ’पर कुछ शंका प्रगट किया कि ’ न जाने’ 2-बार आने से कहीं ’निगेटिव’ भाव तो नहीं पैदा हो रहा है। हालाँ कि उन्होंने बड़ी सादगी और मासूमियत से यह एतिराफ़ किया कि--वह शायर का वह ऊंचा अंदाज़ समझ न सके हैं; तड़प, बेकसी और बेबसी अभी भी उनकी समझ के बाहर है | इसीलिए गज़लों को   और उसके व्याकरण को समझने में अपने आप को वह गोबर- गणेश समझते हैं  |
ख़ैर उनके इस साफ़गोई का अन्दाज़ बड़ा ही दिलकश लगा- कौन न मर जाय इस सादगी पे ऎ ख़ुदा -

सच तो यही है कि ’मीर’ के शे’र या ग़ज़ल समझने कि लिए हमारे मित्र ही क्या ,हम आप और भी बहुत से लोग ना-काफी हैं और ख़सूसन तब, जब कि अपने ज़माने के लगभग सभी उस्ताद शायर भी मीर का लोहा मानते थे और मानते हैं

ख़ैर मूल बात पे आते हैं

बात जब मीर की चली तो पहले मीर के बारे में 2-4 बात कर लेते हैं ,फिर उनके इस शे’र पे आते हैं
’ग़ालिब’ -जिनके बारे में कहा जाता है कि उनकी शायरी पर सबसे ज़्यादा तब्सरा किया गया और मज़्मून लिखे गये । उनका यह शे’र तो आप सबने सुना ही होगा

हैं और भी दुनिया में सुखनबर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ’ग़ालिब’ का है ’अन्दाज़-ए-बयां’ 

और
वही ग़ालिब ,मीर के बारे में क्या बुलन्द ख़्याल रखते हैं आप भी-,सुन लीजिये

मीर के शे’र का अहवाल कहूँ क्या ग़ालिब
जिसका दीवान कम अज़ गुलशन-ए-कश्मीर नहीं

[ यानी ,ऎ ग़ालिब , मीर के शे’र की हम क्या बात करें ,अरे! मीर का दीवान [ग़ज़ल संग्रह] तो कश्मीर के किसी बाग़ से कम नहीं]
वैसे मीर के 6-दीवान मुरत्तब [सम्पादित] हुये हैं ।वैसे दोनो ही उस्ताद शायर ’अक़बराबाद [आज का आगरा] के थे जो बाद मे ग़ालिब दिल्ली चले गये थे और मीर साहब लखनऊ।
यानी ग़ालिब नें "क्या कहूँ"-कह कर सारी बातें कह दी ,कुछ बचा नहीं और उनके दीवान की तुलना गुलशने-कश्मीर से कर जो इज्ज़त बख़्शी है या हैसियत नवाज़ी है ,वो क़ाबिल-ए-रश्क़ है
इसी मुत्तलिक़ एक दूसरा शे’र भी सुन लीजिए

रेख़्ता के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब
कहते है अगले ज़माने में कोई मीर भी था

रेख़्ता -उर्दू का पुराना नाम है यानी पहले के शायर रेख़्ता[यानी उर्दू] में ही शायरी करते थे
गोया ग़ालिब भी मानते हैं कि ’मीर’ भी कोई चीज़ हैं ।
अगर ग़ालिब जैसे अज़ीमुश्शान शायर [प्रतिष्ठित शायर]   यह कहे कि

’ग़ालिब’ अपना तो अक़ीदा है ,ब क़ौल-ए-’नासिख़’
आप बे-बहरा हैं जो मोतक़दे  ’मीर’ नहीं 

[यानी ’नासिख़’ ने जो कहा है कि यह आप की ये बद किस्मती है गर  आप मीर की शायरी के क़ायल नहीं हैं -मैं भी यही सोचता हूँ ]
और यह ’नासिख़’ साहब?
जनाब ’नासिख़’ खुद अपने ज़माने के लखनऊ के एक मशहूर शायर थे जिन्होने उर्दू शायरी को एक मुकाम पे पहुँचाया था।
’आप बे-बहरा हैं जो मोतक़दे  ’मीर’ नहीं’--यह  मिसरा उन्हीं का  है जिसके हवाले से ’ग़ालिब’ ने मज़्कूरा [जिसका ऊपर ज़िक्र हो चुका है] शे’र कहा है

और अकेले ग़ालिब ही क्यों ,अमूमन सभी उस्ताद शायरों ने’ ’मीर’ के बारे में अपने अपने  अन्दाज़ से ऐसे ही ख़्याल ज़ाहिर किए हैं
अब ’ज़ौक़ का ही देखिये ! ’ज़ौक़ ’ने क्या कहा है’ -हाय ये न हो सका उनसे- के अन्दाज़ की बेबसी महसूस करते हैं मीर के अन्दाज़ के

न हुआ पर न हुआ ’मीर’ का अन्दाज़ नसीब
’ज़ौक़’ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल पे  मारा

तो फिर अकबर इलाहाबादी की मज़बूरी और बेकसी को आप क्या कहेंगे जो ख़ुद एक मशहूर शायर थे ।जनाब ने तो दोनों यानी नासिख़ और ज़ौक़ दोनो को एक साथ लपेट कर  फ़र्माते हैं -आप भी देखिए

मैं हूँ क्या चीज़ जो इस तर्ज़ पे जाऊँ ’अक़बर’
’नासिख़’-ओ-’ज़ौक़’ भी जब चल न सके ’मीर’ के साथ

मौलाना हसरत मोहानी जो ख़ुद उर्दू शायरी में अपना एक अलग मुकाम रखते है .मीर के बारे में उनका छलकता हुआ दर्द देखिए--कि वो दिल कहाँ से लाऊँ के अन्दाज़ में किस तरह बयान करते हैं

शे’र मेरे भी हैं पुर-दर्द वलेकिन ’हसरत’
मीर का शैवा-ए-ग़ुफ़्तार कहाँ से लाऊँ

नूह नारवी ,जो दाग़ के शागिर्द थे ,का यह मिसरा भी सुन लें कि क्या बेकसी है उनकी इस इसरार में और मीर की शायरी के बारे में

बड़ी मुश्किल से तक़्लीद-ए-जनाब--ए-’मीर’ होती है 

कहने का मतलब यह कि जब उर्दू के उस्ताद शायर भी मीर की शायरी का लोहा मानते थे या है तो हमारी आप की क्या बिसात है

इतनी सारी बातें कहने का मक़सद यही है कि मीर का वो शे’र और उसकी बुलन्दी अगर हम और हमारे मित्र की समझ में नहीं आते हैं तो कोई ग़लत बात नहीं , कोई आश्चर्य की बात नहीं ।
मगर हम सभी अपनी अपनी  फ़हम [समझ] और तमीज से अर्थ {मा’नी) लगाने के लिए आज़ाद तो ज़रूर हैं। शे’र का मा’नी समझना या लगाना तो बस एक कैलि्डियोस्कोप की तरह है जब देखिए एक नया सा ही लगे है ।बस आप इसे घुमाते जाइए ..और हर बार नया नया पैटर्न [मा’नी]  बनता जायेगा ..नये नये अर्थ लगाते जाइए -लुफ़्त अन्दोज़ होते जाइए

अब हम मौज़ू [विषय] पर आते हैं
शे’र था

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है 
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है 

मीर की यह पूरी ग़ज़ल कविता-कोश से साभार, लगा रहा हूँ कि आप सभी लोग उसकी ग़ज़ल्लीयत की तासीर[प्रभाव ] से मुत्तस्सिर [प्रभावित ] हों

पूरी गज़ल इस तरह से है ... (कविता कोश से साभार)

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है


लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश के बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मै-ओ-ख़ोर की तितली का तारा जाने है


आगे उस मुतक़ब्बर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद् ख़ुदा को वो मग़रूर ख़ुद-आरा जाने है


आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़िआँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है


चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है


क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्यद बच्चा
त'एर उड़ते हवा में सारे अपनी उसारा जाने है


मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-कनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है


क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है


आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है


रख़नों से दीवार-ए-चमन के मूँह को ले है छिपा य'अनि
उन सुराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है


तशना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है 

मत्ला और मक़्ता मिला कर सब 11-अश’आर हैं

यह ग़ज़ल इतनी लोक प्रिय है कि लता मंगेशकर जी से लेकर मेहदी हसन साहब ,बेग़म अख़्तर ,तक जगजीत सिंह से लेकर हरिहरन तक दर्ज़नों पेशेवर और ग़ैर पेशेवर गायकों ने इस ग़ज़ल को अपने अपने अन्दाज़ में गाया है और हर ने यही समझा कि उनकी गायकी इस सन्दर्भ में मुकम्मल [final] है ,ठीक उसी प्रकार जब हर आदमी किसी शे’र का अर्थ लगाता है और उसे अपनी समझ से ठीक ही समझता है और सही समझ कर ही अर्थ लगाता है । जिसमें उसे आनन्द आये वही सही है उसके लिए।
अगर आप You Tube पे देखेंगे तो दर्ज़नों link मिल जायेंगे\ आप की सुविधा के लिए एक link लगा रहा हूँ [जगजीत सिंह वाला]
http://www.youtube.com/watch?v=x2DuKyUV42A 

आप जब सुनेंगे तो देखेंगे कि ग़ज़ल का वज़न और बहर में होने का क्या मायने है कि गायक के स्वर को को कहीं भी अटक feel नहीं है
मगर ,न जाने क्यो कलाकारों  ने इस ग़ज़ल के चन्द अश’आर ही गाये हैं ।मीर की पूरी ग़ज़ल किसी ने नहीं गाई है ।पता नहीं क्यों? शायद time का constrain रहा हो
ख़ैर

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है 
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है 

उस मित्र  का कहना था कि जाने न जाने ...फिर न जाने 2-बार आने से negative अर्थ या भाव तो नहीं निकल रहा है।
सच तो यह है कि वो शे’र का जिसका लब-ओ-लहज़ा और अन्दाज़-ए-गफ़्तगू [बात चीत की style में हो और उसमें ज़्यादे ’अन्वय’ न करना पड़े जो सीधे दिल को छूती है यानी बात चीत का flow बरक़रार रहे, तो अच्छा रहता है
कुछ शो’अरा तो बे मतलब और बेवज़ह  अश’आर में  भर्ती के लफ़्ज़ या अल्फ़ाज़ ठूंसे देते हैं जिस से शे’र अपनी रवानी [natural flow ] और आब-ओ-ताब [चमक] खो देता है  जो महज तुकबन्दी के सिवा कुछ नहीं होता।
इन्हीं तुकबन्दियों पर शरद तैलंग [कोटा निवासी] का  एक तंज़ शे’र पढ़ा था

सिर्फ़ तुक़बन्दियां ही हैं काफी नहीं 
शायरी कीजिए शायरी की तरह 

मगर कुछ शो’अरा [शायरों] को यह फ़न ख़ुदा दाद [भगवान की दी हुई] है और उन्हें इस हुनर में महारत हासिल है और कुछ तो इसे  मश्क़-ओ-अमल [मिहनत और exercise] से हासिल करते है
 मत्ला वाला शे’र ,मीर के इसी ख़ुदा दाद हुनर का नतीज़ा है कि....

मीर  के दिल की तड़प देखिए ,उनकी बेकसी देखिए कि ’पत्ता पत्ता ’की मैं क्या बात करूँ अरे यहाँ तक कि ’बूटा बूटा ’[crippers] तक को  भी पता है ......। यहां पर जो पत्ता या बूटा का 2-बार इस्तेमाल किया है शे’र में जान डाल दिया है ।शेर को बुलन्द कर दिया वगरना शे’र फ़ीका फ़ीका सा लगता। आप स्वयं देखे --यदि हम यह बात ऐसे कहें ’अरे ! ये बात तो मुहल्ले के हर बच्चे को पता है --या ऐसे कहें कि ये बात तो ’मुहल्ले के बच्चे बच्चे [तक] को पता है ...बात तो एक है मगर भाव में फ़र्क़ है ।आप को किस में ज़्यादा वज़न [बात में stress]मालूम होता है ? ईमानदारी से बताईयेगा।

 यही बात ’बूटा बूटा ’ की भी है
बात को वाज़ेह [स्पष्ट] करने के लिए इस शे’र में वज़न बरक़रार रखते हुए कुछ तब्दीली करते हैं [मीर साह्ब की मुआफ़ी के तहत] देखते हैं -क्या होता है?

पत्ता ,भौरा ,कलियां ,बूटा हाल हमारा जाने हैं - इस शे’र में कोई ग़लती नहीं ,न वज़न के लिहाज से ,न environment के लिहाज से न मानी की लिहाज से। आख़िर भौरा ..कलियां भी तो बाग के ही part हैं। अब इस मिसरे को आप  आँख बन्द कर धीरे धीरे गुनगुनायें और बतायें कि बात किसमें ज़्यादा बनी या बन रही है --आप की बेबसी और बेकसी किस में ज़्यादा झलक रही है । हो सकता है आप को कोई ज़्यादा फ़र्क़ नज़र न आये वैसे ही जैसे आंख का डाक्टर आप का चश्मा [नज़र] टेस्ट करता है तो एक मुकाम पे पहुँच कर आप के नज़र की fine tuning check करता है कभी axis घुमाता है कभी additional लेन्स लगाता है फिर पूछता है आप को इस में ज़्यादा अच्छा लगता है या उस में ? फ़र्क़ होता है --थोड़ा ही सही मगर होता है ,होता है ज़रूर।यह बात तो आप भी मानते हैं।

पत्ता पत्ता बूटा बूटा Vs पत्ता ,भौरा,कलियां बूटा...में आप को कौन सा मिसरा ज़्यादा वज़न अहसास कराता है ?
वही बात मिसरा सानी मे..भी है

जाने न जाने गुल ही न जाने .....सारी कायनात को पता है [हमारे दिल का हाल ] बच्चे बच्चे को मालूम है .गली-कूचे तक को मालूम है बाग बगीचे तक को मालूम है सबको मालूम है ,पर ख़ुदा जाने , न जाने क्यों उन को ही नहीं मालूम बस [किस को ? अरे! उन्हीं गुल जी को] मानो जैसे वो [गुल] इस दुनिया में रहते ही नहीं ..कैसे निस्पॄह हैं -कैसे बे तवज़्ज़ोह हैं मुझ पर...उनको छोड़-कर सबको मालूम ।-क्या उपालम्भ है ..और गुल की क्या बेरुखी है ,बे नियाज़ी देखिए  ...क्या लब-ओ-लहज़ा है शिकायत कर ने का ...और जब मीर ने जब आखिरी में यह कह दिया कि ’बाग तो सारा जाने है"- [तो -पर ध्यान दीजिएगा कि बात को कहाँ से कहाँ  खीच कर ले जा रहा है यह एक लफ़्ज़ ’ तो ’] एक लम्बी साँस छोड़ दिया ’मीर साहब ने ,थक गये हों जैसे उस गुल की बेरुखी से ..बेनियाज़ी से -..हैफ़ ![हाय ,अफ़्सोस] अब क्या बचा रह गया इस बाग में....कि वो गुल जो ’मेरा सूरते-हाल न जाने है ..हद हो गई जनाब उनके इस बेरूखी की..।

कभी कभी एक लफ़्ज़ [यहां पे ’तो’]किसी शे’र को मानी के किस बुलन्दी तक पहुंचा देता है , पता ही नहीं चलता
देखिए इस शे’र में इस ’तो’ ने क्या कमाल दिखा दिया ।अब आप पूछेंगे कि क्या कमाल दिखा दिया? तो जनाब आप ’तो’ हटा दीजिए फिर देखिए
इस मिसरा को ऐसा कर देते हैं-----जाने न जाने गुल ही न जाने ,गुलशन सारा जाने है [चूँकि मिसरा वज़न में रखना है इस लिए ’गुलशन’ लिखा -इसमें ’तो’ घुसाने की जगह नहीं मिल रही है [घुसायेगे तो मिसरा बह्र से ख़ारिज़ हो जायेगा यह भी ख़्याल रखना है]
गुलशन सिर्फ़ जानता है मगर ’बाग [को] तो मालूम है मेरा सूरत-ए-हाल उसने भी ’तो’ नहीं बताया उस ’गु्ल’ को।हाय रे मेरी बदक़िस्मती,बद बख़्ती....

।ऐसा ही एक लफ़्ज़ है ’गोया’ -जो मोमिन के एक शे;र को कहाँ से कहाँ तक पहुंचा दिया। उम्मीद है आप ने इशारा समझ लिया होगा । अगर कभी मौक़ा मिला तो उस पर भी तब्सरा करूंगा।

गो कि इस शे’र की वज़ाहत और भी की जा सकती है - इश्क़े-हक़ीकी और इश्क़े-मज़ाजी की रोशनी में । मज़्मून यूँ ही काफी तवील[लम्बा] हो चला है सो यह मुनासिब जगह नहीं है

अन्त में यही कहना है कि अच्छा और सच्चा शे’र -समझ में आ गया तो हीरा ,नहीं तो कंकड़ ।यही कारण है कि शे’र देखने में या ’लिखने में ’ जितना आसन लगता है .कहना उतना आसान नहीं

और सच्चा शे’र वो जो दो लाईनो[मिसरों] में ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा सिमट कर भर दे और फैले तो कायनात बन जाये

 यहां जाने न जाने गुल ही न जाने -जो 3 बार जाने का प्रयोग हुआ है वो शे’र के वज़न को कहाँ से कहाँ तक उठा दे रहा है }यही इसकी ख़सूसियत है इस शे’र में एक भी ’भर्ती’ का लफ़्ज़ नहीं है

उमीद है कि अपनी फ़हम से कुछ हद तक अपनी बात कहने में कामयाब हुआ हूंगा


-आनन्द.पाठक
09413395592

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

जनाब "सरवर" की एक ग़ज़ल : हम हुए गर्दिश-ए-दौरां.....



हम हुए गर्दिश-ए-दौरां से परेशां क्या क्या !
क्या था अफ़्साना-ए-जां और थे उन्वां क्या क्या !

हर नफ़स इक नया अफ़्साना सुना कर गुज़रा
दिल पे फिर बीत गयी शाम-ए-ग़रीबां क्या क्या !

तेरे आवारा कहाँ जायें किसे अपना कहें ?
तुझ से उम्मीद थी ऐ शहर-ए-निगारां क्या क्या !

बन्दगी हुस्न की जब से हुई मेराज-ए-इश्क़
सज्दा-ए-कुफ़्र बना हासिल-ए-ईमां क्या क्या !

फ़ासिले और बढ़े मंज़िल-ए- गुमकर्दा के
और हम करते रहें ज़ीस्त के सामां क्या क्या !

धूप और छाँव का वो खेल ! अयाज़न बिल्लाह
रंग देखे तिरे ऐ उम्र-ए-गुरेजां क्या क्या !

हाय ये लज़्ज़त-ए-आज़ार-ए-शिकस्तापायी
हमने ख़ुद ढूँढ लिए अपने बयाबां क्या क्या !

हैफ़ "सरवर"! तुझे ऐय्याम-ए-ख़िज़ां याद नहीं
इश्क़ में है तुझे उम्मीद-ए-बहारां क्या क्या !

-सरवर
शहर-ए-निगारां =हसीनों का शहर
हासिल-ए-ईमां =ईमान(विश्वास)का नतीजा
गर्दिश-ए-दौरां =ज़माने का चक्कर
मंज़िल-ए-गुमकर्दा =खोई हुई मंज़िल
इयाज़न बिल्लाह =ख़ुदा खै़र करे !
लज़्ज़त-ए-आज़ार-ए-शिकस्तापायी=थकान की  तकलीफ़ का मज़ा

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

उर्दू बह्र पर एक बातचीत -7 बह्र-ए-कामिल


उर्दू बह्र पर एक बातचीत -7
बह्र-ए-कामिल [1 1 2 1 2]

[Disclaimer clause : -वही -[भाग -1 का]

[ अब तक ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’, बह्र-ए-मुत्दारिक, बह्र-ए-हज़ज , बह्र-ए-रमल और बह्र-ए-रजज़ ,बह्र-ए-वाफ़िर [6-बह्र] पर बातचीत कर चुका हूं और बात स्पष्ट करने के लिए उन की कुछ मिसालें भी पेश कर चुका हूँ । अब बात आगे बढ़ाते हुए 7-वीं बह्र बह्र-ए-कामिल पर बातचीत करते हैं......]

पिछले मज़्मून (आलेख) में ’बह्र-ए-वाफ़िर’ पर चर्चा कर चुका हूं.आज ’बह्र-ए-कामिल’की चर्चा करूंगा। ये दोनो बह्रें अरबी है और अरबी शायरी में काफी मक़्बूल और मानूस हैं ,जो उर्दू में भी राईज़ (प्रचलित) हैं’ ’बह्र-ए-कामिल’ का बुनियादी रुक्न है--मुत फ़ा इलुन् ’ जिसका वज़न है [ 1 1 2 1 2 ] .यह रुक्न भी सालिम रुक्न की हैसियत रखता है और यह भी एक सुबाई (7-हर्फ़ी) रुक्न है । उर्दू में यह बड़ी ही आहंगख़ेज़ [लयपूर्ण] बहर है काफी लोकप्रिय भी है ।
 बक़ौल डा0 कुँअर बेचैन ....."’
’कामिल’ शब्द भी अरबी का है । इसके अर्थ हैं-पूरा,समूचा,दक्ष ,निपुण ,चमत्कारी, साधु,फ़कीर। इन सभी शब्दों में निपुण शब्द अच्छा लगा अत: इसी अर्थ के आधार पर इस का नाम ’निपुणिका छंद’ रख रहे हैं ...."
डा0 साहब का उर्दू के बह्रों को हिन्दी नाम देना और हिन्दी के दशाक्षरी "य मा ता रा ज भा न स ल गा" के सूत्र से इन बह्रों को समझना और समझाना  आप का मौलिक प्रयास है।

आप ने  इस बह्र की भी व्याख्या त्रिकल अक्षर(वतद ) और एकल अक्षर (1-हर्फ़ी) से की है जैसे    + 1 एकल (1-हर्फ़ी) +1 वतद(3-हर्फ़ी लफ़्ज़) + 1 वतद (3-हर्फ़ी)  =7 हर्फ़ी रुक्न से की है
 उदाहरण के लिए उन्होने एक शे’र नीचे दिया है (उनकी किताब : ग़ज़ल का व्याकरण से साभार)[नोट:- डा0 साहब ने यह स्पष्ट कर दिया है  कि यह शे’र सिर्फ़ समझाने की गरज़ से कहा गया है इस में आप शे’रियत न देखें]
  न तुझे मिले ,न मुझे मिले
किसी याद के नए क़ाफ़िले

यह बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम का एक उदाहरण है -कारण कि रुक्न [1 2 1 1 2] शे’र में 4 बार [यानी मिसरा में 2-बार] आया है
अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
1 1 2 1 2 / 1 1 2 1 2
न तुझे मिले ,न मुझे मिले
किसी याद के नए क़ाफ़िले

हालांकि डा0 साहब ने इस की तक़्तीअ यूँ की है
1 +12  + 12  / 1+ 12  + 12
न +तुझे+ मिले /,न +मुझे +मिले
कि+सी या+द के /न+ए क़ा+फ़िले

जो कि सही प्रतीत नहीं होता है
बात वहीं पे आ कर अटक गई। जो ’बह्र-ए-वाफ़िर’ के सिल्सिले पे अटकी थी। [देखिए पिछली क़िस्त-6]
क्योंकि उर्दू की क्लासिकल अरूज़ की किताब में इसे या तो ’वतद’[3-हर्फ़ी] लफ़्ज़  और ’फ़ासिला’[4-हर्फ़ी] लफ़्ज़ = 7 हर्फ़ी रुक्न से समझाया गया है या तो फिर 1-वतद[3] +1-सबब[2] +1 सबब[2] = 7 हर्फ़ी से।
इस लिए ’बेचैन’ जी की तज़्वीज़-ए-तक़्तीअ  उचित प्रतीत नहीं हो रही है कारण कि 1-हर्फ़ से कोई रुक्न नहीं बनता ।यहाँ तक कि अगर सालिम रुक्न पे ज़िहाफ़ भी लगाते है तो न्यूनतम (सबसे छोटा से छोटा जुज़ (टुकड़ा) भी 2 हर्फ़ी ही रहता है। 1-हर्फ़ी नहीं होता।

एक बात और
’बेचैन’ जी के तज़्वीज़ के तरकीब में मुत फ़ा इलुन् को’ ’मु तफ़ा इलुन ’के वज़न पे लिया है जिसमे ’सबब’[ न सबब-ए-ख़फ़ीफ़ और न ही सबब-ए-सक़ील ही दिखाई दे रहा है जो ज़ाइज़ प्रतीत नहीं हो रहा है ]

यह बह्र  ’वतद’[3-हर्फ़ी कलमा] और ’फ़ासिला [4 हर्फ़ी कलमा] से बना है मगर कुछ अरूज़ी इसे वतद और सबब से भी बना कर बताते हैं। चूँकि हम ने अभी तक ’फ़ासिला’ की इस्तिलाह (परिभाषा)  नहीं बयान की है तो अभी करेंगे भी नहीं । सिर्फ़ ’वतद’ और ’सबब’ के इश्तिराक (योग) से ही इस की भी व्याख्या करेंगे । आखिर ’फ़ासिला’ [4-हर्फ़ी कलमा] भी =  ’सबब[2] + सबब[2] से भी दिखाया जा सकता है

पिछले अक़्सात (किस्तों में ) में मैने कहा था कि सबब के 2- भेद होते है । चलिए एक बार फिर दुहरा देते हैं
 सबब-ए-ख़फ़ीफ़
 सबब-ए-सक़ील

 सबब-ए-ख़फ़ीफ़ = वो 2-हर्फ़ी कलमा जिसमे पहले हर्फ़ पर ’हरकत’ हो और दूसरा हर्फ़ ’साकिन’ हो
 हिन्दी में ’साकिन’ का कन्स्पेट तो नही हैं फ़िलवक़्त ’साकिन’ हर्फ़ समझने के  लिए आप संस्कृत का ’हलन्त’ का तसव्वुर करे
 जैसे ’तुन्’ ’लुन्’ मुस्’ तफ़्’...यह् सब ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ है जिसका वज़न [2] होता है जिसमें पहले हर्फ़ तु’..’ल’...’मु’ ...त’पर हरकत है जब कि ’न्’ ’स्’ फ़्’ हर्फ़ साकिन है

सबब-ए-सक़ील  = वो 2-हर्फ़ी कलमा जिसमे दोनो हर्फ़ पर हरकत हो इसका भी वज़न 2 होता है मगर इसे दिखाते है [1 1] की शकल में , अगर आप दोनो हर्फ़ पर बराबर वज़न से बोल रहे होते है तब
उर्दू में तो दोनों सबब साफ़ ज़ाहिर हो जाते है हिन्दी में इन दोनो सबब का अन्तर बहुत बारीक़ है कारण कि
उदाहरण के लिए हम हिन्दी के 2 शब्द  ’बात’ और ’रात’  तथा ’अकस्मात्’ या ’तत्पश्चात्’ लेते हैं । बात और रात के ’त’ पे हरकत (ज़बर की हरकत ) है मगर ’त्’ साकिन है मगर आज कल हिन्दी में अकस्मात् और तत्पश्चात् भी ’अकस्मात और तत्पश्चात’ ही लिखा जा रहा है । और यही बात श्रीमन् के साथ भी है

यह रुक्न भी बनती है ’सबब’ और ’वतद ’ के इश्तिराक (साझे) से

चलिए अब, मुत फ़ा इलुन् ’ रुक्न कैसे बनती है, देखते हैं
  मुत फ़ा इलुन् =  सबब-ए-सक़ील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़ + वतद
      [1 1 2 1 2  ] =  [ 1 1 ]   + [  2 ]  + [ 1 2]
                = 1 1 2 1 2
एक बात पर आप ग़ौर फ़र्माये.....
 अगर आप ने ’बह्र-ए-वाफ़िर’ [ 1 2 1 1 2 ] पर ग़ौर फ़र्मायेंगे तो देखेंगे कि वहां ’वतद’ [1 2]आगे था जब कि कामिल में पीछे आकर बह्र का आहंग बना रहा है । आप को नहीं लगता है कि ’बह्र-ए-कामिल’ ,’बह्र-ए-वाफ़िर ’का बरअक़्स [mirror image] है?

ख़ैर..
अब इस बह्र की भी वही परिभाषा है जो अन्य बहूर की है

जैसे (सभी मिसाल ’आहंग और अरूज़’-कमाल अहमद सिद्दीक़ी साहब कि किताब से आभार सहित }
बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम : अगर किसी शे’र मे सालिम रुक्न ’मु त फ़ा इलुन् ’[ 1 1 2 1 2]  4-बार [यानी मिसरा में 2 बार] आये तो उस शे’र की बह्र होगी ’बह्र-ए-कामिल मुरब्ब: सालिम’ । सालिम इस लिए कि रुक्न ’मु त फ़ा इलुन् ’ बिना किसी रद्द-ओ-बदल,बिना किसी तब्दील के पूरा का पूरा सालिम(मुसल्लम ) शकल में तकरार पा रही है
एक मिसाल लेते है

न है कोई मेरा शरीके-ग़म
न किसी से मुझ को उमीद है

अब इसकी तक़्तीअ भी कर लेते हैं
1 1  2 1 2 / 1 1 2 1 2
न है कोई मे/ रा शरीक-ग़म
न किसी से मुझ/ को उमीद है

बात वही कि ’है’ ’ई’ ’से’ को -देखने में तो 2-वज़न का लगता है मगर तलफ़्फ़ुज़ अदायगी 1-वज़न पर होगी
बह्र-ए-कामिल मुसद्दस सालिम : अगर किसी शे’र में यह सालिम रुक्न’ ’मु त फ़ा इलुन् ’[ 1 1 2 1 2] 6-बार [यानी मिसरा में 3 बार] की तकरार [repetition]  हो तो उस शे’र की बह्र होगी ’ बह्र-ए-कामिल मुसद्दस सालिम’
एक मिसाल लेते हैं

न वो नख्ल ,फूल न फल ,चमन ही कहां रहा
तो चमन से बादे-बहार आई तो  क्या ख़ुशी

बात साफ़ करने के लिए इस की भी तक़्तीअ कर लेते हैं

1  1    2  1    2     / 1 1    2    1  2        / 1 1  2 1 2
न वो नख्ल ,फू /ल न फल,च मन /ही कहां रहा
तो चमन से बा/दे-बहार आ/ई तो  क्या ख़ुशी

बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम : अगर किसी शे’र में यह सालिम रुक्न [मुत फ़ा इलुन् ][ 1 1 2 1 2 ] 8-बार [यानी मिसरा में 4-बार] आये तो उस शे’र की बह्र होगी ’बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम’।
एक मिसाल लेते है
अल्लामा इक़बाल की एक बहुत ही उम्दा और आला मर्तबा की एक ग़ज़ल है..[यहां चन्द अश’आर ही लिख रहा हूं] इस गज़ल की आहंग /लय/गति देखे और दिल में इसकी ख़लिश महसूस करें इसकी मयार (स्तर) देखें

कभी ऎ हक़ीकते-मुन्तज़िर ,नज़र आ लिबासे-मजाज़ में
कि हज़ारों सिज़दे तड़प रहे हैं ,मेरी इक जबीने-नियाज़ में

तू बचा बचा के न रख इसे ,तेरा आईना है वो आईना
कि शिकस्ता हो तो अज़ीजतर ,है निगाहे-आईनासाज़ में

जो मैं सर-ब-सिज़दा हुआ कभी ,तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम-आश्ना ,तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
सारे अश’आर बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम मे है ,मैं ’मत्ला’ की तक़्तीअ कर रहा हूँ ,बाक़ी की आप करें तो बेहतर होगा
1 1  2 1 2 /1 1  2  1  2  / 1 1  2 1 2   /1 1 2 1 2
कभ ऎ हक़ी/ कत-मुन् त ज़िर/ ,नज़र आ लिबा /से-मजाज़ में
कि हज़ारो सिज़/दे तड़प रहे/ हैं ,मेरी इक जबी/ने-नियाज़ में

वैसे तो इस बह्र की और सालिम शक्ल 16 रुक्नी [मिसरा में 8-बार] हो सकती है मगर शायर अमूमन मुरब्ब:---मुसद्दस...मुसम्मन की शक्ल में ज़्यादातर अपनी शायरी करते है । बात तो शे’र की शे’रियत और ग़ज़ल की तग़ज़्ज़ुल-ओ-तख़य्युल  [बलागत-ओ-लताफ़त] में है।

इस बह्र के मुज़ाहिफ़ शक्ल की बात बाद में करेंगे जब रुक्न पे ’ज़िहाफ़’ की बातचीत करेंगे
अहबाब-ए-महफ़िल (मंच के दोस्तों से) गुज़ारिश है कि इस बह्र की 16 रुक्नी सालिम शकल अगर आप की नज़र से कोई ग़ज़ल गुज़रती है तो बराए मेहरबानी इस मंच पर लगायें ताकि दीगर कारीं इस से मुस्तफ़ीद हो सकें
आप सभी कारीं (पाठकों) से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें
-आनन्द.पाठक
09413395592

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

उर्दू बह्र पर एक बातचीत -6 बह्र-ए वाफ़िर

उर्दू बह्र पर एक बातचीत -6

बह्र-ए वाफ़िर [1 2 1 1 2 ]



[Disclaimer clause : -वही -[भाग -1 का]



[ अब तक ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’, बह्र-ए-मुत्दारिक, बह्र-ए-हज़ज , बह्र-ए-रमल और बह्र-ए-रजज़ पर बातचीत कर चुका हूं और बात स्पष्ट करने के लिए उन की कुछ मिसालें भी पेश कर चुका हूँ । अब बात आगे बढ़ाते हुए ......]



उर्दू शायरी में एक प्रचलित बह्र है -जिसका नाम है " बह्र-ए-वाफ़िर" जिसका मूल रुक्न है ..’मुफ़ा इल तुन्" [ 1 2 1 1 2 ].यह रुक्न भी सालिम रुक्न की हैसियत रखता है यह भी एक सुबाई (7-हर्फ़ी) रुक्न है । दर हक़ीक़त यह बह्र अरबी में काफी प्रचलित है मगर उर्दू में इतनी लोकप्रिय बह्र नहीं बन सकी जितनी कि अन्य बह्रें बनी। ’वाफ़िर’ का लग़वी (शब्द कोशीय अर्थ) मानी है प्रचुरता ,अधिकता और इसी आधार पर डा0 कुँअर बेचैन जी ने इस बह्र का नाम ’प्रचुरिका छन्द’ रखा है

डा0 साहब का उर्दू के बह्रों को हिन्दी नाम देना और हिन्दी के दशाक्षरी "य मा ता रा ज भा न स ल गा" के सूत्र से इन बह्रों को समझाना आप का मौलिक प्रयास है।

आप ने इस बह्र की व्याख्या त्रिकल अक्षर(वतद ) और एकल अक्षर (1-हर्फ़ी) से की है जैसे 1-वतद(3-हर्फ़ी लफ़्ज़) + 1 एकल (1-हर्फ़ी) +1 वतद(3-हर्फ़ी लफ़्ज़) =7 हर्फ़ी रुक्न से की है

उदाहरण के लिए उन्होने एक शे’र नीचे दिया है (उनकी किताब : ग़ज़ल का व्याकरण से साभार)[नोट:- डा0 साहब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह शे’र सिर्फ़ समझाने की गरज़ से कहा गया है इस में आप शे’रियत न देखें]

दुआ न मिले ,दवा न मिले

रहो न ,जहां हवा न मिले

यह बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्ब: सालिम का एक उदाहरण है -कारण कि रुक्न [1 2 1 1 2] शे’र में 4 बार [यानी मिसरा में 2-बार] आया है

अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं

1 2 1 1 2 / 1 2 1 1 2

दुआ न मिले /,दवा न मिले

रहो न ,जहां / हवा न मिले

हालांकि डा0 साहब ने इस की तक़्तीअ यूँ की है



दुआ+न+मिले , दवा+न+मिले

1 2 +1 +1 2 / 1 2+1 2

त्रिकल+एकल+त्रिकल / त्रिकल+एकल+त्रिकल

3-हर्फ़ी+ 1 हर्फ़ + 3-हर्फ़ी /3-हर्फ़ी+ 1 हर्फ़ + 3-हर्फ़ी

जो कि सही प्रतीत नहीं होता है

क्योंकि उर्दू की क्लासिकल अरूज़ की किताब में इसे या तो ’वतद’[3-हर्फ़ी] लफ़्ज़ और ’फ़ासिला’[4-हर्फ़ी] लफ़्ज़ = 7 हर्फ़ी रुक्न से समझाया गया है या तो फिर 1-वतद[3] +1-सबब[2] +1 सबब[2] = 7 हर्फ़ी से।

इस लिए ’बेचैन’ जी की तज़्वीज़ उचित प्रतीत नहीं हो रही है कारण कि 1-हर्फ़ से कोई रुक्न नहीं बनता ।यहाँ तक कि अगर सालिम रुक्न पे ज़िहाफ़ भी लगाते है तो न्यूनतम (सबसे छोटा से छोटा जुज़ (टुकड़ा) भी 2 हर्फ़ी ही रहता है। 1-हर्फ़ी नहीं होता।

एक बात और

’बेचैन’ जी के तज़्वीज़ में ’इ ल’ को ’इ’ मय हरकत अलग कर [1-हर्फ़] ’लाम’ को ’तुन्’ के साथ जोड़ कर ’लतुन्’[3-हर्फ़ी वतद्] बना दिया है। रुक्न् के वज़न में तो कोई फ़र्क नहीं पड़ा मगर तर्कीब में फ़र्क पड़ गया। कारण कि ’इल’ सबब है और ’तुन’ भी सबब है ्जब कि खाली ’इ’(ऎन) से कोई न रुक्न है और न ही कोई रुक्न का जुज़ है।

उर्दू के शो’अरा (शायरों ने] इस बह्र में ज़्यादा ग़ज़ल या शे’र नहीं कहे है शायद एक कारण यह भी हो कि बीच में 3 लगातार हरकत हर्फ़ [अलिफ़ एन और लाम ] आने से रवानी में ख़लल पड़ता है हालांकि उर्दू में तस्कीन-ए-औसत के लिहाज से बीच वाले हर्फ़ ’एन’ को साकिन कर के ही पढ़ते हैं

यह बह्र ’वतद’[3-हर्फ़ी कलमा] और ’फ़ासिला [4 हर्फ़ी कलमा] से बना है मगर कुछ अरूज़ी इसे वतद और सबब से भी बना कर बताते हैं। चूँकि हम ने अभी तक ’फ़ासिला’ की इस्तिलाह (परिभाषा) नहीं बयान की है तो अभी करेंगे भी नहीं । सिर्फ़ ’वतद’ और ’सबब’ के इश्तिराक (योग) से ही इस की भी व्याख्या करेंगे । आखिर ’फ़ासिला’ [4-हर्फ़ी कलमा] भी = ’सबब[2] + सबब[2] से भी दिखाया जा सकता है



पिछले अक़्सात (किस्तों में ) में मैने कहा था कि सबब के 2- भेद होते है । चलिए एक बार फिर दुहरा देते हैं

सबब-ए-ख़फ़ीफ़

सबब-ए-सक़ील

सबब-ए-ख़फ़ीफ़ = वो 2-हर्फ़ी कलमा जिसमे पहले हर्फ़ पर ’हरकत’ हो और दूसरा हर्फ़ ’साकिन’ हो

हिन्दी में ’साकिन’ का कन्स्पेट तो नही हैं फ़िलवक़्त ’साकिन’ हर्फ़ समझने के लिए आप संस्कृत का ’हलन्त’ का तसव्वुर करे

जैसे ’तुन्’ ’लुन्’ मुस्’ तफ़्’...यह् सब ’सबब-ए-ख़फ़ीफ़’ है जिसका वज़न [2] होता है जिसमें पहले हर्फ़ तु’..’ल’...’मु’ ...त’पर हरकत है जब कि ’न्’ ’स्’ फ़्’ हर्फ़ साकिन है



सबब-ए-सक़ील = वो 2-हर्फ़ी कलमा जिसमे दोनो हर्फ़ पर हरकत हो इसका भी वज़न 2 होता है मगर इसे दिखाते है [1 1] की शकल में , अगर आप दोनो हर्फ़ पर बराबर वज़न से बोल रहे होते है तब



चलिए अब मुफ़ा इल तुन’ रुक्न कैसे बनती है, देखते हैं

मुफ़ा इल तुन = वतद + सबब-ए-सक़ील + सबब-ए-ख़फ़ीफ़

[1 2 1 1 2 ] = [1 2 ] + [ 1 1 ] + [ 2 ]

= 1 2 1 1 2

एक बात पर आप ग़ौर फ़र्माये.....

अगर ’सबब-ए-सक़ील2-हर्फ़ी कलमा[हरकत+हरकत] वज़न [1 1 ] की जगह ’सबब-ए-खफ़ीफ़’-2-हर्फ़ी कलमा[हरकत + साकिन] वज़न [2] होता तो क्या होता ??

तो रुक्न का वज़न [1 2 2 2] हो जाता जो बह्र-ए-हज़ज के मूल रुक्न का वज़न है जो उर्दू शायरी में काफी लोकप्रिय व मधुर आहंग्खेज़ बह्र है जिसमें काफी प्रवाह [रवानी] है।

अब आप यह कहेंगे कि इस बात का यहां क्या तुक है ? क्या ज़रूरत है?

ज़रूरत है। ज़रूरत है यह बताने के लिए कि’ ’बह्र-ए-वाफ़िर’ जो अरबी में तो एक मानूस बह्र है वो उर्दू में लोकप्रिय बहर क्यों न बन सकी ? क्यों उर्दू के शायरों नें इस बहर में काफी शे’र या ग़ज़ल नहीं कहे? हमें लगता है कि [1 2 1 1 2 ] के सामने [ 1 2 2 2 ] -बह्र-ए-हज़ज थी जो ज़्यादा लोकप्रिय आहंगखेज़ मधुर लयात्मक थी इस में शे’र कहना ज़्यादा सरल और दिलकश था ।शायद यह भी एक सबब हो।

खैर

बह्र-ए-वाफ़िर की भी परिभाषा भी वही है जो अन्य बह्रों के हैं

यानी

बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्ब: सालिम : यानी यह रुक्न ’मुफ़ा इल तुन’ [12112] किसी शे’र में 4-बार [यानी मिसरा में 2 बार ] आये तो वो बह्र ’बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्ब: सालिम’ कहलायेगी

एक मिसाल लेते हैं [आहंग और अरूज़ से साभार]



कभी तो मिलायें आप नज़र

कभी सर-ए-रहगुज़र ही मिले

अब इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं

1 2 1 1 2 /1 2 1 1 2

कभी तो मिला/यें आप नज़र

कभी सर-ए-रह/गुज़र ही मिले

[यहां भी वही बात ’तो’.. ये’ ..ही ..हर्फ़-ए-इल्लत के ज़ेर-ए-असर 1-की वज़न पे ही अदा होंगे]

चूँकि [1 2 1 1 2] रुक्न शे’र मे 4-बार [यानी मिसरा में 2-बार ]आया है अत: इसे बह्र-ए-वाफ़िर मुरब्ब: सालिम कहेंगे

बह्र-ए-्वाफ़िर मुसद्दस सालिम :यानी यह रुक्न ’मुफ़ा इल तुन’ अगर किसी शे’र में 6 बार [यानी मिसरा में 3 बार] आये तो वह बह्र-ए-वाफ़िर मुसद्दस सालिम कहलाएगी

एक मिसाल लेते हैं [आहंग और अरूज़ से साभार]

बहुत पी चुका हूं ज़हर-ए-हयात पीर-ए-मुगां

ये मैकदा है शराब पिला ,शराब मुझे

अब इसकी तक़्तीअ भी कर लेते हैं

1 2 1 1 2 / 1 2 1 1 2/1 2 1 1 2

बहुत पी चुका/ हूं ज़हर-ए-हया/त पीर-ए-मुगां

ये मैकदा है /शराब पिला /,शराब मुझे

एक बात पे ध्यान दें इज़ाफ़त हूं’ज़हर-ए-हया’ [1 2 1 1 2] या पीर-ए-मुगां यानी इज़ाफ़त -ए- वज़न में कोई रोल नहीं कर रहा है यानी बह्र की यही मांग है

बह्र-ए-वाफ़िर मुसम्मन सालिम: यानी यह रुक्न ’मुफ़ा इल तुन’ अगर किसी शे’र में 8 बार [यानी मिसरा में 4 बार] आये तो बो बह्र ’बह्र-ए-मुसम्मन सालिम’ कहलायेगी

एक मिसाल लेते हैं [आहंग और अरूज़ से साभार]



अगर ये कहा है तुम ने मेरे रकीब से क़त्ल कर दे मुझे

क़सम है मुझे अगर न उसे पेश कर दूंगा तुहफ़ा में सर

अब इसकी तक़्तीअ भी देख लेते हैं

1 2 1 1 2 / 1 2 1 1 2 / 1 2 1 1 2/ 1 2 1 1 2

अगर ये कहा /है तुम ने मेरे/ रकीब से क़त्/ल कर दे मुझे

क़सम है मुझे /अगर न उसे /मैं पेश कर दूं/गा तुहफ़ा में सर

यहाँ भी वही बात ....ये....है....ने...मे....दे...सब बह्र की मांग की मुताबिक़ 1-की वज़न पे पढ़े जायेंगे

वैसे इस बह्र में 16-रुक्नी बह्र नहीं देखी है..मुश्किल तो है मगर ना-मुमकिन नहीं

इस बह्र के मुज़ाहिफ़ शक्ल की बात बाद में करेंगे जब रुक्न पे ’ज़िहाफ़’ की बातचीत करेंगे

अहबाब-ए-महफ़िल (मंच के दोस्तों से) गुज़ारिश है कि इस बह्र की 16 रुक्नी सालिम शकल अगर आप की नज़र से कोई ग़ज़ल गुज़रती है तो बराए मेहरबानी इस मंच पर लगायें ताकि दीगर कारीं इस से मुस्तफ़ीद हो सकें

आप सभी कारीं (पाठकों) से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें



-आनन्द.पाठक

09413395592

रविवार, 20 जनवरी 2013

उर्दू बह्र पर एक बातचीत-5 [बह्र-ए-रजज़]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत -5

बह्र-ए-रजज़ [ 2 2 1 2 ]



[Disclaimer clause : -वही -[भाग -1 का]



[ अब तक ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’, बह्र-ए-मुत्दारिक, बह्र-ए-हज़ज और बह्र-ए-रमल पर बातचीत कर चुका हूं और बात स्पष्ट करने के लिए उन की कुछ मिसालें भी पेश कर चुका हूँ । जो पाठकगण इन से वंचित रह गये हैं वो मेरे ब्लाग www.urdu-se-hindi.blogspot.com पर भी इन्हें पढ़ सकते हैं ।संक्षेप में एक बार दुहरा रहा हूँ कि बात ज़ेहननशीन हो जाय ।



बह्र मूल रुक्न वज़न तरकीब

मुत्क़ारिब फ़ऊ लुन 1 2 2 वतद + सबब =1 2 + 2 = 1 2 2 =5-हर्फ़ी

मुत्दारिक फ़ा इलुन 2 1 2 सबब + वतद = 2 + 12 = 2 1 2 = 5-हर्फ़ी



हज़ज मफ़ा ई लुन 1 2 2 2 वतद+सबब+सबब = 1 2+ 2+ 2 = 1 2 2 2 =7-हर्फ़ी

रमल फ़ा इला तुन 2 1 2 2 सबब+वतद +सबब = 2 +1 2+ 2 = 2 1 2 2 = 7-हर्फ़ी

रजज़ मुस तफ़ इलुन 2 2 1 2 सबब+ सबब+ वतद = 2+2+ 1 2 = 2 2 1 2 = 7-हर्फ़ी



आप ग़ौर फ़र्मायेंगे कि मूल रुक्न सबब और वतद के combination से बनते जा रहें हैं बस मुख़्तलिफ़ बहर में सबब (2-हर्फ़ी) वज़न के लिए कहीं ’लुन’ तो कहीं ’तुन’ तो कहीं ’मुस’ तो कहीं ’तफ़’ का इस्तेमाल हो रहा हैं ।मालूम नहीं क्यों?



उसी प्रकार वतद के लिए कहीं ’फ़ऊ’ तो कहीं तो कहीं ’मफ़ा’ ’इलुन’ तो कहीं इला’ का इस्तेमाल हो रहा है। मालूम नहीं क्यों?



शायद अरूज़ियों ने आहंग के लिए ऐसा ही तसव्वुर किया हो। खैर....



एक बात और..

हज़ज , रमल और रजज़ में ’वतद’ की location देखते चलिए और मात्रा 1-का वज़न कैसे अपनी जगह बदल रहा है इस बिना पर आप कह सकते हैं कि ’2 2 2 1 ’ भी कोई बह्र होगी । जी हां। आप बिल्कुल सही हैं इस वज़न की भी एक मूल रुक्न है और बह्र भी है .नाम बाद में बताऊंगा।...



अब मूल बात पर आते हैं -बह्र-ए-रजज़]



------ जी हाँ , उर्दू शायरी में एक बह्र है जिसका नाम है बह्र-ए-रजज़। जिसका बुनियादी रुक्न है -’मुस तफ़ इलुन’ [ 2 2 1 2 ]

इस का निर्माण कैसे होता है ऊपर बता चुका हूं। यह भी एक सबाई [7- हर्फ़ी] रुक्न है

डा0 कुँअर बेचैन जी ने इस बहर का हिन्दी नाम ..."वंश-गौरव’ छन्द दिया है । उन्हीं के शब्दों में -" ...’रजज़’ शब्द अरबी का है। इस शब्द का अर्थ है युद्ध क्षेत्र में अपने कुल की शूरता और श्रेष्ठता का वर्णन। इसी अर्थ के आधार पर हमने इस का नाम ’वंश-गौरव’ छन्द रखा है ।"

हमारे यहां शायद ’आल्हा’ में भी ऐसा ही कुछ वर्णन होता है

यह बह्र भी सालिम बह्र की हैसियत रखता है।

बह्र-ए-रजज़ की परिभाषा भी वही है जो अन्य सालिम बहूर [ब0ब0 बह्र] की है यानी

[1] बह्र--ए-रजज़ मुरब्ब: सालिम

यह रुक्न ’मुस तफ़ इलुन ’[ 2 2 1 2] अगर किसी शे’र में 4-बार (यानी मिसरा में 2-बार] आए तो शे’र की बह्र ’बह्र-ए-मुरब्ब: सालिम कहलायेगी

2 2 1 2 / 2 2 1 2 यानी मुस तफ़ इलुन /मुस तफ़ इलुन

2 2 1 2/ 2 2 1 2 मुस तफ़ इलुन /मुस तफ़ इलुन

[2] बह्र-ए-रजज़ मुसद्दस सालिम

अगर किसी शे’र में यह रुक्न [2 2 1 2 ] 6-बार [यानी मिसरा में 3-बार] आये तो बह्र ’ बह्र-ए-रजज़ मुसद्दस सालिम’ कहलायेगी



2 2 1 2/ 2 2 1 2 / 2 2 1 2 यानी मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन

2 2 2 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2 मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन



[3] बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम



अगर किसी शे’र में यह रुक्न [ 2 2 1 2 ] 8-बार [यानी मिसरा में 4-बार] आए तो यह बह्र-ए-मुसम्मन सालिम’ कहलायेगी



2 2 1 2 /2 2 1 2 /2 2 1 2 /2 2 1 2 यानी मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन

2 2 1 2 / 2 2 1 2/ 2 2 1 2/ 2 2 1 2 मुस तफ़ इलुन/ मुस तफ़ इलुन /मुस तफ़ इलुन/मुस तफ़ इलुन



यही बात 16-रुक्नी बह्र में होगी यानी किसी शे’र में यह रुक्न 16 बार [यानी मिसरा में 8-बार ] आये तो उसका नाम बह्र-ए-रज़ज मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम कहलायेगी [ इज़ाफ़ी मानी 2- गुना और मुसम्मन मानी 8]



यूं तो यह रुक्न यदि कोई शायर किसी शे’र में 12 बार या 14 बार प्रयोग करना चाहे तो मनाही तो नहीं है मगर अमूमन शायर यही मुसद्दस और मुसम्मन शक्ल ही प्रयोग करते हैं। बात सिर्फ़ रुक्न और बह्र की ही नहीं होती बल्कि शे’र की शे’रियत और गज़लियत की भी होती है शे’र किसी बह्र में हो बस और दिलकश हो दिल पज़ीर हो।



गो, बह्र के मुसम्मन सालिम या मुसद्दस सालिम के ज़्यादा शे’र नहीं मिला ज़्यादातर शायरों नें इसकी मुज़ाहिफ़ शक्ल में ही शे’र कहें हैं। वात स्पष्ट कर ने कि लिए इस बह्र ् के सालिम शक्ल के कुछ शे,र लेते हैं और फिर तक़्तीअ कर के देखते हैं



मैं कह रहा हूँ यह कि अब ,तू क्या करे, मैं क्या करूं

तू भी मुझे देखा करे ,मैं भी तुझे देखा करूँ

-डा0 कुँअर बेचैन [ग़ज़ल के व्याकरण से साभार]



[डा0 साहब ने यह बात पहले ही साफ़ कर दी है कि यह ख़ुदसाख़्ता शे’र सिर्फ़ बह्र को समझाने के किए कहा है ,इसमें ’शे’रिअत न देखी जाए]



अब इसकी तक़्तीअ भी देख लेते हैं

2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2

मैं कह रहा /हूँ यह कि अब /,तू क्या करे, /मैं क्या करूं

2 2 1 2 / 2 2 1 2/ 2 2 1 2 / 2 2 1 2

तू भी मुझे /देखा करे /,मैं भी तुझे /देखा करूँ



चूंकि 2 2 1 2 [मुस् तफ़् इलुन्] शे’र में 8 बार (यानी मिसरा में 4-बार] आया है अत: यह ’बह्र-ए-रजज़ मुसम्मन सालिम" की मिसाल हुई



एक मिसाल और लेते हैं



हम को भी क्या क्या नाज़ था टूटे हुए दिल पे मगर

उसने तो जिस पत्थर को ठुकराया वो इक दिल हो गया

[जनाब कमाल अहमद सिद्दिक़ी की किताब ’ आहंग और अरूज़ ’ से साभार]

अब इसके तक़्तीअ भी कर लेते हैं

2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2/ 2 2 1 2

हम को भी क्या/ क्या नाज़ था /टूटे हुए/ दिल पे मगर

2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2 / 2 2 1 2

उसने तो जिस/ पत्थर को ठुक/राया वो इक /दिल हो गया



[यहां पर भी वही बात ’ भी’ ’तो’ ’को’ ’वो’ कि देखने में तो सबब [2-हर्फ़ी] लफ़्ज़ लगता है मगर ’हर्फ़-ए-इल्लत’ के ज़ेर-ए-असर इसको गिरा कर [यानी दबा कर ] बह्र की माँग के मुताबिक 1-की वज़न पर पढ़ेगे]

इस बह्र के मुज़ाहिफ़ शक्ल की बात बाद में करेंगे जब रुक्न पे ’ज़िहाफ़’ की बातचीत करेंगे

अहबाब-ए-महफ़िल (मंच के दोस्तों से) गुज़ारिश है कि इस बह्र की सालिम शकल [ मुरब्ब: ,मुसद्दस, मुसम्मन } में अगर आप की नज़र से कोई ग़ज़ल गुज़रती है तो बराए मेहरबानी इस मंच पर लगायें ताकि दीगर कारीं इस से मुस्तफ़ीद हो सकें

आप सभी कारीं (पाठकों) से दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें



-आनन्द.पाठक

09413395592

शनिवार, 12 जनवरी 2013

उर्दू बह्र पर एक बातचीत - किस्त - 4 [ बह्र-ए-रमल)

उर्दू बह्र पर एक बातचीत (क़िस्त -4)

बह्र-ए-रमल [2 1 2 2 ]

[Disclaimer clause ;वही जो क़िस्त -1 में है]



[पिछली बातचीत में बह्र-ए-हज़ज [1 2 2 2 ] का ज़िक्र कर चुका हूं ।डा0 कुँअर बेचैन ने जिसका हिन्दी नाम "कोकिल छन्द रखा है]



अब आगे बढ़ते हैं .....]



उर्दू में एक और मान्य प्रचलित बह्र है -बह्र-ए-रमल - जिसका बुनियादी रुक्न है ’फ़ा इ ला तुन् ’जिसका वज़न है [2 1 2 2 ] और यह भी एक सालिम रुक्न है।यह भी बह्र-ए-ह्ज़ज की मूल रुक्न ’मफ़ा ई लुन ’ की तरह एक सबाई (7-हर्फ़ी) रुक्न है

डा0 कुँअर बेचैन ने इस बह्र का नाम ’बिन्दु अंकन छन्द’ रखा है। उन्हीं के शब्दों में -"’रमल शब्द अरबी भाषा का है।इस शब्द का अर्थ उस विद्या से है जिससे भविष्य में होने वाली घटनायें बता दी जाती हैं ।इस विद्या का मूल आधार नुक़्ते (ब0ब0 निक़ात) [बिंदियां] हैं ,इसी अर्थ के आधार पर हम इसे ’बिन्दु अंकन छन्द’ नाम दे रहे हैं।इस बह्र के विषय प्रेरणात्मक भी हो सकते हैं और उपदेशात्मक भी।"



ख़ैर ,नाम में क्या रखा है । वैसे मेरे ख़याल से ’रमल’ नाम भी कोई बुरा नहीं है

वैसे तो यह बह्र सालिम रुक्न की हैसियत रखता है मगर न जाने क्यों उर्दू में इस बह्र की सालिम शकल (मुसद्दस सालिम या मुसम्मन सालिम) में बहुत कम अश’आर कहे गयें है .प्राय: इस बह्र की मुज़ाहिफ़ शक्ल (ख़ास तौर पर मह्ज़ूफ़ ज़िहाफ़ की शकल) में ज़्यादा अश’आर कहे गये जो ज़्यादा आहंगख़ेज़ (लयपूर्ण) हैं ।ख़ैर.....



यह रुक्न भी ’सबब’(2 हर्फ़ी कलमा) और ’वतद (3 हर्फ़ी कलमा) के योग [combination ] से बना है वैसे ही जैसे बह्र-ए-हज़ज का रुक्न [मफ़ा ई लुन] बना था । देखिए कैसे



फ़ा इला तुन् =सबब +वतद + सबब

= 2 + ( 1 2) + 2

=2 1 2 2

बात वही .

उर्दू में सबब के 2 भेद और वतद के 3 भेद होते है

उर्दू शायरी में इस का ख़ास महत्व है कारण कि उनके यहां हर्फ़ हरक़त और साकिन से वज़न derive करते है जब कि हिन्दी में साकिन का Concept नहीं है [संस्कृत की बात और है]

इसी लिए मैने पहले ही कह दिया है कि यह मज़्मून हिन्दी दोस्तों के नुक़्त-ए-नज़र से लिख रहा हूँ जिन्हे उर्दू ग़ज़ल कहने और पढ़ने समझने का शौक़ है और वो कुछ कहना चाह्ते है यह मज़ामीन शायद उर्दू अदीब या अरूज़ी के नुक़्ते नज़र ज़्यादा कामयाब या मुस्तफ़ीद न हों।

बह्र-ए-रमल की भी परिभाषा भी वही है जो और सालिम बह्र के साथ है जैसे

[1] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 4-बार (यानी मिसरा में 2-बार ] आता है तो बह्र-ए-रमल मुरब्ब: सालिम कहते हैं



2 1 2 2 / 2 1 2 2 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2 1 2 2 / 2 1 2 1 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्



[2] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 6 बार (यानी मिसरा में 3-बार) आये तो बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम कहलायेगी



2122 /2122 /2122 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2122 /2122 /2122 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्



[3] अगर यह रुक्न किसी शे’र में 8 बार (यानी मिसरा में 4-बार) आता है तो यह बह्र "बह्र-ए-मुसम्मन सालिम’ कहलाती है



2122 /2122 /2122/ 2122 यानी फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्/ फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन्

2122 /2122 /2122 / 2122 फ़ा इला तुन् / फ़ा इला तुन् /फ़ा इला तुन् /फ़ा इला तुन्



[4] और अगर यह रुक्न किसी शे’र में 16 बार (यानी मिसरा मेम 8-बार ) आता है तो यह 16-रुक्नी बहर "बह्र-ए- मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम" कहलायेगी

2122 /2122/2122/2122/2122/2122/2122/2122

2122/ 2122/2122/2122/2122/2122/2122/2122



जैसा कि ऊपर कह चुका हूँ अगर्चे (यद्दपि) यह बहर सालिम रुक्न की हैसियत रखता है मगर इस की सालिम शक्ल में बहुत कम अश’आर कहे गये है-पता नही क्यों? इसकी ’मुज़ाहिफ़’ शकल ही ज़्यादा मुस्तमिल (इस्तेमाल में) है

फिर भी कुछ इधर उधर से अरुज़ की किताबों से ,इन्टर्नेट से खोज कर क़ारीं (पाठकों) की सहूलियत को मद्द-ए-नज़र और बात वाज़ेह करने के लिए लगा रहा हूँ । अहबाब(दोस्तों) से दस्तबस्ता (करबद्ध) गुज़ारिश है कि इस बह्र के सालिम शक्ल की कोई और मिसाल मिले तो राकिम-उल-हरूफ़ (इस लेखक को) ज़रूर आगाह कीजिएगा”

जनाब ’सरवर ’ साहब ने ’क़तील सिफ़ाई साहब के शे’र की बह्र-ए-रमल मुसम्मन सालिम’ की निशानदेही की है आप भी मुलाह्ज़ा फ़र्माये



था ’क़तील’ इक अहल-ए-दिल अब उस को भी क्यों चुप लगी है

एक हैरत सी है तारी ,शहर भर के दिलबरों पर

‘ -क़तील सिफ़ाइ

जो डुबाना था मुझे तो क्यों मुझे साहिल दिया था

तोड़ना ही था अगर तो क्यों मुझे यह दिल दिया था



-डा0 कुँअर बेचैन (ग़ज़ल का व्याकरण से)

रू-ब-रू हर बात कहना है यक़ीनन ज़ीस्त आदत

अपने बेगाने सभी हम से ख़फ़ा हैं क्या करें हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }



अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं कि बात कहां तक वाज़ेह (साफ़)हुई

2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

था ’क़तील’ इक/ अहल-ए-दिल अब /उस को भी क्यों /चुप लगी है

एक हैरत /सी है तारी /,शहर भर के/ दिलबरों पर

‘ -क़तील सिफ़ाइ

{’को’ ’है’ का वज़न 1- पर पढ़ें ]

अब आप देखेंगे कि 2122(फ़ा इला तुन) की तकरार (आवॄति) मिसरा में 4-बार आया है इसलिए बज़ाहिर (स्पष्ट है )यह मुसम्मन शकल है । अब इसी बह्र में एक दूसरा शे’र लेते हैं और इसकी तक़्तीअ करते हैं

2 1 2 2 /2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

जो डुबाना/ था मुझे तो /क्यों मुझे सा /हिल दिया था

तोड़ना ही/ था अगर तो /क्यों मुझे यह /दिल दिया था



-डा0 कुँअर बेचैन (ग़ज़ल का व्याकरण से)-साभार

इसी बह्र में एक और शे’र लेकर बात और साफ़ करते हैं

2 1 2 2/ 2 1 2 2/ 2 1 2 2/ 2 1 2 2

रू-ब-रू हर/ बात कहना/ है यक़ीनन/ ज़ीस्त आदत

अपने बेगा/ने सभी हम /से ख़फ़ा हैं /क्या करें हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }-साभार

अब एक मिसाल बह्र-ए-रमल मुसद्दस सालिम का भी देख लेते है



हिज्र में तन्हाई का आलम अजब था

डूब कर यादों में तेरी सो गये हम

-’आहंग और अरूज़ ’से (कमाल अहमद सिद्दक़ी }-साभार

और अब इस की तक़्तीअ भी कर लेते हैं

2 1 2 2 / 2 1 2 2 / 2 1 2 2

हिज् र् में तन्/ हाइ का आ /लम अजब था

डूब कर या/दों में तेरी /सो गये हम



यानी 2122 (फ़ा इला तुन्) का गिर्दान (मिसरा में 3-बार) और शे’र में 6-बार आया है इस लिए यह रमल मुसद्द्स सालिम कहलायेगी



एक बात ग़ौर फ़र्मायें



ऊपर के शे’र मिसरा उला में और मिसरा सानी में ’में’ दोनो जगह आया है मगर दोनो जगह इसका वज़न मुख़्तलिफ़ ( भिन्न) है

मिसरा-ऊला में इस का वज़न 2- करार पाता है जब की मिसरा सानी में 1-करार पा रहा है\ जानते हैं क्यों ?

क्योंकि’ रुक्न’ यही तलब कर रहा है बह्र की यही मांग है ।वगरना मिसरा सानी बहर से ख़ारिज़ हो जायेगा । यही है शे’र की नज़ाकत और बारीकियाँ



मिसाल के तौर पर अज़ीम शो’अरा (शायरों) के कलाम लगाने का मक़सद यह भी है कि हम आप उनके मयार-ए-सुखन से वाक़िफ़ हों और वक़्तन-फ़-वक़्तन (समय समय पर )हम अपने अपने कलाम भी देखें कि उस Bench mark से हम कहाँ है और हमारी कोशिश अभी कितनी मश्क़ तलब है

आप सभी कारीं (पाठकों) से गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें



सादर

-आनन्द.पाठक

09413395592

शनिवार, 5 जनवरी 2013

उर्दू बह्र पर एक बातचीत -बह्र-ए-हज़ज (क़िस्त-3)


उर्दू बह्र पर एक बातचीत -3
बह्र-ए-हज़ज (1 2 2 2 )

[disclaimer clause ; वही क़िस्त -1) का

[पिछली बातचीत में दो बहूर (बह्र का ब0ब0) -बह्र-ए-मुत्क़ारिब(1 2 2) और बह्र-ए-मुतदारिक (2 1 2) का ज़िक्र कर चुका हूं
ये दोनों बहूर ’ख़्म्मास (5-हर्फ़ी) हैं और सालिम बह्र हैं

डा0 कुँअर बेचैन ने इनका हिन्दी नाम भी रखा है
(1) बह्र-ए-मुतक़ारिब =मिलन छन्द
(2) बह्र-ए-मुतदारिक़ =पुनर्मिलन छन्द

अब आगे बढ़ते हैं .....]

उर्दू में एक और मान्य प्रचलित बह्र है जिसका नाम है -बह्र-ए-हज़ज जिसका मूल रुक़्न है "मफ़ा ई लुन्" और जिसका वज़न है 12 2 2. यह भी एक सालिम बह्र है ।सालिम इस लिए कि इस बह्र की बुनियादी रुक़्न (मफ़ा ई लुन) (12 2 2) (बिना किसी काट छाँट के ,बिना किसी कतर ब्योंत के ,बिना किसी तब्दीली के) अपने इसी शकल में रिपीट (गिर्दान) होगी। यह एक (सुबाई)7-हर्फ़ी बह्र है
’हज़ज’ का लग़वी मानी(dictionary meaning) होता है ’सुरीला’ और सचमुच इस बह्र में कही गई ग़ज़ल बहुत ही सुरीली होती है इसी कारण डा0 कुँअर बेचैन ने इस छन्द का हिन्दी नाम "कोकिल छन्द" रखा है
 अज़ीम शो’अरा (मान्य शायरों ) की यह एक बड़ी ही मक़्बूल बहर है इसी बह्र में काफ़ी कलाम कहे गये हैं और अति प्रचलित (राईज़) भी है
यह रुक़्न भी ’वतद’(3-हर्फ़ी कल्मा) और ’सबब"(2 -हर्फ़ी कल्मा) के इश्तिराक (साझा) से बना है
मफ़ाईलुन   = मफ़ा         +ई       + लुन
=(मीम, फ़े अलिफ़)+ (ऐन,ये)+ (लाम,नून)
= वतद         +सबब     +सबब
=  1 2         +2        +2
                        = 1 2 2 2
एक बात ’वतद" और ’सबब’ की बारे में कहना चाहूँगा
उर्दू अरुज़ के लिहाज से वतद के 3-भेद हैं

(1) वतद-ए-मज़्मुआ
(2) वतद-ए-मफ़्रूक़
(3) वतद-ए-मौकूफ़

उसी प्रकार ’सबब" के भी 2-भेद हैं
(1) सबब-ए-ख़फ़ीफ़
(2) सबब-ए-शकील

मगर मैं यहां इसकी तफ़्सीलात (विस्तृत विवेचना) में नहीं जाना चाहता हूँ बस आप तो हिन्दी में ग़ज़ल के लिए इतना ही समझ लें कि ’सबब’ का वज़न 2 है और ’वतद’ का वज़न 12 या 21 होगा

बहर -ए-हज़ज की परिभाषा भी वही है
(1) अगर यह रुक़्न किसी शे’र में 4-बार (यानी मिसरा मे 2 बार ) आये तो बह्र-ए-हज़ज मुरब्ब: सालिम कहलायेगी
     1222       /     1222
     1222        /    1222
(2) अगर किसी शे’र में यह रुक़्न 6-बार (यानी मिसरा में 3 बार) आये तो "बह्र-ए-हज़ज मुसद्दस सालिम" कहलायेगी
     1222    /   1222  /   1222
     1222     /   1222  /  1222
(3)  अगर किसी शे’र में यह रुक्न 8-बार (यानी मिसरा में 4 बार) आये तो "बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम" कहलायेगी
1222   /1222   /1222  /1222
      1222   /1222   /1222  /1222
(4) अगर किसी शे’र में यह रुक़्न 16-बार (यानी मिसरा में 8 बार ) आये तो भी ये "बहर-ए-हज़ज मुज़िआफ़ी मुसम्मन सालिम) कहलायेगी ।कभी कभी इसे 16-रुक़्नी बहर भी कहते हैं
(इज़आफ़ मानी दूना करना)
      1222   /1222  /1222  /1222 /1222/   1222/ 1222/ 1222
      1222   /1222  /1222  /1222 /1222/   1222/ 1222/ 1222

इस बह्र में चन्द अश’आर पेश करता हूँ जिस से बात और साफ़ हो जाये..
इसी बह्र में अल्लामा इक़बाल की एक ग़ज़ल के चन्द अश’आर लगा रहा हूँ ,मुलाहिज़ा फ़र्मायें

ऎ पीराने-कलीसा-ओ-हरम! ऎ वाय मजबूरी
सिला इनकी क़दो-काविश का है सीनों की बेनूरी

कभी हैरत, कभी मस्ती,कभी आहे-सहरगाही
बदलता है हज़ारों रंग मेरा दर्दे-महजूरी

फ़क़ीराने-हरम के साथ ’इक़बाल’ आ गया क्योंकर
मयस्सर मीर-ओ-सुलतां को नहीं शाहीने-काफ़ूरी

अब इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
1 2 2 2/ 1 2 2 2  / 12 2  2/ 1 2 2 2
ऎ पीराने/-कलीसा-ओ/-हरम! ऎ वा/य मजबूरी
सिला इनकी/ क़दो-काविश/ का है सीनों /की बेनूरी

कभी हैरत/, कभी मस्ती,/कभी आहे/-सहरगाही
बदलता है/ हज़ारों रन्/ ग मेरा दर्/दे-महजूरी

फ़क़ीराने/-हरम के सा/थ ’इक़बाल’ आ/ गया क्योंकर
मयस्सर मी/र-ओ-सुलतां/ को नहीं शाही/ने-काफ़ूरी

ऎ का की को  ने -देखने में तो सबब(2) के वज़न का  है मगर जब बह्र में इसे गुनगुनाइएगा तो बह्र के मांग के मुताबिक इसे 1 के वज़न में पढ़ना पड़ेगा।  मक़्ता के तीसरे नम्बर रुक्न /थ ’इक़बाल आ/ पर ग़ौर फ़र्माये ।यूँ तो इसका वज़न आप के ख़याल से /1 2 2 1 2/ होना चाहिए मगर नहीं/ ’ल’ के सामने ’आ ’ गया अत: ’ल’ और ’आ’ को एक साथ मिला कर पढ़ेंगे कि वज़न 1222 रहे और बह्र से ख़ारिज़ न हो। उर्दू अरूज़ के मुताबिक यह जायज है


इसी बह्र में अब्दुल हमीद ’अदम’ (अदम गोण्डवी नहीं) के चन्द अश’आर इसी सिल्सिले में लगा रहा हूँ

जो पहली मर्तबा आता है उनसे गुफ़्तगू कर के
बड़ा शादाब मिलता है ,बड़ा सरशार मिलता है

मुलाक़ात इस तरह होती है दो वाकिफ़ निगाहों में
कि जैसे झूमकर मयख्वार से मयख़्वार मिलता है

अब इसकी तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं
1  2  2  2 / 1 2 2 2 / 1 2 2 2   / 1 2 2 2
जो पहली मर्/तबा आता /है उनसे गुफ़्/तगू कर के
बड़ा शादा/ब मिलता है/ ,बड़ा सरशा/र मिलता है

मुलाक़ात इस/ तरह होती/ है दो वाकिफ़ /निगाहों में
कि जैसे झू/म कर मयख्वा/र से मयख़्वा/र मिलता है

जो, है में भी वही बात कि बह्र की मांग पर इसे 1-की वज़न पे पढ़ना पड़ेगा
"मुलाकात इस" को इस तरह पढ़ें कि इसका वज़न 1222 पे आ जाये यानी "त इस" को तिस की वज़न पे पढ़ना पड़ेगा

इसी बह्र में चन्द अश’आर इस हक़ीर (अकिंचन) का भी बर्दास्त कर लें

यहाँ लोगों की आंखों में नमी मालूम होती है
नदी इक दर्द की जैसे रुकी मालूम  होती  है

तुम्हारी फ़ाइलों में क़ैद मेरी रोटियां सपने
मेरी आवाज़ संसद ने ठगी ,मालूम होती है

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1 2 2  2 /1  2  2  2 /1 2 2 2 / 1 2 2 2
यहाँ लोगों /की आंखों में /नमी मालू/म होती है
नदी इक दर्/द की जैसे /रुकी मालू/म  होती  है

तुम्हारी फ़ा/इलों में क़ै/द मेरी रो/टियां सपने
मेरी आवा/ज़ संसद ने /ठगी ,मालू/म होती है

ये तो रही अदबी बातें
आप ने पुरानी हिन्दी फ़िल्म का यह गाना ्ज़रूर सुना होगा ’सूरज; फ़िल्म का है

बहारों फूल बरसाओ ,मेरा महबूब आया है
हवाओं रागिनी गाओ मेरा महबूब आया है

आप ने इस की लय भी सुनी होगी ,सुर ताल भी सुने होंगे मगर यह न सोचा होगा कि यह गाना ’बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम में है/
अब देखिए कैसे
अब मैं इसकी तक़्तीअ करता हूं
1 2 2 2/1 2  2 2 / 1 2 2  2/ 1 2 22
बहारों फू/ल बरसाओ/ ,मेरा महबू/ब आया है  (रफ़ी साहब ने मेरा में ’मे’ को दबा दिया है और मिरा की वज़न पे
हवाओं रा/गिनी गाओ/ मेरा महबू/ब आया है   (गाया है)
आप स्वयं फ़ैसला करें
अब आप यह पूछेंगे कि अदबी तज़्किरा (चर्चा) में फ़िल्मी गीत का क्या सबब ?
हमारा मक़सद सिर्फ़ यह दिखाना है कि अगर गीत बह्र में हो तो कितना दिल कश हो जाता है कैसे सुर ताल मिल जाते हैं कैसे ज़ेर-ओ-बम (उतार-चढ़ाव ,रिदम) से आहंग (लय) पैदा होता है। अगर आप ग़ौर फ़र्मायेंगे तो बहुत से फ़िल्मी गीत ऐसे मिल जायेंगे जो किसी न किसी बह्र में होंगे। पिछली बार मैने ऐसे ही 2-3 गानों का ज़िक्र किया था जैसे...

इशारों /इशारों/ में दिल ले/ने वाले/बता ये/हुनर तू/ने सीखा/कहां से
122  /122 /  122     / 122 / 12 2/ 1 2 2/ 1 2 2/ 1 2 2        (बह्र-ए-मुत्क़ारिब)

तेरे प्या/र का आ/सरा चा/हता हूँ /वफ़ा कर/ रहा हूँ /वफ़ा चा/हता हूं  (शायद ’धूल का फूल” )
122    /1 2    2    / 1 2   2   /  1 2 2  / 1 2     2   /  1 2 2   /   1  2  2 /  1 2   2            (बह्र-मुत्क़ारिब)

अब तो नई फ़िल्मों के गाने की बात ही छोड़िए...अब वो बात कहां? अब तो मयार (स्तर) ’खटिया’ ’मचिया’ झंडू बाम ’ फ़ेविकोल पर आ गया है।खैर..
मिसाल के तौर पर अज़ीम शो’अरा (शायरों) के कलाम लगाने का मक़सद यह भी है कि हम आप उनके मयार-ए-सुखन से वाक़िफ़ हों और वक़्तन-फ़-वक़्तन हम अपने अपने कलाम भी देखें कि उस Bench mark से हम कहाँ है और हमारी कोशिश अभी  कितनी मश्क़ तलब है
आप सभी कारीं (पाठकों) से गुज़ारिश है कि अपनी रहनुमाई से हमें आगाह करें

सादर
-आनन्द.पाठक
09413395592


उर्दू बह्र पर एक बातचीत (क़िस्त-2)- बह्र-ए-मुतदारिक़


उर्दू बह्र पर एक बातचीत-2
बह्र-ए-मुत्दारिक ( 212)

[disclaimer clause :- -वही-(भाग-1 का)

[ पिछली बार , हमने ’बह्र-ए-मुत्क़ारिब’(122) पर बातचीत की थी .अभी हम सालिम रुक्न पर ही बातचीत जारी रखेंगे .इस बहस को अभी फ़िलवक़्त यहीं छोड़ कर आगे बढ़ते है अगली बहर है ’बह्र-ए-मुत्दारिक’
कुछ दिनों बाद हम फिर लौट कर आयेंगे और बह्र-ए-मुत्क़ारिब पर और बातचीत करेंगे ...

एक बात और
यह लेख अपने हिन्दीदाँ दोस्तों के नज़्रिये से लिखा जा रहा है जिस से मोटा मोटी बहर और वज़न समझने में सुविधा हो .उर्दू अरूज़ की बारिकियां शायद इस में उतनी नज़र न आये।]

 
उर्दू में एक बह्र है "बह्र-ए-मुतदारिक’ जिसका बुनियादी रुक़्न है "फ़ाइलुन" और जिसका वज़न है 212. ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’ की तरह यह भी एक ख़म्मस रुक़्न (5-हर्फ़ी) है।  कुँवर बेचैन जी ने इस का हिन्दी नाम ’पुनर्मिलन छन्द" दिया है उन्हीं के शब्दों में .."मुतदारिक’ शब्द अरबी भाषा का है जिसका अर्थ है --खोई हुई वस्तु पाने वाला। इसी अर्थ के आधार पर हमने इसे ’पुनर्मिलन छन्द’ का नाम दिया है  .।
शायद कालान्तर में इस बह्र का यह हिन्दी नामकरण भी प्रचलित हो जाय जैसी ’नीरज’ जी ने ’रुबाई’ के लिए ’मुक्तक’ नाम दिया है। खैर.....

बह्र-ए-मुतदारिक का रुक़्न भी ’सबब’(2-हर्फ़ी) और वतद (3 हर्फ़ी) के योग से बना है वैसे ही जैसे ’बह्र-ए-मुतक़ारिब का रुक़्न बना है

फ़ाइलुन   =फ़ा + इलुन
 = (फ़े,अलिफ़)+ (ऎन,लाम,नून)  
  =सबब+वतद
  = 2 + 12 = 2 1 2

आप ध्यान दें कि बह्र-ए-मुत्क़ारिब का मूल रुक्न " फ़ ऊ लुन’  भी सबब(2) और वतद(12) के योग से बना है

फ़ऊलुन = फ़ऊ + लुन
=  (फ़े,ऎन,वाव) + (लाम,नून)
=  वतद + सबब
=  12  +  2 =1 2 2
वैसे ही आप पायेंगे कि सिर्फ़ ’सबब’ और ’वतद’ का क्रम बदला हुआ है वरना दोनों ही खमम्स (5-हर्फ़ी) रुक़्न है
अब प्रश्न उठता है कि ’फ़ाइलुन’ में ’सबब’ के लिए ’फ़ा’ तज़्वीज़ किया तो फ़ऊलुन’ में सबब के लिए ’लुन’ क्यों लिया ?

इस पर मैं कुछ कह नहीं सकता ,ये तो अरूज़ियों की बातें हैं ।उनके पास ’सबब’ के लिए और भी ऐसे ही कुछ हर्फ़ हैं जिसका वज़न 2 ही है पर लफ़्ज़ (जुज़ ,कलमा) अलग अलग है और अलग अलग रुक़्न में ये लोग अलग अलग प्रयोग करते है। आप की जानकारी के लिए कुछ ऐसे ही ’जुज़’(टुकड़ा) लिख रहा हूं

सबब (वज़न 2)       : फ़ा , तुन् , ई, ..लुन्.. ,मुस्.., तफ़् , मुफ़् , ऊ , वग़ैरह
वतद (वज़न 1,2 या 2,1): मफ़ा , इला ,इलुन्, लतुन् ..फ़ाअ’..तफ़अ’.लात्... वग़ैरह्

एक दिलचस्प बात और

इन रुक़्न (ब0ब0 अर्क़ान ) के और भी नाम से जाना जाता है ।कुछ अरूज़ की किताबों में इसे ’फ़ेल’ फ़अ’ल(ब0ब0 अफ़ाईल तफ़ाइल  उसूल) के नाम से भी जाना जाता है । हर रुक्न में (बाद में आप देखेंगे) कि ऎन.फ़े.लाम में से कोई 2-हर्फ़ ज़रूर आता है इसीलिए ’रुक़्न ’ का दूसरा नाम ’फ़.अ’,ल भी है [( अ’) को आप ’ऎन’ समझे और (अ) को अलिफ़]

इन रुक़्न पर "ज़िहाफ़’( इस पर बाद में बातचीत करेंगे) लगाने से इनकी शक्ल में तब्दीली हो जाती फिर ये रुक़्न ’सालिम’ नहीं रह पाते .कभी कभी तो ’फ़े.अ’.लाम भी नहीं रह पाता तो ऐसे मुज़ाहिफ़ रुक़्न (ज़िहाफ़ लगाने के बाद बदली हुई रुक्न) को किसी मानूस (मान्य व प्रचलित) हम वज़न रुक्न से बदल लेते हैं कि फ़े.अ’.लाम की शर्त बरक़रार रहे

अब मूल विषय पर आते हैं

बह्र-ए-मुतदारिक का मूल रुक़्न ’फ़ाइलुन’ है और वज़न 2 1 2 है

और परिभाषा भी वही कि
(1) अगर यह रुक्न किसी शे’र में 4 बार(यानी मिसरा में 2 बार) आये तो बह्र-ए-मुत्दारिक मुरब्बअ सालिम कहलायेगी
    212  / 212
    212  / 212
(2) अगर यह रुक़्न किसी शे’र में 6 बार रिपीट (यानी मिसरा में 3 बार) आये तो बह्र-ए-मुत्दारिक मुसद्दस सालिम कहलायेगी
    212  /212/  212
    212  /212 /212
(3) अगर यह रुक़्न किसी शे’र में 8 बार रिपीट (यानी मिसरा में 4 बार) आये तो बह्र-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम कहलायेगी
     212  /212  /212  / 212
     212  /212  /212 /  212
(4) अगर यह रुक़्न किसी शे’र में 16 बार रिपीट (यानी मिसरा मे 8 बार) आये तो भी यह बह्र-ए-मुत्दारिक  मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम   ही कहलायेगी

 अब मैं जनाब ’सरवर आलम राज़ ’सरवर’ के 16 रुक्ऩी ग़ज़ल के चन्द अश’आर इसी बह्र में आप के लिए लगा रहा हूं मुलाहिज़ा फ़र्माये (पूरी ग़ज़ल और अन्य ग़ज़लें आप हिन्दी में यहाँ देख सकते हैं http://sarwarraz.com/ के artcle section में ek pardha Uthaa meGhazal no 2..]

              दिल दुखाए कभी ,जाँ जलाए कभी, हर तरह आज़माए तो मैं क्या करूँ ?
मैं उसे याद करता रहूँ हर घड़ी , वो मुझे भूल  जाए  तो मैं क्या करूँ ?

हाले-दिल गर कहूँ मैं तो किस से कहूँ,और ज़बाँ बन्द रक्खुँ तो क्यों कर जियूँ ?
ये शबे-इम्तिहां और ये सोज़े-दूरूं ,खिरमने-दिल  जलाए  तो मैं क्या करूँ ?

मैने माना कि कोई ख़राबी  नहीं , पर करूँ क्या तबियत  ’गुलाबी’ नहीं
मैं शराबी नहीं ! मैं शराबी नहीं ! वो नज़र  से पिलाए तो मैं क्या करूँ ?

अब मैं इसकी तक़्तीअ करता हूं

212    /212   /212  /212   /212    /212   /212   /212
             दिल दुखा/ए कभी ,/जाँ जला/ए कभी,/ हर तरह/ आज़मा/ए तो मैं/ क्या करूँ ?
मैं उसे /याद कर/ता रहूँ /हर घड़ी /, वो मुझे /भूल  जा/ए  तो मैं /क्या करूँ ?

हाले-दिल/ गर कहूँ /मैं तो किस /से कहूँ,/और ज़बाँ /बन्द रक्खुँ/ तो क्यों /कर जियूँ ?
ये शबे-/इम्तिहां /और ये /सोज़े-दूरूं/ ,खिरमने-/दिल  जला/ए  तो मैं/ क्या करूँ ?

मैने मा/ना कि को/ई ख़रा/बी  नहीं /, पर करूँ /क्या तबि/यत  ’गुला/बी’ नहीं
मैं शरा/बी नहीं /! मैं शरा/बी नहीं /! वो नज़र / से पिला/ए तो मैं/ क्या करूँ ?

अब आप देखेंगे कि ’वो’ ’तो’ देखने में तो सबब (वज़न 2) के लगते है मगर जब आप तरन्नुम में पढ़ेंगे तो इस को वज़न 1 के ज़ोर से पढ़ेंगे तभी इस बहर के आहंग का लुत्फ़ आयेगा ।ये बह्र के आहंग की मांग है
ऊपर ’रक्ख़ुँ’ पर ध्यान दे...सही लफ़्ज़ तो ’रखूँ’ ही था मगर बहर की मांग के कारण इसे ’रक्ख़ुँ’ लिखना पड़ा बग़ैर मानी में किसी तब्दीली के\
यही बात ’तबि’ में भी है इसे ’तबी’ की वज़न पर पढ़ेंगे

अब शकील बदायूनी साहेब की  एक ग़ज़ल के चन्द अश’आर इसी बह्र में लगा रहा हूं मुलाहिज़ा फ़र्मायें

बे-झिझक आ गए ,बेख़बर आ गए
      आज रिन्दों में वाइज़ किधर आ गए

गुफ़्तगू उनसे होती ये किस्मत कहां
  ये भी उनका करम है नज़र आ गए

आना जाना भी ये ख़ूब है आप का
बे-कहे चल दिए बेख़बर आ गए

हम तो रोते ही थे इश्क़ मे रात दिन
तुम भी आख़िर इसी राह पर आ गए

अब इसके तक़्तीअ भी कर के देख लेते हैं
212    /212    /212    /212
बे-झिझक/ आ गए /,बेख़बर /आ गए
      आज रिन्/दों में वा/इज़ किधर/ आ गए

गुफ़् त गू/ उन से हो/ती ये किस्/मत कहां
  ये भी उन/का करम/ है नज़र/ आ गए

आना जा/ना भी ये /ख़ूब है /आप का
बे-कहे/ चल दिए /बेख़बर/ आ गए

हम तो रो/ते ही थे /इश्क़ मे/ रात दिन
तुम भी आ/ख़िर इसी /राह पर /आ गए
 देखने में .. में..से...भी..ना...तो..ही..तो इनका वज़न 2 लगता है मगर तलफ़्फ़ुज़ की अदायगी में बह्र के मांग के मुताबिक इन्हें वज़न 1 पर पढ़ेंगे (और इसे ही मात्रा गिराना कहते हैं)
चूँकि इस बहर में सालिम रुक़्न ’फ़ाइलुन’(212) का हर शे’र में 8-बार (यानी मिसरा में 4 बार) रिपीट हुआ है अत: इस बह्र का नाम हुआ ’बह्र-ए-मुत्दारिक मुसम्मन सालिम"

इसी बह्र मे चन्द अश’आर इस ग़रीब खाकसार के भी बर्दास्त कर लें

आँधियों से न कोई गिला कीजिए
       लौ दिए की  बढ़ाते रहा कीजिए

सर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जायेंगे
       ग़ुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिए

हम वतन आप हैं हम ज़बां आप हैं
दो दिलों में न यूँ फ़ासिला कीजिए

अब इसके तक़्तीअ कर के भी देख लेते हैं

212    /212    /212    /212
आँधियों /से न को/ई गिला /कीजिए
       लौ दिए/ की  बढ़ा/ते रहा /कीजिए

सर्द रिश्/ते भी इक/ दिन पिघल/ जायेंगे
       ग़ुफ़् तगू/ का कोई /सिलसिला/ कीजिए

हम वतन /आप हैं /हम ज़बां /आप हैं
दो दिलों /में न यूँ /फ़ासिला /कीजिए

यहाँ भी ...भी ..को...पर मात्रा गिराई गई है और इसे 1-की वज़न पर ही पढ़ा जाएगा
इस बह्र का भी वही नाम हुआ...’बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम.
ज़िहाफ़ात की बात बाद में करेंगे
आप के सुझाव की प्रतीक्षा रहेगी...बातचीत  जारी रहेगी....
क्रमश:.......

-आनन्द.पाठक
09413395592
       

उर्दू बह्र पर एक बात चीत..बह्र-ए-मुत्क़ारिब (क़िस्त 1)


[दोस्तो ! बहुत दिनों बाद अपने इस ’साईट’ पर लौटा हूं~ वज़ह तो कोई  ख़ास तो नहीं बस मैं  दीगर कामों की मस्रूफ़ियत कह सकता हूं~ और आप मेरी कोताही कह सकते है। अब गिला शिकवा भी क्या ...जब ताख़ीर हो गई तो बहाना क्या...।


ख़ैर..इस बार अपने हिन्दी दां दोस्तों की ख़ातिर मज़्मून का एक सिलसिला शुरु कर रहा हूं ,,,..शायद आप लोग जो ग़ज़ल कहने का शौक़ फ़र्माते हैं इस सिलसिले से कुछ मुस्तफ़ीद (लाभान्वित) हो सकें
बा अदब....]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत (क़िस्त 1)
बहर्-ए-मुतक़ारिब्( 122)

[disclaimer clause : इस मज़्मून (लेख) का कोई भी हिस्सा हमारा नहीं है और न ही मैने कोई नई चीज़ खोज की है ।ये सारी चीज़े उर्दू के अरूज़ की किताबों में आसानी से मिलती है ।जो कुछ मैने  हिन्दी ,उर्दू की किताबों से ,चन्द उर्दू के मज़ामीन (मज़्मून का ब0ब0) ,रिसालों से इन्टेर्नेट पे द्स्तयाब (उपलब्ध) सामग्री और उर्दू की इन्टेरनेट की मज़लिस महफ़िल फ़ोरम से  पढ़ा,समझा,सीखा उसी की बिना (आधार) पर लिख रहा हूं। मैं खास तौर से आ0 कुंवर बेचैन की किताब (ग़ज़ल का व्याकरण (हिन्दी में )  जनाब सरवर आलम राज़’सरवर’ साहेब के मज़ामीन ’आसान अरूज़ और शायरी की बुनियादी बातें-उर्दू में ) शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी साहेब कि किताब .से . और कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहेब की किताब ’आहंग और अरूज़" (उर्दू में) से मदद ली है }मैं इन अज़ीम शो’अरा और लेखकों का मम्नून (आभारी ) हूं

यह बात मैं इस लिए भी लिख रहा हूं कि बाद में मुझ पर सरक़ेह (चोरी) का इल्जाम न लगे
ख़ुदा मुझे इस कारफ़र्माई की तौफ़ीक़ दे
एक बात और

यदि कोई पाठकगण इन लेखों का या सामग्री का कहीं उपयोग करना चाहें तो नि:संकोच ,बे-झिझक प्रयोग कर सकते हैं अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि मैं कोई नई चीज़ तो कह नहीं रहा हूं  और न ही  मैने कुछ इज़ाद किया है ।


मैं कोई अरूज़ी (उर्दू छन्द शात्र का ज्ञाता) भी नहीं हूं और न ही ऐसी कोई मुझ में सलाहिअत (योग्यता एवं दक्षता)  है मगर  .’अमित’ भाई  के हुक्म की तामील में कुछ बातें यहाँ लिख रहा हूं।  ’अमित’ भाई और  इस बज़्म के और मेम्बरान  भी अच्छे शायर है और अरूज़ के जानकार हैं ,उमीद करता हूं कि इस मज़्मून में अगर कहीं कोई नुक़्स नज़र आये तो रह्नुमाई करेंगे और मेरी हिमाकत को नज़र अन्दाज़ करेंगे
   मेरा यह मानना है कि एक अच्छा अरूज़ी एक अच्छा शायर भी हो ,ज़रूरी नहीं और यह भी ज़रूरी नही कि एक अच्छा शायर अच्छा अरूज़ी भी हो। अगर दोनों चीज़ें एक साथ हो तो फिर ....सोने में सुगन्ध कहें या सोने पे  सुहागा.....}

यह आलेख हिन्दी दोस्तों की उर्दू अदब आश्नाई देख कर लिखी जा रही है और बहर के वज़न पर ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है  अत: गुज़ारिश है कि इस को उसी नुक़्त-ए-नज़र( दृष्टि कोण) से देखा जाय कारण यह कि हिन्दी में ....हरकत ...’साक़ित’...साकिन..हर्फ़ का कन्सेप्ट उतना नहीं है जब कि उर्दू में रुक़्न की तामीर में इनका बहुत ख़्याल रखा जाता है

अज़किब्ला (इस से पहले) उर्दू की सालिम बहूर (बह्र का ब0ब0) का ज़िक्र कर चुका हूं उसी में से
 ,एक मानूस-ओ-मक़्बूल (लोकप्रिय) बह्र है " मुतक़ारिब बह्र" जिसका बुनियादी रुक़्न है ’फ़ ऊ लुन्’ और जिसका वज़न है 122.यह 5-हर्फ़ी रुक़्न है ।वैसे  कहा तो यह जाता है कि पहले 7-हर्फ़ी (फ़ाइलातुन..मुस्तफ़िलुन ...वग़ैरह) वज़अ हुई (अस्तित्व) और 5-हर्फ़ी बह्र बाद में वज़अ हुईं
सालिम बह्र सबब (2- हर्फ़ी लफ़्ज़) और वतद (3-हर्फ़ी लफ़्ज़) की तकरार (आवॄति) से बनती है । हिन्दी में ग़ज़ल कहने के लिए इस बह्र के बारे में अभी इतना ही जानना काफी है वरना
उर्दू में सबब के 2-क़िस्म है

 (1) सबब-ए-ख़फ़ीफ़    वज़्न 2
(2)  सबब-ए-शकील     वज़्न 2
और

वतद (वतद का जमा अवताद ) के 3 किस्में है
(1) वतद-ए-मज़्मुआ      वज़्न 12
(2) वतद-ए-मफ़्रूक़        वज़्न 21
(3) वतद-ए-मौक़ूफ़

इन सब बुनियादी इस्तिहालात (परिभाषाओं) का ज़िक्र मुनासिब मुकाम पर समय समय पर करते रहेंगे.उर्दू स्क्रिप्ट् में यहां दिखाना तो मुश्किल है अभी तो बस इतना  ही समझ लीजै कि ’सबब’ का वज़्न 2 और वतद का वज़्न (12) या (21)

फ़ ऊ लुन् = वतद + सबब
=  (फ़े ऎन वाव )+ (लाम नून)
= ( 1 2) +(2)     [नोट करें ;-फ़े का वज़्न 1 और ऎन और वाव एक साथ लिखा और बोला जायेगा तो वज़्न 2)
            = 122   यह बह्र मुतक़ारिब की मूल रुक़्न है
यह रुक़्न अगर किसी
मिसरा  में 2 बार और शे’र में 4 बार आता है तो उसे बह्र-ए-मुतक़ारिब ’मुरब्बा’ सालिम कहेंगे (मुरब्बा=4)
-----     3  बार -------    6 बार आता है तो उसे बह्र-ए-मुतक़ारिब ’मुसद्दस’  सालिम कहेंगे(मुसद्दस=6)
---------  4 बार .................8 बार आता है तो उसे बहर-ए-मुतक़ारिब ’मुस्समन’ सालिम कहेंगे(मुसम्मन=8)

--------   8 बार ...............16 बार आता है तो इसे भी , मुस्समन’ ही कहते है बस  उसमें ’मुइज़ाफ़ी’ लफ़्ज़.मुसम्मन से पहले.जोड़ देते है जिससे यह पता चले कि यह ’मुस्समन’ की दो-गुनी की हुई बहर है
खैर
यह बह्र इतनी मधुर और आहंगखेज़ (लालित्य पूर्ण ) है कि  इस बह्र में बहुत से शो;अरा नें बहुत अच्छी और दिलकश ग़ज़ल कहे  हैं
खुमार बाराबंकी साहब की इसी बह्र में एक गज़ल है  आप भी मुलाहिज़ा फ़र्मायें
मत्ला पेश है

न हारा है इश्क़ और,न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है ,हवा चल रही है

्तक़्तीअ  पर बाद में जाइएगा पहले इस शे’र की शे;रियत देखिए .क्या बात कही है ..इश्क़ और दुनिया ...दिया और हवा सब अपना अपना काम कर रहें है बग़ैर अन्जाम की परवाह किए बग़ैर

खैर इसकी तक़्तीअ पर आते है

122    /  122 /122    /122
न हारा/ है इश्क़ और/न दुनिया/थकी है
122    /122/   122  /122
दिया जल/रहा है/हवा चल/ रही है

इसलिए कि अगर मिसरा को बह्र और वज़्न में पढना है तो ’है’ को दबा कर (मात्रा गिरा कर कि 1 का वज़्न आये) प्र्र पढ़ना  पढ़ेगा
[-"इश्क़ और '- को 22 के  वज़न पर  पढ़ना पड़ेगा यानी ’इश्क़’ को  ’इश’ और "और" को "अर’  की वज़न पर पढ़ना पड़ेगा

एक बात और
इस शे’र में 122 की आवॄति 8-बार हुई है(यानी एक मिसरा में 4 बार आया है) अत: यह मुस्समन(8) हुआ
चूंकि 122 अपनी मूल स्वरूप (बिना किसी बदलाव के बिना किसी काट-छाँट के पूरा का पूरा ,गोया मुसल्लम)में हर बार रिपीट् हुआ अत्: यह "सालिम’ बहर हुआ
अत: इस बहर का नाम -हुआ "बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम’
चन्द अश’आर आलिम जनाब  इक़बाल साहब का लगा रहा हूं बहुत ही मानूस(प्रिय) ग़ज़ल है
सितारों से आगे जहां और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहां और भी हैं

कनाअत न कर आलमे-रंगो-बू पर
चमन और भी  आशियां और भी हैं

तू तायर है परवाज़ है काम तेरा
तिरे सामने आसमां और भी है

इन अश’आर की शे’रिअत देखिए और महसूस कीजिए ..यहां काफ़िया की तुकबन्दी नहीं रदीफ़ का मिलान नहीं शे’र का वज़्न (गुरुत्व) और असरपज़ीरी देखिए और फिर देखिए की हम लोगों की गज़ल या शे’र कहां ठहरते हैं (यानी कहीं नहीं)
अब इसके तक़्तीअ पर एक नज़र डालते हैं
122    /122    /122    /122
सितारों /से आगे /जहाँ औ /र भी हैं
अभी इश्क़/ के इम्ति/हाँ औ/ र भी हैं     (इश्क़ को ’इश् क’ की वज़न पर पढ़ें और ’इम्तिहां’ को ’इम’ ’ति’ की वज़्न पर पढ़ें क्योंकि बहर की यहां पर यही माँग है)

क़नाअत /न कर आ/लमे-रंगो/-बू पर
चमन औ/र भी आ/शियां  औ/र भी हैं

तू तायर/ है परवा/ज़ है का/म तेरा
तिरे सा/मने आ/समां औ/र भी हैं

यहां भी ’से’ और ’है’ देखने में तो वज़न 2 का लगता है लेकिन इसे 1 की वज़्न पे पढ़्ना होगा(यानी मात्रा गिरा कर पढ़ना होगा) कारण कि बहर की यही मांग है यहां पे।यह भी बह्र-ए-मुत्क़ारिब मुसम्मन सालिम की मिसाल है कारण वही कि इस बह्र में भी सालिम रुक्न( फ़ ऊ लुन 122) शे’र में 8-बार (यानी मिसरा में 4-बार) प्रयोग हुआ है

इसी सिलसिले में और इसी बहर में चन्द अश’आर इस ख़ादिम खाकसार का भी बर्दास्त कर लें
122    /122    /122 /122
खयालों /में जब से/ वो आने/ लगे हैं
122     /122       122  / 122
हमीं ख़ुद /से ख़ुद को /बेगाने/ लगे हैं

122    /122        /122  /122
वो रिश्तों/ को क्या ख़ा/स तर्ज़ी/ह देते
122      /122    /122  /122
जो रिश्तों /को सीढ़ी /बनाने /लगे हैं

122     /122     /122    /122
अभी हम/ने कुछ तो /कहा भी /नहीं है
122   /  122       /122/ 122
इलाही /! वो क्यों मुस्क/राने लगे हैं   (मुस्कराने =मुस कराने की तर्ज़ पे पढ़े)
ये भी मुतकारिब मुसम्म्न सालिम बह्र है


कई पाठकों ने लय (आहंग) पर भी समाधान चाहा है.कुछ लोगों की मानना है कि अगर लय (आहंग) ठीक है तो अमूमन ग़ज़ल बहर में होगी। मैं इस से बहुत इत्तिफ़ाक़ (सहमति) नहीं रखता ,मगर हां,अगर ग़ज़ल बह्र में है तो लय में ज़रूर होगी ।कारण कि रुक्न और बह्र ऐसे ही बनाये गयें हैं कि लय अपने आप आ जाती है ’फ़िल्मी गानों में जो ग़ज़ल प्रयोग किए गये हैं उसमें लय भी है ..सुर भी है..ताल भी है ..तभी तो दिलकश भी है
उदाहरण के लिए फ़िल्म का एक गीत लेता हूँ आप सब ने भी सुना होगा इसकी लय भी सुनी होगी इसका संगीत भी सुना होगा(अभी फ़िल्म का नाम याद नहीं आ रहा है)...गाना है

इशारों इशारों में दिल लेने वाले ,बता ये हुनर तूने सीखा कहां से
निगाहों निगाहों से जादू चलाना ,मेरी जान सीखा है तूने जहाँ से

अब मैं इस की तक़्तीअ कर रहा हूं
122   /122  /  122   /  122  / 122  / 122  /122    /122
इशारों /इशारों/ में दिल ले /ने वाले /,बता ये/ हुनर तू/ने सीखा /कहां से
122   /122    /122   /122  / 122  /  122 /  122  /122
निगाहों /निगाहों /से जादू /चलाना ,/मेरी जा/न सीखा/ है तूने /जहाँ से

जब आप ये गाना सुनते हैं तो आप को लय कहीं भी टूटी नज़र नही आती...क्यो?
क्यों कि यह मतला सालिम बहर में है और सही वज़न में हैं
यहां ’में’ ’नें’ ’से’ मे’ ’है’  देखने में तो वज़न 2 लगता है लेकिन बहर का तक़ाज़ा है कि इसे 1-की वज़न में पढ़ा जाय वरना सुर -बेसुरा हो जायेगा..वज़न से ख़ारिज़ हो जायेगा (इसी को उर्दू में मात्रा गिराना कहते हैं) मेरी को ’मिरी’ पढ़ेंगे इस शे’र में
ऐसा भी नहीं है कि जहाँ आप ने ’में’ ’नें’ ’से’ मे देखी मात्रा गिरा दी ,वो तो जैसे ग़ज़ल की बह्र मांगेंगी वैसे ही पढ़ी जायेगी
 ऊपर के गाने में रुक़्न शे’र में 16-बार यानी मिसरा में 8-बार प्रयोग हुआ है अत: यह 16-रुकनी शे’र है मगर है मुस्समन ही
अत: इस पूरी बहर का नाम हुआ,.....बहर-ए-मुक़ारिब मुइज़ाफ़ी मुसम्मन सालिम
आप भी इसी बहर में शे’र कहें ..शायद कुछ बात बने..(शे’र


अभी हम ’बह्र-ए-मुतक़ारिब’ सालिम पर ही चर्चा करेंगे जब तक कि ये बह्र आप के ज़ेहन नशीन न हो जाय। इस बह्र के मुज़ाहिफ़ (रुक्न पे ज़िहाफ़ ) शक्ल की चर्चा बाद में करेंगे
 यह ज़रूरी नहीं कि आप ’मुसम्मन’सालिम (शे’र मे 8 रुक्न) में ही  ग़ज़ल कहें
आप चाहें तो मुसद्द्स सालिम (शे’र में 6 रुक्न) में भी अपनी बात कह सकते है
मैं मानता हूँ कि मुरब्ब सालिम (शे’र में 4 रुक़्न) में अपनी बात कहना मुश्किल काम है मगर असम्भव नहीं है अभी तक इस शक्ल के शे’र मेरी नज़र से गुज़रे नहीं है.अगर कभी नज़र आया तो इस मंच पर साझा करुंगा
मगर बह्र-ए-मुतक़ारिब की मुसम्मन शक्ल इतनी मानूस (प्रिय) है कि अज़ीम शो’अरा (शायरों) ने इसी शक्ल में बहुत सी ग़ज़ल कही है। मैं इसी बहर की यहां 1-ग़ज़ल लगा रहा हूँ। यहां लगाने का मक़सद सिर्फ़ इतना है कि लगे हाथ हम-आप शे’र की मयार (स्तर) और उसके शे’रियत के bench mark से भी वाकिफ़ होते चलें और यह देखें कि हमें इस स्निफ़ (विधा) में और मयार में कहाँ तह जाना है ।तक़्तीअ आप स्वयं कर लीजिएगा .एक exercise भी हो जायेगी

मक़्बूल शायर जनाब इक़बाल साहब का एक  ग़ज़ल लगा रहा हूं ।आप ग़ज़ल पढ़े नहीं सिर्फ़ गुन गुनायें और दिल में महसूस करें

इसकी बुनावाट देखिए ,मिसरों का राब्ता(आपस में संबन्ध) देखिए अश’आर की असर पज़ीरी(प्रभाव) देखिए और इसका लय (आहंग) देखिए और फिर लुत्फ़ अन्दोज़ होइए

122/122//122/122
तिरे इश्क़ का इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख मैं क्या चाहता हूँ

सितम हो कि हो वादा-ए-बेहिजाबी
कोई बात सब्र आज़मा चाहता हूँ

ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ

ज़रा-सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना
वही लनतरानी सुना चाहता हूँ

कोई दम का मेहमां हूं ऎ अहले-महफ़िल
चिराग़े-सहर हूँ  बुझा चाहता हूँ

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बेअदब हूँ  सज़ा चाहता हूँ

नोट : इश्क़ को  ’इश् क (2/1) की वज़न में पढ़े
     ’इन्तिहा’ को इन् तिहा (2/12) की वज़्न् पे पढ़ें

वादा-ए-बेहिजाबी  =पर्दा हटाने का वादा
लनतरानी       =शेखी बघारना
चिराग़-ए-सहर    =भोर का दीपक

शायद ये प्रस्तुति शायद आप के काम आये ,इस उमीद से
सादर
आनन्द.पाठक
09413395592






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