शुक्रवार, 16 मार्च 2012

जनाब ’सरवर’ की एक ग़ज़ल : हम ने सब कुछ ही ......


हम ने सब कुछ ही मुहब्बत में तिरे नाम किया

और जो बच गया वो वक़्फ़-ए-मय-ओ-जाम किया



खु़द को जैसे भी हुआ खूगर-ए-आलाम किया

फ़ैसला इस तरह तेरा दिल-ए-नाकाम ! किया



शाम को सुब्ह किया ,सुब्ह को फिर शाम किया

हम ने मर मर के ग़म-ए-ज़ीस्त का इकराम किया



कब रहा एक जगह गर्दिश-ए-दौरां को क़ियाम

साक़ी-ए-वक़्त को किसने है भला राम किया ?



एक लम्हा भी नहीं सज्दा-ए-ग़म से खाली

कैसे काफ़िर ने हमें बन्दा-ए-इस्लाम किया



आप का पास-ए-मुहब्बत कोई देखे तो सही

हम को रुस्वा किया और वो भी सर-ए-आम किया



ऐसे बे-फ़ैज़ थे कुछ हाथ न आया अपने

शिकवा-ए-दर्द किया ,शिकवा-ए-अय्याम किया



राह गुम-कर्दा हुए शहर-ए-यक़ीं में जिस दिन

दिल-ए-दिवाना को सर-गश्ता-ए-अउहाम किया



बज़्म-ए-अहबाब में "सरवर" ये ग़ज़ल लाए हो?

और इस पर यह समझते हो बड़ा काम किया !



-सरवर



खूगर-ए-आलाम =तकलीफ़ सहने के काबिल

इकराम = इज्ज़त/इस्तक़्बाल

क़ियाम =घर/निवास

गर्दिश-ए-दौरां =ज़माने का चक्कर

बे-फ़ैज़ = बिना किसी उपकार के

शिकवा-ए-अय्याम =वक़्त की शिकायत

गुम-कर्दा =खो गए

सर-गस्ता:-ए-अउहाम =मुग़ालते में भूले-भटके


-सरवर-





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