शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

जनाब ’सरवर’ की एक ग़ज़ल : नज़र मिली ,बज़्म-ए-शौक़

याराना-ए-ब्लाग !
आदाब
एक मुद्दत के बाद यहां हाज़िरी लगा रहा हूं. और आप से मुख़ातिब हो रहा हूं
कुछ तो अपनी कोताही का सबब ,कुछ रोजगार-ए-ज़िन्दगी की मस्रूफ़ियत कि हाज़िरी न दे सका .इस बाइस-ए-ताख़ीर की मु’आफ़ी चाहता हूं

एक बार फिर इस ब्लाग को सरगर्म करने के लिए ,इस उम्मीद-ओ-यास से हाज़िर हो गया हूं कि आप मुअज़्ज़म की ज़र्रा नवाज़ी और मुहब्बत फ़िशानी पहले जैसी ही मिलती रहेगी
तालिब-ए-दुआ
आनन्द.पाठक

{ जनाब ’सरवर’ की एक ग़ज़ल से आगाज़ कर रहा हूं }


                                                ग़ज़ल



नज़र मिली, बज़्म-ए-शौक़ जागी, पयाम अन्दर पयाम निकला

मगर वो इक लम्हा-ए-गुरेज़ां , न सुब्ह आया ,न शाम निकला



" बड़े तकल्लुफ़ से आया साग़र ,बड़े तजम्मुल से जाम निकला"

हमारा जौक़-ए-मय-ए-वफ़ा ही रह-ए-मुहब्बत में ख़ाम निकला



वफ़ा है क्या, दोस्ती कहाँ की,हमारी तक़दीर है तो यह है

किया जो साये पे अपने तकिया तो वो भी मेह्शर-ख़िराम निकला



मैं आब्ला-पा , दरीदा-दामां खड़ा था सेहराये जूस्तजू में

मगर दलील-ए-सफ़र ये मेरा खु़द-आगही का क़ियाम निकला



न आह-ए-लर्ज़ां, न अश्क-ए-हिरमां, बदन-दरीदा ,न सर-ख़मीदा

तिरी गली से ज़रूर गुज़रा , मगर ब-सद-इहतराम निकला



इक एक हर्फ़-ए-उमीद-ओ-हसरत ग़ज़ल की सूरत में ढल गया है

मिरा सलीक़ा दम-ए-जुदाई खिलाफ़-ए-दस्तूर-ए-आम निकला



कभी यकीं पर गुमां का धोका ,कभी गुमां पर यकीं की तुहमत

हमें खुश आयी ये सदा-लौही ,हमारा हर तरह काम निकला



हज़ार सोचा ,हज़ार समझा ,मगर ज़रा कुछ न काम आया

क़दम क़दम मंज़िल-ए-ख़िरद में ,मिरा जुनूं से ही काम निकला



गुमां ये था बज़्म-ए-बेख़ुदी में ,बहक न जाये कहीं तू "सरवर"

मगर तिरा नश्शा-ए-ख़ुदी तो हरीफ़-ए-मीना-ओ-जाम निकला



-सरवर-



लम्हा-ए-गुरेज़ां = (आप के साथ) बिताए हुए पल

तजम्मुल = शानो-शौकत से

ख़ाम =दोष, ग़लती

तकिया = भरोसा

महशर ख़िराम =क़यामत की चलन

दरीदा दामां =फटा-चिथड़ा दामन

सहराये जुस्तजू = तलाश का रेगिस्तान

आह-ए-लर्ज़ां =काँपती हुई आवाज़

अश्क-ए-हिर्मां =नाउम्मीदी की आँसू

सर-ख़मीदा =झुका हुआ सर,नत-मस्तक

सादा-लौही =कोरा स्लेट/कोरा कागज़

ख़िरद =अक़्ल

बा-सद-ऐहतिराम = सैकड़ों बार इस्तिक़्बाल करते हुए

हरीफ़ =विरोधी