रविवार, 27 मार्च 2011

जनाब ’सरवर’ की 2-ग़ज़लें

ग़ज़ल : ज़माना एक जालिम है ....


ज़माना एक ज़ालिम है किसी का हो नहीं सकता
किसी का ज़िक्र क्या यह ख़ुद ही अपना हो नही सकता

यह है मोजिज़-नुमायी उसकी या है हुस्न-ए-ज़न मेरा?
"कि उसका हो के फिर कोई किसी का हो नहीं सकता"

नज़र तो फ़िर नज़र है ढूँढ लेगी लाख पर्दों में
छुपो तुम लाख लेकिन ख़ुद से पर्दा हो नहीं सकता

मक़ाम-ए-नाउम्मीदी ज़ीस्त का उन्वान क्यों ठहरे?
मुहब्बत में जो तुम चाहो तो क्या क्या हो नहीं सकता

उधर वो नाज़ कि "देखे हैं तुम से लाख दीवाने !"
इधर ये ज़ोम कि कोई भी हम सा हो नहीं सकता!

कहाँ यह उम्र-ए-दो-रोज़ा कहाँ दुनिया की आवेज़िश
हुआ अब तक मगर अब यूँ गुज़ारा हो नहीं सकता

मुहब्बत और शै है ,दिल सितानी और ही शै है
तकल्लुफ़ बर-तरफ़! अब यह गवारा हो नहीं सकता

कोई अच्छा कहे "सरवर" तुझे या वो बुरा जाने
नज़र में ख़ुद की जो है उस से अच्छा हो नहीं सकता

-सरवर-

मोजि़ज़-नुमाई =चमत्कार
हुस्न-ए-ज़न =खु़श ख़याली
ज़ोम =गुमान
दुनिया की आवेज़िश =दुनिया की झंझटें
दिल सितानी =दिल को बहलाना
तकल्लुफ़ बर-तरफ़! = तकल्लुफ़ छोड़िए !

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गज़ल : रह-ए-उल्फ़त निहायत ...


रह-ए-उल्फ़त निहायत मुख़्तसर मालूम होती है
हमें हर राह तेरी रह-गुज़र मालूम होती है

हमें यह ज़िन्दगी इक दर्द-ए-सर मालूम होती है
न होना चाहिए ऐसा मगर मालूम होती है

मुसीबत में इक ऐसा वक़्त भी आता है इन्सां पर
ज़रा सी छाँव भी अपना ही घर मालूम होती है

न हम बदले, न दिल बदला ,न रंग-ए-आशिक़ी बदला
मगर बदली हुई तेरी नज़र मालूम होती है

कभी तुम भी किसी से दिल लगा कर देखते साहेब!
ज़रा सी चोट भी इक उम्र भर मालूम होती है

हर आहट पर मिरी साँसों की हर लै जाग उठती है
शब-ए-उम्मीद यादों का सफ़र मालूम होती है

हमें दुनिया भला क्या राह से अपनी लगायेगी
वो अपने आप से ही बेख़बर मालूम होती है

तिरे शे’रों पे इतनी दाद "सरवर" सख़्त हैरत है !
हमें ये साज़िश-ए-अह्ल-ए-हुनर मालूम होती है

-सरवर-

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

जनाब "सरवर' की एक ग़ज़ल : तमाम दुनिया में ढूंढ आया ......

ग़ज़ल : तमाम दुनिया में ढूंढ आया .....

तमाम दुनिया में ढूँढ आया मैं ग़म-शुदा ज़िन्दगी की सूरत
मिली तो अक्सर हयात-ए-मुज़्तर,मगर मिली अजनबी की सूरत

सबक़ तो सीखा हम अहल-ए-दिल ने ये इज्ज़ की सर-बलन्दियों से
कि एक सजदा है काफ़ी लेकिन हो बन्दगी बन्दगी की सूरत

अजीब दस्तूर-ए-आशिक़ी है न मैं ही मैं हूँ न तुम ही तुम हो
न दोस्ती दोस्ती की सूरत ,न दुश्मनी दुश्मनी की सूरत

ख़बर, तसव्वुर,ख़याल ,ईमां ,गुमां, यक़ीं,फ़िक्र ,इल्म,हिकमत
मक़ाम-ए-ख़ुद-आगाही के आगे ,सवाद-ए-कम-आगाही की सूरत

बरहना-पा, आब्ला-गज़ीदा, शिकस्ता-दिल ,पैरहन- दरीदा
मक़ाम-ए-सिद्रा पे सोचता हूँ कोई है परदा-दरी की सूरत

मिला सर-ए-राह ख़ुद से जब मैं अजीब ही अपना हाल देखा
किसी की आंखें, किसी का चेहरा ,नज़र किसी की,किसी की सूरत

न मुझसे पूछो कि मैं कहाँ हूँ ,मुझे तो कुछ भी पता नहीं है
कि अपनी सूरत में आ रही है नज़र मुझे हर किसी की सूरत

यह सच है दुनिया में और भी हैं जमील-ओ-ख़ुशरू हसीन-ओ-दिलबर
पसंद आयी मगर हमें तो जनाब-ए-मन ! आप ही की सूरत

न जाने कब से खड़ा था ’सरवर’ इक आस्तीन-ए-उम्मीद थामे
वो निकला ख़ुद से ही ग़ैर हाज़िर, हुई अजब हाज़िरी की सूरत

-सरवर
मुज़्तर =बेचैनी
बरहना-पा =नंगे पाँव
आब्ला-गज़ीदा = छाला सहित
पैरहन-दरीदा =चिथड़े लपेटे
मक़ाम-ए-सिद्रा = ऊचाईयों के अन्तिम पड़ाव पर
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