शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

जनाब "सरवर" की दो ग़ज़लें ..

ग़ज़ल : कभी तुझ पे तेरी निगाह है ......

कभी तुझ पे मेरी निगाह है कभी खु़द से मुझको ख़िताब है
कोई ये बताये है राज़ क्या यहाँ कौन ज़ेर-ए-निक़ाब है

मुझे तू ही काश ! बता सके यह करम है या कि इताब है
कभी रंग-ए-इश्वा-ओ-नाज़ है ,कभी बे-नियाज़ी का बाब है

ज़रा सोच तो सही नासिहा ! भला तुझ में मुझ में है फ़र्क़ क्या !
मुझे फ़िक्र-ए-शाम-ए-फ़िराक़ है ,तुझे ख़ौफ़-ए-रोज़-ए-हिसाब है

कभी इस तरह ,कभी उस तरह मिरा इम्तिहान हुआ किया
इसी फ़िक्र में कटी ज़िन्दगी कि ये कैसा मेरा निसाब है ?

ये जहां हो या वो जहान हो कोई इन को ले के करेगा क्या
यह है रेग्ज़ार-ए-गुरेज़पा ,तो वो कारवान-ए-सराब है

तब-ओ-ताब-ए-शेवा-ए-दिलबरी! तब-ओ-ताब-ए-शेवा-ए-दिलबरी!
"न पयाम है ,न सलाम है ,न सवाल है,न जवाब है"

कभी इस तरफ़ भी उठा नज़र ,तुझे अपनी भी है कोई ख़बर?
नहीं चश्म-ए-तार ,है यह आईना !मिरा दिल नहीं यह किताब है!

कोई लाख तुझ को कहे बुरा न ग़मीं हो "सरवर"-ए-बे-नवा
यह फ़राज़-ए-दार-ए-अना ही तो तिरे हक़ में कार-ए-सवाब है !

-सरवर

ख़िताब =सम्मान/इज्ज़त
करम =मेहरबानी
इताब =गुस्सा
बाब =अध्याय
इश्वा =मोहिनी की हाव-भाव
नासिहा =उपदेशक
निसाब =धन-दौलत/जमा-पूँजी
रेग्ज़ार-ए-गुरेजपा =भाग-दौड़/पलायन
कारवान-ए-सराब =मीरीचिका का सफ़र
बे-नवा =दरिद्र/कंगाल/दीन-हीन
तब-ओ-ताब-ए-शेवा-ए-दिलबरी= दिलबरी के तरीके की (प्रेम की)गर्मी
कार-ए-सवाब = दान-पुण्य का काम
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ग़ज़ल :रह-ए-वफ़ा में ग़म-ए-जुदाई....

रह-ए-वफ़ा में ग़म-ए-जुदाई कभी मिरा हम-क़दम न होता
तुझे ख़ुदा का जो ख़ौफ़ होता तो ख़्वार में ख़म-ब-ख़म न होता

मुझे सर-ए-बज़्म-ए-ग़ैर तेरी निगाह-ए-कम-आशना ने मारा
जो मुझ पे अह्सान यूँ न होता , तिरा यह अह्सान कम न होता

तुम्हारी इस बन्दगी के सदक़े मिरा मुक़द्दर उरूज पर है
जो इश्क़ जल्वा-कुशा न होता तो दिल मिरा जाम-ए-जम न होता

बुरा हो इस ज़िन्दगी का जिस ने हमें किया ख़्वार आशिक़ी में
:जो हम न होते तो दिल न होता जो दिल न होता तो ग़म न होता:

निगाह-ए-लुत्फ़-ओ-करम जो करते हमारे जानिब भी गाहे-गाहे
तो हस्र-ए-उल्फ़त में हमको शिकवा कभी तुम्हारी क़सम न होता

कभी तो हंगाम-ए-ज़िन्दगी में निगाह मिलती सलाम होता
तुझे भी दुनिया की दाद मिलती मुझे भी मरने का ग़म न होता

भला मैं इस तरह क्यों भटकता फ़िसाद-ए-हुस्न-ए-नज़र के हाथों
अगर तिरी राह-ए-जुस्तजू में फ़रेब-ए-दैर-ओ-हरम न होता

ग़मों के हाथों ही आज "सरवर" है इश्क़ में बा-मुराद-ए-मंज़िल
सितम बा शक्ल-ए-करम जो होता करम बा शक्ले-सितम न होता

-सरवर
ख़्वार में =बदहाली में
ख़म-बा-ख़म =उलझन
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