शनिवार, 11 सितंबर 2010

जनाब 'सरवर ' की दो ग़ज़लें ....

ग़ज़ल : आश्ना थे ख़ुद से ......



आश्ना थे ख़ुद से ,फिर ना-आश्ना होते गये
हो भला इस इश्क़ का,हम क्या से क्या होते गये!

अश्क़-ए-ग़म बहते रहे और नक़्श-ए-पा होते गये
ज़िन्दगी के कर्ज़ सारे यूँ अदा होते गये

ना-रसाई का फ़साना क्या कहें,किससे कहें ?
मंज़िलें आयीं तो हम बे-दस्त-ओ-पा होते गये

इत्तिफ़ाकन अपनी हालत पर नज़र जब जब पड़ी
हम निगाहों में ख़ुद अपनी बे-रिदा होते गये

रेग्ज़ार-ए-आरज़ू में वक़्त वो हम पर पड़ा
राहज़न चेहरे बदल कर रहनुमा होते गये

अहल-ए-दुनिया की ज़रा देखो करम-फ़र्माइयां
आड़ में ईमां की बन्दे भी खु़दा होते गये

इश्क़ में बेताबियों की लज़्ज़तें मत पूछिए
नाला-हाये आरज़ू हर्फ़-ए-दुआ होते गये

ये कहो "सरवर" तुम्हारी इन्किसारी क्या हुई?
तुम भी दुनिया की तरह क्यों ख़ुद-नुमा होते गये?

-सरवर
बे-रिदा = बिना चादर के
ना-रसायी का =असफलता का
बे-दस्त-ओ-पा =असमर्थ/लाचार
रेग्ज़ार-ए-आरज़ू = इच्छाओं के रेगिस्तान में
इन्किसारी =ख़ाकसारी/विनम्रता
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ग़ज़ल : रोज़-ओ-शब रुलायेगी ....
रोज़-ओ-शब रूलायेगी आप की कमी कब तक ?
दर्द-ए-बेकसी कब तक ? रंज-ए-आशिक़ी कब तक?

"सरवर"-ए-परेशां से ऐसी दिल्लगी कब तक?
बे-रुख़ी के पर्दे में नाज़-ओ-दिलबरी कब तक?

दाग़-ए-नारसायी क्यों ज़ख़्म-ए-कज-रवी कब तक?
सुब्ह नौहा-ख़्वां होगी शाम-ए-यास की कब तक?

क्यों न हम भी दिखलायें दाग़-हाये शाम-ए-ग़म ?
महशर-ए-मुहब्बत में ये रवा-रवी कब तक?

अब तो अपनी सूरत भी अजनबी सी लगती है
देगी यूँ फ़रेब आख़िर मेरी ज़िन्दगी कब तक?

सुब्ह-ओ-शाम शिकवा है रोज़-ओ-शब का रोना है
इस तरह निभाओगे हम से दोस्ती कब तक?

राह-ए-मैकदा या-रब! हर क़दम पे खोटी है
कर्ब-ए-तिश्नगी कब तक? जाम ये तही कब तक?

मैं शिकार-ए-नाउम्मीदी ,तू वफ़ा से बेगाना
देखिये रहे अपनी ज़ीस्त अजनबी कब तक?

हो चुकी बहुत बातें ,सोच तो ज़रा "सरवर"
मंज़िले-ए-मुहब्बत में सिर्फ़ शायरी कब तक?
सरवर-
दाग़-ए-नारसायी =न मिलने का दुख
कज-रवी =(प्रेमिका की) टेढ़ी चाल
शाम-ए-यास =ना उम्मीदी की शाम
कर्ब-ए-तिश्नगी =प्यास की बेचैनी
जाम तही =बची-खुची शराब ,तलछट में बची शराब
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