शनिवार, 21 अगस्त 2010

जनाब 'सरवर' की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल : रोज़-ओ-शब इस में .....


रोज़-ओ-शब इस में बपा शोर-ए-कि़यामत क्या है ?
ये मिरा दिल है कि आईना-ए-हैरत ? क्या है ?

बात करने में बताओ तुम्हें ज़हमत क्या है?
इक नज़र भी न उठे ,ऐसी भी आफ़त क्या है.?

जान कर तोड़ दिया रिश्ता-ए-दाम-ए-उम्मीद
"आज मुझ पर यह खुला राज़ कि जन्नत क्या है"

नाला-ए-नीम-शबी , आह-ओ-फ़ुग़ां-ए-सेहरी
गर नहीं है यह इबादत, तो इबादत क्या है?

मुझ को आग़ाज़-ए-मुहब्बत से ही फ़ुर्सत कब है?
क्या बताऊँ तुझे अंजाम-ए-मुहब्बत क्या है?

"मीर"-ओ-’इक़्बाल’से,"ग़ालिब"से ये पूछें साहेब!
शायरी चीज़ है क्या ,शे’र की अज़मत क्या है

जब से मैं दीन-ए-मुहब्बत में गिरिफ़्तार हुआ
कुफ़्र-ओ-ईमान की ,वल्लाह ! हक़ीक़त क्या है?

हम ग़रीबों पे जो दस्तूर-ए-ज़बां-बन्दी है
कोई मजबूरी है तेरी कि है आदत ? क्या है?

हर्फ़-ओ-मानी हुए बे-रब्त ,क़लम टूट गया
मंज़िल-ए-शौक़ में ये आलम-ए-वहशत क्या है?

डूब कर ख़ुद में पता ये चला ,हर सू तू है !
हम-नशीं ! तफ़्रक़ा-ए-जल्वत-ओ-ख़ल्वत क्या है?

काम से रखता हूँ काम अपना सदा ही यारो !
मुझको दुनिया से भला फिर ये शिकायत क्या है?

एक पल चैन नहीं "सरवर’-ए-बदनाम तुझे !
कुछ तो मालूम हो आख़िर तिरी नियत क्या है?

-सरवर-
अज़्मत =महत्व
दीन-ए-मुहब्बत =मुहब्बत का धर्म
हर्फ़-ओ-मानी =शब्द और अर्थ ,कथन और भाव
बे-रब्त =बिना संबंध के,आपस में बिना ताल-मेल के
हर-सू =हर तरफ़
तफ़र्क़ा = फ़र्क़
===========================


ग़ज़ल : अफ़्सोस ख़ुद को खुद पे.....

अफ़्सोस ख़ुद को ख़ुद पे नुमायां न कर सके
हम ज़िन्दगी को साहब-ए-ईमां न कर सके

राह-ए-तलब में कार-ए-नुमायां न कर सके
अश्क़-ए-जुनूं को आईना-सामां न कर सके

वो इश्क़ क्या जो दर्द का दर्मां न कर सके
वो दर्द क्या जो इश्क़ को आसां न कर सके

हर लम्हा-ए-हयात हिसाब अपना ले गया
"हम ज़िन्दगी में फिर कोई अरमां न कर सके

दामान-ए-आरज़ू की दराज़ी तो देखिए
खु़द से भी ज़िक्र-ए-तंगी-ए-दामां न कर सके

यूँ मुब्तिला-ए-कुफ़्र-ए-तमन्ना रहे कि हम
चाहा हज़ार,दिल को मुसलमां न कर सके

क्यों मुझसे लाग है तुझे ऐ शूरिश-ए-हयात
वो काम कर जो गर्दिश-ए-दौरां न कर सके !

इतनी तो हो मजाल कि ख़ुद को समेट लें
क्या ग़म जो हम तलाफ़ी-ए-हिज्रां न कर सके

इस दर्जा फ़िक्र-ए-शेहर-ए-निगारां में गुम रहे
हम खु़द भी अपनी ज़ात का इर्फ़ां न कर सके

"सरवर" चलो है मैकदा-ए-इश्क़ सामने
मुद्दत हुयी ज़ियारत-ए-इन्सां न कर सके

-सरवर

आईना-सामां =आईने की तरह
नुमायां =ज़ाहिर/व्यक्त
कार-ए-नुमाया =बहुत बड़ा काम
दर्मा =इलाज
मुब्तिला = गिरफ़्त में
तलाफ़ी-ए-हिज़्रा =जुदाई की भरपाई
इरफ़ाँ न कर सके =जान न सके
=

3 टिप्‍पणियां:

Rajendra Swarnkar ने कहा…

जनाब आनन्द पाठक साहब
नमस्कार !
बार बार एक ही ग़ज़ल कैसे… ?

रोज़-ओ-शब इस में बपा शोर-ए-कि़यामत क्या है ?
ये मिरा दिल है कि आईना-ए-हैरत ? क्या है ?

अभी 17 जुलाई की पोस्ट में भी थी ।
वैसे ग़ज़ल बाकमाल है ।

अफ़्सोस ख़ुद को ख़ुद पे नुमायां न कर सके
हम ज़िन्दगी को साहब-ए-ईमां न कर सके

बहुत शानदार और रवां - दवां ग़ज़ल है हमेशा की तरह …
मुबारकबाद !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

सुनील गज्जाणी ने कहा…

anand jee
namaskar !
aap ke blog pe pehli baar aane ka soubhagya prapt hua ,
aap ki gazale lajavab hai , aananad aa gaya blog pe aa kar .
saadar

Devi Nangrani ने कहा…

Lajawaab har sher

इतनी तो हो मजाल कि ख़ुद को समेट लें
क्या ग़म जो हम तलाफ़ी-ए-हिज्रां न कर सके
Sarwar ji ko paghna khushnaseebi hai.Unki Ghazals saaz aur aawaaz mein bhi yahan uplabdh ho ye koshish kejiye