शनिवार, 19 जून 2010

जनाब "सरवर" की दो ग़ज़ल

ग़ज़ल : कहने को यूँ तो ज़िन्दगी ...........

कहने को यूँ तो ज़िन्दगी अपनी ख़राब की
लेकिन है बात और ही अह्द-ए-शबाब की !

इज़हार-ए-शौक़ पर ये निगाहें इताब की ?
"जो बात की ख़ुदा की क़सम ! ला-जवाब की"!

याँ जान पर बनी है मुहब्बत के फेर में
और आप को पड़ी है हिसाब-ओ-किताब की

क्या पूछते हो उम्र-ए-गुरेज़ां की कायनात
"दो करवटें थीं आलम-ए-ग़फ़लत में ख़्वाब की"

हम रोज़-ए-हश् र होंगे जो मस्रूफ़-ए-दीद-ए-यार
फ़ुर्सत किसे मिलेगी सवाल-ओ-जवाब की ?

देखा क़रीब से तो वहाँ और रंग था
तारीफ़ सुनते आये थे हम आँ-जनाब की !

उक़्बा की कौन फ़िक्र करे ,मेरे इश्क़ ने
दुनिया ख़राब की ,मेरी दुनिया ख़राब की !

ग़ैरों में ख़्वार है तो वो अपनों में ना-मुराद
क्या पूछते हो "सरवर"-ए-इज़्ज़त-मआब की !

-सरवर
निगाह-ए-इताब =गुस्से से भरी आँख
उम्र-ए-गुरेजा =भागती हुई ज़िन्दगी
उक़्बा =परलोक
इज़्ज़त-ए-म’आब =इज़्ज़तदार

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ग़ज़ल : दिल ही दिल में डरता हूँ...........

दिल ही दिल में डरता हूँ कुछ तुझे ना हो जाए
वरना राह-ए-उल्फ़त में जाए जान तो जाए

मेरी कम नसीबी का हाल पूछते क्या हो
जैसे अपने ही घर में राह कोई खो जाए

गर तुम्हे तकल्लुफ़ है मेरे पास आने में
ख़्वाब में चले आओ यूँ ही बात हो जाए

झूठ मुस्कराए क्या आओ मिल के अब रो लें
शायरी हुई अब कुछ गुफ़्तगू भी हो जाए

ये भी कोई जीना है?खाक ऐसे जीने पर
कोई मुझ पे हँसता है ,कोई मुझको रो जाए

मेरे दिल के आँगन में किस क़दर अँधेरा है
काश ! चाँदनी बन कर कोई इसको धो जाए

याद एक धोखा है ,याद का भरोसा क्या
तुम ही खु़द यहाँ आकर ,याद से कहो जाए

देख कर चलो ’सरवर’! जाने कौन उल्फ़त में
फूल तुमको दिखला कर ,ख़ार ही चुभो जाए

-सरवर-

तकल्लुफ़ =तकलीफ़
ख़ार = काँटा

1 टिप्पणी:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अति सुंदर गजल ... धन्यवाद ...