शनिवार, 22 मई 2010

जनाब 'सरवर' की दो ग़ज़ल

ग़ज़ल : इक ज़रा सी देर को ......


इक ज़रा सी देर को नज़रों में आने के लिए
तुम ने ’सरवर’ किस क़दर एहसान ज़माने के लिए !

इक तमन्ना, एक हसरत ,इक उम्मीद ,इक आरज़ू
है अगर कुछ तो यही है सर छुपाने के लिए

काम क्या आया दिल-ए-मुज़्तर मक़ाम-ए-ज़ीस्त में
एक दुनिया आ गई बातें बनाने के लिए

मेरी तन्हाई मिरे ग़म का मदावा बन गई
रात मैं खुद से मिला ,सुनने सुनाने के लिए

वक़्त जैसा भी गुज़र जाए ग़नीमत जानिए
क्या ख़बर कल आये कैसा आज़माने के लिए

बारगाह-ए-इश्क़ में है आजिज़ी मेराज-ए-शौक़
सर झुकाना है ज़रूरी सर उठाने के लिए

वो निगाह-ए-शर्मगीं और वो तबस्सुम ज़ेर--ए-लब !
इक सताने के लिए ,इक आज़माने के लिए

अहल-ए-दुनिया को कोई मिलता नहीं क्या दूसरा ?
रह गया हूँ मैं ही "सरवर" यूँ सताने के लिए ?

-सरवर
दिल-ए-मुज़्तर =बेचैन दिल
आजिज़ी =विनम्रता


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ग़ज़ल : मरीज़-ए-इश्क़ पर .......

मरीज़-ए-इश्क़ पर पल में क़ियामत का गुज़र जाना
"सिरहाने से किसी का उठ के वो पिछले पहर जाना "

किसी को हम-नफ़स समझा, किसी को चारागर जाना
मगर दुनिया को हमने कुछ नहीं जाना ,अगर जाना

मक़ाम-ए-ज़ीस्त को हम ने भला कब मोतबर जाना ?
मिला जो लम्हा-ए-फ़ुर्सत उसे भी मुख़्तसर जाना

इलाही ! हम ग़रीबों की ही क्यों यह आज़माईश है ?
दवा का बे-असर रहना , दुआ का बे-असर जाना

तबस्सुम ज़ेर-ए-लब तेरा,दलील-ए-सुब्ह-ए-जान-ओ-दिल
तेरा नज़रें चुराना ,नब्ज़-ए-हस्ती का ठहर जाना

हक़ीक़त है तो बस इतनी सी है हंगामा-ए-हस्ती की
"यहाँ पर बे-ख़बर रहना ,यहाँ से बे-ख़बर जाना "

सलाम ऐसी मुहब्बत को ,भला ये भी मुहब्बत है !
किसी की याद में जीना ,किसी के ग़म में मर जाना

रह-ए-उल्फ़त में हम से और क्या उम्मीद रखते हो ?
ये क्या कम है कि अपनी ज़ात को गर्द-ए-सफ़र जाना?

तू ख़ुद को लाख समझे बा-कमाल-ओ-बाहुनर "सरवर"
तुझे लेकिन ज़माने ने हमेशा बे-हुनर जाना !

-सरवर

शनिवार, 15 मई 2010

जनाब "सरवर" की एक ग़ज़ल : हम हुए गर्दिश-ए-दौरां.....

हम हुए गर्दिश-ए-दौरां से परेशां क्या क्या !
क्या था अफ़्साना-ए-जां और थे उन्वां क्या क्या !

हर नफ़स इक नया अफ़्साना सुना कर गुज़रा
दिल पे फिर बीत गयी शाम-ए-ग़रीबां क्या क्या !

तेरे आवारा कहाँ जायें किसे अपना कहें ?
तुझ से उम्मीद थी ऐ शहर-ए-निगारां क्या क्या !

बन्दगी हुस्न की जब से हुई मेराज-ए-इश्क़
सज्दा-ए-कुफ़्र बना हासिल-ए-ईमां क्या क्या !

फ़ासिले और बढ़े मंज़िल-ए- गुमकर्दा के
और हम करते रहें ज़ीस्त के सामां क्या क्या !

धूप और छाँव का वो खेल ! अयाज़न बिल्लाह
रंग देखे तिरे ऐ उम्र-ए-गुरेजां क्या क्या !

हाय ये लज़्ज़त-ए-आज़ार-ए-शिकस्तापायी
हमने ख़ुद ढूँढ लिए अपने बयाबां क्या क्या !

हैफ़ "सरवर"! तुझे ऐय्याम-ए-ख़िज़ां याद नहीं
इश्क़ में है तुझे उम्मीद-ए-बहारां क्या क्या !

-सरवर
शहर-ए-निगारां =हसीनों का शहर
हासिल-ए-ईमां =ईमान(विश्वास)का नतीजा
गर्दिश-ए-दौरां =ज़माने का चक्कर
मंज़िल-ए-गुमकर्दा =खोई हुई मंज़िल
इयाज़न बिल्लाह =ख़ुदा खै़र करे !
लज़्ज़त-ए-आज़ार-ए-शिकस्तापायी=पाँवों के टूटने की तकलीफ़ का मज़ा

गुरुवार, 6 मई 2010

जनाब "सरवर" की एक ग़ज़ल : वो तसव्वुर में ...

वो तसव्वुर में भी मुझ पर मेहरबां होता नहीं
रब्त आख़िर क्यों हमारे दरमियां होता नहीं ?

दिल पे जो गुज़रे है नज़रों से अयां होता नहीं
हाये क्या कीजिए कि क़िस्सा ये बयां होता नहीं

आशिक़ी में मातम-ए-आशुफ़्तगां होता नहीं ?
आप ही कह दें कि ऐसा कब कहाँ होता नहीं?

दिल बदलते देर क्या लगती है अहल-ए-देह्र को
क्या बतायें हम तुम्हें क्या क्या यहाँ होता नहीं

हम समझते थे कि फ़िक्र-ए-ज़िन्दगी मिट जायेगी
चारासाज़-ए-ज़ीस्त क्यों सोज़-ए-निहाँ होता नहीं

एक दुनिया देखिये नग़्मा-सरा-ए-ऐश है
क्यों ग़म-ए-इंसां में कोई नौहा-ख़्वां होता नहीं?

एक हर्फ़-ए-दिलदिही या इक निगाह-ए-इल्तिफ़ात
तुझ से इतना भी तो ऐ जान-ए-जहां होता नहीं

बे-तलब ही जान दे देते हैं अहल-ए-आरज़ू
सज्दा-ए-उल्फ़त रहीन-ए-सद-अज़ाँ होता नहीं

जान ही देनी है तो क्या हिज़्र और कैसा विसाल
आशिक़ी में तो ख़याल-ए-ईं-ओ-आं होता नहीं

इस क़दर मानूस दुनिया की सुख़न साज़ी से हूँ
बात सुन लेता हूँ लेकिन सर-गिरां होता नहीं

वहशत-ओ-आशुफ़्तगी में हद्द-ए-इम्कां से गुज़र
फ़ाश वरना हुस्न का सिर्र-ए-निहां होता नहीं

वक़्त वो आया है जब कोई नहीं पुरसान-ए-हाल
तेरी सूरत पर भी अब तेरा गुमां होता नहीं

क्या गया मेरा दिल -ए-बेताब हाथों से निकल ?
कल जहाँ था दर्द प्यारे ! अब वहाँ होता नहीं

आ ही जाता है लबों पर शिकवा-ए-आज़ूर्दगी
दिल दु्खे "सरवर" तो फिर ज़ब्त-ए-फ़ुगां होता नहीं

-सरवर
तसव्वुर = ध्यान में
रब्त =सम्बन्ध
अयाँ =जाहिर
आशुफ़्तगां =दुखी लोग
नग़्मा-सरा-ए-ऐश =ख़ुशी के गीत गाने वाले
अहल-ए-देह्र =दुनिया वाले
नौहा-ख़्वां =मातम करने वाला
ज़ब्त-ए-फ़ुगां =रोने पर क़ाबू
रहीन-ए-सद-अज़ां =सौ (१००) अज़ानों की वज़ह से
सर्र-ए-निहाँ =छुपी हुई बात.राज़,भेद
हर्फ़-ए-दिलदिही =सान्त्वना के दो बोल
निगाह-ए-इल्तिफ़ात =प्यार में कनखियों से देखना
ईं-ओ-आँ = ये और वो
मानूस =माना हुआ ,जानकार
सर-गिरां = नाख़ुश/ख़फ़ा
वहशत-ए-आशुफ़्तगी = (इश्क़ में) पागलपन और परेशानी
हद्द-ए-इम्कां =संभावनाओं की हद तक
पुरसान-ए-हाल =हाल-चाल पूछने वाला
शिकवा-ए-आज़ूर्दगी = उदासी की शिकायत

शनिवार, 1 मई 2010

जनाब सरवर की एक गज़ल : बयान-ए-हुस्न-ओ-शबाब

ग़ज़ल :बयान-ए-हुस्न.....

बयान-ए-हुस्न-ओ-शबाब होगा
तो फिर न क्यों इज़्तिराब होगा ?

ख़बर न थी अपनी जुस्तजू में
हिजाब-अन्दर-हिजाब होगा !

कहा करे मुझको लाख दुनिया
सुकूत मेरा जवाब होगा

किसे ख़बर थी दम-ए-शिकायत
वो इस तरह आब-आब होगा ?

मैं ख़ुद में रह रह कर झाँकता हूँ
‘ कभी तो वो बे-नका़ब होगा !

किताब-ए-हस्ती पलट के देखो
कहीं ख़ुद का भी बाब होगा

न मुँह से बोलो, न सर से खेलो
अब और क्या इन्क़लाब होगा ?

करम तिरा बे-करां अगर है
मिरा गुनह बे-हिसाब होगा

वफ़ा की उम्मीद और उन से ?
सराब आख़िर सराब होगा !

खड़ा हूँ दर पे तिरे सवाली
ये ज़र्रा कब आफ़्ताब होगा ?

रह-ए-मुहब्बत में जाने कब तक
अदा-ख़िराज-ए-शबाब होगा

हयात-ए-पेचां की उलझनों में
छुपा कहीं मेरा ख़्वाब होगा

रहा अगर हाल यूँ ही ’सरवर’
तो हस्र मेरा ख़राब होगा !

-सरवर-
दम-ए-शिकायत =शिकायत के वक़्त
इज़्तिराब =घबड़ाहट/बेचैनी
हिजाब-अन्दर-हिजाब =एक पर्दे के अन्दर दूसरा पर्दा
सुकूत =ख़ामोशी
आब-आब =शर्म के मारे पानी-पानी
बेकरां =असीम/अपार
हयात-ए-पेचां =पेचदार ज़िन्दगी
सराब =मृग-तृष्णा/मरीचिका
ख़िराज-ए-शबाब =जवानी का कर्ज़
हस्र =नतीजा