मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

जनाब सरवर की दो मज़ीद ग़ज़लें........

ग़ज़ल : बेखु़दी आ गई लेकर कहाँ.......

बेखु़दी आ गई लेकर कहाँ ऐ यार मुझे ?
कर गई अपनी हक़ीक़त से ख़बरदार मुझे

ख़ूब कटती है जो मिल बैठे हैं दीवाने दो
उसको शमशीर मिली ,जुर्रत-ए-इज़हार मुझे

तेरी महफ़िल की फ़ुसूँ-साज़ियाँ अल्लाह!अल्लाह !
खेंच कर ले गई फिर लज़्ज़त-ए-आज़ार मुझे

सुब्ह-ए-उम्मीद है आइना-ए-शाम-ए-हसरत
आह अच्छे नज़र आते नहीं आसार मुझे !

मैं दिल-ओ-जान से इस हुस्न-ए-अता के क़ुर्बान
जल्वा-ए-हुस्न उसे ,हसरत-ए-दीदार मुझे

अल-अमान अल-हफ़ीज़ अपनों की करम-फ़र्मायी
बन गई राहत-ए-जां तोहमत-ए-अग़्यार मुझे

एक तस्वीर के दो रुख़ हैं ब-फ़ैज़-ए-ईमान
तवाफ़-ए-क़ाबा हो कि वो हल्क़-ए-ज़ुन्नार मुझे

मैं ज़माने से ख़फ़ा ,दुनिया है मुझ से नालां
इम्तिहां हो गई ये फ़ितरत-ए-ख़ुद्दार मुझे

साग़र-ए-मय ना सही दुर्द-ए-तहे-जाम सही
तिश्ना लब यूँ तो न रख साक़ी-ए-ख़ुश्कार मुझे!

मंज़िल-ए-दर्द में वो गुज़री है मुझ पर ’सरवर’
अब कोई मरहला लगता नहीं दुश्वार मुझे

-सरवर
फ़ुसूँ साजियाँ =जादू/मायाजाल
तोहमत-ए-अग़्यार =दुश्मनों के आरोप
लज़्ज़त-ए-आज़ार = तकलीफ़ के मज़े
तवाफ़-ए-काबा =काबा की परिक्रमा
दुर्द-ए-तहे-जाम = तलछट में बची शराब
मरहला =मंज़िल

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ग़ज़ल : दामन-ए-तार-तार ये.......

दामन-ए-तार-तार ये,सदक़ा है नोक-ए-ख़ार का
शुक्र-ए-ख़ुदा कि मुझसे कुछ रब्त तो है बहार का!

तेरे मक़ाम-ए-जब्र से मेरे मक़ाम-ए-सब्र तक
सिलसिला-ए-आरज़ू रहा दीदा-ए-अश्कबार का

क़िस्सा-ए-दर्द कह गया लह्ज़ा-ब-लह्ज़ा नौ-ब-नौ
"पर भी क़फ़स से जो गिरा बुल्बुल-ए-बेक़रार का"

मंज़िल-ए-शौक़ मिल गई कार-ए-जुनूं हुआ तमाम
इश्क़ को रास आ गया आज फ़राज़ दार का !

ज़ीस्त की सारी करवटें पल में सिमट के रह गईं
सदियों का तर्जुमां था लम्हा वो इन्तिज़ार का

ज़िक्र-ए-हबीब हो चुका फ़िक्र-ए-ख़ुदा की ख़ैर हो !
चाक रहा वो ही मगर दामन-ए-तार-तार का !

सोज़-ओ-गुदाज़-ए-ज़िन्दगी अपना ख़िराज ले गया
नौहा-कुनां में रह गया हस्ती-ए-कम-अयार का

हुस्न की सर-बुलंदियाँ इश्क़ की पस्तियों से हैं
सोज़-ए-खिज़ां से मोतबर साज़ हुआ बहार का

नाम-ए-ख़ुदा कोई तो है वज़ह-ए-शिकस्त-ए-आरज़ू
यूँ ही तो बेसबब नहीं शिकवा ये रोज़गार का ?

नाम-ओ-नुमूद एक वहम और वुजूद इक ख़याल !
अपने ही आईने में हूँ अक्स मैं हुस्न-ए-यार का !

हर्फ़-ए-ग़लत था मिट गया अपने ही हाथ मर गया
अब क्या ख़बर कि क्या बने "सरवर’-ए-सोगवार का !


-सरवर-

रब्त =संबंध
नौ-ब-नौ =नया-नया
अश्कबार =रोनेवाला
क़फ़स =पिजड़ा
फ़राज़ दार =ऊँची फाँसी का तख़्ता
सोज़-ओ-गुदाज़=सुख-दुख,रस
ख़िराज =महसूल’
हस्ती-ए-कम-अयार=बेकार की ज़िन्दगी
पस्तियां =लघुता,विनम्रता
मोतबर =ऐतबार के क़ाबिल
नुमूद =प्रगट,अवतार
सोगवार =शोकग्रस्त

7 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

rajeevspoetry ने कहा…

अच्छी ग़ज़लें हैं. Language थोड़ी मुश्किल है.

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

अमिताभ मीत ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़लें हैं .... शुक्रिया !

आलोक मोहन ने कहा…

अच्छी ग़ज़लें हैं. Language थोड़ी मुश्किल है.

MUFLIS ने कहा…

ज़ीस्त की सारी करवटें पल में सिमट के रह गईं
सदियों का तर्जुमां तो था लम्हा वो इन्तिज़ार का

मैं ज़माने से ख़फ़ा ,दुनिया है मुझ से नालां
इम्तिहां हो गई ये फ़ितरत-ए-ख़ुद्दार मुझे

ऐसे पुर-कशिश शेर कह पाना
किसी उस्ताद-ए-मुहतरम के बस ही की बात है
सर्वर साहब की शाईरी में ज़िन्दगी के अलग-अलग
रंगों से रु-ब-रु होने का मौक़ा मिलता है .

aapka bahut bahut shukriyaa

आनन्द पाठक ने कहा…

मोहतरम जनाब संजय जी/राजीव जी/अमिताभ जी/आलोक मोहन जी/मुफ़लिस जी
आदाब.आलिम जनाब "सरवर" साहेब की इज्ज़त अफ़्ज़ाई के लिए आप लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया
चन्द अहलेकारीं से हम भी इत्तिफ़ाक़ रखते हैं कि गज़ल की ज़ुबान कहीं कहीं मुश्किल हो गई है.इन्तख़ाब-ए-गज़ल में आइन्दा मैं इसका ख़याल रखूंगा.
मुख़्लिस
आनन्द