गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

वाक़ियाती शायरी क्या है ..............क़िस्त २

[पिछली क़िस्त-१ में आप ने पढ़ा कि ग़ज़लों की चार तक़्सीम की जा सकती है जैसे हस्तीनी ,शंखिनी ,चतुरनी और पद्दमिनी .इनके बारें में एक मुख़्तसर ताअर्रुफ़ भी आप ने पढ़ा .अब आप आगे पढ़ें.रवायती शायर और रसूमियाती शायरी क्या है ]

इस अजीब-ओ-ग़रीब तहरीर से कम से कम ये मालूम हुआ कि "वाक़ियाती"शायरी की तलाश ज़फ़र इक़्बाल ,मुनीर नियाज़ी वग़ैरह की "हस्तीनी’ "शंखिनी" "चतुरनी" ग़ज़लियात में की जा सकती है."पद्मिनि’ रिवायती शायरी का ही "वाक़ियाती:’ नाम लगता है.!अलबत्ता ,ख़ुद वाक़ियाती ग़ज़ल के इन क़िस्मों की शिनाख़्त का कोई पैमाना हमारे पास नही है.! बह्र-कैफ़ (जो भी हो) ,इसी तिश्ना -ए-तशरीह तारीफ़ (अतृप्त व्याख्या) के बाद अब रस्मूयाती और वाक़ियाती (पारम्परिक और यथार्थवादी) ग़ज़ल पर थोड़ी सी गुफ़्तगू की जा सकती है.!
(१) रस्मूयाती शायरी(पारम्परिक शायरी) क्या है?
इन्टर्नेट पर आने वाले बेशीतर शायर रसूमियाती शायरीसे वाक़िफ़ हैं क्योंकि वह ख़ुद भी इसको तख़्लीक़ कर रहे हैं.अगर इस से मुराद सिर्फ़ वो शायरी ली जाए जिसकी मौज़ूआत (विषयों) में गुल-ओ-बुल्बुल,बहार-ओ-ख़िज़ां ,हिज्र-ओ-विसाल,वगै़रह के रवायती मज़ामीन नुमायां (दिखते) हैं तो ऐसी शायरी कल भी होती थी आज भी होती है.और कल भी होती रहेगी क्योंकि इस मज़ामीन का ताल्लुक़ सिर्फ़ ग़ज़ल की रिवायत से ही नहीं बल्कि इन्सानी ज़िन्दगी की हक़ीकतों से भी बहुत गहरा है.अगर इस तारीफ़ में वो कलाम भी शामिल कर लिया जाए जो शो’अरा (शायरों) ने अपनी ज़ाती तजिर्बात (व्यक्तिगत अनुभव) ,मुशाहदात,(अपने दर्शन,अनुभव)और ज़िन्दगी के दूसरे अवामिल की तहरीक (अमल करने वाले की प्रस्तावों)पर लिखा है तो यह कहना ज़रूरी हो गया कि हर रस्मूयाती शायर किसी न किसी वक़्त वाक़ियाती शायरों के साथ होता होगा और वो भी कभी न कभी रस्मूयाती शायरी कर लेते होंगे.!

(२) वाक़ियाती शायरी क्या है ?
कहा जाता है कि वाक़ियाती शायरी में शायर की ज़िन्दगी का अक्स ग़ालिब होता है.मगर यह तारीफ़ तो अक्सर रसूमियत शायरी पर भी सादिक़ आती है!आख़िर दर्ज-ए-ज़ैल अश्’आर को वाक़ियाती न कहा जाए तो क्या कहा जाए

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों ? (ग़ालिब)

कहा मैनें कितना है ’गुल का सबात’ ?
कली ने यह सुन कर तबस्सुम किया (मीर)

तुम मिरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता (मोमिन)

था कहाँ वक़्त की हस्ती के फ़साने पढ़ते
सिर्फ़ उन्वान ही उन्वान नज़र से गुज़री (सीमाब अकबराबादी)

हाय वो मेरी आख़िरी हसरत
दिल से निकली थी दुआ होकर (राज़ चांदपुरी)

वाक़ियाती शायरी को समझने के लिये हम जदीद (आधुनिक) वाक़ियाती शायरों के कलाम का जायज़ा लेंगे. चूँकि ज़फ़र इक़्बाल को इस क़िस्म की शायरी का इमाम(मुखिया) माना जाता है इसलिए इस्तिद्लाल और तौजीहात (व्याख्या और स्पष्टीकरण )के लिए उनका कलाम ज़ियादा इस्तेमाल किया जायेगा. अलावा अज़-ईन (लगे हाथ)हम दूसरे वाक़ियाती शायरों के कलाम से भी इस्तिफ़ादा करेंगे (लाभ उठायेंगे).कसीर तादाद( ज़ियादे संख्या) में मिसालें (उदाहरण) पेश करेंगे.जिन अश’आर पर कोई नाम दर्ज नहीं हैवो ज़फ़र इक़्बाल के हैं.सहूलात की ख़ातिर उनका नाम नहीं लिखा गया है.
हमें वाक़ियाती शायरी को समझने में दिक़्कत पेश आयी है.मुमकिन है कि इस कोताही की वज़ह हमारी रिवायती अदाबी तर्बियत हो.या ये फिर शायरी है ही ऐसी कि इसकी इफ़्हाम-ओ-तफ़्हीम (समझना-समझाना) आसान नहीं है.ब-हर-कैफ़ (जो भी हो)हमने अपनी समझ के मुताबिक़ वाक़ियाती शायरी को मुख़्तलिफ़ इक़्साम (विभिन्न भागो में) में बाँटने की कोशिश की है.ताकि इस के समझने में आसानी हो.वाक़ियाती शायरी के चन्द क़ाबिल-ए-ज़िक्र ख़ुसूसियत दर्ज-ए-ज़ैल है (चर्चा करने योग्य ख़ास-ख़ास बातें नीचे दर्ज है)
(अ) सादगी-ओ-पुरकारी !:-
वाक़ियाती शायरी की सबसे नुमायां ख़ुसूसियत उसकी सादगी मालूम होती है.न सिर्फ़ ज़बान बल्कि अपनी फ़िक्र-ओ-बयान में भी ये सिर्फ़ इस क़दर सीधी और सादा होती है कि इसको पढ़ने में किसी मेहनत की हाजत (मुश्किल)नहीं है.अलबत्ता यह और बात है कि अपनी आसानी के बावुजूद अक्सर अश’आर का मतलब आम अक़्ल की गिरिफ़्त (पकड़) से बाहर मालूम होता है.अफ़्सोस की क़ारी(पाठक) के पास वो मख़्सूस ज़ेहन (विशेष समझ) नहीं होता है जिसकी ये शायरी मुत्क़ाज़ी है (चाहती है) और न ही उस को वाक़ियाती शायरी से ज़ाती (व्यक्तिगत) इस्तिफ़ादे की सहूलात हासिल है.ब-हर-हाल (जो भी हो ) ’सादगी’की चन्द मिसालें (उदाहरण) हाज़िर हैं
आग लगी है जंगल में
काँप रहा हूँ सर्दी में (आशुफ़्ता चंगेज़ी)

साहिल,रेत,समन्दर,शाम
साथ है मेरे पल भर शाम

दूर उभरती लहरों मे
डूब रही है हँस कर शाम (शाइदा रूमानी)
इस से ज़ियादा ’सादा-बयानी’ का तसव्वुर अगर ना-मुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर है.यक़ीन न हो तो आप कोशिश कर के देख लें

रंग बाहर से ना अन्दर से निकाला है कहीं
सर-बसर अपने बराबर से निकाला है कहीं

मिसाल ढूंढ रहा हूँ मैं आज तक उसकी
वो एक रंग जो सुर्ख़ाब से निकलता है

मिले अगर न कहीं भी वो बे-लिबास बदन
तो मेरे दीदा-ए-नामनाक से निकलता है
”रंग का अपने बराबर से निकलना’, ’रंग का सुरख़ाब से निकलना”,"बे-लिबास बदन का दीदा-ए-नामनाक से निकलना’ ऐसे मानी-ख़ेज़ और मुन्फ़्रीद (अर्थपूर्ण और विविध) मुहावरे हैं जिस के सामने अक़्ल-ए-सलीम (दिमाग) घुटने टेकने पर मजबूर है.कोई समझाओ कि हम समझायें क्या ? कुछ और मिसालें देखिये

कहाँ ऐसा तकल्लुफ़ है घरों में
बड़े आराम से हैं दफ़्तरों में (अताउर रहमान तारिक़)

देख शहादत खेल नहीं
बाज़ आ नक़्शेबाज़ी से (आशुफ़्ता चंगेज़ी)

आठ बरस का बच्चा मेरा दोस्त क़रीबी लगता है
काम बहुत होगा पापा को प्यार से जब समझाता है (आसिफ़ अली मज़हर)

वाक़ियाती शायरी के इन लाजवाब नमूनों पर कुछ कहना सूरज को चिराग़ दिखाने के बराबर है !

है कामयाब तो होना बहुत ही दूर की बात
कि मैं तो इश्क़ में नाकाम भी नहीं होता
अगर शायर इश्क़ में कामयाब नहीं हो सका और नाकाम भी नहीं हुआ तो खु़दारा बताइये कि उस बेचारे पर कौन सी हालत मुसालत हुई है ?"या इलाही ! ये माजरा क्या है?"

हम-बिस्तरी है अपनी हमारे लिये बहुत
मुद्दत से जागना है ,ना सोना किसी के साथ

दीवार-ए-तकिया बीच में कर ली गई बलंद
हमने बिछा दिया जो बिछौना किसी के साथ

इन अश’आर की मानी-आफ़्रीनी और उलू-ए-ख़याल(अर्थ और भाव) को क्या कहा जाये ! बेहतर यही है कि ज़ियादा हद-ए-अदब की कर ख़ामोश हो लिया जाय.!

[......जारी है ]

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