सोमवार, 5 अप्रैल 2010

एक मजमून :"वाक़ियाती शायरी क्या है ?

"वाक़ियाती शायरी क्या है ?
(यथार्थवादी शायरी क्या है?)
----सरवर आलम राज़ ’सरवर’
[ यह लेख रोमन उर्दू में है जिस का हिन्दी रुपान्तरण यहाँ दिया जा रहा है जिस से हिन्दी के पाठकगण भी आनन्द उठा सकें]

तम्हीद (भूमिका)
कुछ अर्सा कब्ल (पहले) इन्टर्नेट पर :वाक़ियाती शायरी"(यानी ऐसी शायरी जो मौजूदा दौर के के बदलते हुए इन्सानी मसाइल (समस्यायें) और बदलते हुई दुनिया की तर्जुमानी करे) और "रसूमियाती शायरी"( यानी रिवायती शायरी) पर बहस की एक दिलचस्प सिलसिला चला था और फिर ( जैसा कि तक़रीबन हर ऐसी बहस के साथ होता है!)किसी नतीजे पर पहुँचे बगै़र ख़त्म भी हो गया था. इस बहस में उर्दू ग़ज़ल पर ही ज़ियादा गुफ़्तगू की गई थी और बाक़ी दूसरे अस्नाफ़ के जानिब (विधाओं की तरफ़) तवज्जुह (ध्यान) नहीं की गई थी.कम से कम इस बहस से यह तो ज़रूर हुआ कि सब पर नई सोच के कुछ दरवाज़े खुल गये थे. यह मज़्मून इसी बहस का हिस्सा है.
यहाँ इस बहस का आग़ाज़ (शुरुवात) कि "वाक़ियाती शायरी क्या है?" ख़ुद शायरी की तारीफ़ से करना मुनासिब मालूम होता है ताकि बात साफ हो जाए.इस के बाद "वाक़ियाती शायरी"और ’रसूमियाती शायरी" के फ़र्क और ख़ुसूसियत (विष्टितता) को समझना आसान होगा.
(१) "रसूमियाती शायरी" की तारीफ़ मुंशी बृज नारायन"चकबस्त" के इस शे’र से बेहतर नहीं हो सकती है.:-

"शायरी क्या है? दिली जज़्बात का इज़हार है
दिल अगर बेकार है तो शायरी बेकार है "

गोया इन्सानी जज़्बात, ख़यालात और एह्सासात के दिलपिज़ीर (जो दिल को पसंद हो) इज़हार का नाम ही शायरी है.इस इज़हार के सांचे .अस्नाफ़-ए-सुख़न (साहित्य की विधायें) उस्लूब और उसूल (शैली और सिद्धान्त) हमारे बुज़ुर्गों ने बड़ी मेहनत और दिलसोज़ी से मुरत्तब (क्रमबद्ध) किया है और आज भी रिवायती शो’अरा (शायर लोग) इनकी ही रोशनी में दाद-ए-सुख़न दे (साहित्य की सेवा कर)रहें हैं.
(२) "वाक़ियाती शायरी की तारीफ़ का मसला ज़रा मुश्किल और तफ़्सील तलब (विस्तार चाहता) है.बहुत तलाश के बावजूद इस मौज़ू(विषय) पर ऐसा कोई शे’र नहीं मिल सका है जिससे इसकी मुकम्मल और सही तारीफ़ हो सके.ख़्याल है कि कि इन्सानी ज़िन्दगी के वाक़ियात-ओ-मसाइल (यथार्थ और समस्यायें) "रोटी ,कपड़ा और मकान ,मज़दूर और सरमायादार (पूजीपति) की कश्मकश (खींच-तान) ,इन्सान के ज़मीनी मसाइल (जंग ,ज़ालिमों के हाथों कमज़ोरों पर ज़्यादती.मईशत के मसाइल पर क़ौमों की आवेज़िश (जीवन यापन के नाम पर कौ़मों के लड़ाई-झगड़ा)वगै़रह का इज़हार " वाक़ियाती शायरी" कहलायेगा.मशहूर वाक़ियाती शायर ’ज़फ़र इक़्बाल’ का एक शे’र इस सिलसिले में इस्तेमाल किया जा सकता है क्यों कि इसमें हमारी तलाश का हवाला नज़र आता है.
ये कश्फ़ सब के लिए आम भी नहीं होता
अगर्चे शायरी इल्हाम भी नहीं होता
(कश्फ़= दिल की बात इल्हाम =ख़ुदा की वाणी , अगर्चे = यद्यपि)
हम यहाँ ’होता’/होती’ के बहस में नहीं पड़ेंगे! कम से कम से शे’र से यह तो मालूम हो जाता है कि शायरी (और चूँकि ’ज़फ़र इक़्बाल’ वाक़ियाती शायरी के इमाम है इस लिए शायरी से "वाक़ियाती शायरी" मुराद लेना मुनासिब मालूम होता है.) कश्फ़ की तरह की कोई चीज़ है अलबत्ता यह इल्हाम हर्गिज़ नहीं है और ये कश्फ़ अल्लाह के ख़ास ख़ास बन्दों पर ही नाज़िल होता है लेकिन यह तो इल्हाम के साथ भी है. तो फिर इस शे’र की तावील (विस्तार) क्या होगी? वल्लाह-ओ-आलम !
ऊपर बयान हो चुका है कि इस मज़ामीन में हमारा मौज़ू ग़ज़ल है.इस हवाले से हिन्दुस्तान के मशहूर रिसाले "इस्तिआ’रा" (न्यू दिल्ली ,इंडिया ,जून/जुलाई २०००)के चन्द इक़्तिबासात(उद्धरण) पेश किए जा सकते हैं.इस के दो वजूहात(कारण) हैं.एक तो यह कि यह रिसाला वाक़ियाती शायरी का आलम-बरदार(प्रतिनिधि) है दूसरे यह कि इस में एक गोशा (अध्याय) वाक़ियाती शायरी ’ज़फ़र इक़्बाल’ के लिए मुख़्तस (निर्धारित) कर दिया गया है.हम इस गोशे से ख़ास तौर से इस्तिफ़ादा करेंगे (फ़ायदा लेंगे)
यह इक़्तिबासात (उद्धरण)काफी तवील (लम्बा )है.और उतनी ही दिलचस्प भी! इन को मै यहाँ बा-सद-इक्रा(जस का तस) पेश कर रहा हूँ.इन के मश्मूलात मेरी और आप की ज़ुबान का हिस्सा नहीं हैं और हर मुहज़्ज़ब महफ़िल (प्रतिष्ठित गोष्ठियों) में इन को क़ाबिल-ए-मज़ामत (निन्दनीय)कहा जायेगा.लेकिन बात साफ करने के लिये इनको यहाँ देना लाज़िमी है.मज़्कूरा इक़्तिबासात ( ऊपर वर्णित उद्धरण) दर्ज-ए-ज़ेल (नीचे दर्ज) है
" ग़ज़ल ४ क़िस्म की होती है :-
(१) हस्तीनी :यह शराब,कबाब की रसिया, बदजुबान.बदकिरदार ,बदख़ू (बुरे और कड़ुवे स्वभाव की) होती हैं.इसे न तो अपनी इज़्ज़त का पास (लिहाज़) होता है न दूसरों की तक्रीम(आदर-सत्कार) का ख़्याल.इसका क़द या तो बहुत लम्बा होता है या तो बहुत छोटा.इसका जिस्म भी बहुत भारी या दुबला होता है.होंठ बहुत मोटे होते हैं .जिंसी आवारगी की हर वक़्त शिकार रहती है.जिंसी अज़ा (व्यभिचार)का ज़िक्र अक्सर करती रहती है.इसके पसीने में बदबू होती है और जिस्म से शराब की गन्ध आती है.अक्सर कड़वी,खट्टी ,नमकीन नीज़ ज़ायक़ा वाली चीज़ें शौक़ से खाती है.ये बहुत ऐय्यार और मक्कार होती है.इस से किसी को भी वफ़ा की उम्मीद नहीं.ऐसी ’हस्तीनी ग़ज़लें" हमारे अह्द-ए-जदीद (आधुनिक काल) में सब से ज़ियादा रचाई जाती है.
(२) शंखिनी :मर्दों से हँस-हँस कर बात करने में इसे कोई हिजाब नहीं.बे-वफ़ाई इसकी सरिश्त (स्वभाव )में है .आशिक़ों का हलक़ा(इलाक़ा) बढ़ाने के लिए हर तरह के नाज़-ओ-ग़मज़ा-ओ-इश्व:(नाज़-नखरे-कामुक हाव-भाव) का इस्तेमाल करती है.जिंसी मिलाप और अपनी तारीफ़ सुनने के लिए बे-क़रार रहती है.यह अक्सर गंदी रहती है.झूट बोलती है.बड़ी मक्कार और फ़रेबी होती है.जल्दी हँसने लगती है.इसके चलने के अन्दाज़ में बे-हया मस्ती होती है.क्योंकि यह शराब बहुत ज़ियादा पीती है.ऐसी "शंखिनी ग़ज़ल" के बारे में अहम्द फ़राज़ ज़ियादा बेहतर तौर पर बता सकते हैं
(३) चतुरनी :यह क़द्र-ए-इश्क़ पसन्द (प्रेम को इज़्ज़त और सम्मान देने वाली)और वफ़ादार होती हैं. इसकी गुफ़त्गू में बहुत मिठास होती है.अन्दाज़ बहुत प्यारा और मोह लेने वाला होता है.मोसक़ी (संगीत) से ख़ास लगाव रखती हैं.जिंसी जुनून का शिकार नहीं मगर तबीयत में इज़्तिराब (आतुरता) की सी कैफ़ियत रहती है.यकसां हालात में कभी नही रहती.कहीं भी इसे एक जगह क़रार नहीं.इसकी जिस्म में लचक और चाल में ख़ुमारी होती है.ये रंगीन कपड़े पहन कर,बाल बना कर बहुत ख़ुश होती है.ये "चतुरनी ग़ज़ल"नासिर काज़मी ,मुनीर नियाज़ी ज़फ़र इक़्बाल और साक़ी फ़ारुक़ी के यहाँ अक्सर मिल जाती है.
(४) पद्मिनि :यह सब से आला(उत्तम) ,ख़ुश गुफ़्तार,ख़ुश किरदार होती है.इसके चेहरे का रंग गुल-ए-नीलोफ़र जैसा और जिस्म खूबसूरत अनार की तरह होता है.आहू-चश्म (मृग नयनी) याक़ूती होंट (रसीले ख़ूबसूरत) ,रोशन चेहरा ,आँखों में नश्तर रखने वाली यह "पद्मिनि’ ख़ुशबुओं की दिल-दाद होती है.इस की जिस्म से ख़ुशबू आते हैं फूलों से इसे बहुत प्यार होता है.पसीने में इत्र-ए-गुलाब होता है.यह पेशाब भी करती हैं तो उस पर भिड़ों का हुजूम हो जाता है."पद्मिनि’ आख़िरी बार "ग़ालिब" के साथ देखी गई थी.उसके बाद कहाँ रूप-पोश (मुँह छुपा ली ,गायब) हो गई कुछ पता नहीं.किसी को कुछ ख़बर नहीं.हाँ इतना ख़बर ज़रूर है कि "पद्मिनि’कहीं न कहीं ज़रूर ज़िन्दा होगी.किसी कुंज में ,किसी सेहरा(उपवन) में,किसी जंगल में भटक रही होगी."पद्मिनि’ की तलाश जारी है

[......जारी है ]

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बेहद जानकारीपूर्ण और ज्ञानवर्धक आलेख!!

वीनस केशरी ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक लेख
उर्दू को हिन्दी में पढ़ कर भी बहुत मजा आया

Amitraghat ने कहा…

बहुत जानकारी मिली जनाब..........."