मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

जनाब सरवर की दो मज़ीद ग़ज़लें........

ग़ज़ल : बेखु़दी आ गई लेकर कहाँ.......

बेखु़दी आ गई लेकर कहाँ ऐ यार मुझे ?
कर गई अपनी हक़ीक़त से ख़बरदार मुझे

ख़ूब कटती है जो मिल बैठे हैं दीवाने दो
उसको शमशीर मिली ,जुर्रत-ए-इज़हार मुझे

तेरी महफ़िल की फ़ुसूँ-साज़ियाँ अल्लाह!अल्लाह !
खेंच कर ले गई फिर लज़्ज़त-ए-आज़ार मुझे

सुब्ह-ए-उम्मीद है आइना-ए-शाम-ए-हसरत
आह अच्छे नज़र आते नहीं आसार मुझे !

मैं दिल-ओ-जान से इस हुस्न-ए-अता के क़ुर्बान
जल्वा-ए-हुस्न उसे ,हसरत-ए-दीदार मुझे

अल-अमान अल-हफ़ीज़ अपनों की करम-फ़र्मायी
बन गई राहत-ए-जां तोहमत-ए-अग़्यार मुझे

एक तस्वीर के दो रुख़ हैं ब-फ़ैज़-ए-ईमान
तवाफ़-ए-क़ाबा हो कि वो हल्क़-ए-ज़ुन्नार मुझे

मैं ज़माने से ख़फ़ा ,दुनिया है मुझ से नालां
इम्तिहां हो गई ये फ़ितरत-ए-ख़ुद्दार मुझे

साग़र-ए-मय ना सही दुर्द-ए-तहे-जाम सही
तिश्ना लब यूँ तो न रख साक़ी-ए-ख़ुश्कार मुझे!

मंज़िल-ए-दर्द में वो गुज़री है मुझ पर ’सरवर’
अब कोई मरहला लगता नहीं दुश्वार मुझे

-सरवर
फ़ुसूँ साजियाँ =जादू/मायाजाल
तोहमत-ए-अग़्यार =दुश्मनों के आरोप
लज़्ज़त-ए-आज़ार = तकलीफ़ के मज़े
तवाफ़-ए-काबा =काबा की परिक्रमा
दुर्द-ए-तहे-जाम = तलछट में बची शराब
मरहला =मंज़िल

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ग़ज़ल : दामन-ए-तार-तार ये.......

दामन-ए-तार-तार ये,सदक़ा है नोक-ए-ख़ार का
शुक्र-ए-ख़ुदा कि मुझसे कुछ रब्त तो है बहार का!

तेरे मक़ाम-ए-जब्र से मेरे मक़ाम-ए-सब्र तक
सिलसिला-ए-आरज़ू रहा दीदा-ए-अश्कबार का

क़िस्सा-ए-दर्द कह गया लह्ज़ा-ब-लह्ज़ा नौ-ब-नौ
"पर भी क़फ़स से जो गिरा बुल्बुल-ए-बेक़रार का"

मंज़िल-ए-शौक़ मिल गई कार-ए-जुनूं हुआ तमाम
इश्क़ को रास आ गया आज फ़राज़ दार का !

ज़ीस्त की सारी करवटें पल में सिमट के रह गईं
सदियों का तर्जुमां था लम्हा वो इन्तिज़ार का

ज़िक्र-ए-हबीब हो चुका फ़िक्र-ए-ख़ुदा की ख़ैर हो !
चाक रहा वो ही मगर दामन-ए-तार-तार का !

सोज़-ओ-गुदाज़-ए-ज़िन्दगी अपना ख़िराज ले गया
नौहा-कुनां में रह गया हस्ती-ए-कम-अयार का

हुस्न की सर-बुलंदियाँ इश्क़ की पस्तियों से हैं
सोज़-ए-खिज़ां से मोतबर साज़ हुआ बहार का

नाम-ए-ख़ुदा कोई तो है वज़ह-ए-शिकस्त-ए-आरज़ू
यूँ ही तो बेसबब नहीं शिकवा ये रोज़गार का ?

नाम-ओ-नुमूद एक वहम और वुजूद इक ख़याल !
अपने ही आईने में हूँ अक्स मैं हुस्न-ए-यार का !

हर्फ़-ए-ग़लत था मिट गया अपने ही हाथ मर गया
अब क्या ख़बर कि क्या बने "सरवर’-ए-सोगवार का !


-सरवर-

रब्त =संबंध
नौ-ब-नौ =नया-नया
अश्कबार =रोनेवाला
क़फ़स =पिजड़ा
फ़राज़ दार =ऊँची फाँसी का तख़्ता
सोज़-ओ-गुदाज़=सुख-दुख,रस
ख़िराज =महसूल’
हस्ती-ए-कम-अयार=बेकार की ज़िन्दगी
पस्तियां =लघुता,विनम्रता
मोतबर =ऐतबार के क़ाबिल
नुमूद =प्रगट,अवतार
सोगवार =शोकग्रस्त

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

जनाब सरवर की दो गज़लें

गज़ल : न सोज़ आह में मिरी..............


न सोज़ आह में मिरी, न साज़ है दिल में
मैं लाऊँ कौन सी सौग़ात तेरी महफ़िल में ?

मैं आईना हूँ कि आईना-रू नहीं मालूम
ये वक़्त आया है इस आशिक़ी की मंज़िल में

ख़ुदी कहूँ कि इसे बेख़ुदी बताओ तुम
मैं अपने आप चला आया कू-ए-क़ातिल में

हमारे ज़ब्त ने रख्खा भरम ख़ुदाई का
ज़बां पे आ ही गई थी जो बात थी दिल में

न अपने दिल की कहो तुम ,न दूसरों की सुनो
अजीब रंग यह देखा तुम्हारी महफ़िल में

हरम के हैं ये शनासा ,न दैर से वाकि़फ़
रखा है क्या भला इन मुफ़्तियान-ए-कामिल में?

यक़ीं गुमान में बदला ,गुमां अक़ीदे में
हमें तो बस ये मिला तेरे ख़ाना-ए-गिल में

फ़राज़-ए-इश्क़ ने इस मर्तबे को पहुँचाया
रहा न फ़र्क़ कोई राह और मंज़िल में

ख़रोश-ए-मौजा-ए-तूफ़ां ने लाख दावत दी
उलझ के रह गये लेकिन फ़रेब-ए-साहिल में

अभी मिला भी न था हसरतों से छुटकारा
उम्मीद डाल गई आ के और मुश्किल में

कोई मुझे ’सरवर’ ! कहे न दीवाना
शुमार मुझको करो आशिक़ान-ए-कामिल में !

-सरवर-
सौग़ात = उपहार
ख़ाना-ए-गिल =(मिट्टी का घर),ये दुनिया
आइना-रू =आइना जैसा
शनासा =जाना-पहचाना
मुफ़्तीयाने-कामिल = पूरा मुफ़्ती
अक़ीदा =श्रद्धा/विश्वास
आशिक़ान-ए-कामिल = पूरा आशिक़
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ग़ज़ल : हो गई मेराज-ए-इश्क़........

हो गई मेराज-ए-इश्क़-ओ-आशक़ी हासिल हमें
पहले दर्द-ए-दिल मिला ,बाद उसके दाग़े-दिल हमें !

बन्दगान-ए-आरज़ू में कर लिया शामिल हमें
आप ने ,शुक्र-ए-ख़ुदा ! समझा किसी क़ाबिल हमें !

कम-निगाही ,तंग दामानी ,वुफ़ूर-ए-आरज़ू
ज़िन्दगी! तेरी तलब में यह हुआ हासिल हमें !

इस क़दर आसूदा-ए-राहे-मुहब्बत हो गये
ढूंढती फिरती है हर सू शोरिश-ए-मंज़िल हमें !

लम्हा-लम्हा लह्ज़ा-लह्ज़ा वो क़रीब आते गये
रफ़्ता-रफ़्ता कर गए ख़ुद आप से ग़ाफ़िल हमें !

बन गया ख़ुद अपना हासिल आलम-ए-ख़ुद रफ़्तगी
देखती ही रह गई दुनिया-ए-आब-ओ-गिल हमें

दीदा-ए-बीना दिल-ए-ख़ुश्काम फ़िक्र-ए-बेनियाज़
अब कोई मुश्किल नज़र आती नहीं मुश्किल हमें !

खु़द को ही तारीख़ दुहराती है जब "सरवर’ तो फिर
क्यों नज़र आया नहीं माज़ी में मुस्तक़्बिल हमें ?

-सरवर

शोरिश =हंगामा.झगड़ा.फ़साद
हर सू =हर तरफ़
मेराज-ए-इश्क़ =प्रेम की उच्चता
वुफ़ूर-ए-आरज़ू = तीव्र-इच्छा
कम निगाही =उपेक्षा
तंग-दामानी = ग़रीबी
आसूदा = तृप्त होना/सन्तुष्ट होना
शोरिल =उन्माद
आब-ओ-गिल =पानी-मिट्टी
मुस्तक़्बिल =भविष्य

रविवार, 18 अप्रैल 2010

एक गज़ल : उम्मीद-ओ-आरज़ू मिरी.......

उम्मीद-ओ-आरज़ू मिरी दमसाज़ बन गई
इक सोज़-ए-आशिक़ी बनी,इक साज़ बन गई !

सौदा न कम हुआ सर-ए-मक़्सूद-ए-आशिक़ी
क्या इन्तिहाये-आरज़ू आग़ाज़ बन गई ?

यारों !ये क्या हुआ कि सर-ए-बज़्म-ए-ज़िन्दगी?
जो भी ग़ज़ल कही ,शरार-अन्दाज़ बन गई !

कैसी तलाश ,किस की तमन्ना,कहाँ की दीद
ख़ुद मेरी ज़ात मेरे लिये राज़ बन गई !

वा-मांदगी-ए-बाल-ओ-पर-ए-फ़िक्र ?अल-अमां !
हद से बढ़ी तो हिम्मत-ए-परवाज़ बन गई

यूँ आश्ना-ए-कूचा-ए-आवारगी रहे
हर ना-मुरादी शौक़-ए-तग-ओ-ताज़ बन गई

जब मैनें बढ़ के उसकी नज़र को किया सलाम
झुक कर वो फ़ित्ना-ज़ा ग़लत अन्दाज़ बन गई !

"सरवर" ये फ़ैज़-ए-’राज़’ है कि तेरी शायरी
हुस्न-ए-सुख़न से गुलशन-ए-शिराज़ बन गई !

-सरवर-
दमसाज़ =दोस्त
सोज़-ए-आशिक़ी =प्रेमाग्नि
शरार-अन्दाज़ = चिंगारी जैसी अन्दाज़
गुलशने-शिराज़ = शिराज़ के बाग(इरान का एक शहर जो
अपने बागों के लिए मशहूर है

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

वाकियाती शायरी क्या है........किस्त ३(अंतिम किस्त)

[इस आलेख के २-भाग आप इसी ब्लोग पर पढ़ चुकें हैं ,प्रस्तुत है इस लेख की अन्तिम कड़ी)

(ब) इबारत क्या ! इशारत क्या ! अदा क्या !
मिर्ज़ा ग़ालिब का शे’र है
बला-ए-जां है उसकी हर बात
इबारत क्या ! इशारत क्या ! अदा क्या !

अब ज़रा ये अश’आर देखिये.इन पर तब्सिरा तहसील-ए-लाहासिल(कुछ कहना कुछ भी हासिल न होने ) की हैसियत रखता है.हर शे’र अपनी जगह एक बे-बहा नगीना है और ऐसी खूबसूरती का हामिल है कि उसको "ज़मीनी" शे’र कहने को बेसाख़्ता( बेहिचक) जी चाहता है.आप भी पढ़िए और सर धुनिये

इक कमीने की रोटियाँ खा कर
सख़्त बीमार हो गया हूँ मैं (प्रवीण कुमार ’अश्क)

रोग मत पाल ग़ज़ल का ऐ "अश्क’
तुझको यह लड़की न पागल कर दे (प्रवीण कुमार ’अश्क)

मिरे ही पास थे तख़्लीक़ के मन्सब सभी कल भी
मैं माँ हूँ किस तरह से मैं दर्द-ए-ज़ेह नहीं सकती (मसर्रत ज़ेबा)
ज़मीनी मसाइल और उनकी शिकायत से इन्कार नहीं है :दर्द-ए-ज़ेह: और वो भी ग़ज़ल में ? ला-हौल-वा-लाकुव्वत!(राम राम! राम !) मह्व-ए-हैरत हूँ( मैं तो हैरान हूँ)कि दुनिया क्या से क्या हो जायेगी !

यूँ तो सेहत मिरी रहती है बहुत ठीक मगर
एक तकलीफ़ है जल्दी मुझे होने वाली

अब्र उमड़ता हुआ आता है गुज़र जाता है (अब्र=बादल)
एक बारिश तो मुझे चाहिए होने वाली

फ़ँसना तो मछलियों का मुक़द्दर की बात है
दर्या में अपना जाल तो डाला ही करते हम

इस शहर से जो कूच ना करते अभी कुछ और (कूच=प्रस्थान)
लोगों की पगड़ियाँ तो उछाला ही करते हम

बे-ज़ायक़ा ही रह गया ख़्वान-ए-सुख़न ’ज़फ़र’
थोड़ा सा और तेज़ मसाला ही करते हम !

बहुत ज़ियादा ज़रूरी है मछलियों की तरह
ये रात-दिन मिरी आँखों का का आब में होना

ये अश’आर भी अपना जवाब आप ही हैं.अगर शायरी इसी का नाम है तो इसको दूर से ही सलाम करना बेहतर है

रौशनी का बदन हुआ रेज़ा
रूह पर गर्द रात का रेज़ा

आज ये किस ने दिल पे दस्तक दी
मेह्वर-ए-ज़ीस्त में अटा रेज़ा (मुहम्मद वसीम)

टूटे अगर हवा तो अन्धेरे का गुल झड़े
मक्तूब ले गई है सवेरे के नाम का (जावेद नासिर)

एक लट्टू की तरह घूम रहा हूँ अब तक
जैसे ख़ुद को किसी चक्कर से निकाला है कहीं

इन अश’आर को पढ़ कर हमारा सर भी लट्टू की तरह घूम रहा है.चूँकि इस सूरत-ए-हाल में बेहतरी की उम्मीद नहीं है इसलिए आइए अब आगे चलें !
(स) नातिक़ा सर-बा-गरेबाँ है
इस उन्वान के तहत जो अश’आर दिए गए हैं वो हर क़िस्म की तशरीफ़-ओ-तौज़ीह से बाला-तर हैं.इनकी अन्दरुनी नाज़ुक-ख़याली ,नुद्रत-ए-फ़िक्र-ओ-बयान,रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी का ताल-मेल अपनी तफ़्सीर ख़ुद ही फ़राहम करते हैं.आप भी मुलाहिज़ा फ़र्माइए कि ये मस्वाक़ी बार बार कहाँ मयस्सर आते हैं

उलझे दाढ़ी चोटी में
खेलो फाग लंगोटी में

बिकते देखा है इन्सान
दो बोटी, दो रोटी में

आज ’मुज़फ़्फ़र’ चाँद हुए
कल तक थे कजलौटी में (मुज़फ़्फ़र हन्फ़ी)

ज़मीन कम है तो जा कर आसमां पर चूमना है
जहाँ वो हो नही सकता वहाँ पर चूमना है

जो ना-मुम्किन है वो मुम्किन भी हो सकता है इक दिन
कभी उस बे-निशां के हर निशां पर चूमना है

झलक हमको नज़र आती है इसमें साफ़ उनकी
हमें अपने ही रंग-ए-रायगां पर चूमना है.

हबाब-आसा अगर यह ज़िन्दगानी है तो हर वक़्त
किसी के मेहराम-ए-आब-ए-रवां पर चूमना है

मैं उसमें आप भी गायब सा होने लगता हूँ
गु़बार जो मिरे मेहताब से निकलता है

गु़रूब होता हूँ जब मैं खुले समन्दर में
वो बन्द होते हुए बाब से निकलता है

चिराग़ सा जो किसी बुतकदे में बुझता हूँ
दुआ दरीचा-ए-मेहराब से निकलता है

देखे जो मैने ख़्वाब वो चिल्ली के ख़्वाब थे
आँखों में फिर रही है वो यादों की कहकशाँ (समर टुकरवि)

ये भूख बीच में आख़िर कहाँ से आई है ?
ये रोटियाँ भी तिरे हैं ,शिकम भी तेरे हैं (अक़ील शादाब)

तुम्हारे बिन मिरा परदेश में अब दिल नहीं लगता
मैं दिन जाने की गिनती हूँ कैलेन्डर सामने रख कर (मसर्रत ज़ेबा)

(द) आते हैं गै़ब से ये मज़ामीन ख़याल में !
जैसे कि उन्वान से ज़ाहिर है ये अश’आर हमारे सर पर से गुज़र गये.!चूँकि इनकी इफ़्हाम-ओ-तफ़्हीम( समझने और समझाने) का ताल्लुक़ किसी और ही दुनिया से मालूम होता है हम इन पर तफ़्सीली राय देने से बिल्कुल क़ासिर हैं.अगर आप को भी यही परेशानी लाहक़ हो तो हम किसी वाक़ियाती शायर से इनकी तफ़्सीर और रुमूज़ हासिल करने की कोशिश करेंगे

बड़ी लतीफ़ थी वो बात जिस को सुनने से
लहू बदन में हुआ है उबाल-आमादा (ख़ालिद बसीर)

कब तक मैं किवाड़ों को लगाए हुए रखता ?
दिन उगते ही अहवाल-बयानी निकल आई (अहमद कमाल परवाज़ी)

मैं वाक़िफ़ हूँ तिरी चुप-गोईयों से
समझ लेता हूँ तेरी अनकही भी (सुलेमान ख़ुमार)
आजकल फ़ारसी का इल्म उमूमी तौर से ज़वाल-पज़ीर है.नए लिखने वाले ख़ास तौर से इसमें कमज़ोर हैं.ये बात ज़ाहिर है कि अच्छी शायरी के लिए थोड़ी बहुत फ़ारसी आनी चाहिए.इसका सुबूत हर अच्छे शायर के कलाम में मिल जायेगा.!लेकिन ऊपर के अश’आर में जो फ़ारसी के तराकीब इस्तेमाल की गई है वो ला-जवाब हैं.इनकी तख्लीक़ के लिए जो ज़ेहन चाहिए वो हर एक को वदीयत (प्राप्त)नहीं हुआ है.यही हाल ज़फ़र इक़्बाल के अश’आर का है.

मौजूदगी सी जैसे किसी और की भी है
मंज़र जो बन रहा है तिकोना किसी के साथ

एक ही बार होने में ताम्मुल था मगर
अब पड़ा है उसी हालात में दोबारा होना

कुछ समझ में ही न आना मिरी और फिर हर बार
और का और उन आँख़ों का इशारा होना

जहाँ क़ियाम है उसका वहाँ से हट कर है
कि है ज़मीन पे ही लेकिन ज़मीन से हट कर है

गु़बार-ए-हवाब है दोनों में एक सा लेकिन
वो बाग़-ए-बोसा बाहिश्त-ए-बरीं से हट कर है

ज़फ़र महाज़-ए-मुहब्बत से अपनी पासपायी
किसी भी क़ाफ़िला-ए-वापसीं से हट कर है
चन्द और :-
कुछ हासिले वैसे भी थे आपस में ज़ियादा
कुछ ख़्वाब तुम्हारे थे हमारों से बहुत दूर

यूँ उसने सभी जमा किए एक जगह पर
और फेंक दिया हौ मुझे सारों से बहुत दूर

ख़ल्वत-कदा-ए-दिल पे ज़ुबूँ -हाली-ए-बिसयार
है सूरत-ए-गंजीना-ए-अल्फ़ाज़-ओ-मानी (ऐन तबिश)

ख़ुश्क-ओ-तार ज़र्द हरी फ़स्ल का अस्फ़-अम-माकूल
अब किसी ख़्वाब से चस्पा नहीं ताबीर कोई

गै़र मर्बूत गुमान-वस्फ़ मुहर्रफ़ मुबहम
यानी हर शख़्स हुआ आयत-ए-इंजील कोई (सलीम शह्ज़ाद)

शायद था इक बगूले में तन्हाइयों का ग़म
’ज़ेबा’जो दिल के गमले में कैक्टस लगा मुझे (मसर्रत ज़ेबा)

बो दी थी मैं ने अपनी दसों उँगलियाँ जहाँ
पैरों में आ रहा है वही रास्ता सा फिर (राशिद इम्कान)

(य) ग़लती-हाये-मज़ामीन न पूछ !
इस उन्वान के तहत चन्द वाक़ियाती शायरों के कुछ अश’आर दिए जा रहे हैं.इनके पढ़ने के बाद ये शो’अरा "ज़मीनी’ शायरी की धुन में उर्दू सर्फ़-ओ-नाह्व ,उसूल-ए-ज़बान-ओ-बयान और फ़साहत-ओ-बलाग़त की इब्तदाई मालूमात से बेगाना हो गये हैं.ऐसा मालूम होता है कि इस इल्म को हासिल करने के लिये इनको किसी ’रसूमियाती: उस्ताद-ए-फ़न से रुजू करने की सख़्त ज़रूरत है.कोई साहेब-ए-ज़बान ऐसी फ़ाश ग़ल्तियाँ नहीं कर सकता.और अगर उस से इनका सुदूर हो भी जाए तो वह ऐसे कलाम को शाये कव्वाने की हिम्मत यक़ीनन नहीं कर सकता है .

हर ग़म को सहने की ताक़त देना मुझे
कोई भी ग़म इससे पहले मत देना मुझे

ऐसा मत करना जीते जी मर जाँऊ
मरने से पहले शोहरत देना मुझे (मुहम्मद अल्वी)

अब अपनी चीख़ ही क्या ,अपनी बे-ज़बानी क्या
महज़ अमीरों की ज़िन्दगानी क्या (अज़्रा परवीन)

वो दर्मियान-ए-रोज़-ओ-शब वक़्फ़ा है क्या ?
ज़ेर-ए-उफ़ुक मेरी तरह जलता है क्या ? (शफ़क़ सौपुरी)

ये कश्फ़ सबके लिए आम भी नहीं होता
अगर्चे शायरी इल्हाम भी नहीं होता
शायरी और "होता"? बेसोख़्त अक़्ल बा-हैरत कि ईंचे बुल-अजाबी अस्त ?

अभी मुन्कशिफ़ होना है पहली बार हम पर
अभी हम ने नक़्श-ए-निहाँ पर चूमना है

ज़फ़र हम ने अभी ग़र्क़ाब हो जाने से पहले
कहीं अपने दरीदा बादबाँ पर चूमना है
अहल-ए-ज़बान "ने" माज़ी के लिए लिखते हैं न कि हाल और मुस्तक़्बिल के लिए !यहाँ हम "ने"की बजाय हम"को" होना चाहिए.देखिये गा़लिब क्या कहते हैं:-

हमने माना कि तगा़फ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएंगे हम तुम को ख़बर होने तक !

और यह भी दीदा-ए-इब्रत निगाह से देखिए
आँखों के आईने तो सुबुक्सार थे यहाँ
दिल के निवाह में ही गिरानी का रंग था

ऊपर से चल रही थी हवाएं भी तेज़-तेज़
ख़ाशाक-ए-ख़ूँ पे शोला बयानी का रंग था

मैं जिस जगह नहीं था वहाँ दूर-दूर तक
आब-ओ-हवा पे मेरी नैशानी का रंग था
ख़ुदा-रा (हे भगवान !) कोई बताये कि यह " आँखों के आइने की सुबुक्सारी", "ख़ाशाक-ए-खूँ पे शोला बयानी का रंग",और "आब-ओ-हवा पे नैशानी का रंग" किस चिड़िया का नाम है.?
इस हक़ीक़त से तो इन्कार मुम्किन नहीं है कि ज़माने के हालात बदलते रहते हैं जैसा कि किसी ने क्या ख़ूब कहा है :-

साबात एक तग़इय्युर को है ज़माने में
सुकूँ मुहाल है क़ुदरत के कारखाने में

इस लिए अदब-ओ-शे’र के लिए भी ज़माने के साथ चलना ज़रूरी है.अगर ऐसा नहीं होगा तो कल ज़माना कहीं का कहीं पहुँच चुका होगा और अदब-ओ-शे’र जुमूद का शिकार होकर आहिस्ता-आहिस्ता गायब हो जायेंगे..सोचना यह है कि क्या ग़ज़ल इन बदलती क़द्रों की साथ बदल कर अपना रंग और मिज़ाज क़ायम रख सकती है?यह भी तो मुम्किन है कि ग़ज़ल बहुत सी ज़मीनी मज़ामीन बयान करने से क़ासिर है और वह अपनी फ़ितरत मेम इन्सानी जज़्बात-ओ-एह्सासात को भी बेहतर बयान कर सकती है.वाक़ियाती मसाइल की दाद-रसी के लिए दूसरी अस्नाफ़(विधायें) मौजूद हैं जिनको इस्तेमाल करना और इनमें नए तजीर्बे करना मुस्तहसिन है. ग़ज़ल का हुलिया बिगाड़ कर यह मक़्सद हासिल नहीं हो सकता है.:

तय कर चुका हूँ राह-ए-मुहब्बत के मरहले
इस से ज़ियादा हाज़त-ए-शर्ह-ओ-बयां नहीं (राज़ चांदपुरी)

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(समाप्त)

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

ग़ज़ल : मुहब्बत आशना हो कर.......

मुहब्बत आशना हो कर वफ़ा ना-आशना होना
इसी को तो नहीं कहते कहीं काफ़िर-अदा होना ?

ये तपती दोपहर में मुझसे साए का जुदा होना
ज़ियादा इस से क्या होगा भला बे-आसरा होना ?

यकीं आ ही गया हमको तुम्हारी बे-नियाज़ी से
बुज़र्गो से सुना था यूँ तो बन्दों का खु़दा होना !

न जाने कौन से मन्ज़िल है जो बेगाना-ए-ग़म हूँ
मुझे रास आ गया क्या इश्क़ में बे-दस्त-ओ-पा होना ?

ख़ुदी और बे-ख़ुदी में फ़र्क़ है तो सिर्फ़ इतना है
मुहब्बत आशना होना ,मुहब्बत में फ़ना होना !

कोई सीखे तो सीखे आप से तर्ज़े-खुदावन्दी
मिरी बे-चारगी पर आप का यूँ ख़ुद-नुमा होना !

ये सुबह-ओ-शाम की उलझन ये रोज़-ओ-शब के हंगामे
क़ियामत हो गया क़र्ज़े-मुहब्बत का अदा होना

ये सोज़ो-साज़े-उल्फ़त और ये जज़्बो-जुनूँ ’सरवर’
मुबारक हो तुझे शाइस्ता-ए-हर्फ़े-वफ़ा होना

-सरवर-
बे-दस्त-ओ-पा होना = बेबस/लाचार होना
शाइस्ता-ए-हर्फ़े-वफ़ा होना = वफ़ा के का़बिल होना

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

वाक़ियाती शायरी क्या है ..............क़िस्त २

[पिछली क़िस्त-१ में आप ने पढ़ा कि ग़ज़लों की चार तक़्सीम की जा सकती है जैसे हस्तीनी ,शंखिनी ,चतुरनी और पद्दमिनी .इनके बारें में एक मुख़्तसर ताअर्रुफ़ भी आप ने पढ़ा .अब आप आगे पढ़ें.रवायती शायर और रसूमियाती शायरी क्या है ]

इस अजीब-ओ-ग़रीब तहरीर से कम से कम ये मालूम हुआ कि "वाक़ियाती"शायरी की तलाश ज़फ़र इक़्बाल ,मुनीर नियाज़ी वग़ैरह की "हस्तीनी’ "शंखिनी" "चतुरनी" ग़ज़लियात में की जा सकती है."पद्मिनि’ रिवायती शायरी का ही "वाक़ियाती:’ नाम लगता है.!अलबत्ता ,ख़ुद वाक़ियाती ग़ज़ल के इन क़िस्मों की शिनाख़्त का कोई पैमाना हमारे पास नही है.! बह्र-कैफ़ (जो भी हो) ,इसी तिश्ना -ए-तशरीह तारीफ़ (अतृप्त व्याख्या) के बाद अब रस्मूयाती और वाक़ियाती (पारम्परिक और यथार्थवादी) ग़ज़ल पर थोड़ी सी गुफ़्तगू की जा सकती है.!
(१) रस्मूयाती शायरी(पारम्परिक शायरी) क्या है?
इन्टर्नेट पर आने वाले बेशीतर शायर रसूमियाती शायरीसे वाक़िफ़ हैं क्योंकि वह ख़ुद भी इसको तख़्लीक़ कर रहे हैं.अगर इस से मुराद सिर्फ़ वो शायरी ली जाए जिसकी मौज़ूआत (विषयों) में गुल-ओ-बुल्बुल,बहार-ओ-ख़िज़ां ,हिज्र-ओ-विसाल,वगै़रह के रवायती मज़ामीन नुमायां (दिखते) हैं तो ऐसी शायरी कल भी होती थी आज भी होती है.और कल भी होती रहेगी क्योंकि इस मज़ामीन का ताल्लुक़ सिर्फ़ ग़ज़ल की रिवायत से ही नहीं बल्कि इन्सानी ज़िन्दगी की हक़ीकतों से भी बहुत गहरा है.अगर इस तारीफ़ में वो कलाम भी शामिल कर लिया जाए जो शो’अरा (शायरों) ने अपनी ज़ाती तजिर्बात (व्यक्तिगत अनुभव) ,मुशाहदात,(अपने दर्शन,अनुभव)और ज़िन्दगी के दूसरे अवामिल की तहरीक (अमल करने वाले की प्रस्तावों)पर लिखा है तो यह कहना ज़रूरी हो गया कि हर रस्मूयाती शायर किसी न किसी वक़्त वाक़ियाती शायरों के साथ होता होगा और वो भी कभी न कभी रस्मूयाती शायरी कर लेते होंगे.!

(२) वाक़ियाती शायरी क्या है ?
कहा जाता है कि वाक़ियाती शायरी में शायर की ज़िन्दगी का अक्स ग़ालिब होता है.मगर यह तारीफ़ तो अक्सर रसूमियत शायरी पर भी सादिक़ आती है!आख़िर दर्ज-ए-ज़ैल अश्’आर को वाक़ियाती न कहा जाए तो क्या कहा जाए

क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों ? (ग़ालिब)

कहा मैनें कितना है ’गुल का सबात’ ?
कली ने यह सुन कर तबस्सुम किया (मीर)

तुम मिरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता (मोमिन)

था कहाँ वक़्त की हस्ती के फ़साने पढ़ते
सिर्फ़ उन्वान ही उन्वान नज़र से गुज़री (सीमाब अकबराबादी)

हाय वो मेरी आख़िरी हसरत
दिल से निकली थी दुआ होकर (राज़ चांदपुरी)

वाक़ियाती शायरी को समझने के लिये हम जदीद (आधुनिक) वाक़ियाती शायरों के कलाम का जायज़ा लेंगे. चूँकि ज़फ़र इक़्बाल को इस क़िस्म की शायरी का इमाम(मुखिया) माना जाता है इसलिए इस्तिद्लाल और तौजीहात (व्याख्या और स्पष्टीकरण )के लिए उनका कलाम ज़ियादा इस्तेमाल किया जायेगा. अलावा अज़-ईन (लगे हाथ)हम दूसरे वाक़ियाती शायरों के कलाम से भी इस्तिफ़ादा करेंगे (लाभ उठायेंगे).कसीर तादाद( ज़ियादे संख्या) में मिसालें (उदाहरण) पेश करेंगे.जिन अश’आर पर कोई नाम दर्ज नहीं हैवो ज़फ़र इक़्बाल के हैं.सहूलात की ख़ातिर उनका नाम नहीं लिखा गया है.
हमें वाक़ियाती शायरी को समझने में दिक़्कत पेश आयी है.मुमकिन है कि इस कोताही की वज़ह हमारी रिवायती अदाबी तर्बियत हो.या ये फिर शायरी है ही ऐसी कि इसकी इफ़्हाम-ओ-तफ़्हीम (समझना-समझाना) आसान नहीं है.ब-हर-कैफ़ (जो भी हो)हमने अपनी समझ के मुताबिक़ वाक़ियाती शायरी को मुख़्तलिफ़ इक़्साम (विभिन्न भागो में) में बाँटने की कोशिश की है.ताकि इस के समझने में आसानी हो.वाक़ियाती शायरी के चन्द क़ाबिल-ए-ज़िक्र ख़ुसूसियत दर्ज-ए-ज़ैल है (चर्चा करने योग्य ख़ास-ख़ास बातें नीचे दर्ज है)
(अ) सादगी-ओ-पुरकारी !:-
वाक़ियाती शायरी की सबसे नुमायां ख़ुसूसियत उसकी सादगी मालूम होती है.न सिर्फ़ ज़बान बल्कि अपनी फ़िक्र-ओ-बयान में भी ये सिर्फ़ इस क़दर सीधी और सादा होती है कि इसको पढ़ने में किसी मेहनत की हाजत (मुश्किल)नहीं है.अलबत्ता यह और बात है कि अपनी आसानी के बावुजूद अक्सर अश’आर का मतलब आम अक़्ल की गिरिफ़्त (पकड़) से बाहर मालूम होता है.अफ़्सोस की क़ारी(पाठक) के पास वो मख़्सूस ज़ेहन (विशेष समझ) नहीं होता है जिसकी ये शायरी मुत्क़ाज़ी है (चाहती है) और न ही उस को वाक़ियाती शायरी से ज़ाती (व्यक्तिगत) इस्तिफ़ादे की सहूलात हासिल है.ब-हर-हाल (जो भी हो ) ’सादगी’की चन्द मिसालें (उदाहरण) हाज़िर हैं
आग लगी है जंगल में
काँप रहा हूँ सर्दी में (आशुफ़्ता चंगेज़ी)

साहिल,रेत,समन्दर,शाम
साथ है मेरे पल भर शाम

दूर उभरती लहरों मे
डूब रही है हँस कर शाम (शाइदा रूमानी)
इस से ज़ियादा ’सादा-बयानी’ का तसव्वुर अगर ना-मुमकिन नहीं तो मुश्किल ज़रूर है.यक़ीन न हो तो आप कोशिश कर के देख लें

रंग बाहर से ना अन्दर से निकाला है कहीं
सर-बसर अपने बराबर से निकाला है कहीं

मिसाल ढूंढ रहा हूँ मैं आज तक उसकी
वो एक रंग जो सुर्ख़ाब से निकलता है

मिले अगर न कहीं भी वो बे-लिबास बदन
तो मेरे दीदा-ए-नामनाक से निकलता है
”रंग का अपने बराबर से निकलना’, ’रंग का सुरख़ाब से निकलना”,"बे-लिबास बदन का दीदा-ए-नामनाक से निकलना’ ऐसे मानी-ख़ेज़ और मुन्फ़्रीद (अर्थपूर्ण और विविध) मुहावरे हैं जिस के सामने अक़्ल-ए-सलीम (दिमाग) घुटने टेकने पर मजबूर है.कोई समझाओ कि हम समझायें क्या ? कुछ और मिसालें देखिये

कहाँ ऐसा तकल्लुफ़ है घरों में
बड़े आराम से हैं दफ़्तरों में (अताउर रहमान तारिक़)

देख शहादत खेल नहीं
बाज़ आ नक़्शेबाज़ी से (आशुफ़्ता चंगेज़ी)

आठ बरस का बच्चा मेरा दोस्त क़रीबी लगता है
काम बहुत होगा पापा को प्यार से जब समझाता है (आसिफ़ अली मज़हर)

वाक़ियाती शायरी के इन लाजवाब नमूनों पर कुछ कहना सूरज को चिराग़ दिखाने के बराबर है !

है कामयाब तो होना बहुत ही दूर की बात
कि मैं तो इश्क़ में नाकाम भी नहीं होता
अगर शायर इश्क़ में कामयाब नहीं हो सका और नाकाम भी नहीं हुआ तो खु़दारा बताइये कि उस बेचारे पर कौन सी हालत मुसालत हुई है ?"या इलाही ! ये माजरा क्या है?"

हम-बिस्तरी है अपनी हमारे लिये बहुत
मुद्दत से जागना है ,ना सोना किसी के साथ

दीवार-ए-तकिया बीच में कर ली गई बलंद
हमने बिछा दिया जो बिछौना किसी के साथ

इन अश’आर की मानी-आफ़्रीनी और उलू-ए-ख़याल(अर्थ और भाव) को क्या कहा जाये ! बेहतर यही है कि ज़ियादा हद-ए-अदब की कर ख़ामोश हो लिया जाय.!

[......जारी है ]

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

एक मजमून :"वाक़ियाती शायरी क्या है ?

"वाक़ियाती शायरी क्या है ?
(यथार्थवादी शायरी क्या है?)
----सरवर आलम राज़ ’सरवर’
[ यह लेख रोमन उर्दू में है जिस का हिन्दी रुपान्तरण यहाँ दिया जा रहा है जिस से हिन्दी के पाठकगण भी आनन्द उठा सकें]

तम्हीद (भूमिका)
कुछ अर्सा कब्ल (पहले) इन्टर्नेट पर :वाक़ियाती शायरी"(यानी ऐसी शायरी जो मौजूदा दौर के के बदलते हुए इन्सानी मसाइल (समस्यायें) और बदलते हुई दुनिया की तर्जुमानी करे) और "रसूमियाती शायरी"( यानी रिवायती शायरी) पर बहस की एक दिलचस्प सिलसिला चला था और फिर ( जैसा कि तक़रीबन हर ऐसी बहस के साथ होता है!)किसी नतीजे पर पहुँचे बगै़र ख़त्म भी हो गया था. इस बहस में उर्दू ग़ज़ल पर ही ज़ियादा गुफ़्तगू की गई थी और बाक़ी दूसरे अस्नाफ़ के जानिब (विधाओं की तरफ़) तवज्जुह (ध्यान) नहीं की गई थी.कम से कम इस बहस से यह तो ज़रूर हुआ कि सब पर नई सोच के कुछ दरवाज़े खुल गये थे. यह मज़्मून इसी बहस का हिस्सा है.
यहाँ इस बहस का आग़ाज़ (शुरुवात) कि "वाक़ियाती शायरी क्या है?" ख़ुद शायरी की तारीफ़ से करना मुनासिब मालूम होता है ताकि बात साफ हो जाए.इस के बाद "वाक़ियाती शायरी"और ’रसूमियाती शायरी" के फ़र्क और ख़ुसूसियत (विष्टितता) को समझना आसान होगा.
(१) "रसूमियाती शायरी" की तारीफ़ मुंशी बृज नारायन"चकबस्त" के इस शे’र से बेहतर नहीं हो सकती है.:-

"शायरी क्या है? दिली जज़्बात का इज़हार है
दिल अगर बेकार है तो शायरी बेकार है "

गोया इन्सानी जज़्बात, ख़यालात और एह्सासात के दिलपिज़ीर (जो दिल को पसंद हो) इज़हार का नाम ही शायरी है.इस इज़हार के सांचे .अस्नाफ़-ए-सुख़न (साहित्य की विधायें) उस्लूब और उसूल (शैली और सिद्धान्त) हमारे बुज़ुर्गों ने बड़ी मेहनत और दिलसोज़ी से मुरत्तब (क्रमबद्ध) किया है और आज भी रिवायती शो’अरा (शायर लोग) इनकी ही रोशनी में दाद-ए-सुख़न दे (साहित्य की सेवा कर)रहें हैं.
(२) "वाक़ियाती शायरी की तारीफ़ का मसला ज़रा मुश्किल और तफ़्सील तलब (विस्तार चाहता) है.बहुत तलाश के बावजूद इस मौज़ू(विषय) पर ऐसा कोई शे’र नहीं मिल सका है जिससे इसकी मुकम्मल और सही तारीफ़ हो सके.ख़्याल है कि कि इन्सानी ज़िन्दगी के वाक़ियात-ओ-मसाइल (यथार्थ और समस्यायें) "रोटी ,कपड़ा और मकान ,मज़दूर और सरमायादार (पूजीपति) की कश्मकश (खींच-तान) ,इन्सान के ज़मीनी मसाइल (जंग ,ज़ालिमों के हाथों कमज़ोरों पर ज़्यादती.मईशत के मसाइल पर क़ौमों की आवेज़िश (जीवन यापन के नाम पर कौ़मों के लड़ाई-झगड़ा)वगै़रह का इज़हार " वाक़ियाती शायरी" कहलायेगा.मशहूर वाक़ियाती शायर ’ज़फ़र इक़्बाल’ का एक शे’र इस सिलसिले में इस्तेमाल किया जा सकता है क्यों कि इसमें हमारी तलाश का हवाला नज़र आता है.
ये कश्फ़ सब के लिए आम भी नहीं होता
अगर्चे शायरी इल्हाम भी नहीं होता
(कश्फ़= दिल की बात इल्हाम =ख़ुदा की वाणी , अगर्चे = यद्यपि)
हम यहाँ ’होता’/होती’ के बहस में नहीं पड़ेंगे! कम से कम से शे’र से यह तो मालूम हो जाता है कि शायरी (और चूँकि ’ज़फ़र इक़्बाल’ वाक़ियाती शायरी के इमाम है इस लिए शायरी से "वाक़ियाती शायरी" मुराद लेना मुनासिब मालूम होता है.) कश्फ़ की तरह की कोई चीज़ है अलबत्ता यह इल्हाम हर्गिज़ नहीं है और ये कश्फ़ अल्लाह के ख़ास ख़ास बन्दों पर ही नाज़िल होता है लेकिन यह तो इल्हाम के साथ भी है. तो फिर इस शे’र की तावील (विस्तार) क्या होगी? वल्लाह-ओ-आलम !
ऊपर बयान हो चुका है कि इस मज़ामीन में हमारा मौज़ू ग़ज़ल है.इस हवाले से हिन्दुस्तान के मशहूर रिसाले "इस्तिआ’रा" (न्यू दिल्ली ,इंडिया ,जून/जुलाई २०००)के चन्द इक़्तिबासात(उद्धरण) पेश किए जा सकते हैं.इस के दो वजूहात(कारण) हैं.एक तो यह कि यह रिसाला वाक़ियाती शायरी का आलम-बरदार(प्रतिनिधि) है दूसरे यह कि इस में एक गोशा (अध्याय) वाक़ियाती शायरी ’ज़फ़र इक़्बाल’ के लिए मुख़्तस (निर्धारित) कर दिया गया है.हम इस गोशे से ख़ास तौर से इस्तिफ़ादा करेंगे (फ़ायदा लेंगे)
यह इक़्तिबासात (उद्धरण)काफी तवील (लम्बा )है.और उतनी ही दिलचस्प भी! इन को मै यहाँ बा-सद-इक्रा(जस का तस) पेश कर रहा हूँ.इन के मश्मूलात मेरी और आप की ज़ुबान का हिस्सा नहीं हैं और हर मुहज़्ज़ब महफ़िल (प्रतिष्ठित गोष्ठियों) में इन को क़ाबिल-ए-मज़ामत (निन्दनीय)कहा जायेगा.लेकिन बात साफ करने के लिये इनको यहाँ देना लाज़िमी है.मज़्कूरा इक़्तिबासात ( ऊपर वर्णित उद्धरण) दर्ज-ए-ज़ेल (नीचे दर्ज) है
" ग़ज़ल ४ क़िस्म की होती है :-
(१) हस्तीनी :यह शराब,कबाब की रसिया, बदजुबान.बदकिरदार ,बदख़ू (बुरे और कड़ुवे स्वभाव की) होती हैं.इसे न तो अपनी इज़्ज़त का पास (लिहाज़) होता है न दूसरों की तक्रीम(आदर-सत्कार) का ख़्याल.इसका क़द या तो बहुत लम्बा होता है या तो बहुत छोटा.इसका जिस्म भी बहुत भारी या दुबला होता है.होंठ बहुत मोटे होते हैं .जिंसी आवारगी की हर वक़्त शिकार रहती है.जिंसी अज़ा (व्यभिचार)का ज़िक्र अक्सर करती रहती है.इसके पसीने में बदबू होती है और जिस्म से शराब की गन्ध आती है.अक्सर कड़वी,खट्टी ,नमकीन नीज़ ज़ायक़ा वाली चीज़ें शौक़ से खाती है.ये बहुत ऐय्यार और मक्कार होती है.इस से किसी को भी वफ़ा की उम्मीद नहीं.ऐसी ’हस्तीनी ग़ज़लें" हमारे अह्द-ए-जदीद (आधुनिक काल) में सब से ज़ियादा रचाई जाती है.
(२) शंखिनी :मर्दों से हँस-हँस कर बात करने में इसे कोई हिजाब नहीं.बे-वफ़ाई इसकी सरिश्त (स्वभाव )में है .आशिक़ों का हलक़ा(इलाक़ा) बढ़ाने के लिए हर तरह के नाज़-ओ-ग़मज़ा-ओ-इश्व:(नाज़-नखरे-कामुक हाव-भाव) का इस्तेमाल करती है.जिंसी मिलाप और अपनी तारीफ़ सुनने के लिए बे-क़रार रहती है.यह अक्सर गंदी रहती है.झूट बोलती है.बड़ी मक्कार और फ़रेबी होती है.जल्दी हँसने लगती है.इसके चलने के अन्दाज़ में बे-हया मस्ती होती है.क्योंकि यह शराब बहुत ज़ियादा पीती है.ऐसी "शंखिनी ग़ज़ल" के बारे में अहम्द फ़राज़ ज़ियादा बेहतर तौर पर बता सकते हैं
(३) चतुरनी :यह क़द्र-ए-इश्क़ पसन्द (प्रेम को इज़्ज़त और सम्मान देने वाली)और वफ़ादार होती हैं. इसकी गुफ़त्गू में बहुत मिठास होती है.अन्दाज़ बहुत प्यारा और मोह लेने वाला होता है.मोसक़ी (संगीत) से ख़ास लगाव रखती हैं.जिंसी जुनून का शिकार नहीं मगर तबीयत में इज़्तिराब (आतुरता) की सी कैफ़ियत रहती है.यकसां हालात में कभी नही रहती.कहीं भी इसे एक जगह क़रार नहीं.इसकी जिस्म में लचक और चाल में ख़ुमारी होती है.ये रंगीन कपड़े पहन कर,बाल बना कर बहुत ख़ुश होती है.ये "चतुरनी ग़ज़ल"नासिर काज़मी ,मुनीर नियाज़ी ज़फ़र इक़्बाल और साक़ी फ़ारुक़ी के यहाँ अक्सर मिल जाती है.
(४) पद्मिनि :यह सब से आला(उत्तम) ,ख़ुश गुफ़्तार,ख़ुश किरदार होती है.इसके चेहरे का रंग गुल-ए-नीलोफ़र जैसा और जिस्म खूबसूरत अनार की तरह होता है.आहू-चश्म (मृग नयनी) याक़ूती होंट (रसीले ख़ूबसूरत) ,रोशन चेहरा ,आँखों में नश्तर रखने वाली यह "पद्मिनि’ ख़ुशबुओं की दिल-दाद होती है.इस की जिस्म से ख़ुशबू आते हैं फूलों से इसे बहुत प्यार होता है.पसीने में इत्र-ए-गुलाब होता है.यह पेशाब भी करती हैं तो उस पर भिड़ों का हुजूम हो जाता है."पद्मिनि’ आख़िरी बार "ग़ालिब" के साथ देखी गई थी.उसके बाद कहाँ रूप-पोश (मुँह छुपा ली ,गायब) हो गई कुछ पता नहीं.किसी को कुछ ख़बर नहीं.हाँ इतना ख़बर ज़रूर है कि "पद्मिनि’कहीं न कहीं ज़रूर ज़िन्दा होगी.किसी कुंज में ,किसी सेहरा(उपवन) में,किसी जंगल में भटक रही होगी."पद्मिनि’ की तलाश जारी है

[......जारी है ]