शनिवार, 6 मार्च 2010

जनाब "सरवर" की दो गज़लें

एक ग़ज़ल : डूबता है दिल कलेजा मुँह को आया जाए है......

डूबता है दिल कलेजा मुँह को आया जाए है
हाय! यह कैसी क़ियामत याद तेरी ढाए है !

इश्क़ की यह ख़ुद फ़रेबी!अल-अमान-ओ-अल हफ़ीज़ !
जान कर वरना भला खु़द कौन धोखा खाए है

आँख नम है ,दिल फ़सुर्दा है ,जिगर आशुफ़्ता खू
लाख समझाओ वा लेकिन चैन किसको आए है ?

क्या तमन्ना ,कौन से हसरत ,कहाँ की आरज़ू ?
रंग-ए-हस्ती देख कर दिल है कि डूबा जाए है !

ऐतिबार-ए-दोस्ती का ज़िक्र कोई क्या करे ?
ऐतिबार-ए-दुश्मनी भी अब तो उठता जाए है !

इस दिल-ए-बे-मेह्र की यह कज अदायी देखिए
आप ही शिकवा करे है ,आप ही पछताए है !

बेकसी तो देखिये मेरी राह-ए-उम्मीद में
दिल को समझाता हूँ मैं और दिल मुझे समझाए है !

क्या शिकायत हो ज़माने से भला ’सरवर’ कि अब?
मैं जहाँ हूँ मुझसे साया भी मिरा कतराए है !

-सरवर-
कज अदायी = बेरुख़ी
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एक ग़ज़ल : छोड़िए छोड़िए यह ढंग पुराना साहिब !


छोड़िए छोड़िए यह ढंग पुराना साहिब !
ढूँढिए आप कोई और बहाना साहिब !

खत्म आख़िर हुआ हस्ती का फ़साना साहिब
आप से सीखे कोई साथ निभाना साहिब !

भूल कर ही सही ख़्वाबों में चले आयें आप
हो गया देखे हुए एक ज़माना साहिब !

हमने हाथों की लकीरों में तुम्हें ढूँढा था
वो भी था इश्क़ का क्या एक ज़माना साहिब !

क्यों गए ,कैसे गए ,ये तो हमें याद नहीं
हाँ मगर याद है वो आप का आना साहिब !

कू-ए-नाकामी-ओ-नाउम्मीदी-ओ-हसरतसंजी
हो गया अब तो यही अपना ठिकाना साहिब !

क़स्रे-उम्मीद ,वो हसरत के हसीन ताज महल
हाय! क्या हो गया वो ख़्वाब सुहाना साहिब ?

रहम आ जाए है दुश्मन को भी इक दिन लेकिन
तुमने सीखा है कहाँ दिल का दुखाना साहिब ?

आते आते ही तो आयेगा हमें सब्र हुज़ूर
खेल ऐसा तो नही दिल का लगाना साहिब !

इसकी बातों में किसी तौर न आना ’सरवर’
दिल तो दीवाना है ,क्या इसका ठिकाना साहिब !

-सरवर-

कू-ए-नाकामी-ओ-नाउम्मीदी-ओ-हसरतसंजी= असफलता,निराशा और अपना दुख
बयान करने की जगह
क़स्रे-उम्मीद = उमीदों का महल

5 टिप्‍पणियां:

तिलक राज कपूर ने कहा…

ये ग़ज़लें, एकाएक लगा कि उस्‍ताद ज़ौक साहब से रूबरू हूँ। ऐसी ग़ज़लें बहुत कम पढ़ने को मिलती हैं जिनका हर ईक शेर बार-बार पढ़ने को दिल कहे।
जो ग़ज़ल कहने का सलीका सीखना चाहते हैं उन्‍हें सरवर साहब को जरूर सुनना और पढ़ना चाहिये।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बहुत बढ़िया गजले हैं. बहुत खूब.

venus kesari ने कहा…

इस दिल-ए-बे-मेह्र की यह कज अदायी देखिए
आप ही शिकवा करे है ,आप ही पछताए है !

बेकसी तो देखिये मेरी राह-ए-उम्मीद में
दिल को समझाता हूँ मैं और दिल मुझे समझाए है !

क्या शिकायत हो ज़माने से भला ’सरवर’ कि अब?
मैं जहाँ हूँ मुझसे साया भी मिरा कतराए है !

क्या कहूँ इन शेरोन ने लाजवाब कर दिया

आते आते ही तो आयेगा हमें सब्र हुज़ूर
खेल ऐसा तो नही दिल का लगाना साहिब !

अब इसके लिए क्या कहूँ जी दिल खुश हो गया

सरवर साहब को पढवाने के लिए शुक्रिया

Udan Tashtari ने कहा…

दोनों गज़लें बहुत उम्दा..आपका आभार इन्हें प्रस्तुत करने का.

आनन्द पाठक ने कहा…

आदरणीय तिलक राज जी/भारतीय नागरिक जी/केसरी जी/समीर जी
"सरवर" साहब की ग़ज़ल पसन्द आई बहुत बहुत धन्यवाद
सादर
आनन्द.पाठक