शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 11

ग़ज़ल 11

दिल पे गुज़री है जो बता ही दे !
दास्ताँ अब उसे सुना ही दे !

मेरे हक़ में दुआ नहीं, न सही
किसी हीले से बददुआ ही दे !

खो न जाए कहीं मिरी पहचान
तू वफ़ा का सिला जफ़ा ही दे !

शामे-फ़ुरक़त की तब सहर होगी
हुस्न जब इश्क़ की गवाही दे

बे-ज़बानी मिरी जुबाँ है अब
सोज़-ए-शब ,आह-ए-सुबहगाही दे

कौन समझाए ,किसको समझाए
अब तो ऐ दिल उसे भुला ही दे

कुछ तो मिल जाए तेरी महफ़िल से
नामुरादी का सिलसिला ही दे !

दिल ज़माने से उठ चला है अब
कब तलक दाद-ए-कमनिगाही दे

अपनी मजबूरियों पे शाकिर हूँ
इतनी तौफ़ीक़ तो इलाही ! दे !

तुझ पे ’सरवर’ कभी न यह गुज़रे
शायरी दाग़-ए-कज कुलाही दे !
-सरवर-

सोज़े-शब =रात की जलन
आहे-सुबह्गाही = सुबह की आह
शाकिर = ईश्वर का शुक्रगुज़ार
तौफ़िक़ = ताकत
दाग़-ए--कज कुलाही = घमंड का दाग़

3 टिप्‍पणियां:

ravikumarswarnkar ने कहा…

बेहतर...

PK Swami ने कहा…

chhotee bahar meiN aik shaandaar ghazal hai. aik hassaas dil kee akkaas hai aur behatareen alfaaz se murassaa hai.

aik asarpazeer ghazal par Sarwar saheb ko mubaarakbaad pesh hai.

PK Swami

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० रविकुमार जी/स्वामी जी
जनाब सरवर साहेब की ग़ज़ल की सराहना के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया
सादर
आनन्द.पाठक