रविवार, 21 फ़रवरी 2010

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 13

ग़ज़ल १३


शब-ए-उम्मीद है ,सीने में दिल मचलता है
हमारी शाम-ए-सुख़न का चिराग़ जलता है

न आज का है भरोसा ,न ही ख़बर कल की
ज़माना रोज़ नयी करवटें बदलता है

अजीब चीज़ है दिल का मुआमला यारों !
सम्भालो लाख, मगर ये कहाँ सम्भलता है

न तेरी दोस्ती अच्छी ,न दुश्मनी अच्छी
न जाने कैसे तिरा कारोबार चलता है

सुना है आज वहाँ मेरा नाम आया था
उम्मीद जाग उठी ,दिल में शौक़ पलता है

वही है शाम-ए-जुदाई , वही है दिल मेरा
करूँ तो क्या करूँ ,कब आया वक़्त टलता है !

मिलेगा क्या तुम्हें यूँ मेरा दिल जलाने से
भला सता के ग़रीबों को कोई फलता है ?

इसी का नाम कहीं दर्द-ए-आशिक़ी तो नहीं ?
लगे है यूँ कोई रह रह के दिल मसलता है

न दिल-शिकस्ता हो बज़्म-ए-सुख़न से तू ’सरवर’
नया चिराग़ पुराने दिये से जलता है !
-सरवर
दिल-शिकस्त =दिल का टूटना

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 12

ग़ज़ल 12


ज़माने की अदा है काफ़िराना
जुदा मेरा है तर्ज़-ए-आशिक़ाना

तिरा ज़ौक़-ए-तलब ना-मेह्रिमाना
न आह-ए-सुब्ह ने सोज़-ए-शबाना

शबाब-ओ-शे’र-ओ-सेहबाये-मुहब्बत
बहोत याद आये है गुज़रा ज़माना

’ चे निस्बत ख़ाक रा बाआलम-ए-पाक ?
कहाँ मैं और कहाँ वो आस्ताना

बहुत नाज़ुक है हर शाख़-ए-तमन्ना
बनायें हम कहाँ फिर आशियाना ?

मकाँ जो है वो अक्स-ए-लामकाँ है
अगर तेरी नज़र हो आरिफ़ाना !

मिरी आह-ओ-फ़ुग़ां इक नै-नवाज़ी
मिरा हर्फ़-ए-शिकायत शायराना

मैं नज़रें क्या मिलाता ज़िन्दगी से
उठीं ,लेकिन उठीं वो मुज्रिमाना

हमारी ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी है
मगर इक साँस लेने का बहाना

मुझे देखो,मिरी हालात न पूछो
मुझे आता नहीं बातें बनाना

उलझ कर रह गया मैं रोज़-ओ-शब में
समझ में कब ये आया ताना-बाना

न देखो, इस तरह मुझको न देखो
बिखर जाऊँगा होकर दाना-दाना

मुझे है हर किसू पर ख़ुद का धोका
ये दुनिया है कि है आईना-ख़ाना ?

निकालो राह अपनी आप ’सरवर’
कभी दुनिया की बातों में न आना !

-सरवर


मुज्रिमाना =अपराधियों जैसा
आरिफ़ाना =सूफ़ियों जैसा
आस्ताना = चौखट
आह-ओ-फ़ुँगा= विलाप
आईनाख़ाना =शीशे का घर
सोज़-ए-शबाना =रात में दिल की जलन

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

जनाब सरवर की एक ग़ज़ल : ग़ज़ल 11

ग़ज़ल 11

दिल पे गुज़री है जो बता ही दे !
दास्ताँ अब उसे सुना ही दे !

मेरे हक़ में दुआ नहीं, न सही
किसी हीले से बददुआ ही दे !

खो न जाए कहीं मिरी पहचान
तू वफ़ा का सिला जफ़ा ही दे !

शामे-फ़ुरक़त की तब सहर होगी
हुस्न जब इश्क़ की गवाही दे

बे-ज़बानी मिरी जुबाँ है अब
सोज़-ए-शब ,आह-ए-सुबहगाही दे

कौन समझाए ,किसको समझाए
अब तो ऐ दिल उसे भुला ही दे

कुछ तो मिल जाए तेरी महफ़िल से
नामुरादी का सिलसिला ही दे !

दिल ज़माने से उठ चला है अब
कब तलक दाद-ए-कमनिगाही दे

अपनी मजबूरियों पे शाकिर हूँ
इतनी तौफ़ीक़ तो इलाही ! दे !

तुझ पे ’सरवर’ कभी न यह गुज़रे
शायरी दाग़-ए-कज कुलाही दे !
-सरवर-

सोज़े-शब =रात की जलन
आहे-सुबह्गाही = सुबह की आह
शाकिर = ईश्वर का शुक्रगुज़ार
तौफ़िक़ = ताकत
दाग़-ए--कज कुलाही = घमंड का दाग़

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

जनाब सरवर की ग़ज़ल : 10

ग़ज़ल १०

कहाँ से आ गए तुम को न जाने
बहाने और फ़िर ऐसे बहाने !

कोई यह बात माने या न माने
मुझे धोखा दिया मेरे ख़ुदा ने !

ज़माना क्या बहुत काफी नहीं था ?
जो तुम आए हो मुझको आज़माने !

लबों पर मुह्र-ए-ख़ामोशी लगी है
दिलों में बन्द हैं कितने फ़साने !

न मौत अपनी न अपनी ज़िन्दगी है
मगर हीले वही है सब पुराने !

ज़माने ने लगाई ऐसी ठोकर
हमारे होश आए है ठिकाने !

कहाँ तक तुम करोगे फ़िक्र-ए-दुनिया ?
चले आओ कभी तुम भी मनाने !

हवा-ए-नामुरादी ! तेरे सदक़े
बहार अपनी न अपने आशियाने !

ज़रा देखो कि डर कर बिजलियों से
जला डाले ख़ुद अपने आशियाने !

मिलेंगे एक दिन ’सरवर’ से जाकर
अगर तौफ़ीक़ दी हम को ख़ुदा ने !

-सरवर-
तौफ़ीक़ = शक्ति,सामर्थ्य
हीले =बहाने

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

दो मुख्तलिफ गज़लें

ग़ज़ल ०९


जब नाम तिरा सूझे ,जब ध्यान तिरा आवे
इक ग़म तिरे मजनू की ज़ंजीर हिला जावे !

सब की तो सुनूँ लोहू ये आँख न टपकावे
कीधर से कोई ऐसा दिल और जिगर लावे !

जी को न लगाना तुम ,इक आन किसू से भी
सब हुस्न के धोखे हैं ,सब इश्क़ के बहलावे !

ख़ुद अपना नाविश्ता है ,क्या दोष किसू को दें
यह दिल प-ए-शुनवाई जावे तो कहाँ जावे ?

टुक देख मिरी जानिब बेहाल हूँ गुर्बत में
दीवार ! सो लरज़ाँ है साया ! सो है कतरावे !

दुनिया-ए-दनी में कब होता है कोई अपना
बहलावे से बहलावे , दिखलावे से दिखलावे !

देखो तो ज़रा उसके अन्दाज़-ए-ख़ुदावन्दी
ख़ुद बात बिगाड़े है ,ख़ुद ही मुझे झुठलावे !

सद हैफ़ तुझे ’सरवर’ अब इश्क़ की सूझी है
हर बन्दा-ए-ईमां जब काबे की तरफ जावे

-सरवर-
नविश्त: = भाग्य में लिखा
सद हैफ़ = हाय भोले-भाले !
पा-ए-शुनवाई= अपनी बात सुनाने कि लिये

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ग़ज़ल ०३

दर्द-ए-बेकसी कब तक रंज-ए-आशिक़ी कब तक
रास मुझ को आयेगी ऐसी ज़िन्दगी कब तक !

सोज़-ए-दिल छिपाएगा अश्क की कमी कब तक
खुश्क लब दिखाएंगे आरज़ी खुशी कब तक !

तिश्नगी मुक़द्दर में साथ तो नहीं आयी
चश्म-ए-मस्त बतला तू ऐसी बेरुखी कब तक !

ज़ब्त छूटा जाता है सब्र क्यों नहीं आता
देखिये दिखाती है रंग बेकसी कब तक !

दिल में हैं मकीं लेकिन सामने नहीं आते
रखेगा भला आखिर सब्र आदमी कब तक !

दर पे आँख अटकी है उखड़ी उखड़ी सांसे हैं
नातवां सहे आखिर तेरी ये कमी कब तक !

मेहरबान वो हों तो लुत्फ़-ए-इश्क सादिक है
बंदगी में कटेगा ’स्वामी’ ज़िन्दगी कब तक !!
-स्वामी-