रविवार, 31 जनवरी 2010

शायरी में ’ज़म(खोट) का पहलू’-----------कड़ी ३(अंतिम )

[नोट : कड़ी १ और कड़ी २ नीचे इसी ब्लॉग पर दर्ज-ए-जेल है ]

अब दो मिसाल और देखिये जिनमें यह पहलू नुमाया नहीं है.
(२) मिसाल -२
वालिद मरहूम राज़ चांदपुरी साहब ने अपनी एक किताब ’दास्तान-ए-चांद’ कानपुर (हिन्दुस्तान) में मन्क्कुरा (सन) १९२३ के एक मुशायरे का तज़करा (चर्चा) लिखा है.इसकी ज़मीन थी -" नाज़ रहने दे ,नियाज़ रहने दे".मुशायरे में बहुत से मशहूर शायरों ने शिरकत की थी जिनमें उस ज़माने के मुस्तनद और माने हुए उस्ताद हकीम’नातिक़ लखनवी’ भी शामिल थे.जब ह्कीम साहब ने अपनी तरही ग़ज़ल (मुशायरे की थीम ग़ज़ल) मुशायरे में इनायत की तो इस पर बहुत दाद मिली.एक शे’र पर कुछ शो’अरा (शायरों) ने इसके मज़्मून,रंग और हुस्न की दाद दी लेकिन कुछ लोगों ने जिनकी हकीम साहब से शायराना मुख़ासिमत ( विरोध) थी और दोनो की आपस में चश्मकशीं (नोक-झोंक) आम थी इसमे ’ज़म का पहलू" सरे मुशायरा ही निकाल लिया और ऐसे तंज़िया (व्यंगात्मक) और मज़ाहिक (हास्य) अन्दाज़ में दाद और सताइश (तारीफ़) डोंगरे बरसाए कि लोगों के कान खड़े हो गये.बेचारे हकीम साहब अपनी मासूमियत और फ़ित्री शराफ़त (स्वभावगत शराफ़त) में उनका इशारा न समझ सके और उन्होने अपना शे’र कई बार दुहराया.आख़िकार उनके एक क़रीबी दोस्त ने दबे अल्फ़ाज़ में उन्हे सूरत-ए-हाल से आगाह किया और ’नातिक़ लखनवी’ साहब आगे बढ़ गए.हकीम साहब की इस ज़मीन में पूरी ग़ज़ल नहीं मिल सकी .इस लिए इस ज़मीन दूसरे शायरों के चन्द अश’आर (शे’रों) में ’हकीम ’नातिक़ लखनवी’ साहब के शे’र भी शामिल कर दिये हैं.उन्हे नीचे लिख रहा हूं.देखिए कि कहीं आप को किसी शे’र में शे’रों में ’ज़म का पहलू’ निकलता है ?
यह शौक़े सज्दा, यह ज़ौक़े नियाज़ रहने दे
क़बूल हो चुकी , फ़िक्रे- नमाज़ रहने दे

नियाज़-ओ-नाज़ में कुछ इम्तियाज़ रहने दे
रुख़-ए-जमील पर रंगे-ए-मजाज़ रहने दो

नया है ज़ख़्म अभी तीर-ए-नाज़ रहने दे
ख़ुदा के वास्ते ऐ जल्दबाज़ रहने दे

तसर्रूफ़ात की दुनिया तो है बहुत महदूद
तख़्लुयात को अफ़सानासाज़ रहने दे

जो कुछ हुआ वो हुआ अब तो फ़र्ज़ है सजदा
हिकायत-ए-रह-ए- दुर्र-ओ-दराज़ रहने दे



रुख़-ए-जमील पर =सुन्दर हसीन चेहरे पर
तसर्रूफ़ात की दुनिया = मतलब की दुनिया
तख़्लुयात =ख़यालात
महदूद = सीमित
हिकायत =कथा-कहानी/हाल-चाल

मिसाल -३ मिर्ज़ा अस्दुल्लाह खां ’गा़लिब’ की एक मशहूर ग़ज़ल दर्ज-ए-ज़ेल (नीचे दर्ज है).इस ग़ज़ल से उर्दू का हर आशिक़ खूब ही तो वाकि़फ़ है.हम हज़ारों मर्तबा इसको पढ़ चुके हैं और बेतबाज़ी और ख़तूत वगै़रह में इसके अश’आर भी लिखते रहते हैं लेकिन कभी आप का ख़याल इस जानिब नहीं गया होगा कि मिर्ज़ा गा़लिब के इस ग़ज़ल में भी यार लोगों ने ’ज़म का पहलू" ढूँढ निकाला है.कज फ़हमी और कम सवादी की ऐसी मिसालें कम ही देखने में आती हैं .ब-हर-कैफ़(बहर हाल ,जो भी हो) ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है .पढ़िए औए लुत्फ़ अन्दोज़ होइए.अगर कोशिश से हो सके तो इसमें ’ज़म के पहलू’ की निशानदेही कीजिए

बाज़ीचा-ए-अफ़्ताल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

होता है निहाँ गर्द में सहरा मिरे आगे
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मिरे आगे

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तिरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे

फिर देखिए अन्दाज़े-गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार
रख दे कोई पैमाना-ओ-सहबा मिरे आगे

इमां मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी सागरो मीना मिरे आगे

हमपेशा-ओ-हममशरब-ओ-हमराज़ है मेरा
’ग़ालिब’ को बुरा क्यों कहो अच्छा मिरे आगे

अब यह बात ख़त्म होती है.आप के सवालात का इन्तेज़ार रहेगा.एक मर्तबा फिर आप से दस्त-बस्ता (हाथ जोड़ कर ) इस्तदा है कि ’ज़म के पहलू’ की निशानदेही सिर्फ शे’र या अश’आर का नं० दे कर फ़र्माए किसी तफ़्सील या तशरीह में न जाएं.अगर आप किसी क़िस्म की वज़ाहत या तशरीह ऐसी ही ज़रूरी समझते हैं तो मुझको ’इ-मेल’ कर दीजिए.मेरा ’इ-मेल’ का पता मेरे नाम के बाद दर्ज है.
इस में दो-चार बड़े सख़्त मक़ाम आते हैं

आप की तवज्जो का मम्नून-ओ-मुतशक्किर (आभारी व शुक्र गुजार ) हूँ.
यार ज़िन्दा ,सोहबत बाक़ी
(समाप्त)
----सरवर आलम ’राज़’ सरवर’
Email sarwar­_raz@hotmail.com

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