मंगलवार, 26 जनवरी 2010

एक मज़मून : शायरी में ’ज़म(खोट) का पहलू’-----------कड़ी १

---सरवर आलम राज़ ’सरवर’

(नोट : स्रोत -यह लेख इन्टरनेट साईट "उर्दू अन्ज़ुमन.काम से लिया गया है।जो उर्दू स्क्रिप्ट में लिखा हुआ है इसके मूल लेखक जनाब ’सरवर आलम राज़ ’सरवर’ साहिब है । यहाँ पर मैने हिंदीदाँ दोस्तों की सहूलियत के लिए सिर्फ़ हिंदी में तहरीर-ए-नक़्ल (ट्रान्सलिट्रेशन) किया है।) -आनन्द.पाठक

जैसा कि हम सब जानते हैं ,इन्टरनेट की दुनिया में तमाम महफ़िलों में ग़ज़ल का इस कदर जोर है कि हर शख्स सिर्फ़ ग़ज़ल कहने और दूसरों की ग़ज़लों पर लिखने को ही इब्तिदा और इन्तिहा (आदि और अन्त) समझता है।अगर कभी किसी की कोई नज़्म नज़र आ जाती है तो मसर्रत ( खुशी) के साथ हैरत भी होती है कि यह बदी’अत (अज़ीबो गरीब स्थिति) कैसी?दरअस्ल (वास्तव में) यह भी उर्दू के ज़वाल (क्षरण) की निशानी है कि इसमें संजीदा (गंभीर) शायरी व अदबी काम नापैद (गायब) होता जा रहा है।तन्क़ीद-ओ-तहकी़क़ (समीक्षा व आलोचना) तो अब बराए नाम (नाम मात्र) ही रह गई।किसी रिसाले (पत्रिका) को उठा कर देख लीजिए। चन्द बहुत कम म’आर(स्तरीय) की आज़ाद नज़्में ,चन्द औसत और दूसरे दर्ज़े की ग़ज़लें, चार-छ्ह दूसरे या तीसरे दर्ज़े की अफ़्सानों के अलावा कुछ और हाथ नही आएगा।अगर क़िस्मत की खूबी से किसी माहिर-ए-फ़न की कोई अच्छी ग़ज़ल नज़र आ गई या म’आरी (स्तरीय)तन्क़ीद-ओ-तह्क़ीक़ पर कोई मज़्मून (लेख) दिखाई दे जाए तो इसे मक़ाम-ए-शुक्र (भला) समझिए। मीर तक़ी ’मीर’,मिर्ज़ा रफ़ी ’सौदा’,मिर्ज़ा ’गा़लिब’मौलाना ’हाली’,मोमिन खाँ ’मोमिन’,अमीर मिनाई वगै़रह क ज़िक्र छोड़े कि ये बुजु़र्ग तो दूसरे अहद(दुनिया) से ताल्लुक़ रखते हैं। अब तो वह ज़माना भी ख्वा़बो ख़याल होकर रह गया है जब नवाब मिर्ज़ा खाँ ’दाग़ देहलवी,अल्लामा इक़्बाल ,जिग़र मुरादाबादी, फ़िराक़ गोरखपुरी,हसरत मोहानी,फ़ानी बदायूनी,असगर गोंडवी,सीमाब अकबराबादी,आनन्द नारायण मुल्ला,जगन्नाथ आज़ाद,मुल्कराज़,रासिद हुसेन खां,खलीलुर्रहमान आज़मी ,नियाज़ फ़तेहपुरी,ताजवर नजीबा बादी,,मुंशी प्रेमचन्द,कॄशन चन्दर,फ़िराक़ गोरखपुरी अमीन हैदर,खदीजा मस्तूर (छिपा हुआ) हाजिरा(उपस्थित) फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ,शकील बदायूनी,एह्सान मारहरवी,,नशूर वाहिदी,नातिक़ लखनवी,,यास अज़ीमाबादी, अज़ीम बेग़ चुगताई,रासिद अहमद सिद्दीक़ी,कैप्टन सफ़ीकुर्रहमान,कर्नल मुहम्मद खाँ,ऐसे ही ,खु़दा जाने कितने शायर ,अदीब,अफ़सानानिगार(कहानीकार),नक्का़द(समालोचक),मिज़ाहनिगार(हास्य-व्यंग्य के लेखक)बज़्मे उर्दू को गरमाते रहते थे। अगर हम चिराग़-ए-रुखे ज़ेबा (चिराग-ए-रोशन)) लेकर ढूढने भी निकलें तो मुश्ताक़ यूसूफ़,कलीम अहमद अज़ीज़,शम्सुल रहमान फ़ारुक़ी,और २-३ मजीद (अतिरिक्त) नामोंके अलावा आप किसी बन्दपा(पूज्य) शायर,अदीब ,नक़्क़ाद या अफ़सानानिगार का नाम नहीं ले सकेंगे।’ " ब-बीं तफ़ावुत-ए-रेह-अज़ कुजा अस्त ता ब कुजा" (देखो तो सही कि रास्ता का फ़र्क़ कहाँ से कहाँ पहुँच गया है )"
आज बैठे बैठे मुझे ख्याल आया कि मैं चन्द सतूर (पंक्तियाँ) उर्दू ग़ज़ल के एक ऐसे ऐब के बारे में कारीं (पाठकों की) महफ़िल की खि़दमत में पेश करूँ।जिसके नाम से बेशीतर अह्बाब(दोस्त लोग) नाआशना होंगे।अब इस तरह की मालूमात आहिस्ता-आहिस्ता किस्स-ए-पारीन( पुरानी बातें) ही नहीं होती जा रही है बल्कि दुनिया से उठती जा रही है।और वह वक्त दूर नहीं कि अहले उर्दू (उर्दू वाले)इन बातों से नावाक़िफ़ और लाइल्म हो जायेंगे।अफ़्सोस कि अमेरिका में वह किताबें और वसाईल (साधन) द्स्त्याब(हस्तगत) नहीं हैं जो ऐसे मज़ामीन की तैयारी में कमा हक़्कू (जैसा कि इनका हक़ है) मदद दे सकें और न ही ऐसे लोग मौज़ूद हैं जिनसे इस्त्फ़ादा (फ़ायदा ले) कर कर के उन्हे ज्यादा मुक़म्मिल (पूरा) मुस्तनद और जामे (पूरा) बनाया जा सके।इसलिए आज का मौज़ूँ (विषय) नसिर्फ़ मुख्तसर (संक्षिप्त) होगा बल्कि बड़ी हद तक तश्ना (प्यास जगाने वाली) भी। शायद कहीं कोई ऐसा दोस्त मौजूद हो जो इस मज़ामीन में मुनासिब इज़ाफ़े (बढ़ोत्तरी) कर सके। अगर ऐसा हो सके तो मै बहुत ही मम्नून (आभारी) हूँगा। मुमकिन है कि मज़ामीन देख कर आप को भी कोई शे’र ऐसा याद आ जाए जो इस ऐब की तारीफ़ में आता है.आप से गुज़ारिश है वह शे’र मुझको इ-मेल से भेंज दे ताकि मुनासिब इह्तिसाब -ओ- इन्तिकाद (देख-भाल) के बाद आप ही के नाम से यहाँ पेश किया जा सके।यह दरख्वास्त इसलिए कर रहा हूँ कि मामला निहायत नाज़ुक है और इस मंज़िल में ऐहतियात निहायत ज़रूरी है।आप को मेरी इस बात की अहमियत का अन्दाज़ा पढ़ कर हो जाना चाहिए।
हमारे उस्तादों ने सदियों के तद्ब्बुर (सोच विचार) तदबीर(उपाय) सख़्त मेहनत के बाद शायरी के अ’ऊब(एबों) की फ़ेहरिस्तसाज़ी और हदबन्दी कर दी है।इस तरह उन्होने शायरी के मुहासिन( खूबियों)सनाए-ओ-बदा’अ(नई नई चामत्कारिक अलंकारों) को भी बहुत तफ़्सील व वज़ाहत से क़लमबन्द कर रखा है।आप इनमें से चन्द अऊ’ब(दोषों) और चन्द मुहासिन (खूबियो)से ज़रूर ही वा्क़िफ़ होंगे।मिसाल के तौर पर मुहासिन में फ़साहत-ओ-बलाग़त(सीधा सादा लेखन और चामत्कारिक लेखन) अश्र पज़ीरी(प्रभावकारी लेखन) मुख़्तलिफ़ सन’अती(विभिन्न प्रकार की शैल्पिक कारीगरी) वगै़रह ,और अ’ऊब (दोषों ) में शुतुर्गर्वा (ऊँट के गले में बिल्ली, बेमेल) हरूफ़ का गिरना या दबना,मुहावरों का ग़लत इस्तेमाल,हमारी आम मालूमात का हिस्सा है।अ’ऊब की फ़ेहरिस्त में एक नाम आता है ’ज़म का पहलू"(खोट का पहलू) । मसलन हम कहेंगे इस शायरी में "ज़म का पहलू"निकलता है।ऐसे बयान देखते ही ज़ेहन में एक सवाल फ़ितरी (स्वाभाविक ) तौर पर पैदा होता है कि यह ’ज़म का पहलू ’क्या होता है ? और यह किस चिड़िया का नाम है? आज की मुख़्तसिर गुफ़्तगू ’जम के पहलू’ पर ही होगी.....................................................(जारी)

1 टिप्पणी:

Raviratlami ने कहा…

उर्दू की सामग्री को हिन्दी में पेश कर आपने बढ़िया काम किया है. क्या आप कम्प्यूटर के स्वचालित उर्दू-हिन्दी लिपिपरिवर्तक का प्रयोग करते हैं? यदि हाँ तो कौन सा? यदि आपने इन ऑनलाइन स्वचालित उर्दू-लिपि परिवर्तकों का प्रयोग नहीं किया है तो कृपया इन्हें देखें -

http://sggs.learnpunjabi.org/default.aspx

http://translate.malerkotla.co.in/transU2h.aspx