मंगलवार, 19 जनवरी 2010

एक ग़ज़ल :गुरूर-ए-हुस्न के मंज़र ...

[पिछली बार इस साईट पर एक ग़ज़ल " शौक़ है उनको मुस्कराने का......" चस्पा की थी .इस पर कुछ अहलेकारीं (पाठक गण) ने गुज़ारिश की कि राक़िम-उल-हरूफ़ (लेखक) का एक मुख़्तसर तार्रुफ़ (संक्षिप्त परिचय) भी पेश किया जाय तो रवा (उचित) होगा.इसी के मद्द-ए-नज़र उनकी एक और ग़ज़ल मुख़्तसर तार्रुफ़ के साथ पेश की जा रही है

पी०के०स्वामी (प्रभात कुमार स्वामी) की पैदाईश 1947 ,कलकत्ता (कोलकोता) में हुई. आपकी graduation और law की तालीम वहीं से हुई जहां आप ३१ साल तक मुकीम रहे. मौसूफ़ पिछले बत्तीस सालों से देलही में कयाम रखते हैं और दीगर मुलाज़मत के बाद एक MNC से बतौर मुन्ताजिम.ए आला रिटायर हुए.उर्दू से बेहद मुहब्बत है. इन्हों ने उर्दू ज़बान और ग़ज़ल की रहनुमाई अमेरिका में बसे मोहतरिम उस्ताद सरवर आलम राज़ "सरवर" से हासिल की और सीखने का ये सिलसिला जारी है.
(email ; pkswami1@gmail.com)
चलते-चलते अहले-कारीं को आग़ाह कर दें
"स्वामी" के नाम से यह भरम न हो कि जनाब दक्षिण भारत से या किसी भगवाधारी से रब्त रखते है.लोग मोहब्बत से इन्हें ’स्वामी’से याद करते हैं.आप बड़ी शिद्दत से शे’र-ओ-शायरी का शौक़ फ़र्माते है. जब आप से तार्रुफ़ पूछा गया तो फरमाया के :

यह और बात है कि तार्रुफ़ न हो सका
हम ज़िन्दगी के साथ बहुत दूर तक गये !

इनकी एक और ग़ज़ल दर्ज-ए-ज़ैल (नीचे दर्ज) है आप भी लुत्फ़-अन्दोज़ होइए.

ग़ज़ल ०२
गुरुर-ए- हुस्न के मंज़र जहां मालूम होते हैं
हसीं कुछ वार खंज़र के वहां मालूम होते हैं

निगाह-ए- शौक़ के जलवे जहां मालूम होते हैं
ये जितने हों निहां उतने अयाँ मालूम होते हैं

तबस्सुम ज़ेर-ए-लब है और पेशानी पे बल तौबा
मेहरबाँ हैं मगर ना-मेहरबाँ मालूम होते हैं

अजब नाज़ -ओ -अदा -ए -दिलनवाज़ी हुस्न वालों की
के ज़ालिम रूठ कर भी जान-ए- जां मालूम होते हैं

न जाने वक़्त-ए-आख़िर किस लिए अहसास होता है
लुटे हम जिन के हाथों पासबां मालूम होते हैं

मेरा फैज़ -ए-तख़य्युल है कि मेराज -ए-मुहब्बत है
नज़र से दूर हैं वो पर यहाँ मालूम होते हैं

बहार आयी है जिन पर और रानाई चमकती है
दिल -ए-पामाल गुलशन के निशाँ मालूम होते हैं

हमारे मैकदे के रिंद गिरते और संभलते हैं
ये क़ैफ़ -ए-बेख़ुदी के राजदां मालूम होते हैं

वो भूले से जो आ जाए कभी दाम-ए-तसव्वर में
निशात -ए-दीद के दरया रवां मालूम होते हैं

हसीनों कि परस्तिश में गवां दी जां ’स्वामी’ ने
फरिश्तों ने कहा ये तो जवां मालूम होते हैं !!!

-- PK Swami

निहाँ =छुपे हुए
अयाँ =जाहिर तौर पर, स्पष्ट
फ़ैज़-ए-तख़य्युल= सोच के फ़ायदे
मेराज-ए-मुहब्बत= मुहब्बत की सीढ़ी
दिल-ए-पामाल =पैरों से कुचला हुआ दिल
दाम-ए-तसव्वुर = कल्पना की जाल में

4 टिप्‍पणियां:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बहुत बढ़िया गजल . भाई आनंद आ गया .. प्रस्तुति के लिए धन्यवाद....

सतपाल ने कहा…

तबस्सुम ज़ेर-ए-लब है और पेशानी पे बल तौबा
मेहरबाँ हैं मगर ना-मेहरबाँ मालूम होते हैं
wahwa!!

आनन्द पाठक ने कहा…

आ० सतपाल जी/मिश्र जी
"स्वामी’ जी के ग़ज़ल की सराहना के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया
मुख़्लिस
आनन्द.पाठक

Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak " ने कहा…

आनन्द आया देखकर, साधक करे पुकार.
बङी ये सेवा देश की, तुम करते हो यार.
तुम करते हो यार, स्वयं भी अच्छी कविता.
शेर,कुण्डली,गजल या दोहा, हैं सब कविता.
यह साधक कविराय,आज कुछ खुल के गाया.
साधक करे पुकार, देखकर आनन्द आया.
sahiasha.wordpress.com