शनिवार, 26 दिसंबर 2009

जनाब सरवर साहब की ग़ज़ल

ग़ज़ल ०२
बात ऐसी हुई है क्या साहेब ?
हो गए आप क्यों ख़फ़ा साहेब?

कुछ तो कहिए कहाँ कि ये आखिर
लग गई आप को हवा साहेब ?

ख़ामशी और ऐसी खामोशी !
कब मुहब्बत में है रवा साहेब ?

हाय यह कैसी बे-नियाज़ी है ?
रंगे-हस्ती बिखर गया साहेब

क्या कोई मुझसे बद गुमानी है ?
तौबा ,तौबा ! ख़ुदा ! ख़ुदा ! साहेब !

याद है आप को कि मैं हूँ कौन ?
आशना और बावफ़ा ! साहेब !

मुझसे कोई अगर शिकायत है
कीजिए आप बरमला साहेब !

छोड़िए अब मुआफ़ कर दीजिए
कुछ अगर हो कहा-सुना साहेब !

दोस्ती और आश्ती के सिवा
इस जहाँ में रखा है क्या साहेब ?

आप दिल में हैं ,आप आँखों में
मेरी सूरत है आईना साहेब !

रह-रवे-राहे-आशानाई हूँ
गरचे हूँ शिकस्ता-पा साहेब !

दर्दमन्दी के और मुहब्बत के
वादे सब कीजिए वफ़ा साहेब !

मैं भी हो जाँऊ आप ही जैसा
मेरे हक़ में करें दुआ साहेब !

बह्रे-तज़्दीदे-शौक़ ’सरवर ’ को
याद करना है क्या बुरा साहेब ?

- - सरवर
आश्ती = शान्ति./अमन/सुकून
बरमला = खुल्लम-खुल्ला,आमने-सामने
शिकस्ता-पा = अपाहिज
गरचे = हालाँ कि ,यद्दपि
बह्रे-तज़्दीद =नए सिरे से ,दुबारा

जनाब सरवर साहब की गज़लें

ग़ज़ल ०१


मंज़िले-दर्द से गुज़र आए
आज अपने किए को भर आए !

था क़ियामत निगाह का मिलना
आँख से दिल में वह उतर आए !

आज याद आई उसकी यूँ जैसे
सुबह का भूला शाम घर आए !

ना-तवानी से ना-तवानी है
ग़म उठाते हुए भी डर आए !

हम अगर काम से गये तो क्या ?
आप तो अपना काम कर आए !

कैसे दुनिया से ग़म छुपाएँ जब
दिल उमँद आए , आँख भर आए !

हमने माना कि कुछ नहीं हासिल
क्या करें कोई याद अगर आए ?

आरज़ू है कि आरज़ू न रहे
चाहे फ़िर और कुछ न बर आए !

पहले जिस आरज़ू में जीते थे
आज उसी आरज़ू में मर आए !

अश्क़े-ग़म पी तो लूँ मगर हमदम
चैन ही इस तरह अगर आए !

दिल दुखे और आँख खु़श्क रहे
आए तो कैसे ये हुनर आए ?

मेरे आँसू ग़रीब के आँसू
इनमें फिर किस तरह असर आए ?

बाज़ आ अब भी इश्क़ से ’सरवर’
कितने इल्ज़ाम तेरे सर आए !

--सरवर--
नातवानी=कमजोरी

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

दिलचस्प अदबी बातें ( उर्दू की रोचक साहित्यिक बातें) भाग २/२

दिलचस्प अदबी बातें ( उर्दू की रोचक साहित्यिक बातें) भाग २/२
----सरवर आलम राज़ ’सरवर"
[नोट : यह लेख मोहतरम जनाब सरवर आलम राज़ ’सरवर’ द्वारा  उर्दू लिपि में लिखा गया है जो उनकी साईट www.sarwarraz.com से लिया गया है .जिसका सारा श्रेय सरवर साहब को और उनकी मेहनत को जाता है .यहाँ पर मात्र उसका हिन्दी तर्जुमा(ट्रान्सलिटरेशन) किया गया है तथा मुश्किल उर्दू अल्फ़ाज़ का कोष्ठक में हिंदी भावार्थ भी दिया गया है जिससे हिन्दी भाषी भी इस मज़्मून का लुत्फ़ उठा सकें---आनन्द.पाठक)

(१) तक़रीबन ४-५ सौ साल से ऐसे मौक़ों पर जब ज़िन्दगी की बे-सबाती (क्षण-भंगुरता) और उस में ऐश-ओ-आराम की कामयाबी का ज़िक्र मक़्सूद हो ,तो एक मिस्रा पढ़ा करते हैं’

बाबर ! बा ऐश कोश कि आलम दो-बारा नीस्त !

यह मिस्रा मुगल बादशाह ज़हीरुद्दीन बाबर का है जिसने हिन्दुस्तान में मुगलिया सल्तनत की दाग़-बेल (नींव) डाली थी."बाबर" फ़ारसी का अच्छा शायर भी था.पूरा शेर इस तरह है

नौ-रोज़-ओ-नौ-बहार-ओ-मय-ओ-दिलबरे खु़श अस्त
बाबर बा ऐश कोश कि आलम दो-बारा नीस्त !

(यानी नौ-रोज़ का दिन हो ,और बहार का मौसम भी,शराब-ए-साफ़ी हो और हसीन माशूक़ा भी तो ऐ बाबर ! जी भर के ऐश-ओ-इशरत कर ले क्योकि यह दुनिया दोबारा हाथ नही आएगी)

(२) किसी मौक़े पर बरजस्त:(तुरन्त) शे’र कहना या किसी दूसरे का शे’र पढ़ना भी एक फ़न है.इस की दो (२) मिसाल दर्ज की जाती है.
(अ) उर्दू के मशहूर शायर शेख़ क़लन्दर बख़्श "जुर्रत" ना-बीना (अंधे) थे.एक मर्तबा वो फ़िक्रे-सुख़न में बैठे थे कि उनके दोस्त इन्शा अल्लाह खाँ "इन्शा" आ पहुँचे और उन्होने ’जुर्रत" से पूछा कि शेख़ साहब किस फ़िक्र में ग़लताँ (दुविधा ग्रस्त)हैं?
"जुर्रत"ने कहा कि एक मिस्रा हो गया है,उसकी गिरह के फ़िक्र में हैं." और फ़िर वो मिस्रा सुनाया.

उस ज़ुल्फ़ पे फब्ती शब-ए-दीजूर की सूझी

[फब्ती=कुटिल मुस्कान, दीजूर= तारीक़ ,अँधेरा]
"इन्शा’ साहब ने फ़ौरन कहा "यूँ कह दीजिए"

"अन्धे को अन्धेरे में बड़ी दूर की सूझी ! "

(ब) मौलाना अबुल कलाम ’आज़ाद’अरबी और फ़ारसी के के ज़बर्दस्त आलिम(जानकार) थे.उनको हज़ारों अश’आर याद थे जिन को वो बार-महाल (समय व परिस्थिति पर)इन्तिहाई महारत से इस्तिमाल किया करते थे.एक मर्तबा एक सियासी मसले पर ’आज़ाद’ साहेब का मुहम्मद अली :जौहर" से इख्तिलाफ़ (विरोध) हो गया और "जोहर" साहब ने उनका साथ छोड़ कर दूसरों से जा मिले. मौलाना "आज़ाद" ने एक मज़्मून लिखा और उस में यह शे’र शामिल कर दिया

माशूक़-ए-मा बा-शेवा-ई हर कस मुवाक़िफ़ अस्त
बा मा शराब ख़ुर्द ,बा ज़ाहिद नमाज़ कर्द

(हमारा माशूक़ अपने सुलूक में हर एक का साथ दे लेता है .जहाँ उसने हमारे साथ बैठ कर शराब पी,वहीं उसने ज़ाहिद के साथ नमाज़ भी पढ़ ली !]
मौलाना "जौहर" ग़ुस्से में रात के वक़्त ही अपने एक दोस्त सैयद महफ़ूज़ अली के घर पहुँचे और उनको सोते से उठा कर कहा कि "देखो अबुल कलाम ने कैसा तंज़ (ताना) किया है .मुझे इसका जवाब भी चाहिये.
सैयद साहब भी ज़बर्दस्त आलिम थे.उन्होने उसी वक़्त यह शे’र जवाब में लिख कर दे दिया

"बर कफ़े जाम-ए-शरीअत, बर कफ़े संदान-ए-इश्क़
हर हवसनाक ना दानद जाम-ओ-सन्दाँ बा ख़तान

[मेरे एक हाथ में शराब का जाम है,और दूसरे हाथ में इश्क़ का बट्टा(कसौटी ).एक हवस परस्त इन्सान कब समझ सकता है कि शरी’अत और इश्क़ में किस तरह तवाज़ुन(सन्तुलन) बरक़रार रखा जा सकता है?

(३) मुगल बादशाह औरंगज़ेब अपनी तबियत का बहुत सख्त था.और हुकूमत उन उसूलों पर चलाना चाहता था जो उसके ख़याल में इस्लाम पर मब्नी (आधारित) थे.उसी के मुत्तलिक़ यह मशहूर है उस ने मोसूक़ी को मम्नूअ (संगीत को प्रतिबन्धित) क़रार दिया था.जब कुछ मिरासी(मर्सिया वाले) एक फ़र्ज़ी जनाज़ा लेकर उस के सामने से गुज़रे और उसके पूछने पर लोगों ने यह कहा-" यह मोसूक़ी (संगीत) का जनाज़ा है"तो उसने मुस्करा कर कहा था कि इसको ऐसा गहरा दफ़्न करना कि फिर निकल कर न आ सके. !. इसी का एक लतीफ़ा और सुन लीजिए:
औरंगज़ेब ने एक मर्तबा हुक्म जारी किया कि तमाम ज़नान-ए-बाज़ारी (तवायफ़ें) फ़लाना तारीख तक निकाह कर के अपनी मा’सियत (पाप) भरी ज़िन्दगी को खै़रबाद (अलविदा)कह दें वर्ना सब को एक कश्ती में बिठा कर दरिया में डुबो दिया जाएगा.!इस हुक्म से घबरा कर बहुत सी औरतों ने जल्दी जल्दी निकाह कर लिया.लेकिन कुछ बे-निकाह बाक़ी रह गईं.यहाँ तक कि उस मन्हूस तारीख के आने में सिर्फ़ एक दिन रह गया.उन औरतों में एक औरत थी जो एक मका़मी (स्थानीय) बुज़ुर्ग शेख़ कलीम-उल्लाह से अक़ीदत(श्रद्धा) रखी थी.और उनके पास रोज़ हाज़िर हुआ करती थी.उस दिन वो गई तो शेख़ साहेब से आब-दीदा(आँख में आँसू) हो कर कहा कि " बाँदी का आख़री सलाम क़ुबूल फ़रमाइये.
शेख़ साहेब के दरयाफ़्त करने पर उसने सारा हाल सुनाया तो आप ने कहा कि कल जब तुम लोग दरिया की तरफ़ ले जाई जा रही तो "हफ़ीज़’ शिराज़ी का यह शे’र बा-आवाज़-ए-बुलन्द पढ़ती जाना !

दर कू-ए-नेकनामी मा रा गुज़र ना दादंद
गर तू ना मी पसंदी तग़यीर कुन क़ज़ा रा !

(मानी; हम को नेक नामी के कूचे में तो जाने नही दिया गया.अब अगर तुझ को हमारी यह हालत पसंद नही है तो फिर क़ज़ा को बदल दे)!
दूसरे दिन जब सब औरतें ये ज़ोर-ज़ोर से पढ़ती हुई औरंगज़ेब के सामने से गुज़री तो वह इस क़दर मुतस्सिर(प्रभावित) हुआ उसने अपना हुक्म उसी वक़्त मन्सूख़ (रद्द) कर दिया !
(४) उर्दू शायरी के दो मर्कज़ (केन्द्र) मशहूर है : लखनऊ और दिल्ली।.लखनऊ के दो असातिज़ा (गुरु) ख़्वाज़ा हैदर अली"आतिश"और शेख इमाम बख़्श ’नासिख’ के शायराना चश्मकशीं (नोंक-झोंक) उर्दू अदब की तारीख में बहुत मारूफ़ हैं एक ज़माने में ’आतिश’ ने ’नासिख’की ग़ज़लों की ज़मीन में कई ग़ज़लें कहीं.उस पर ’नासिख’ने झुँझला कर तन्ज़न (ताने से) एक शे’र कहा कि

लिख रहा है एक जाहिल मेरे दीवान का जवाब
बू-मुसैलिम ने लिखा था जैसे क़ुरान का जवाब

(बू-मुसैलिम: एक शख्स जिसने पैगम्बर होने का दावा किया था)
जब "आतिश’ ने यह शे’र सुना तो फ़ौरन जवाब में यह शे’र कह दिया

क्यों ने दे हर मोमिन उस मुल्हिद के दीवान का जवाब
जिसने दीवान अपना ठहराया है "क़ुरान" का जवाब

(५) लखनऊ के एक मुशायरे में "नासिख" साहब ऐसे वक़्त पहुँचे जब महफ़िल तक़रीबन ख़त्म होने वाली थी.ख़्वाजा ’आतिश" और चन्द दूसरे शो’अरा मौजूद थे.मिज़ाज-पुर्सी(हाल-चाल) के बाद लोगो ने अर्ज़ किया कि "हुज़ूर ! मुशायरा तो ख़त्म हो चुका है लेकिन सब को आप का बड़ा इन्तिज़ार रहा."
शेख़ नासिख़ ने फ़ौरन यह मत्ला कह कर सुनाया और इस तरह अपने देर में आने का जवाज़(औचित्य) पैदा किया कि

जो ख़ास है वो शरीक-ए-गिरोह-ए-आम नही
शुमार -ए-दाना-ए-तस्बीह में इमाम नही

इस मत्ला में तस्बीह (एक किस्म की जपने की एक माला जिसमें छोटे-छोटे दाने लगे रहते हैं और इमाम लोग तस्बीह पढ़ते वक़्त गिना करते हैं)का ज़िक्र है जिस में जा-बजा छोटे दाने के बाद एक बड़ा दाना होता है जो इमाम कहलाता है और जिसका तस्बीह पढ़ते वक्त शुमार नहीं किया जाता है.यह भी याद रहे कि शेख़ नासिख़ का नाम इमाम बख्स था गोया इस शे’र में उन्होने अपने नाम से फ़ायदा भी उठाया है .सब ने शे’र की तारीफ़ की .’आतिश’ ने फ़ौरन जवाब में तंजन कहा -"

यह बज़्म वो है कि ताखी़र का मक़ाम नहीं
हमारे गंजिफ़: में बाज़ी-ए-ग़ुलाम नहीं

गंजिफ़: =ताश का एक प्रकार का खेल
ताख़ीर का मक़ाम= देर से आने की जगह

उस के जवाब में ’नासिख़’ के ही एक शाग़िर्द ख़्वाज़ा ’वज़ीर’ ने एक शे’र पढ़ा जो आज भी ब-तौर-ए ज़र्ब-ए-उल-मिसाल (लोक-मुहावरे की तरह) इस्तेमाल होता है:

जो ख़ास बन्दे हैं वो बन्दा-ए-अवाम नहीं
हज़ार बार जो यूसुफ़ बिके ग़ुलाम नहीं !

(६) लखनऊ के एक मुशायरे में "नासिख’ और "आतिश’ अपने अपने शागिर्दों के साथ मौजूद थे."मुसाफ़ी" ("आतिश’ के उस्ताद) की आमद (आगमन) भी मुतवक़्की थी(उम्मीद थी) मगर वो अभी आये नहीं थे ,इस दौरान एक कमसिन(कम उम्र के, नौजवान) लड़के ने अपनी ग़ज़ल का एक मत्ला पेश किया :

जिस बे-दहन से मैं करुँ तक़रीर बोल उठे
मुझ में कमाल यह है कि तस्वीर बोल उठे

बे-दहन= ख़ामोश तक़रीर= भाषण ,बात-चीत

मुशायरे में शोर मच गया और मत्ले की सबने बहुत तारीफ़ की."नासिख" साहब ने उसे कई बार पढ़वा कर दाद दी.इतने में "मुशाफ़ी" साहब आ पहुँचे ."नासिख" किसी तरह "आतिश " को छेड़ना चाहते थे.चुनांचे जब शमा "मुशाफ़ी" के सामने आई तो "नासिख" ने उनसे कहा कि अभी आप के आमद से क़ब्ल (आने से पहले) एक लड़के ने एक बेमिसाल मत्ला पढ़ा है .मैं चाहता हूँ कि आप भी सुन लें"
शमा उठा कर उस लड़के के सामने रख दी गई और उस ने फिर अपना मत्ला पढ़ कर सुनाया."आतिश’ को अपने उस्ताद के सामने से शमा इस तरह उठाए जाने पर गुस्सा आ गया और उन्होने "नासिख़" के सामने कहा कि एक ग़लत मत्ला पर इस क़दर दाद के क्या मानी? तस्वीर को बे-दहन कहना बिल्कुल ग़लत है.इस को यूँ कहना चाहिए

जिस बे-ज़बां से मैं करूँ तक़रीर बोल उठे
मुझ में कमाल यह है कि तस्वीर बोल उठे

और इस तरह एक लफ़्ज़ को बदल कर शे’र बहुत बुलन्द कर दिया.

(७) एक शे’र ग़म-ओ-रंज के मौक़े पर पढ़ा जाता है

दिल का उजड़ना सहल सही, बसना सहल नहीं ज़ालिम
बस्ती बसना खेल नहीं ,बसते बसते बसती है

आम तौर पर इसे "मीर" का शे’र समझा जाता है.यह दर-अस्ल शोकत अली खान "फ़ानी" बदायूनी का शे’र है.इस ग़ज़ल के कुछ अश’आर और सुनिए:

दुनिया मेरी बला जाने ,मँहगी है या सस्ती है
मौत मिले तो मुफ़्त न लूँ ,हस्ती की क्या हस्ती है ?

जग सूना है तिरे बगै़र,आँखों का क्या हाल हुआ
जब भी दुनिया बसती थी ,अब भी दुनिया बसती है

आँसू थे सो ख़ुश्क हुए, जी है कि उम्दा आता है
दिल पे घटा सी छाई है खुलती है ना बरसती है

दिल का उजड़ना सहल सही ,बसना सहल नहीं ज़ालिम
बस्ती बसना खे़ल नहीं बसते बसते बसती है

’फ़ानी’ जिस में आँसू क्या, दिल के लुहू का काल न था
हाय वो आँख अब पानी की, दो बूँदों को तरसती है

(८) मीर तक़ी ’मीर’ के ये अश’आर एक क़िते की सूरत में पढ़ा जाता है :

कल पाँव एक कास-ए-सर पर जो आ गया
यकसर वो उस्तुख्वाँ -ए-शकस्ता से चूर था

कहने लगा कि देख कर चल राह बे-ख़बर !
मैं भी कभू कसू का सर-ए-पुर-गु़रूर था !

कासए सर= खोपड़ी

उस्तुख़्वाँ =हड्डियाँ
सर-ए-पुर-गु़रूर =अहंकारी.घमण्डी का सर

 कभू कसू का =कभी किसी का

यह अश’आर ’मीर’ की एक ग़ज़ल में क़िताबन्द की तरह आईं हैं. इस ग़ज़ल के चन्द और अश’आर मुलाहिज़ा फ़रमाईए

था मस्त’आर हुस्न से उस के जो नूर था
ख़ुर्शीद में भी उस का ही ज़र्रा ज़हूर था

पहुँचा जो आप को तो मैं पहुँचा ख़ुदा के ताईन
मालूम अब हुआ कि बहुत मैं भी दूर था

मजलिस में रात एक तिरे पर्तवे बगै़र
क्या शमा ,क्या पतंग हर इक बे-हुज़ूर था

हम ख़ाक मिले तो मिले ,लेकिन ऐ सिपह्र !
उस शोख़ को भी राह पे लाना ज़रूर था

कल पाँव एक कासए-सर पर जो आ गया
यकसर वो उस्तुख्वाँ -ए-शकस्ता से चूर था

कहने लगा कि देख कर चल राह बे-ख़बर !
मैं भी कभू कसू का सर-ए-पुर-गु़रूर था !

(९) एक मिस्रा अक्सर लोग तन्ज़न (व्यंग्य से) पढ़ते हैं

"आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले"

यह मत्ला आख़री मुगल बादशाह बहादुर शाह’ज़फ़र’ के ज़माने के शायर मिर्ज़ा मुहम्मद अली "फ़िदवी’ का है जो मिर्ज़ा "हज्व’ के नाम से भी मशहूर थे .पूरा शे’र यूँ है

चल साथ कि हसरत दिल-ए-महरूम से निकले
आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले

(१०) लोग किसी शख़्स को तन्बीह (चेतावनी) के तौर पे एक मिस्रा सुनाते हैं .आप ने इलेक्शन या ऐसे ही किसी और सियासी मौक़े पर इस को इधर-उधर लिखा देखा होगा

"दौड़ो ! ज़माना चाल क़यामत की चल गया !"

यह शे’र जस्टिस शाह दीन "हुमायूँ" का है .आप १२ अप्रिल १८६८ को बागबानपुरा (लाहौर) में पैदा हुए और २ जुलाई १९१८ को लाहौर में ही अल्लाह को प्यारे हुए.पूरा शे’र इस तरह है

उठ्ठो ! वगरना हस्र नहीं होगा फिर कभी
दौड़ो ! ज़माना चाल क़यामत की चल गया !

(११) किसी शख़्स का इन्तक़ाल हो जाए तो लोग यह मिस्रा पढ़ते है:

"क्या खूब आदमी था,ख़ुदा मग़फ़िरत करे"

 मगफ़िरत करे = आत्मा को शान्ति प्रदान करे

यह शेख मुहम्मद इब्राहिम "ज़ौक़" (१७८९-१८५४) का एक मक़्ता है."ज़ौक" और "गा़लिब" हम-अस्र (समकालीन) थे,दोनों ही मुख़्तलिफ़ वक़्तों में (विभिन्न समय में) बहादुर शाह "ज़फ़र’ के उस्ताद भी रहे थे.पूरा मक़्ता इस तरह है

कहते हैं आज "ज़ौक़" जहाँ से गुज़र गया
क्या खूब आदमी था ,ख़ुदा मगफ़िरत करे

(१२) एक मिस्रा तक़रीबन १८५६ से ज़र्ब-उल-मिसाल (लोक मुहावरे) के तौर पर मुस्तमिल है(प्रचलित है).और इन्सान के उरूज-ओ-ज़वाल (उत्थान-पतन)) के इब्रतनाक अक्सी (इबारती तौर पर अक्स ) करता है .इस को शायर ने मुगल सल्तनत की बुझती हुई शमा के पस-ए-मंज़र( सन्दर्भ) में कहा था लेकिन यह अब भी अपनी मुनयत(उद्देश्य) में यकता (बेमिसाल)है

"इक धूप थी कि साथ गई आफ़्ताब के !"

यह मुन्शी ख़ुशबख़्त अली खान "ख़ुर्शीद’ लखनवी के एक शे’र का माखूज़ है "खुर्शीद" साहेब मुहम्मद रज़ा "बर्क़"लखनवी के शागिर्द थे.मत्ला इस तरह से है

पीरी में वल्वले कहाँ है शबाब के
इक धूप थी कि साथ गई आफ़्ताब के !

पीरी में =बुढ़ापे में

 वल्वले = जोश ,उमंग

(१३) अब कोई शख़्स आधी को छोड़ पूरी के पीछे भागे और उसके हाथ उनमें से एक भी न लगे तो लोग हसरत या तंज़ से कहते हैं कि

"ना ख़ुदा ही मिला ,ना विसाल-ए-सनम.ना इधर के रहे ना उधर के रहे!"

यह मिस्रा मिर्ज़ा सादिक़ "शरार" का है पूरा शे’र सुनिए

गये दोनों जहान के काम से हम ,ना इधर के रहे ना उधर के रहे
ना ख़ुदा ही मिला ,ना विसाल-ए-सनम.ना इधर के रहे ना उधर के रहे!

(१४) किसी की वफ़ात (मृत्यु) हो जाए तो आम तौर पर लोग ताज़ियत (अर्थी) के वक़्त इज़हार-ए-हक़ीक़त (सच्चाई प्रगट करने)और तसल्ली के लिए कहते हैं

"वो आज ,कल हमारी बारी है !"

यह उर्दू के मशहूर मस्नवी (उर्दू की एक काव्य विधा) "ज़ेह्र-ए-इश्क़’(हकीम तसद्दुक़ हुसेन अल-मारूफ़ बा-मिर्ज़ा "शौक़" लख़नवी (१७८३-१८७१) के हैं.पूरा शे’र और इसी मस्नवी के चन्द और अश’आर दर्ज-ए-ज़ेल (नीचे दर्ज़) है

मौत से किस को रस्तगारी है
आज वो कल हमारी बारी है

इश्क़ में हमने यह कमाई की
दिल दिया ग़म से आशनाई की

जाये- इब्रत सराय-ए-फ़ानी है
मुरीद-ए-मर्ग-ए-नागिहानी है

ऊँचे ऊँचे मकान थे जिनके
आज वो तंग गोर में हैं पड़े
हर घड़ी मुन्क़लिब ज़माना है
यही दुनिया का कार खाना है

रस्तगारी = मुक्ति

सराय-ए-फ़ानी= नश्वर दुनिया(ठहरने की जगह)

तंग गोर=छोटी सी कब्र
मुन्क़लिब = उथल-पुथल







मिर्ज़ा "शौक" के पोते "एह्सान" लख़नवी का कहना है कि मस्नवी ’ज़ेह्र-इश्क़’ एक सच्ची वाक़िए पर मब्नी (आधारित) है.उनके बयान के मुताबिक़ मिर्ज़ा ’शौक़’ के बिरादर-ए-निस्बत (साले!)और एक ख़ातून "सितारा’ की मुहब्बत अपने अन्जाम में नाकाम साबित हुई थी.मिर्ज़ा ’शौक़’ ने दोनो की ग़म अंगेज़ गुफ़्तगू किसी तरह सुन ली थी और उस से मुत्तसिर (प्रभावित) हो कर अपनी मस्नवी का आग़ाज़ उसी रात दीवार पर कोयले से मस्नवी की इब्तदाई (शुरुआती) अश’आर लिख कर किया था

(१५) मौत और ज़िन्दगी के हवाले से दर्ज-ए-ज़ेल मिस्रा मुद्दत से ज़र्ब-ए-मसाल(मुहाविरा) हो कर रह गया है.

"ज़िन्दगी नाम है मर मर के जिए जाने का"

यह नामवर शायर शौकत अली खान "फ़ानी" के एक शे’र का मिस्रा है "फ़ानी" का कलाम अपनी हसरत-अमीज़ी और सोज़ के लिये निहायत मशहूर है और मौसूफ़ (श्रीमान) का शुमार ’जिगर मुरादाबादी’ ’असगर गोंडवी’ और हसरत मोहानी के साथ पिछली सदी के अज़ीम (प्रतिष्ठित) शो’अरा (शायरों) में किया जाता है."फ़ानी" क़स्बा इस्लाम नगर ज़िला बदायूँ में १३ सितम्बर १८७९ को पैदा हुए थे और आप ने २७ अगस्त १९४१ को हैदराबाद (डेक्कन) में इन्तेकाल फ़रमाया.आप अरबी फ़ारसी और उर्दू के आलिम (जानकार) थे और साथ ही १९०१ में बरेली कालेज से बी०ए० और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एल०एल०बी० की अस्नाद(सनदें) भी हासिल कर रखी थी.उनका पूरा शे’र सुनिये

हर नफ़स उम्र-ए-गुज़स्ता की है मय्यत ’फ़ानी’
ज़िन्दगी नाम है मर मर के जिए जाने का!

हर नफ़स =हर श्वाँस,हर पल
उम्र-ए-गुज़स्ता= बीती हुई उमर

"फ़ानी" के ये ३ - अश’आर भी बहुत मशहूर हैं

ज़िक्र जब छिड़ गया क़यामत का
बात पहुँची तिरी जवानी तक

सुने जाते ना थे तुम से दिन रात के शिकवे
कफ़न सरकाओ मेरी बे-ज़बानी देखते जाओ

इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िन्दगी काहे को है ,ख़्वाब है दीवाने का

मुअम्मा =पहेली


  (१६) सेहत और तन्दरुस्ती की अहमियत के हवाले से यह शे’र अकसर पढ़ा जाता है :

तंग्दस्ती अगर ना हो ’ग़ालिब’
तन्दरुस्ती हज़ार ने’मत है

यह शे’र मिर्ज़ा ’गालिब’ का नही है.बल्कि मिर्ज़ा कुर्बान अली बेग ’सालिक’ का है जो ’ग़ालिब’ के शागिर्द थे.दिल्ली में १८२४ में पैदा हुए थे और १८८१ में हैदराबाद (डेक्कन) में इन्तिक़ाल किया.आप की बेटी रुक़ैय्या बेगम हिन्द-ओ-पाक के मशहूर आलिम-ए-इस्लाम मौलाना अबुल अला मौदूदी की वालिदा (माँ) थीं सही शे’र यूँ है

तंग्दस्ती अगर ना हो ’सालिक’
तन्दरुस्ती हज़ार ने’मत है

(१७) मुगल हुकूमत के ज़वाल (पतन) के ज़माने में बादशाह मुहम्मद शाह :रंगीला:का नाम अपनी ऐय्याशियों के वजह से तारीख़ में बहुत मशहूर है.उसी का एक फ़ारसी मिस्रा भी ज़बान-ज़द-ए-ख़ास-ओ-आम(हर छोटे-बड़े की ज़बान पर) है कि

"शामते एमाल-ए-मा,सूरत-ए-नादिर गिरिफ़्त "

शामते-एमाल= किए हुए कुकृत्यों का फल

[हमारे शामते-एमाल ने हमें नादिर शाह दुर्रानी की सूरत में पकड़ लिया है]
लेकिन इस का पसे-ए-मंज़र (सन्दर्भ) कम लोगों को मालूम है.नादिरशाह दुर्रानी ने १७३९ के लगभग दिल्ली पर हमला किया था और वहाँ क़त्ल-ओ-ग़ारतगरी का बाज़ार गर्म कर रखा था.जब बादशाह के दरबारी मुहम्मद शाह :रंगीला: के हुज़ूर शिकायत ले कर आये कि शहर में यह सब हो रहा है तो बादशाह को अपनी बेबसी का अन्दाज़ा हुआ और उसने आह भर कर फ़िल बदीह (यानी उसी वक्त) यह शे’र कह दिया कि

दीदाह-ए-इबरत -खु़शा ! क़ुद्रत-ए-हक़ रा बे-बीन
शामते-एमाल-ए-मा , सूरत-ए-नादिर ग़िरिफ़्त

[ऐ मेरी इबरत(बुरे काम का मिलने वाला फल) देखने वाली आँखे ! ज़रा अल्लाह की क़ुद्रत देख ! कि हमारे शामते-एमाल ने नादिर की सूरत में हमें पकड़ लिया है]
यह वो वक्त था जब नादिर शाह के हुक्म से दिल्ली में क़त्ले आम हो रहा था और हज़ारों आदमी मौत के घाट उतारे जा रहे थे.उस समय के दस्तूर के मुताबिक़ नादिर शाह दिल्ली की जामा मस्जिद मे तलवार सूंते(तलवार को म्यान से बाहर निकाल कर युद्ध के लिए तैयार) बैठा हुआ था .यह क़त्ल-ए-आम के हुक्म के मुतरादिफ़ (पर्यायवाची) था और जब तक वह इस सूरत में बैठा रहता क़त्ल-ए-आम जारी रहता.आख़िर मुहम्मद शाह :रंगीले: के वज़ीर-ए-आज़म नंगे सर और बे-चारगी (असहाय स्थिति) के इज़हार के तौर पर गले में अपनी तलवार लटका कर नादिरशाह के सामने हाज़िर हुआ और कहा कि

कसे ना मांद कि दीगर बा-तेग़-ए-नाज़ खुशी
मगर कि ज़िन्दा खूनी ख़ल्क़ रा वा बाज़ खुशी!

[अब तो कोई भी बाक़ी नहीं बचा कि तू अपने निग़ाह-ए-नाज़ से उस को क़त्ल करे,सिवाय इस के कि तू लोगो को दोबारा ज़िन्दा करे और फ़िर से उनको क़त्ल करे]
उसके बेकसी और बुढ़ापे को देख कर नादिरशाह ने अपनी तलवार म्यान में कर ली.और कहा कि

बा रीश-ए-सफ़ेदात बा ख़शीदम
(तुम्हारी सफ़ेद दाढ़ी को देख कर मैं मु’आफ करता हूँ)
उसी वक़्त इरानी नक़ीब (चोबदार) दिल्ली की सड़कों पर : अमान (शान्ति) ! अमान (शान्ति)! चिल्लाते हुए दौड़ निकले और क़त्ले आम रुक गया.
अगला ज़माना भी अजीब था लोगो में अदाबी और शे’री ज़ौक़ बहुत था और किसी सख़्त वक़्त भी उनको हरी हरी सूझती थी

(१८) एक मिस्रा बहुत मशहूर है जो लोग किसी अच्छे शख़्स के इन्तिकाल-ए-पुर मलाल (मृत्यु के दुख भरे) के मौक़े पर पढ़ते हैं

"ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थी मरने वाले में !"

यह मिस्रा मिर्ज़ा खान "दाग" देहलवी का है और मुकम्मल शे’र यूँ है;

ख़बर सुन कर मेरे मरने की ,वो बोले रक़ीबो से
ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थी मरने वाले में !

रक़ीबों से =अपने अन्य दूसरे प्रेमियों से



मिर्ज़ा ’दाग़’ (१८३१-१९०५) ’गा़लिब’ के शागिर्द थे और उर्दू के मुसल्लिम-उस-सुबूत असातिज़ा (पूर्ण रूपेण प्रामाणिक गुरु) में उनका नाम शुमार होता है.उनके चन्द और अश’आर मशहूर है और नीचे लिखे जाते हैं

राह पर उनको लगा लाए तो हैं बातों में
और खुल जाएंगे दो-चार मुलाक़ातों में

फ़लक देता है जिनको ऐश उनको ग़म भी होते हैं
जहाँ बजती हैं शहनाई वहाँ मातम भी होते हैं

उर्दू है जिसका नाम हमी जानते हैं ’दाग’!
सारे जहाँ में धूम हमारे ज़बाँ की है

(१९) एक जुमला मशहूर है जो लोग किसी ऐसे शख़्स के लिए कहते हैं जिस का कोई ठिकाना ना हो और दर-ब-दर मारा-मारा फिरता हो

"’धोबी का कुत्ता ,न घर का न घाट का’"
यह दर-अस्ल मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी ’सौदा’ (१७१३-१७८१) के दर्ज-ए-ज़ेल तीन(३) अश’आर का हिस्सा है और जो उन्होने मिर्ज़ा मज़हर ’जाने-जानाँ’ (फ़ारसी के मशहूर शायर थे और उर्दू में भी कहते थे लेकिन कम) की शायरी की ह्ज्व (बुराई) में कहे थे

"मज़हर " का शे’र फ़ारसी और रेख़्ता के बीच
"सौदा" यक़ीन जान कि रोड़ा है बात का

आगाह-ए-फ़ारसी तो कहें इस को रेख़्ता
वाक़िफ़ जो रेख़्ता का ज़रा होव ठाट का

अल क़िस्सा इस का हाल यही है तो सच कहूँ
कुत्ता है धोबी का कि न घर का न घाट का

(२०) जब कोई परेशान हो तो लोग उसकी तसल्ली के लिए कहते हैं कि

बाँट ले कोई किसी का ग़म यह मुमकीन ही नहीं
यार ग़म दुनिया में उठवाते नहीं मज़दूर से

यह शे’र लखनऊ के मशहूर उस्ताद शेख़ इमाम बख़्श ’नासिख" का है

२१) किसी पर हमेशा बुरा वक़्त ही रहे तो लोग कहते हैं कि

उम्र कटने को कटी पर क्या है ख्वा़री में कटी !
यह ख़्वाजा अमीनुद्दीन "अमीन’ अज़ीमाबादी का एक मत्ला है.नवाब मुस्तफ़ा खान ’शेफ़्ता’ (शागिर्द-ए-गा़लिब) के तज़्करे "गुलशन-ए-बे-ख़ार में इन का ज़िक्र है कि उस वक़्त मौसूफ़ (श्रीमान) ज़िन्दा थे (१८३४) ,पूरा मत्ला यूँ है

दिन कटा फ़रियाद में और रात ज़ारी में कटी
उम्र कटने को कटी पर क्या ही ख़्वारी में कटी

ज़ारी में कटी= रोने-धोने में कटी



(२२) एक मत्ला मीर तक़ी ’मीर’ के नाम से बहुत मशहूर है और उसकी आम शक्ल यूँ है

शिकस्त-ओ-फ़तह नसीबों से है वले अए ’मीर’
मुक़ाबला तो दिल-ए-नातवाँ ने खूब किया

दिल-ए-नातवाँ =कमजोर दिल ने
शिकस्त-ओ-फ़तह= हार-जीत


 
शे’र तो वाक़यी बहुत खूबसूरत है और इसका ’मीर’ के नाम से मन्सूब (निस्बत) हो जाना कोई हैरत की बात नहीं.लेकिन दर-अस्ल यह शे’र नवाब मुहम्मद यार ख़ान’अमीर’ रामपुरी का है.मौसूफ़ रियासत रामपुर के बानी नवाब फ़ैज़ुल्लाह ख़ान के छोटे भाई थे और उस्ताज़-उल-असातिज़ा (गुरुओं के उस्ताद) "क़ायम" चाँद्पुरी के शागिर्द थे. सही सूरत इस शे’र की यूँ है :

शिकस्त-ओ-फ़तह मियां इत्तिफ़ाक़ है लेकिन
मुका़बिला तो दिल-ए-नातवाँ ने खूब किया

इसी तरह एक और शे’र है जो ’मीर’ के नाम से मशहूर है हालां कि उनका नहीं है यह शे’र भी अपनी नज़ाक़त-ओ-बयाँ और खूबसूरती में ला-जवाब है

वो आए बज़्म में इतना तो’मीर’ ने देखा
फिर उसके बाद चिराग़ों में रोशनी न रही

एक किताब "कामिलान-ए-रामपुर" में "फ़िक्र" रामपुरी का बताया गया है. मज़े के बात यह है कि उसी किताब में इस को ’राज़’ याज़्दानी का भी लिखा गया है जो ’फ़िक्र’ रामपुरी के उस्ताद थे.सही शे’र सिर्फ़ तख़ल्लुस के फ़र्क के साथ यूँ है

वो आए बज़्म में इतना तो ’फ़िक्र’ ने देखा
फिर उसके बाद चिराग़ों में रोशनी न रही

(२३) अल्लामा ’इक़बाल’ की एक मशहूर ग़ज़ल के दो अश’आर यूँ है

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़र! नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
तू बचा-बचा के न रख इसे तिरा आईना है वो आईना
कि शिकस्त हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आईना-साज़ में

जबीन-ए-नियाज़ में =माथा टेकने की कामना में


[’आनन’ यानी यह ख़ाकसार ,अर्ज़ करता है कि यह पूरी ग़ज़ल ’बहर-ए-कामिल मुसम्मन सालिम ’ की एक मुस्तनद मिसाल है]
इसी ज़मीन और बह्र में एक शे’र मशहूर है जो ’इक़बाल’(१८६९-१९३८) का नहीं है बल्कि उनके एक हम-अस्र (समकालीन) शायर इकराम अहमद "लुत्फ़’ बदायूनी (१८७५-१९४३) का है

रूख़-ए-मुस्तफ़ा है वो आईना कि अब ऐसा दूसरा आईना
न हमारे बज़्म-ए-ख़्याल में ,न दुकान-ए-आईना-साज़ में

(मुस्तफ़ा= लकाब (उपाधि) है पैगम्बर मुहम्मद का)
२४) अब नीचे कुछ अश’आर और उनके लिखने वाले शायर का नाम दिए जा रहे है यह अश’आर किसी न किसी वजह से मशहूर है

सियाह बख्ती में कब कोई किसी का साथ देता है
कि तारीक़ी में साया भी जुदा होता है इन्सान से
-इमाम बख़्श ’नासिख़’

वे सूरत-ए-इलाही किस देश बस्तियाँ हैं
अब जिन के देखने को आँखे तरस्तियाँ हैं
-मिर्ज़ा रफ़ी ’सौदा’

गया वो हुस्न लेकिन रंग है रुख़्सार-ए-जानाँ पर
अभी बाक़ी है कुछ कुछ धूप दीवार-ए-गुलिस्ताँ पर
-"मुश्ताक़ देहलवी

ज़रा उनकी शोख़ी तो देखिए ,लिए ज़ुल्फ़-ए-ख़म-शुदा हाथ में
मिरे पीछे आ के दबे-दबे मुझे ’साँप’ कह के डरा दिया !

ज़ुल्फ़-ए-ख़म-शुदा =बल खाईं जुल्फ़ें

-मख़्फ़ी ; (’मुशाफ़ी’ की बेटी)

तुम्हे गै़रों से कब फ़ुर्सत ,मैं अपने ग़म से कब खाली
चलो बस हो चुका मिलना ,न तुम खाली, न हम खाली
-जफ़र अली ’हसरत’ देहलवी

सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं
गया वक़्त फ़िर हाथ आता नहीं
-मीर ’हसन’ देहलवी

लिख कर जो मेरा नाम ज़मीं पर मिटा दिया
उनका था खेल, ख़ाक में मुझको मिला दिया
-नवाब अख़्तर महल : (मुगल शाहजादी थीं)
(२५) एक दिन मिर्ज़ा ’गा़लिब’ के घर में उनके कुछ शागिर्द जमा थे और वो ख़ुद किसी काम से बाहर गये हुए थे.उनके एक शागिर्द ने न जाने किस तरंग एक मुहमल (अर्थहीन) मिस्रा कहा कि
"’शराब सींक पे डाली ,कबाब शीशे में’"
दूसरे शागिर्द खूब हँसे कि यह भी कोई बात हुई! इतने मे ’गालिब’ वापस आ गये.लोगों ने उनके सामने यह मिस्रा पेश किया.और उन्होने कहा कि ’इस मिस्रे ’पर यूँ गिरह लगा लो तो शे’र मुकम्मल हो जाए

किसी के सामने आने से साक़ी कि ऐसे होश उड़े
शराब सींक पे डाली ,कबाब शीशे में’

(२६) ’इक़बाल’ एक मर्तबा अलीगढ़ यूनिवर्सिटी गये हुए थे.चन्द लड़कों ने शोखी से एक मिस्रा मौजूं कर के उनकी ख़िदमत में पेश किया कि इस पर गिरह लगा दीजिए.मिस्रा यूँ था
"मछलियाँ दस्त में पैदा हो,हिरन पानी में"

’इक़बाल’ ऐसी बातों से परहेज़ करते थे.लेकिन लोगों की फ़रमाईश पर उन्होने फ़िलबदीह(तुरन्त) गिरह लगा कर शे’र मुकम्मल कर दिया

अश्क़ से दस्त भरे,आह से सूखे दरिया
मछलियाँ दस्त में पैदा हो,हिरन पानी में !

(२७) एक बार मीर ’अनीस’ ने एक शे’र का दूसरा मिस्रा मौजूं किया लेकिन पहला मिस्रा बन नहीं पा रहा था."अनीस’ के वालिद मीर ख़ालिक़ (जो खुद भी एक बुलन्द पाया मर्सियागो थे ) के इस्तिफ़्सार पर ’अनीस’ ने मिस्रा सुनाया

"अच्छा सवार होइए ,हम ऊँट बनते हैं"
{इस मिस्रा का पसे-मंज़र यह है कि ’अनीस’ वो वाक़िया क़लमबन्द करना चाह रहे थे जब एक बार इमाम हुसेन(जो अभी बच्चे थे) किसी बात पर ज़िद कर रहे थे तो हुज़ूर-ए-पाक ने उन्हे अपनी कमर पर बिठा कर सवारी करवाई थी.}
मीर ख़ालिक़ ने सुनते ही शे’र मुकम्मल कर दिया

जब आप रूठते हैं तो मुश्किल से मनते हैं
अच्छा सवार होइए ,हम ऊँट बनते हैं"

(२८) मीर ’अनीस’ ने एक बार किसी मर्सियाख़्वानी की महफ़िल में यह मिस्रा पढ़ा
’बह्रे अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’
इस पर सामयीन ने (सुनने वालों ने)शोर मचाया कि "बह्र-ए-अली" में ’ज़म’(खोट ,दोष) का पहलू निकलता है.क्योंकि "बह्र-ए-अली" तो "बहरे अली’(यानी कान से माज़ूर अली) पढ़ा या सुना जा सकता है और ज़ाहिर है कि यह बे-अदबी है.’अनीस’ ने फ़ौरन मिस्रा बदल दिया

"काने अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’

लोगों ने फ़िर शोर मचाया कि हज़रत अली "काने’(एक आँख वाले) नहीं थे.घबरा कर मीर ’अनीस’ ने एक बार फिर मिस्रा बदल दिया

"गंजे अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’
लोग फिर चीख उठे कि हज़रत अली "गंजे" भी नहीं थे.मीर ’अनीस’ ने एक बार फिर फ़ौरन मिस्रा बदल दिया
"कंजे़ अली के गौ़हर-ए-यक्ता हुसेन हैं’                                         (कंज़= खज़ाना)
और इस तरह उनकी जान छूटी
(२९) इन मिसालों से यह न समझा जाए कि हमेशा दूसरे ही "अनीस" की अश’आर मुकम्मल किया करते थे .मीर ’मुनीस’ (अनीस के छोटे भाई)ने एक दिन "अनीस’को अपना शे’र सुनाया.

न तड़पने की इजाज़त है न फ़रियाद की है
यूँ ही मर जाऊ ये मर्ज़ी मिरे सैयाद की है

मीर ’अनीस’ ने दूसरे मिस्रे में मामूली तरमीम (बदलाव) कर के शे’र को वो चार चाँद लगाया दिए जिस से यह शे’र ज़र्ब-ए-उल-मिसाल (लोक-मुहावरों) का दर्जा इख़्तियार कर गया

न तड़पने की इजाज़त है न फ़रियाद की है
घुट-घुट कर मर जाऊ ये मर्ज़ी मिरे सैयाद की है

---समाप्त----
(यह लेख २ भाग में है.पहला भाग दिनांक ३ दिसम्बर २००९..को इसी ब्लोग पर अपलोड किया गया है .)
प्रस्तुतकर्ता
-आनन्द.पाठक

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

दिलचस्प अदबी बातें ( उर्दू की रोचक साहित्यिक बातें) भाग १/२

[नोट : यह लेख मोहतरम जनाब सरवर आलम राज़ द्वारा रोमन उर्दू में लिखा गया है जो उनकी साईट www.sarwarraz.com
से साभार लिया गया है .जिसका सारा श्रेय सरवर साहब को और उनकी मेहनत को जाता है .यहाँ पर मात्र उसका हिन्दी में तहरीरे नकल (ट्रान्सलिटरेशन) किया गया है तथा मुश्किल उर्दू शब्दों का कोष्ठक में हिंदी भावार्थ भी दिया गया है जिससे हिन्दी भाषी भी इस लेख का लुत्फ़ उठा सकें---आनन्द.पाठक)


मोहतरम जनाब सरवर आलम राज "सरवर" एक मुख़्तसिर त’आर्रुफ़ : (संक्षेप में परिचय)
जनाब सरवर आलम राज "सरवर" साहिब उर्दू अदब के एक जाने माने नामचींन कलमकार,शायर,नस्रनिगार हैं और आप उर्दू के एक महफ़िल www.urduanjuman.com के मुन्तज़िम आला (प्रधान प्रबन्धक) भी है और गै़रों की महफ़िल भी आप बड़े अदब से याद किए जाते हैं और अपनी ग़ज़ल और तहरीर से इनायत फ़र्माते हैं.आप की शायरी ,मज़ामीन,तब्सरा,तहरीर वगैरह काफी अहम और पुरइल्म होते हैं .आप खुद एक वेब साइट चलाते है
www.sarwarraz.com
आप का जन्म १६ मार्च १९३५ में जबलपुर (मध्य प्रदेश,भारत) में हुआ था. आप ने सिविल इंजीनियरेंग की ऊची सनद-ए-तालिम अमेरिका से ली और बाद में वहीं बस गए.और उर्दू की फ़रोग़ी (प्रचार-प्रसार) में अपनी तमाम उम्र लगा दी और उर्दू की खिदमत में लगे हुए हैं. शायरी आप को अपने वालिद मरहूम जनाब अबुल फ़ैज़ मोहम्मद सादिक़ "राज चाँद्पुरी" साहब से विरासत में मिली है जो खुद अपने ज़माने के मशहूर शायर थे.

सरवर साहब दिमाग़ से तो सिविल इंजीनियर है मगर दिल से उर्दू के मानिंद शायर व नस्रनिगार हैं.
सरवर साहब की तफ़्सील त’आर्रुफ़ इस साइट पर देख सकते हैं www.sarwarraz.com

दिलचस्प अदबी बातें ( उर्दू साहित्यिक की रोचक बातें) भाग १/२
----सरवर आलम राज़ ’सरवर"


(क) तमहीद (प्राक्क्थन): काफी मुद्दत हुई मैनें उर्दू के इन्टरनेट की एक महफ़िल में "दिलचस्प अदबी हक़ाइक़" के उन्वान (शीर्षक) से मज़ामीन (लेखों) का एक सिलसिला पेश किया था.यह सिलसिला आरिफ़ लखनवी साहिब के उन मज़ामीन पर मब्नी(आधारित) था जो उन्होने बार-ए-सग़ीर(समन्दर पार) के मुख्तलिफ़ (विभिन्न) उर्दू रिसालों (पत्रिकाओं) में लिखे थे. चूँकि बैरून-ए-हिन्द-ओ-पाक के सायक़िन(प्रकाशित होने वालों) के रसायी(पँहुच) इन रिसालों तक नहीं है इसलिए मैनें इस सिलसिले को मामूली तब्दीलियों के साथ "नेट"पर चस्पा कर दिया था. ज़ेरे-नज़र मज़्मून (दॄष्ट्व्य लेख), मज़ामीन उन्हीं की एक ’तरक़्क़ीयाफ़्ता" शक्ल है जो मैने अब ज़ियादा वसीह (बड़े) पैमाने दुनिया-ए-उर्दू के सामने पेश कर रहा हूँ.
इस सिलसिले में चन्द अहम बातें मारूज़ी(प्रार्थित) हैं:-
१) इस तहरीर(लेख) का कोई हिस्सा राक़िम-उल-हरूफ़ (लेखक)की तहकी़क़ (खोज) का नतीज़ा नही है. इस काम का सेहरा (श्रेय)’आरिफ़ लखनवी और उन दूसरे अहबाब (दोस्तों) के सर जाता है जिन्होने यह तहकी़क़ की या बाद में इस में इज़ाफ़ा (बढ़ोत्तरी) किया.
२)मैने सिर्फ़ इस तहकी़क़ को मुख़्तसर(संक्षिप्त) तब्दिलियों और इज़ाफ़ों के साथ पेश किया है. इस मेंरी तब्ज़ा’द(मेरी मेहनत की) कोई चीज़ नही है.ये वज़ाहत (स्पष्टीकरण) निहायत ज़रूरी है ताकि मुझ पर सरक़ेह (चोरी) का इल्ज़ाम न लग सके !.उमीद है कि मज़्मून पढ़ते वक़्त आप ये बात ज़ेहन में रखेंगे .शुक्रिया!
आरिफ़ लखनवी साहब ने ’दिलचस्प अदबी हक़ाइक़’ के सिलसिले में ऐसे दिलचस्प अदबी और शे’री वाक़ियात और हक़ाइक़ पर रोशनी डाली है जिससे उर्दू का आम का़री (सामान्य पाठक) वाक़िफ़ नही है और है भी तो अच्छी तरह से नही है.मिसाल के तौर पर बहुत से अश’आर और मिसरे’ लोगों के इस्तेमाल में है लेकिन उन्हे शायर का नाम नहीं मालूम है या वह शे’र के दूसरे मिसरे से ना-वाक़िफ़ हैं या उन्हें शे’र की ’शान-ए-नुज़ुल’(य़ानी शे’र किस मौक़े पर और क्यूँ कहा गया था), का इल्म(जानकारी) नही है.
इन बातों की दरयाफ़्त और तस्दीक़ का काम बहुत तहक़ीक़ और मेहनत चाहता है.आरिफ़ साहब इस के लिए हमारे शुक्रिया के मुस्तहक़ (अधिकारी) है.यक़ीन है कि आप सब इन दिलचस्प अदबी बातों से महज़ूज़-ओ-मुस्तफ़ीद(आनन्द और फ़ायदा उठाये) होंगे.यहाँ यह कहना नामुनासिब नहीं कि आरिफ़ साहब की तहक़ीक़ को पढ़ कर कई उर्दू-दोस्त अहबाब ने इस में इज़ाफ़ा किया है और इस सिलसिले को मज़ीद दिलचस्प(और ज्यादा दिलचस्प) बनाया है .मैने इन इज़ाफ़ों को भी यहाँ शामिल कर लिया है .मै इन दोस्तों का भी मम्नून(आभारी) हूँ.
(ख) तक़रीब-ए-मुलाक़ात : अब आप ऐसे वाक़ियात और हादिसात (नई नई बातों और घटनाओं ) का लुत्फ़ उठाएं जो इस मज़्मून का मौज़ू (विषय) हैं !
(१) अपना माज़ी(अतीत) हर एक को प्यारा होता है और गुज़री हुई बातें भली मालूम होती हैं. आप ने देखा होगा कि लोग पुराना ज़माना याद कर के एक मिस्रा दिलसोज़ी से पढ़ते हैं

"वो आशिकी़ के हाय ज़माने किधर गये"

मुकम्मल शे’र (पूरा शे’र) इस तरह है

" फिरते थे दस्त-दस्त दीवाने किधर गये
वो आशिक़ी के हाय ज़माने किधर गये"

यह शे’र शाह मुबारक ’आरज़ू"(शागिर्द-ए-खा़न आरज़ू) का है ,मौसूफ़ (श्रीमान) ग्वालियर(भारत) के रहने वाले थे मगर बेशीतर उम्र दिल्ली में गुज़री, उनका ज़माना १७५६ के लगभग का है. उनका एक और मत्ला दर्ज-ए-ज़ेल (नीचे लिखा ) है

सर से लगा के पाँव तलक दिल हुआ हूँ मैं
याँ तक तो फ़न-ए-इश्क़ में कामिल हुआ हूँ मैं

(२) एक शे’र ज़बान-ज़द-ए-ख़ास-ओ-आम (छोटे-बड़े सब की ज़बान पर) है और हम इसको मौका़ बे-मौका़ पढ़ते रहते है

अब तो आराम से गुज़रती है
अ’क़िबत की ख़बर खु़दा जाने

आ’क़िबत =आख़िरत
अव्वल तो यह शे’र ही ग़लत पढ़ा जाता है ,दूसरे यह एक क़ता’ का हिस्सा है जो मुगल बादशाह शाह आलम का है.शाह आलम का तख़ल्लुस (उपनाम) ’आफ़्ताब’ था. पूरा क़ता’ इस तरह है

सुबह उठ जाम से गुज़रती है
शब दिल आराम से गुज़रती है
आ;क़िबत की ख़बर खु़दा जाने
अब तो आराम से गुज़रती है

शाह आलम ’आफ़्ताब’ का एक शे’र नज़्र-ए-क़ारीं (पाठकों के सामने) है

आये तो ख़्वाब में माह-ए-लिक़ा तो फ़िर
अए ’आफ़्ताब’ दौलत-ए-बेदार जानिये

माह-ए-लिक़ा= दीदार-ए-चाँद



(३) जब कोई शख़्स किसी दूसरे के फटे मे पैर (टांग) अड़ाता है और ख़्वाह मख़्वाह (बेमतलब)दख्ल़-ए-दर माक़ूलात(अच्छे भले के बीच में दख़ल) करता है तो लोग उस से अज़-राहे-नसीहत-ओ-तन्बीह (सरे राह चलते चलते नसीहत और उपदेश देना) कहते है

गै़रों की तुझको क्या पड़ी ,अपनी नबेड़ तूँ

नबेड़=सम्भाल


यह मिस्रा भी अक्सर ग़लत पढ़ा जाता है .इसकी सही शक्ल यूँ है   तुझको पराई क्या पड़ी अपनी नबेड़ तूँ

यह शेख़ मुहम्मद इब्राहिम "जौक़’(मिर्ज़ा ग़ालिब के समकालीन)की एक ग़ज़ल का मत्ला है. "जौक़’आख़िरी मुगल बादशाह बहादुर शाह’ज़फ़र’के उस्ताद थे .शायरी में ’ग़ालिब’ और ’जौक़’ की चश्म्कीं (नोंक-झोंक) निहायत मशहूर हैं. हर-चन्द(यद्यपि) कि’जौक़’ के यहाँ ’ग़ालिब’ की सी बुलन्दी-ए-ख़याल,नुदरत-ए-मज़ामीन( मज़ामीन में नवीनता) ,और लताफ़त-ए-ज़बान-ओ-बयान (भाषा और भाव का माधुर्य) नही है फ़िर भी उनका कलाम ज़बान-ओ-मुहावरे की सफ़ाई और सिका़हात(शुद्धता) के लिये मा’रूफ़ (मशहूर)है और उनका शुमार उर्दू के चोटी के मुस्तनद(प्रतिष्ठित) शो’अरा(शायरों) में होता है. इस निहायत मुश्किल ज़मीन में ’जौक़ ’ के मज़्क़ूरा:(ऊपर वर्णित) गज़ल के मज़ीद(कुछ और) चन्द अश’आर दर्ज-ए-ज़ैल (नीचे दर्ज)है

रिन्द-ए-ख़राब हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू

नाखू़न खु़दा ना दे तुझे ऐ पंज-ए-जुनून
देगा तमाम अक़्ल के बखिये उधेड़ तू

यह तंग-नाये-देह्र नहीं मंज़िल-ए-फ़राग
गाफ़िल! ना पाँव हिर्स के फैला,सुकेड़ तू
उल्फ़त का गर है नख़्ल तो सरसब्ज़ होयेगा
सौ बार जड़ से फ़ेंक दे उस को उखेड़ तू

उम्र-ए-रवाँ का तौसन-ए-चालाक इसलिये
तुझ को दिया कि जल्द करे याँ से एड़ तू

आवारगी से कू-ए-मोहब्बत के हाथ उठा
अए ज़ौक ! ये उठा न सकेगा खुखेड़ तू

दह्र= समय
मंज़िल-ए-फ़राग=मुक्ति की मंज़िल

हिर्स=लालच

नख़्ल= पेड़

तौसन= घोड़ा

(४) लोग जब किसी शख़्स को दूसरे के राज़-ए-दारून-ए-खाना अफ़्सां (प्रगट) करते हुए सुनते हैं तो अज़-राह-ए-इब्रत-ओ-अफ़सोस उस का तन्बीह(अफ़्सोस के दौरान तसल्ली) करते हुए कहते हैं कि " ऐसा ना कहो क्यों कि"
’मुँह से निकली ,हुई पराई बात !
अमूमन लोगों को ना तो इस शे’र का दूसरा मिस्रा’ मालूम है ना ही शायर के नाम का इल्म है .यह मिस्रा’ ’ख्वाज़ा हैदर अली "आतिश" का है जिनका शुमार शायरी के असातिज़ा (उस्तादों) में होता है . मुआमिला बन्दी,ज़बान-ओ-बयान की नफ़ासत-ओ-लताफ़त (काव्य-सौष्ठव और कथन का सौन्दर्य और माधुर्य )नीज़ुलू-ए-खयाल (विचारों और भावों की प्रासंगिता)आप की ग़ज़लों की नुमायां ख़ुसूसिआत (स्पष्ट विशेषता) है. इस ग़ज़ल के चन्द अश’आर मुलाहिज़ा फ़रमाइए:

लब-ए-शीरीं आयी उनकी बात
बन गई क़न्द की मिठाई बात

ताज़गी फ़िक्र की कभी ना गई
जब सुनाई ,नई सुनाई बात

यह सदा आती है ख़ामोशी से
मुँह से निकली ,हुई पराई बात

दामन उस गुल का क्या छुयेगी सबा
यह किसी ने है झूट उड़ाई बात

तेरे शीरीं कलाम को सुन कर
फिर न ’आतिश’ किसी की भायी बात

(५) मीर तक़ी ’मीर"(द:१८१०) की शायराना अज़मत के ए’तिराफ़ (शायरी की श्रेष्ठता के स्वीकारोक्ति) में मिर्ज़ा ’गालिब’ (१७९७-१८६९) का यह शे’र बहुत मशहूर है

"गालिब" अपना यह अक़ीदा है बकौल-ए-"नासिख़"
आप बे-बेह्रा है जो मो’तक़िद-ए-’मीर" नहीं

जैसा कि "गालिब’ ने कहा है कि इस शे’र का दूसरा मिस्रा’ शेख़ इमाम बख़्श "नासिख़" (१८३८) का है.’नासिख़ का कलाम उनकी मुश्किल पसन्दी के लिये मशहूर है. उनके जिस शे’र का मिस्रा’"गा़लिब" ने इस्तेमाल किया है वह यूँ है :

शुबह "नासिख" नही,कुछ "मीर" की उस्तादी में
आप बे-बह्रा है जो मो’तक़िद-ए-मीर नहीं

शुबहा =भ्रम ,doubt

बे-बह्रा हैं= छ्न्द ,बहर में नहीं हैं
मो’तक़िद=विश्वास(अक़ीदा)




अब शेख़ "नासिख" का ज़िक्र आया है तो ३-अश’आर और सुन लीजिए जो ज़र्ब-उल-मिसाल (लोकोक्ति/मुहाविरों) के तौर पर ज़बान ज़द-ए-खास-ओ-आम (छोटे-बड़े सबकी जुबान पर रहता) है

"ज़िन्दगी ज़िन्दादिली का नाम है
मुर्दा दिल ख़ाक जिया करते हैं!

सियाह-वक़्त में कब किसी का साथ देता है
कि तारीक़ी में साया भी जुदा होता है इन्साँ से
रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बाद
सुर्ख़ होता है इन्साँ ठोकरे खाने के बाद

तारीकी़ में= अँधेरे में



(६) मिर्ज़ा असद-उल्लाह खान "ग़ालिब" अपनों से बड़ों की अज़मत की ऐ’तिराफ़(श्रेष्ठता स्वीकार करने में) बिल्कुल नहीं हिचकिचाते थे.’मीर’ के हवाले से उनका शे’र ऊपर आ ही चुका है.उनका एक और मशहूर शे’र है

क़यामत है तर्ज़-ए-बेदिल में रेख्ता कहना

                                                            -असद-उल्लाह खाँ!


रेख़्ता = लिखने की एक शैली जिसमें ’गा़लिब’ को महारत हासिल थी

इस शे’र में ’ग़ालिब’ ने अपने मह्बूब शायर मिर्ज़ा अब्दुल का़दर ’बेदिल’का ज़िक्र किया है और उनके अन्दाज़-ए-बयान में उर्दू ग़ज़ल लिखने की मुश्किलात का ए’तिराफ़ (स्वीकार) भी किया है. मिर्ज़ा अब्दुल का़दर ’बेदिल’(वफ़ात १७२१) दिल्ली के रहने वाले थे और फ़ारसी के बेमिसाल शायर थे.उनकी शायरी का एक दिल फ़रेब और और मुन्फ़्रिद (अलग) अन्दाज़ था वह सीधी-सादी मज़्मून को भी इन्तिहाई खूबसूरत से लब-ओ-लहजे में,लेकिन इतने ही पेचीदा तरीक़े से बाँधते थे कि मज़्मून ना सिर्फ़ आसानी से समझ में आ जाता था बल्कि उसका लुत्फ़-ए-बयान भी दोबाला (दुगना) हो जाता था .मिर्ज़ा ’बेदिल’ ने उर्दू में भी मुख़्तसर सीताब’-आज़माई की है जिसके मुत्तलिअ(संबन्ध) से मालूम होता है कि अगर उर्दू की जानिब तव्जुह करते तो उस में भी बुलन्द-पाया(श्रेष्ठ) शायर क़रार दिए जाते .उनके दो उर्दू अश’आर पेश-ए-ख़िदमत है ;

मत पूछ दिल की बातें ,वो दिल कहाँ है हम में ?
वो तुख़्म-ए-बेनिशाँ का हासिल कहाँ है हम में ?

जब दिल के आस्ताँ पर इश्क़ आन कर पुकारा
पर्दे से यार बोला ’बेदिल’ कहाँ है हम में ?

(७) नवाब मिर्ज़ा खान ’दाग़’ देहलवी ,शायरी में मिर्ज़ा ’गा़लिब’ के शागिर्द थे. उनका कलाम तग़ज़्ज़ुल (ग़ज़ल के सौन्दर्य) और ज़बान-ओ-बयान की सफ़ाई के लिए मशहूर है. लफ़्ज़ ’ग़ज़ल’ का लुग़ावी (शब्द कोशीय dictionary ) मत्लब ’अपने महबूब से गुफ़्तगू करना’ है .इस हवाले से ’दाग़’ की शायरी में आशिक़ाना मज़ामीन ,मुआमलाबन्दी ,हिज्र-ओ-विसाल के क़िस्से वगै़रह बा-कसरात (अधिकाधिक)  मिलते हैं.ग़ज़ल के दूसरे मौज़ूआत (विषयों) मसलन दुनिया की बे-सबाती(नश्वरता) ,मारिफ़त (मोक्ष) ,तसव्वुफ़(अध्यात्म) वगै़रह पर उनका ज़ोर निस्बतन (अपेक्षाकॄत) कम है .इस की एक वजह तो उनकी उफ़्ताद-ए-तबाअ थी और दूसरी वजह ये थी कि उनकी सारी ज़िन्दगी ऐश-ओ-आराम से अमीराना माहौल में कटी.गु़रबत, तंग-दस्ती और परेशानी का उनको कभी सामना नहीं करना पड़ा.फ़िर यह भी एक अहम बात है कि उनकी ज़िन्दगी ही में उनकी बहुत क़द्र हुई,जिसकी एक मिसाल यह है (और यह उस ज़माने में शायरी में क़बूल-ए-आम का एक पैमाना था) कि जितनी ग़ज़लें ’दाग़’ की ज़नान-ए-बाज़ारी (तवायफ़ों )ने गाईं किसी और शायर की नहीं गाई गईं.आख़िर-ए-उम्र (उम्र के आख़िरी पड़ाव)में ’दाग़’ निज़ाम-ए-द्क्कन के उस्ताद हो गए और उसी ज़माने में(अल्लामा) इक़बाल ने उन के सामने ज़ानू-ए-तलाम्मुज़ (बड़े शागिर्द) तय कर के कुछ दिन उनसे इस्लाह ली थी.ज़ेल(नीचे) में ’दाग़’ के चन्द अश’आर पेश किए जाते हैं जो उनकी आम शायरी के रंग से मुख्तलिफ़ हैं

ग़मे दुनिया से गर पायी भी रुखसत सर उठाने की
फ़लक का देखना तक़रीब तेरे याद आने की

"दाग़’-ए-वारफ़्ता:-ए-उल्फ़त का ठिकाना क्या है
खा़ना बरबाद ने मुद्दत हुई घर छोड़ दिया

होश-ओ-हवास ताब-ओ-तावाँ ’दाग़’ जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं ,सामान तो गया

मिरे आशियाँ के तो थे चार तिनके
चमन उड़ गया ,आंधियाँ आते-आते

(८) दोस्तों की बेवफ़ाई और बेरुख़ी पर शिकायतन और तन्ज़न(व्यंग्य से) लोग एक शे’र पढ़ा करते हैं

वाबस्ता मेरे याद से कुछ तल्ख़ियाँ भी थी
अच्छा किया जो आप ने मुझको भुला दिया

अमूमन (आम तौर पर) यह शे’र साहिर लुध्यानवी का बताया जाता है जो कि ग़लत है.इस शे’र की सही शक्ल हस्ब-ए-जे़ल(नीचे दिए के अनुसार) है

वाबस्ता मेरे याद से कुछ तल्ख़ियाँ भी थी
अच्छा किया जो तुम ने फ़रामोश कर दिया !

और यह शे’र हसन "लतीफ़ी" का है जो ’साहिर’ के हम-वतन और हम-अस्र(समकालीन) भी! उनका मज्मूआ-ए-कलाम १९८९ में लाहौर से साया हुआ था जब कि वह खुद १९५३ में इन्तक़ाल कर चुके थे
(९) लोग जब पुराने ज़माने की बातें याद कर के जब अपनी हसरतों का ज़िक्र करते हैं या बुढ़ापे में अपने गुज़रे दिनों को याद करते हैं तो आम तौर पर एक शे’र पढ़ा करते हैं

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें
ऐसे हैं जैसे ख़्वाब की बातें

यह शे’र शेख़ मुहम्मद इब्राहिम "जौक़" का है जो आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ’ज़फ़र’ के उस्ताद और ’गा़लिब’के हम-अस्र (समकालीन)थे .उनकी और मिर्ज़ा ’गा़लिब’ की शायराना चश्म्कीं (नोंक-झॊंक) हमारी अदबी तारीख (इतिहास) का एक दिलचस्प हिस्सा है.उस्ताद ’जौक़’ की इसी ग़ज़ल के चन्द और अश’आर मुलाहिज़ा कीजिए

फिर मुझे ले चला उधर देखो
दिल-ए-ख़ाना ख़राब की बातें

तुझ को रुस्वा करेंगी खूब अए दिल
तेरी ये इज़्तिराब की बातें

देख ऐ दिल! न छेड़ क़िस्स-ए-ज़ुल्फ़ की बातें
कि यह है पेंच-ओ-ताब की बातें

ज़िक्र क्या जोश-ए-इश्क़ में है ऐ ’ज़ौक’
हम से हों सब्र-ओ-ताब की बातें

अब ,’ज़ौक’ का ज़िक्र चला है तो उनकी एक और मश्हूर ग़ज़ल के कुछ अश’आर सुन लीजिए:

लाई हयात आये ,क़ज़ा ले चली ,चले !
अपनी खु़शी न आये ,न अपनी खु़शी चले

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल-लगी चले ?

दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो यूँ ही ,जब तक चली चले

(१०) जब किसी मुश्किल मसले के हल में कोई कसर रह जाती है या मज़ीद परेशानी (कुछ अतिरिक्त परेशानी) की सूरत पैदा होने लगती है तो लोग कुछ तंज़ से(व्यंग्य से) और कुछ इज़हार-ए-हक़ीक़त के लिये कहते हैं कि ’अभी दिल्ली दूर है".
इस फ़िक़रे(बात) की बुनियाद मीर तक़ी ’मीर" के इस शे’र पर है

शिकवा-ए-आबला अभी से ’मीर’?
है पियारे हुनूज़ दिल्ली दूर !

(शिकवा-ए-आबला= पाँवों में छालों की शिकायत)
दूसरे मिसरे में ’पियारे’ का तल्लफ़ुज़ का़बिले ग़ौर है क्योंकि यह हमारे जाने पहचाने ’प्यारे’ से मुख़्तलिफ़ है.! अगर शे’र में इसे ’प्यारे " बाँधा और पढ़ा जाए तो मिस्रा वज़्न से ख़ारिज हो जायेगा.इस क़िस्म के इज़्तिहादात (कोशिशें)’मीर’ के यहाँ काफ़ी तादाद में मिलते हैं और इनकी बुनियाद अल्फ़ाज़ के ऐसे इस्तेमाल और तल्लफ़ुज़(उच्चारण) पर होते हैं जो उस ज़माने के अवाम में मक़्बूल (स्वीकार्य) था
इसी तरह किसी मुश्किल मंज़िल से सही सलामत गुज़र जाने पर अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए ये मिस्रा
पढ़ा जाता है:

जान है तो जहान है प्यारे !

यह भी ’मीर’ का मिस्रा है ,पूरा शे’र सुनिये

’मीर’! आमदन भी कोई मरता है?
जान है तो जहान है प्यारे !

(आमदन=जान-बूझ कर)
देखिय ’मीर’ के अश’आर कैसे कैसे मुक़ामात (जगहों) पर इस्तेमाल होते हैं और लोगों को इल्म भी नही होता कि इनका खा़लिक़ (रचयिता)कौन है
इस तरह जब कोई शख़्स किसी दूसरे से बतौर हमदर्दी और दोस्ती, उस का हाल पूछता है तो वह शख़्स शुक्रिया अदा करते हुए यूँ कहता है

तुम ने पूछा तो मेहरबानी की !

यह भी खु़दा-ए-सुख़न ’मीर’ के शे’र का एक मिस्रा है.पूरा शे’र यूँ है

हाल-ए-बद गुफ़्तानी नहीं मेरा
तुम ने पूछा तो मेहरबानी की

( गुफ़्तानी= कहने के लायक)
----------------------------
(११) ’मीर’ की तरह ’मोमिन’ के भी कई मिसरे और अश’आर लोगों की ज़बान पर ज़र्ब-उल-मिसाल (मुहावरे) के तौर पर चढ़ा हुआ है .मसलन कोई शख़्स किसी दूसरे की शिकायत करे और नतीजे में उस का ही ख़ुद उल्टा क़सूर निकल आए तो लोग तंज़न (कटाक्ष में) एक मिस्रा पढ़ते हैं

’मैं इल्ज़ाम उस को देता था ,क़ुसूर अपना निकल आया

पूरा शे’र यूँ है

यह उज़्र-ए-इम्तिहान-ए-जज़्ब-ए-दिल कैसा निकल आया
मैं इल्ज़ाम उस को देता था ,क़ुसूर अपना निकल आया !

इसी तरह अगर बहस के दौरान किसी शख़्स के सारे दलील बातिल(ग़लत) साबित हों, तो लोग हँस कर कहते हैं कि

दावा-ए-खिज़्रे बे-दलील हुआ !

यह भी ’मोमिन’का एक मिस्रा है .शे’र इस तरह है

आस्माँ राह पर नहीं आता
दावा-ए-ख़िज़्रे बे-दलील हुआ !

(खिज़्र एक पैगम्बर का नाम है जिनसे भूले भटके मुसाफ़िरों की रहनुमाई मन्सूब है)
मोमिन ख़ान ’मोमिन’ का एक मिस्रा तो इस क़दर मक़्बूल है कि उसकी तशरीह के लिए पूरे शे’र का लिख देना ही काफ़ी है

’ उम्र सारी तो कटी इश्क़े बुताँ में ’मोमिन’
आखिरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे !

आप ने यह भी देखा होगा कि लोग किसी को उस के असली ( या फ़र्ज़ी) इश्क़ से बाज़(दूर) रखने की कोशिश करें तो वह कह देता है कि -’क्या करूँ? दिल पर बस ही नहीं है’  -’मोमिन इस को यूँ कहते हैं

जो फिर जाये उस बेवफ़ा से तो जानूँ
कि दिल पर नहीं ज़ोर चलता किसी का !

और आप ने लोगों को तसल्ली देते हुए यह भी सुना होगा कि " भाई ! अब खु़दा ख़ुदा करो’.देखिये इस ख़्याल को मोमिन ने कितनी ख़ूबसूरती से बाँधा है

नाम-ए-इश्क़े-बुतां न लो ’मोमिन’
कीजिये बस खु़दा ख़ुदा साहेब !

(१२) ’मीर’ की शायराना अज़्मत(शायरी की श्रेष्ठता) के सभी क़ायल हैं.उर्दू अदब के इस सिलसिले में काफी लिखा जा चुका है.’मीर’ का एक निहायत दिलकश शे’र है

अब के जुनूं में फ़ासिला शायद ना कुछ रहे
दामन के चाक और गिरेबां के चाक में !

इस पर मौलाना अल्ताफ़ हुसेन ’हाली’(शागिर्द-ए-गा़लिब)ने एक बडा़ पुर-लुत्फ़ लतीफ़ा लिखा है जिस से न इस शे’र की ख़ूबी ज़ाहिर होती है बल्कि ’मीर’ के उस बुलन्द मका़म का भी अन्दाज़ा होता है जो उनको दूसरों की निगाहों में हासिल था.
मौलाना ’हाली’ के ही अल्फ़ाज़ मे यह लतीफ़ा सुनिये ;-

’मौलाना आज़ुर्दाह के मकान पर उनके चन्द एहबाब,(कुछ दोस्त) जिनमें ’मोमिन’और ’शाइफ़्ता’भी थे,इक रोज़ जमा थे .’मीर’ का यह शे’र पढ़ा गया. शे’र की बे-इन्तिहा तारीफ़ हुई.और यह सब को ख़याल हुआ कि इस काफ़िया को हर शख़्स अपने -अपने सलीक़े से और फ़िक़्र के मुआफ़िक बाँध कर दिखाये .सब क़लम दवात और काग़ज़ लेकर अलग बैठ गये और फ़िक़्र करने लगे. उसी वक़्त एक और दोस्त वारिद हुए (आए). मौलाना से पूछा ’हज़रत किस फ़िक्र(चिन्ता) में बैठे हैं? मौलाना ने कहा-
"क़ुल-हो-वल्लाह’ का जवाब लिख रहा हूँ !"
(क़ुल-हो-वल्लाह : क़ुरान की एक निहायत फ़सीह-ओ-बलीग़ सूरा का नाम है)

मौलाना ’हाली’ ने इस शे’र के मुत्तलिक़ यह राय ज़ाहिर की है

"ज़ाहिर है कि जोश-ए-ज़ुनून में गिरेबाँ या दामन या दोनो का  चाक करना मुब्तज़ल पामाल (निहायत घटिया ) मज़्मून है जिस को क़दीम (पुराने)ज़माने से लोग बाँधते चले आए हैं ,ऐसे चीथड़े हुए मज़्मून को ’मीर’ ने बा-वुजूद ग़ायत दर्जे की सादगी के अछूते ,निराले और दिलकश उस्लूब (दिल को छूने वाली शैली)में बयान किया है कि इस से बेहतर उस्लूब समझ में नही आ सकता.इस उस्लूब में बड़ी ख़ूबी यह है कि सीधा-सादा है और बा-वजूद इसके कि बिल्कुल अनोखा है."

(१३) एक ग़ज़ल का मशहूर मत्ला ,जो बार-ए-सग़ीर(समन्दर पार) हिन्द-ओ-पाक की जंग-ए-आज़ादी के दौरान अक्सर सुना जाता था,नीचे दिया जा रहा है.जलसों और जुलूसों में अंग्रेजों पर तन्ज़न इस शे’र को खास तौर से जोश-ओ-ख़रोश और वलवले के साथ गाया जाता था

सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

आम तौर से इस शे’र को मौलाना ज़फ़र अली खा़न से मन्सूब (सम्बद्ध) किया जाता है,लेकिन यह बात सही नही है.दर-अस्ल यह मत्ला एक जोशीले नज़्म का है जो एक मुहीब्ब-ए-वतन( देशप्रेमी) लेकिन तक़रीबन गुमनाम शायर राम प्रसाद’बिस्मिल’ शाह्जहाँपुरी ने जंग-ए-आज़ादी के ज़माने में लिखी थी.’बिस्मिल’ साहेब १८९३ में एक मज़हबी घराने में पैदा हुए थे. बचपन से ही उन्हे हिन्दुस्तान पर अंग्रेजों के तस्सलुत (कब्जे )से नफ़रत थी और होश सँभालते ही वो वतन की आज़ादी के लिये तह-ए-दिल से ख़्वाहाँ थे.उन्होने १९ -साल की उम्र से ही तहरीक-ए-आज़ादी में सरगर्मी से हिस्सा लेना शुरु कर दिया था और १९२२ में ’हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशियेसन"के रुक्न(स्तम्भ) भी बन गये थे.यह अन्जुमन आज़ादी के जंग में हर हर्बेह को रवा (उचित) समझती थी.चुनांचे १९२५ में ’बिस्मिल’ साहब ने अपने चन्द साथियों के साथ मिल कर काकोरी (लखनऊ के क़रीब एक क़स्बा है ) के पास एक ट्रैन लूटने के लिये डाका डाला ताकि सियासी कामों के लिये पैसा मुहैया कर सकें. इस वारदात के नतीजे में वह गिरिफ़्तार हुए और मुक़्दमे के बाद १९ दिसम्बर १९२७ को ’बिस्मिल साहब को फ़ाँसी दे दी गई. हक़ मगफ़िरत(भगवान उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान ) करे. अजब आज़ाद मर्द था !
’बिस्मिल’ साहब बहुत अच्छा शे’री ज़ौक (शे’रों में रुचि) रखते थे.मज़्कूरा (उपर कही गई) मत्ले वाली उनकी पूरी नज़्म इस तरह है

सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है !

रह रव-ए-राह-ए-तमन्ना! रह न जाना राह में
लज़्ज़त-ए-सेहरा-नवर्दी दूरी-ए- मन्ज़िल में है !

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है?

ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत तेरे जज़्बों के निसार
तेरी क़ुर्बानी का चर्चा गै़र की महफ़िल में है

साहिल-ए-मक़्सूद पर ले चल खु़दारा नाखु़दा
आज हिन्दोस्तान की कश्ती बड़ी मुश्किल में है

दूर हो अब हिन्द से तारीकी-ए-बुग़्ज़-ओ-हसद
बस यही हसरत ,यही अरमान हमारे दिल में है

वो ना अगले वलवले हैं अब ना अरमानो की भीड़
एक मिट जाने की हसरत अब दिल-ए-’बिस्मिल’ में है!

’बिस्मिल’ साहेब की एक और नज़्म इसी ज़मीन और बह्र में दर्ज-ए-ज़ेल है,(नीचे दर्ज है) पढि़ये और लुत्फ़-अन्दोज़(आनन्दित) होइए

चर्चा अपने क़त्ल का अब यार की महफ़िल में है
देखना है यह तमाशा कौन सी मंज़िल में है

देश पर क़ुर्बान होते जाओ ऐ हिन्दियों
ज़िन्दगी का राज़ मुज़्मिर खंजर-ए-क़ातिल में है

दूर हो अब हिन्द से तारीकी-ए-बुग़्ज़-ओ-हसद
बस यही हसरत ,यही अरमान हमारे दिल में है

बाम-ए-रफ़’अत पर चढ़ा दो देश पर होकर फ़ना
’बिस्मिल’ अब इतनी हवस बाक़ी हमारे दिल में है

(१४) मीर’अनीस’(१८०२-१८७४): अपनी मर्सिया निगा़री के लिए निहायत मशहूर हैं.इस फ़न में उनकी मिर्ज़ा दबीर बेग से चश्मकशीं (नोंक-झोंक) उर्दू अदब की तारीख (इतिहास) का निहायत दिलचस्प बाब (अध्याय) है.एक मर्तबा मीर’अनीस’ एक मर्सिया की फ़िक्र में माह्व (खोए) थे और कुछ परेशान से नज़र आ रहे थे कि उनकी बेगम का उधर से गुज़र हुआ .उन्होने अपने शौहर को परेशान देख कर पूछा कि "क्या बात है"? आप किस सोच में बैठें हैं.? मीर ’अनीस’ ने जवाब दिया "क्या बताऊँ ? एक बहुत अच्छा सा मिस्रा हो गया है उसकी जोड़ का दूसरा सोच रहा हूँ" बेगम के पूछने पर उन्होने यह मिस्रा पढ़ा

:’या-रब ! रसूल-ए-पाक की खेती हरी रहे"

बेगम ने बे-साख़्ता (अविलम्ब) कहा कि "दूसरा मिस्रा यूँ लिख दीजिये

" सन्दल से मांग ,बच्चों से गोदी भरी रहे"

मीर साहब फड़क उठे. इस तरह यह मत्ला मुक्क्मल होकर मुहावरा-बन्दी की खूबसूरती की बाइस ज़र्ब-उल-मिसाल (लोकोक्ति) हो गया.

यारब! रसूल-ए-पाक की खेती हरी रहे
सन्दल से मांग,बच्चों से गोदी भरी रहे !

(१५) मौलाना अल्ताफ़ हुसेन ’हाली’एक का़दिर-उल-कलाम (बात चीत करने में निपुण) शायर और एक एहद-साज़ नस्र निगार थे.वह अपनी नज़्मों (ख़सूसन : मुसद्दस-ए-हाली)[ खसूसन=ख़ास तौर से) के लिए बहुत मशहूर हैं.आप सर सैय्यद अहमद खान के साथियों मे से थे.और उर्दू शे’र-ओ-अदब को उसकी रिवायती (रस्मी) बन्दिशों से आज़ाद कर के उसे ज़माने और वक़्त की तक़ाज़ों से हम-आहंग (एक सी राय)करने की कोशिशों में पेश-पेश थे."हाली" की तस्नीफ़ (रचनाओं) में "यादगार-ए-गालिब"और "मुक़दमा-ए-शे’र-ओ-शायरी" बहुत मशहूर और अहम है.वह ग़ज़ल के भी आला पाये के (प्रमुख) शायर थे और इस में मिर्ज़ा’ग़ालिब’ के शागिर्द थे .चुनांचे अपने एक शे’र में कहते हैं

"हाली" ! सुख़न में "शायफ़्ता" से मुस्तफ़ीद हूँ
शागिर्द "मीरज़ा" का ,मुका़लिद हूँ ’मीर’ का !

(नवाब मुस्तफ़ा खान"शायफ़्ता" मिर्ज़ा "गालिब" के शागिर्द थे.मीरजा से खुद "ग़ालिब"की जानिब इशारा है और ’मीर’ से मुराद मीर तक़ी ’मीर’ है)
ज़ेल (नीचे) में "हाली" के चन्द ग़ज़लिया अस’आर दर्ज किये जाते हैं .देखिये तग़ज़्ज़ुल(ग़ज़लियत) में उनका पाया किस क़दर बुलन्द था

इक उम्र चाहि्ये कि गवारा हो नीश-ए-इश्क़
रख्खी है आज लज़्ज़त-ए-ज़ख्म-ए-जिगर कहाँ

किस से पैमान-ए-वफ़ा बाँध रही है बुलबुल ?
कल ना पहचान सकेगी गुल-ए-तार की सूरत !

इश्क़ सुनते थे जिसे हम वो यही है शायद
खु़द-बा-खु़द दिल में है इक शख़्स समाया जाता !

कर दिया चुप वाक़ियात-ए-देह्र ने
थी बहुत हम में भी गोयायी बहुत !

याराना-ए-तेज़गाम ने मंज़िल को जा लिया
हम मह्वे नाला-ए-जरस-ए-कारवां रहे !

दरिया को अपनी मौज की तुग़ानियों से काम
कश्ती किसी की पार हो या दरमियां रहे !

तुग़यानियाँ= जल-प्लावन, सैलाब



(१६) एक मिस्रा लोग हालात की गै़र मामूली और तेज़-रफ़्तार तब्दीली पर अक्सर पढ़ते हैं

"निकले जो मयकदे से तो दुनिया बदल गयी !"

पूरा शे’र दर्ज-ए-ज़ेल है.शायर "गुस्ताख़" रामपुरी हैं जो हज़रत ’अमीर’ मीनाई के शागिर्द थे और मुद्दतों अलीगढ़ में जेलर के ओहदे पर फ़ाइज़(पद्स्थापित) थे :

सद-साला दौर-ए-चर्ख़ था सागर का एक दौर
निकले जो मयकदे से तो दुनिया बदल गई !

(१७) एक और मिस्रा ज़बान-ज़द-ए-खा़स-ओ-आम (सभी छोटे-बड़े की जबान पर) है और लोग शायर या पूरे शे’र से अमूमन ना-वाक़िफ़ है

’शाम कहते हैं जिसे, है सहर-ए-परवाना"
पूरा शे’र यूँ है

है ज़माने से जुदा रोज़-ओ-शब -ए-सोख्तागाँ
शाम कहते हैं जिसे है सहर-ए-परवाना

रोज़-ओ-शब -ए-सोख्तागाँ =दिन रात प्रेम में जलने वाले



इसी तरह एक और मिस्रा मशहूर है जिसे इन्तेज़ार और बेचैनी के वक़्त पढ़ा जाता है

"शिताब आ! कि नहीं ताब-ए-इन्तिज़ार मुझे’

 "शिताब = जल्दी
यह पूरा शे’र इस तरह है

तिरा ख़याल सताता है बार-बार मुझे
’शिताब आ ! कि नहीं ताब-ए-इन्तिज़ार मुझे!

ये दोनो अश’आर मीर मुहम्मद अली "बेदार" के हैं(१७४१-१८२१) जो ख्वाज़ा मीर "दर्द" के शागिर्द थे और मीर तकी़ ’मीर" और मिर्ज़ा रफ़ी "सौदा’ के हम-अस्र( समकालीन)
(१८) किसी शख्स को अपना गुज़रा हुआ अच्छा वक़्त याद करते देख कर लोग एक शे’र बतौर-ए-तन्ज़ और कुछ इज़हार-ए-हक़ीक़त के लिए पढ़ते हैं

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें
ऐसे हैं जैसे ख़्वाब की बातें

यह शेख इब्राहिम "ज़ौक" की एक गज़ल का मत्ला है.इसी गज़ल के चन्द अस’आर दर्जे ज़ैल (नीचे दर्ज ) है
फ़िर मुझे ले चला उधर देखो !
दिल-ए-खा़ना ख़राब की बातें

माह्ज़बीं याद है कि भूल गये? माह्ज़बीं=चाँद सा चेहरा
वो शब-ए-माहताब की बातें

तुझको रुसवा करेंगी खूब ऐ दिल!
तिरी ये इज़्तिराब की बातें इज़्तिराब=बेचैनी

ज़िक्र क्या जोश-ए-इश्क़ में ऐ ’ज़ौक़"
हम से हों सब्र-ओ-ताब की बातें

(१९) २-मशहूर मत्ला दर्ज-ए-ज़ैल है .पहला मत्ला एक फ़िल्म में भी आ चुका है. फ़िल्म और गुल-ओ-कारा (कलाकारों)का नाम ज़ेहन से उतर गये हैं

हमें तो काटनी है शाम-ए-ग़म में ज़िन्दगी अपनी
जहाँ वो हों वहाँ ऐ चांद ले जा चाँदनी अपनी

तमन्ना थी तो बस ये थी तमन्ना आख़िरी अपनी
कि वो साहिल पे होते और कश्ती डूबती अपनी

ये मत्ला ’शीरी" भोपाली मरहूम (वफ़ात(मॄत्यु) १९८९) के हैं.जहाँ तक राक़िम-उल-हरूफ़ (लेखक) की याददास्त काम करती है ’शीरी’साहेब हज़रत ’सीमाब’अक़बराबादी के शागिर्द थे.मेरे वालिद मरहूम (हज़रत "राज़’ चांदपुरी) भी "सीमाब" साहब से शरीफ़-ए-तलम्मुज़ (शिष्ट-शिष्यता)रखते थे और उनकी ’शीरी’साहब से ख़त-ओ-किताबत थी.जिस फ़िल्मी गाने का ऊपर ज़िक्र हुआ है उसका एक और शे’र है

तक़ाज़ा है येही दिल का वहीं चलिये वहीं चलिए
वो महफ़िल हाय!जिस महफ़िल में दुनिया लुट गई अपनी !
(२०) जब किसी का कोई नुक़्सान हो जाए और कुछ मतलब-परस्त लोग उस से फ़ायदा उठाना चाहें तो यह शे’र पढ़ा जाता है

दीवार क्या गिरी मिरे कच्चे मकान की
लोगों ने घर के सहन में रस्ता बना लिए!

सहन= आंगन
यह शे’र सिब्ते-अली ’सबा’ का है जो रावलपिण्डी (पाकिस्तान) के क़रीब एक फ़ैक्टरी में मामूली मुलाज़िम थे और वहीं ४१ साल की उम्र में उनकी वफ़ात (मृत्यु) हुई.

(२१) बाज़ औका़त (कभी-कभी) कोई काम हज़ार कोशिश के बावजूद अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ नहीं हो पाता है और लोग ऐसे नाकामी पर एक मिस्रा पढ़ते हैं:

" जो ख़ुदा ने लिख दिया उसको मिटा सकते नहीं"
यह मिस्रा मीर इज़्ज़तुल्लाह खाँ "इश्क़’ देहलवी का है और पूरा शे’र इस तरह है

सब्ज़ ख़त की दिल से उल्फ़त हम उठा सकते नहीं
जो खु़दा ने लिख दिया उसको हम मिटा सकते नहीं

मीर "इश्क़" साहेब को अपने वालिद हकीम क़ुदरतुल्लाह खां "का़सिम"से शायरी में तलम्मुज़ (शिष्यता)हासिल था.उर्दू शायरी के मशहूर तज़्करे (चर्चे) "गु़लशन-ए-बेख़ार" में उनका ज़िक्र है.आप ने हकीम सनाउल्लाह "फ़िराक़" से भी मशविर-ए-सुख़न किया था.तक़रीबन १८५४ में आप का इन्तेका़ल हुआ.मीर "इश्क़" का एक और मिस्रा भी मशहूर है जिसको लोग तंज़िया तौर पर अपने किसी दोस्त या महबूब की बे-नियाज़ी(उपेक्षा) पर पढ़ते हैं

हम कौन हैं साहब ,हमें क्यों याद करोगे !
पूरा शे’र इस तरह है;-

" तुम गै़र के घर बैठ के दिल शाद करोगे
हम कौन है साहेब ,हमें क्यों याद करोगे !

(२२)एक शे’र अकसर लोग दोस्तों और अज़ीज़ों की बे-मुरव्वती और बे-रुखी पे पढ़ा करते हैं:-

नहीं उल्फ़त तो मुरव्वत ही सही
भूल जाना तिरी आदत ही सही

दर-अस्ल यह शे’र दो (२) मुख़्तलिफ़ अश’आर के मुख़्तलिफ़ मिसरों को मिला कर बनाया गया है.यह अश’आर दर्जे ज़ेल है और हज़रत गु़लाम भीक "नैरंग" के हैं.मौसूफ़(श्रीमान) १८७६ में मौज़ा दोराना ज़िला अम्बाला में पैदा हुए थे और आप ने लाहौर में ७६ साल की उम्र में १९५२ में वफ़ात (मृत्यु) पाई.आप ने गवर्नमेन्ट कालेज़ से बी०ए० किया था और अल्लामा "इक़बाल’ के हम जमात (सहपाठी) और दोस्त थे.अब वो अश’आर सुनिए जिनके मिसरों से मज़्कूरा(ऊपर वर्णित ) शे’र तश्कील दिया गया है

है मुसाफ़िर को निगाह भी काफी
नहीं उल्फ़त तो मुरव्वत ही सही

हम भी याद आयेंगे सर चढ़ के कभी
भूल जाना तिरी आदत ही सही

इन अश’आर को पढ़ कर बे-अख्तियार(बरबस) "गा़लिब" की यह ग़ज़ल याद आ जाती है:-

इश्क़ मुझको नहीं वहशत ही सही
मिरी वहशत तिरी शोहरत ही सही

क़ता कीजिए ना ताल्लुक़ हम से
कुछ नहीं है तो अदावत ही सही

अपनी हस्ती ही से हो जो कुछ हो
आगाही गर नहीं, ग़फ़लत ही सही

हम कोई तर्क-ए-वफ़ा करते हैं ?
ना सही इश्क़ ,मुसीबत ही सही

हम भी तस्लीम की खू डालेंगे
बे-नियाज़ी तिरी आदत ही सही

यार से छेड़ चली जाए ’ असद’
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही

(२३) बाज़ अश’आर ग़लत मशहूर है और अपने मज़्मून के ऐतिबार से इस क़दर शोहरत पा चुके हैं लोग मुख़्तलिफ़ मौकों पर उन्हे इसी तरह से पढ़ते हैं ! दर्ज-ए-ज़ेल शे’र इस तरह मशहूर है:-

यह दुनिया या इलाही! जल्वा-गाह-ए-नाज़ है किस की?
हज़ारों उठ गये,रौनक वही बाक़ी है महफ़िल की

दर-अस्ल यह एक मत्ला है और इसकी सही शक्ल यूँ है

यह दुनिया या इलाही! जल्वा-गाह-ए नाज़ है किस की?
हज़ारो उठ गये ,रौनक़ वही है आज तक इस की !

यह मत्ला "नादिर" काकोरवी के एक मुसद्दस (=ऐसी नज़्म जिसका हर बन्द छ्ह (६) अश’आर पर मुस्तमिल हो) का टीप का शे’र है.इस मुसद्दस का एक बन्द दर्ज-ए-ज़ेल है

अजब तर्कीब से साने ने रख्खी है बिना इस की

" साने=बनाने वाला, creator.
बिना=आधार

कि सदिया हो गयी इक ईंट भी इसकी नहीं खिसकी
लगी रहती है आमद-रफ़्त जिसमें रोज़ जिस-तिस की
वही रौनक है जिसकी और वही दिलचस्पियाँ जिसकी
यह दुनिया या इलाही !जल्वा गाह-ए-नाज़ है किस की
हज़ारो उठ गये ,रौनक़ वही है आज तक इस की

"नादिर"काकोरवी क़स्बा काकोरी ज़िला लखनऊ में १८६७ में पैदा हुए थे और वहीं १९१२ में उनका इन्तेका़ल हुआ .उन्होने जदीद नज़्म (आधुनिक कविता)की इब्तिदाई( प्रारम्भिकी) तश्कील (रूप-रेखा) के सिलसिले में मौलाना अल्ताफ़ हुसेन "हाली" (वफ़ात १९१४)और मौलाना मुहम्मद हुसेन "आज़ाद"(वफ़ात १९१०) के साथ काम किया था.

(२४) एक शे’र मुद्दतों से ज़बान ज़द-ए-ख़ास-ओ-आम है (सभी लोगो की जुबान पर है) लेकिन शायर का नाम शायद ही किसी को मालूम है

शह्र में अपने यह लैला ने मुनादी कर दी
कोई पत्थर से न मारे मिरे दीवाने को

यह शे’र शाह तुरब अली "क़लन्दर" का है.आप एक सूफ़ी-मानुस बुज़ुर्ग थे (१७८६-१८५८).इसी ग़ज़ल के चन्द अश’आर नीचे दिये जाते हैं

उड़ के आया है लगन में तिरे जल जाने को
शौक़ से फूँक दे ऐ शमा ! तू परवाने को

मैं समझता हूँ इशारात-ओ- किनायात तिरे इशारात-ओ- किनायात =इशारें और कनखियाँ
राज़-ए-माशूक़ से क्या इल्म है बेगाने को

शह्र में अपने लैला ने यह मुनादी कर दी
कोई पत्थर से न मारे मिरे दीवाने को

क्यों न यारी करे अब तिफ़्ल-ए-बरहमन से "तुरब’
ख़ाना-ए-यार समझता है वो बुत-ख़ाने को

इन की एक दूसरी ग़ज़ल का एक शे’र और भी सुन लीजिये :-

इधर मैं ग़म से रोता हूँ, उधर वो शोख़ हँसता है
कहीं बिजली चमकती है, कहीं पानी बरसता है

(२५) एक मिस्रा सदियों से बा-तौर-ए-मुहाविरा मशहूर है और मुगलों के हिन्दुस्तान में आमद कब्ल के (आने से पहले) खिलजी दौर से इस्तेमाल होता चला आ रहा है

ज़बान-ए-यार-ए-मन तुर्की वा मन तुर्की ना मी दानम

(मेरे महबूब की ज़बान तुर्की यानी तुर्किश है ,और मैं तुर्की से ना-वाक़िफ़ हूँ)
यह मिस्रा ऐसे मौकों पर पढ़ा जाता है जब दो अश्खास (शख़्स का बहु-वचन) गुफ़्तगू कर रहे हों और एक की बात दूसरे की समझ में नहीं आ रही हो.यह अमीर ख़ुसरो के शे’र क एक मिस्रा है.पूरा शे’र यूँ है :-

चेह खुश बूदे अगर बूदे ज़बानश दर दहान-ए-मन
ज़बान-ए-यार-ए-मन तुर्की वा मन तुर्की ना मी दामन !

(क्या ही अच्छा होता कि उस की ज़बान मेरे मुँह में होती.मगर (मेरा तो यह हाल है कि) मेरे महबूब की ज़बान तुर्की है और मैं तुर्की से ना-वाक़िफ़ हूँ
अमीर खु़सरो का एक मिस्रा बहुत मशहूर है:-

नर्ख़ बाला कुन की अर्ज़ानी हनूज़ !
(क़ीमत और ज़ियादा कर कि अभी बहुत कम है)

पूरा शे’र इस तरह है:-

हर दो आलम कीमत-ए-ख़ुद गुफ़्ताही
नर्ख़ बाला कुन की अर्ज़ानी हनूज़ !
[तूने अपनी क़ीमत (सिर्फ़) दो आलम ही बताई है .इस क़ीमत को और ज़ियादा कर कि अभी बहुत कम है ]

[अगले अंक भाग-२ में समाप्य)

-प्रस्तुतकर्ता आनन्द.पाठक